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'लल्लनटॉप कहानी कंपटीशन' में चुनी गई कहानी, मच्छरों के साथ मेरे प्रयोग

लल्लनटॉप कहानी प्रतियोगिता का चौथा संस्करण 2019 में आयोजित किया गया था. इसमें सैकड़ों लोगों ने भाग लिया. कई चरणों के क्रमबद्ध चयन के बाद हमने 15 टॉप कहानियां सेलेक्ट कीं, जिनको फिर से हमारे तटस्थ निर्णायक दल ने जांचा. 


Web Story Band 02
कई चरणों के क्रमबद्ध चयन के बाद हमने 15 टॉप कहानियां सेलेक्ट कीं, जिनको फिर से हमारे तटस्थ निर्णायक दल ने जांचा.

निर्णायक दल को इसमें से तीन कहानियां एक ही मयार की लगीं. इसलिए हर बार जहां प्रथम विजेता एक लेखक/लेखिका और उसकी एक कहानी को घोषित किया जाता था, अबकी बार हम घोषित करेंगे तीन विजेता. आपको उन्हीं तीन विजेताओं में से एक अतुल आत्मप्रकाश उर्फ़ गोपाल गोयल की कहानी ‘मच्छरों के साथ मेरे प्रयोग’ पढ़ा रहे हैं. ये कहानी मच्छरों के बहाने एक बड़े डिस्कोर्स को चुनौती देती है.

मच्छरों के साथ मेरे प्रयोग
अतुल आत्मप्रकाश

‘‘जो सोचेगा, वो समझेगा कि पक्षियों मे केवल शुतुर्मुर्ग और कबूतर ही गांधीवादी हैं.’’

इस तरह की व्यंगोक्ति भला अंतिम आचार्य के अलावा दूसरा कौन कर सकता था. शाश्वत शक्की अंतिम की बातें ही नहीं अदायें भी नकलातीत थीं.
कई वर्षां से नाओम चोम्सकी नामक द्रोणाचार्य के एकलव्य बन कर अंतिम ने अजीबो-गरीब तुलनाओं में महारत पाई थी. इस विधा में अंतिम का अब अगर किसी से मुकाबला था तो सिर्फ अंतिम से.

न जाने कितने दीवाने थे जो मानते थे इन अजीबो-गरीब तुलनाओं में बहुत गहरे मायने छुपे होते हैं. आवश्यकता है तो बस उन्हें खोजने और समझने की. अंतिम किसी भी विभूति, महापुरूष, विचारधारा, चिंतन धारा अथवा मान्यता की पलभर में लेनी-देनी कर सकता था. जे॰ एन॰ यू॰ परिसर और उसके बाहर भी चहुर्दिश अहर्निश फैलती इस कुख्याति में अब तो अंतिम को भी रस आने लगा था.

‘‘जैसे शुतुर्मुर्ग और कबूतर की अहिंसा उनकी आत्म-मुग्ध जिंदगियों की रक्षा करती आ रही है वैसे ही आप भी गांधीवादी और अगांधीवादी लोगो में भ्रमित होने से अपनी बुद्धि की रक्षा कर सकते है. एक सीधा सा सवाल पूछो और हो गया दूध का दूध और पानी का पानी’’,

अंतिम बोले जा रहा था.

‘‘एक अगांधीवादी का तर्क होगा कि गांधी को अहिंसा से प्राण-रक्षा की प्रेरणा शुतुर्मुर्ग और कबूतर से मिली हो सकती है, जबकि एक गांधीवादी आपको विश्वास दिला कर रहेगा कि इन दो पक्षी प्रजातियों के विलुप्त न होने का श्रेय भी गांधी को ही जाता है. गांधी की प्रेरणा के चलते ही यह अपनी प्राण-रक्षा में सफल हुये हैं. नहीं तो न जाने कबके निबट गये होते. और इस तरह गांधीवादी और अगांधीवादी दोनों ही अपने अपने तरीके से गांधी की हत्या करते रहते हैं.’’

एक ठंडी आह भरकर अंतिम मौन हो गया.

यूं तो कमरे मे छह लोग थे पर किसी को कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि क्या कहें. इस शांत अंतराल मे अंतिम विचार-मग्न हो गया और फर्श के एक बिंदु पर अपनी नजर टिका दी. मानो जैसे कि ध्यान लगा रहा हो या फिर एक शिकार-कुशल बाघ की मानिंद शिकार पर निर्णायक छलांग लगाने से पहले सांसें रोक रखीं हों.

चटाक-चटाक जैसी जोर से ताली बजने की आवाज ने अचानक से उस कमरे का सन्नाटा तोड़ दिया. अंतिम की विचार-यात्रा भंग करने का यह दुस्साहस कान्हा ने अनजाने में ही कर दिया था. असल में तो वह रक्त-पिपासु मच्छर मार रहा था.

खेल के मैदान में जॉन्टी रोहड्स जैसी त्वरित प्रतिक्रियाओं के लिये मशहूर कान्हा जे॰ एन॰ यू॰ फुटबाल टीम का गोलकीपर था. अपनी उन्हीं अति-सतर्क इंद्रियों से आज उसने अपनी रक्त-रक्षा की थी.

‘‘इस प्रकार मच्छर की हत्या करना हिंसा है या अहिंसा? क्या गांधीजी इसकी निंदा नहीं करते?’’,

आखिकार मैंने बोलने की धृष्टता कर ही दी. पूरा कमरा ठहाकों से गूंज उठा था.

‘‘ओ हो! मदहोश कुमार जी भी बोलते हैं?’’, शिप्रा ने ताना मारा.

‘‘क्यों नही, क्यों नही! राम कृपा हो तो लंगडे भी पहाड़ चढ़ जाते हैं और गूंगे बोलने लगते हैं. आज लगता है मदहोश कुमार जी पर भी राम कृपा हो गई है’’, कविता ने ज्ञान दिया.

‘‘मुझे तो लगता है कि यह शायद मच्छरों की भाषा जानते-समझते हैं, और उनसे बात करके ही इनका पेट भर जाता है. हमसे बात करने की फुर्सत ही कहां मिलती होगी’’, ये रूबिका की किलसन थी जो शब्दों में बयां हो रही थी.

‘‘मुझे तो आज पता चला कि हमारे गूंगे मदहोश कुमार जी वास्तव में इंसानों के बीच मच्छरों के एजेंट हैं. मच्छर पर हमला होते ही देखो कैसे श्रीमान मच्छरेश कुमार जी के अंदर की मच्छरियत जाग उठी’’,

अंतिम के इस व्यंग्य-बाण ने मानो मेरे प्रश्न की ही हत्या कर दी हो.

मधुरेश कुमार का मदहोश कुमार या गूंगा कुमार यहां तक की मच्छरेश कुमार बन जाना इन विचारशील व्यक्तियों के लिये हिंसा की परिभाषा में आता ही न था. ऊपर से मेरा प्रतिरोध न करना मेरी मौन सहमति थी और मेरी मौन सहमति इस हिंसा, इस भावनात्मक हिंसा के बेरोक-टोक चलाये रखने का लाइसेंस था. अंतरात्मा जैसी किसी चीज के बिना भी क्या गांधीवादी होना संभव है? क्या गांधीवाद एक आधुनिक अंधविश्वास बनकर तो नहीं रह गया है?
मेरे उपहास-पूर्ण तिरस्कार-पूर्ण उपनामों के नीचे मेरे प्रश्न गौण हो गये थे. विशाल हृदय से अपने उपनामों की अनदेखी करते हुये मैंने अपने प्रश्नों पर टिके रहने का फैसला किया.

‘‘अंतिम! मैं सिर्फ यह जानना चाह रहा था कि बार-बार काट रहे मच्छरों के प्रति क्या गांधी जी अपने अहिंसा के सिद्धांत पर अडिग रह पाते? यदि हां तो कब तक वे उन्हें अपना खून पिलाते रहते?’’

सहसा ही मेरी वाणी में दृढ़ता आ गई थी और उस दृढ़ता ने कमरे के माहौल को जादुई ढंग से बदलकर रख दिया था. पता नहीं सच था या मेरा भरम पर मुझे लग रहा था कि हर कोई मुझसे ही उत्तर की उम्मीद कर रहा था. दो साल की दोस्ती में पहली बार मुझे अंतिम भी सच में सच जानने-समझने का इच्छुक लग रहा था.

अपनी ही खाम-ख्याली से अपना हौसला बढ़ाते हुए मैं शुरू हो गया.

‘‘मेरी समझ में हिंसा पर आमादा व्यक्ति विचार-शून्य और संवेदना-शून्य होने से पहले खुद को समझाता है कि हिंसा ही एकमात्र उपाय है. अतः अंतरात्मा की आवाज को अनसुना किया जाना जरूरी है. प्रति-हिंसा उसकी इस सोच को बल देती है और हिंसा, प्रति-हिंसा का सिलसिला विनाश तक चलता रहता है. परंतु यदि प्रति हिंसा के स्थान पर अहिंसा से उत्तर दिया जाये तो हिंसा की अनिवार्यता पर प्रश्न-चिन्ह लग जाता है और अंतरात्मा की आवाज जोर-जोर से शोर मचाने लगती है. यही है गांधी का अहिंसा का संदेश.’’

‘‘क्या हम यह मान सकते है कि मच्छरों की अंतरात्मा होती है? और उस अंतरात्मा की आवाज उनका हृदय-परिवर्तन कर सकती है?’’

कमरे में फिर सन्नाटा पसर गया. एक बारगी फिर उस सन्नाटे को कान्हा की ताली ने तोड़ा. और, इस बार वह मच्छर नहीं मार रहा था. पलभर में ही दूसरे साथी भी ताली बजाने लगे थे.

‘‘पर इन दार्शनिक बातों का वास्तविकता के धरातल पर क्या लाभ?’’ अंतिम ने बड़ी गंभीरता से सवाल दागा.
‘‘मच्छर काटेंगे तो उन्हें मारना तो पड़ेगा ही. इसमें ज्यादा दिमाग खपाने की जरूरत ही क्या है?’’ रूबिका ने बोरियत भरे स्वर में बात को खत्म करने की नीयत से बोला.

‘‘घर में घुसपैठ कर खून पीते मच्छरों और देश में घुसपैठ कर खून बहाने वाले फिदायीन और जेहादियों में मुझे तो कोई अंतर नहीं नजर आता’’, मैंने बड़ी गंभीरता से कहा.

‘‘जैसे मच्छर मरते रहते हैं और नये-नये आते रहते है, वैसे ही नये-नये जेहादी भी आते रहते हैं. ऐसे तो यह सिलसिला चलता ही रहेगा’’, कान्हा ने पहली बार चर्चा में अपना योगदान दिया था.

‘‘इंसानों की तुलना मच्छरों से करना कितनी ओछी मानसिकता है.’’

अंतिम ने जोरदार गोला दागा था और सब मेरी ओर देखने लगे थे.

‘‘ब्रेन-वाशिंग से इंसान और मच्छर के बीच का अंतर मिटाया जाता है. असली खतरा उन ताकतों से है जो ब्रेन-वाशिंग करते और करवाते हैं.’’

‘‘गांधी जी मच्छरों को मारने से ज्यादा जोर सफाई पर देते थे. सफाई रखो और मच्छर पैदा ही न होने दो. यह है सच्ची अहिंसा.’’

मेरे चुप होते ही मुझे कमरे में पसरे गहन सन्नाटे का अहसास हुआ मानो हर कोई सोच रहा हो कि, ‘‘आखिर सफाई रखी कैसे जाये?’’


वीडियो – लल्लनटॉप कहानी कॉम्पिटिशन का रिजल्ट आ गया है, जानिए टॉप 15 कहानियां किनकी निकलीं!

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