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'लल्लनटॉप कहानी कंपटीशन' में चुनी गई कहानी - चार टांगों वाला चिकन

लल्लनटॉप कहानी प्रतियोगिता का चौथा संस्करण 2019 में आयोजित किया गया था और इसमें सैकड़ों लोगों ने भाग लिया था. कई चरणों के क्रमबद्ध चयन के बाद हमने 15 टॉप कहानियां सेलेक्ट कीं, जिनको फिर से हमारे तटस्थ निर्णायक दल ने जांचा.


Web Story Band 02
कई चरणों के क्रमबद्ध चयन के बाद हमने 15 टॉप कहानियां सेलेक्ट कीं, जिनको फिर से हमारे तटस्थ निर्णायक दल ने जांचा.

निर्णायक दल को इसमें से तीन कहानियां एक ही मयार की लगीं. इसलिए हर बार जहां प्रथम विजेता एक लेखक/लेखिका और उसकी एक कहानी को घोषित किया जाता था, अबकी बार हम घोषित करेंगे तीन विजेता. और बाकी 12 विजेता होंगे, उप विजेता. आज हम उन्हीं 12 विजेताओं में से एक कपिल मदान की कहानी ‘चार टांगों वाला चिकन’ आपको पढ़ा रहे हैं. ये कहानी एक मध्यमवर्गीय परिवार की साधारण सी ज़िन्दगी से उपजा एक व्यंग्य है, जो ये बताता है कि कैसे चार पेग के बाद एक मध्यमवर्गीय परिवार का व्यक्ति, अपनी आकांक्षाओं को लेकर बातें करने लगता है. चार पेग के बाद इसलिए क्योंकि सोबर हालत में ज़िन्दगी का पहिया खींचने से फुर्सत ही नहीं मिलती.

चार टांगों वाला चिकन

कपिल मदान

‘शराब, कबाब और शबाब’ – उर्दू के इन तीन लफ़्ज़ों की प्लेसमेंट में मिसॉजिनी और बेअदबी कूट-कूट कर भरी हुई हैं और इन्हें सुनते ही मेरे ज़हन में कई ख़याल और सवाल उमड़ते हैं. मसलन वह कौन बुद्धिजीवी रहा होगा जिसने पहली बार इन तीन शब्दों का इस्तेमाल एक साथ किया होगा? और मैंने इस महान वाक्यांश का कोई हिंदी या शाकाहारी वर्जन कभी नहीं सुना – जैसे ‘मदिरा, पनीर और यौवन’ या फिर ‘दारू, पापड़ और जवानी’. अब न जाने कब चखने के प्रेशर में आकर बेचारे कबाब बदनाम हुए होंगे और फिर दोनों ने मिलकर शबाब को भी बदनाम कर डाला. और शायद तभी से बाज़ारों में ये जुमला भी मशहूर हुआ ‘नीचे कबाब की दुकान और ऊपर गौरी का मकान.’

ख़ैर, इन बाज़ारू जुमलों के इलावा कुछ ऐसे पर्सनल किस्से-कहानियां भी हैं, जिन्हें खंगालने पर तो यही लगता है कि ‘शराब, कबाब और मर्द’ ज़्यादा सही बैठता है. तो इसी तर्ज़ पर पेश-ए-ख़िदमत है एक क़िस्सा लेट 80’s से – जब मेरे पापा शराब दिल खोल कर पीया करते थे. शराब या तो बाहर से पी कर आया करते थे, या फिर घर पर ही पिया करते थे. पर शराब जब कभी घर पर पी जाती थी तो मानो ऐसा लगता था कि कोई जश्न चल रहा हो. और इस जश्न का आगाज़ कुछ इस तरह होता था – पापा किचन में आते हैं, कुछ देर इधर-उधर की बातें करते हैं, यहां-वहां नज़र घुमाते, चीज़ो को टटोलते हैं और फिर मम्मी से एक बेहद अहम् सवाल पूछते हैं,

“मैं कुछ दिन पहले सोडा की 2-3 बोतलें लाया था, वो सब खत्म हो गई हैं या कुछ बची हैं?”

बस तो हम सब समझ जाते थे कि ये सवाल कोई सवाल नहीं हैं, ये तो एक ऐलान हैं कि “आज शराब पी जाएगी!” और ये ऐलान होते ही माहौल में तेज़ी आ जाती हैं, और घर के सभी लोग इस जश्न की तैयारी में लग जाते हैं – सबसे पहले कूलर में पानी भर दिया जाता हैं ताकि ड्रॉइंग रूम को ठंडा किया जा सके. फिर सभी इस जश्न का असला-बारूद ड्रॉइंग रूम की टेबल पर इकट्ठा करने में जुट जाते हैं – यानी कांच के गिलास, पानी, बर्फ़, ओपनर और कुछ खाने-पीने का हल्का-फुल्का सामान जैसे नमकीन, भजिया, नमक पारे…

इस महफ़िल के ठीक शुरू होने से पहले मम्मी ड्रॉइंग रूम में आती हैं और पूछती हैं “कुछ बना दूं?” “अरे नहीं नहीं… कोई ज़रुरत नहीं हैं… बस एक-दो पेग ही तो पीने हैं” पापा ने झिझकते हुए कहा, “चलो बच्चे लोग बाहर बरामदे में खेलो, यहां शोर मत मचाओ” मम्मी ऐसा बोलते हुए किचन में जाकर अपने काम में लग जाती हैं.

(बताना भूल गया कि गर्मियों की छुट्टियां चल रही हैं, मामा और बुआ के बच्चे छुट्टियां बिताने हमारे यहां आये हुए हैं)

First peg (पहला जाम)

पहला पेग बन चुका हैं. और अंदर से पापा की आवाज़ आती हैं “अरे… ये टेप रिकॉर्डर की तार कहां है?”
ये सुनते ही मैं फौरन अंदर दौड़ जाता हूं, “पापा ये रही वायर… आशू बाहर ले आया था, हम बच्चे इससे खेल रहे थे…”
“अच्छा सुन! पिछले महीने मैं रफ़ी-लता के पुराने गाने भरवा कर लाया था, वो कैसेट कहां है?”
“कौन-सी कैसेट? …अच्छा पापा वो! …पापा वो गाने तो बहुत ही पुराने हो गए थे, मैं तो उस पर नए गाने भरवा लाया था न… ’मैंने प्यार किया’ के! पापा बहुत मस्त गाने हैं उसके… ला दूं वो कैसेट?” ये बोलते ही मुझे एहसास हुआ कि अब गाली या थप्पड़ बस पड़ने ही वाली हैं, तो मैने झट से कहा, “पापा… पैसे मम्मी ने दिए थे…”
अजीब-सी कब्ज़ वाली शक्ल बना कर पापा ने 2-4 सेकंड मुझे घूरा जैसे मैंने सही में किसी से प्यार कर लिया है और रिश्ता पापा को मंज़ूर नहीं हैं, पर पापा ने अपने पेग पर फोकस किया और कहा, “अच्छा… अब तू बाहर जा”
मैं बाहर आकर बच्चो के साथ खेलने लगा, और थोड़ी देर में ड्रॉइंग रूम से जगजीत सिंह के कुछ शराब वाले गानों की आवाज़ आने लगी.

Second peg (दूसरा जाम)

“हेलो?” ड्रॉइंग रूम से पापा की आवाज़ आती हैं.
“हां जी! बोलो…” रसोई से मम्मी की आवाज़ आती है.
(पापा मम्मी को अक्सर ‘हेलो’ करके ही बुलाते हैं और मम्मी पापा को ‘हां जी’ करके बुलाती हैं, शायद उस दौर में नाम से पुकारने की रवायत काफ़ी मॉडर्न थी.)
“हेलो! यहां थोड़ा सलाद भिजवा दो…”
“और कुछ?”
“पनीर है थोड़ा सा?”
“नहीं!”
“अरे, परसों ही तो लाया था 250 ग्राम पनीर!”
“हां, मैं ही तो खा जाती हूं सारा पनीर! कल दिन में आपकी बहन आयी थी, उसी की फ़रमाइश थी पनीर की भुज्जी की…”
“हां-हां…ठीक है.”
“रिंकू! रिंकू!” पापा का बुलावा आया मेरे लिए…
“जी पापा!” मैं दौड़ कर उनके पास जाता हूं…
“क्या कर रहा है तू?”
“मैं ऊंच-नीच का पापड़ा खेल रहा हूं सबके साथ…”
“अच्छा एक काम कर, ये ले 50 रुपए… भाग के जा और पप्पू के यहां से 250 ग्राम पनीर ले आ… अरे सुन… कहां भागा चला जा रहा है!”
“पापा आप ही ने तो अभी कहा… भाग के जा!”
“हां पर पूरी बात सुना कर… जीरे वाला पनीर लाना है और पप्पू को बोलियो कि पापा कह रहे हैं पनीर ताज़ा हो, कहीं तुझे पुराना पनीर पकड़ा दे तो!”
“पापा… मैं एक uncle-chips का पैकेट ले लूं?”
“ठीक है…”
“और पापा campa भी!”
“ठीक है…”

इस ‘ठीक है’ का मतलब हैं कि शराब अपना काम सही से कर रही है और वो भी दूसरे पेग में… क्या बात है! लगता है कि आज पेग पटियाला साइज़ के चल रहे हैं!

पनीर आ चुका है—100 ग्राम के करीब पनीर ड्रॉइंग रूम में पहुंचा दिया गया है और बाकी के पनीर की पकौड़ों की फ़रमाइश है.
अंदर ड्रॉइंग रूम में पनीर और शराब चल रही है, और बाहर बरामदे में uncle-chips और campa की पार्टी. इससे बेहतर क्या ही होगा इस पूरी कायनात में. पर मम्मी अभी पापा की फ़रमाइश पर गर्मी में पकौड़े तल रही है. बीच-बीच में ड्रॉइंग रूम से मेरे लिए बुलावा आता रहता है और मुझे पनीर खाने को दिए जाता हैं – ये न्योता सिर्फ़ मेरे लिए एक्सक्लूसिव है, मेरी बहन या बाकी के बच्चों को ऐसा कोई न्योता नहीं मिलता है.

Third peg (तीसरा जाम)

अब ड्रॉइंग रूम से अनूप जलोटा के भजनों की आवाज़ आ रही है—”ऐसी लागी लगन, मीरा हो गयी मगन…”
इतने में मेरे लिए एक और बुलावा आता हैं. अब ड्राइंग रूम में माहौल एकदम मस्त हो चुका है. पापा के पैर टेबल पर आ चुके हैं, चेहरा एकदम सुर्ख लाल और होंठों पर नॉन-स्टॉप मुस्कान! और सामने प्लेट में पनीर के कुछ पकौड़े पड़े हैं, ताज़ी पुदीने की चटनी के साथ. मम्मी भी किचन का काम निपटा कर पापा के बगल में जुड़कर बैठी हैं और खूब खिल-खिला रही हैं. कसम से ये नज़ारा किसी रासलीला से कम नहीं लग रहा है.
“बेटा… तेरी मम्मी को तो मैं कल एक गिफ़्ट दिला रहा हूं!”
“क्या दिला रहे हो?”
“पूछ अपनी मम्मी से…”
“मम्मी क्या गिफ़्ट मिल रहा हैं आपको?”
“वाशिंग मशीन!” मम्मी बोली, और बोलते ही खिल-खिला कर हंसने लगी, मानो कोई लॉटरी हाथ लग गयी हो. लेकिन ये तो हर बार के तीसरे पेग का किस्सा है! मुझे अच्छे से याद है पिछली बार तीसरे पेग के बाद हम लोग कुल्लू-मनाली घूमने गए थे और उससे पहले पापा कई बार मुझे अप्पू-घर की सैर भी करवा चुके थे. पता नहीं मम्मी अब भी क्यों हर बार की तरह बेवकूफ़ बन जाती हैं… मेरी समझ में ये कभी नहीं आया.
“मम्मी, आपके तो मज़े हैं!”
“बेटा… तुझे क्या चाहिए?” पापा ने पूछा.
“गियर वाली साइकिल!” मेरे मुंह से टपक पड़ा.
ओह शिट! ये मैंने क्या बोल दिया, वही मम्मी वाली गलती, जो मैं पहले भी आठ बार कर चुका हूं. पर अब मैं अच्छे से जान चुका हूं कि ये तीसरे पेग वाले वादे कभी भी पूरे नहीं होते.
“ठीक है… कल तेरी मम्मी की वाशिंग मशीन और तेरी साइकिल… डन!” पापा ने बहकी आवाज़ में कहा “अच्छा… हेलो आज डिनर में क्या बना है?”
“दाल…” मम्मी ने कहा.
“अरे अरे… कल तेरी वाशिंग मशीन आ रही है और तू आज दाल खिलाएगी? नहीं नहीं… गलत बात… आज सब्ज़ी खाते हैं!”

(हमारे यहां नॉन-वेज/मटन को सब्ज़ी कहा जाता है. बकरा, मुर्गा जैसे शब्दों का इस्तेमाल कम ही किया जाता है.)
“अब कौन बनाएगा सब्ज़ी?” मम्मी बोली.
“अरे बाहर से मंगवा लेते हैं!” पापा का ऐलान.
“हां पापा… बटर चिकन! वो जो मामा के यहां खाया था… बहुत सही होता है वो.”
“ठीक है… वही मंगवा ले…” ऐसा बोलते ही पापा ने आधे ये ज्यादा बचा हुआ तीसरा पेग एक ही सांस में गटक लिया!

Fourth peg (चौथा जाम)

पापा ने मुझे चावला-चिकन वाले का फ़ोन नंबर दिया और कहा, “मेरा नाम लेके बोल… एक फुल बटर चिकन… एक्स्ट्रा ग्रेवी के साथ… और सुन… बड़ी जल्दी रहती है तुझे, कितनी बार कहा है कि पूरी बात सुना कर… चावला को बोलियो कि चिकन जवान हो… ये साले अनाड़ियों को बूढ़ा चिकन पेल देते हैं…” मैंने झट से फ़ोन के चक्के पर नंबर मिलाया :
2 …टक …टक
4 …टक …टक …टक …टक
3 …टक …टक …टक
“हेलो, अंकल मैं 11 बटा 171 से… मदान जी के यहां से बोल रहा हूं… एक फुल बटर चिकन भेज दो… एक्स्ट्रा ग्रेवी… क्या? पापा कह रहे हैं क्यों भेजें? …हेलो? पापा कह रहे हैं कि इनके पास कोई चिकन नहीं है… हैल्लो, जी मैं मदान… ओह, अच्छा… सॉरी! पापा रॉन्ग नंबर लग गया… लगता है जल्दबाज़ी में फ़ोन का चक्का गलत घूम गया… फिर से मिलाता हूं…”
“हेलो, चावला अंकल? …जी मैं मदान जी के यहां से बोल रहा हूं… जी हां 11 ब्लॉक… 171 नंबर से. अंकल एक फुल चिकन… जी बटर! …जी बस और कुछ नहीं!”
“एक्स्ट्रा ग्रेवी… चिकन जवान हो… ये तो बोल…” पापा ने छटपटाते हुए कहा.

“हैल्लो अंकल, वो एक्स्ट्रा ग्रेवी कर देना… हेलो? …पापा फ़ोन काट दिया!”
“ऐसे कैसे फ़ोन काट दिया? फिर से मिला… मैं बात करता हूं! साले ये लोग पैसे पूरे लेते हैं, बात आधी सुनते हैं…”
मैने फ़ोन मिलाकर पापा को दे दिया, “हेलो. मैं मदान 11 ब्लॉक तो, तैनू आर्डर दित्ता सिगा… हां फुल बटर चिकन दा! इक काम करी… एक्स्ट्रा ग्रेवी नाल देवी… ते चिकन जवान होवे… समझ गया न तू? ओके…”
“ला रहा है!” पापा ने ये बोलते ही चौथे पेग को भी निपटा डाला.
“और मत पीना… बस करो…” मम्मी ने टोका.
“तू टेंशन मत ले… तेरी तो वाशिंग मशीन आ रही है कल…”
ये सुनते ही मम्मी फिर से खिलखिला उठी और उधर पापा ने लगे हाथ अपना पांचवां पेग भी बना लिया!

Fifth peg (पांचवा जाम)

मुझे अच्छे से मालूम था, कल न तो वाशिंग मशीन आएगी और न ही कोई गियर वाली साइकिल. कल सुबह उठते ही पापा मुझसे एक ही बात पूछेंगे, “अच्छा कल तू पनीर और uncle-chips लाया था, बाकी के पैसे कहां हैं?” मुझे लगा इस बार ये मम्मी वाली गलती को सुधारना चाहिए… साइकिल की जगह कुछ ऐसा मांग लेता हूं जो अभी के अभी मिल जाए! और मेरे पास टाइम भी कम हैं, क्योंकि शायद आज की शाम का ये आख़िरी पेग है. मैने भी तेज़ाब के अनिल कपूर की तरह जोश में बोल दिया :
“पापा मुझे साइकिल नहीं चाहिए!”
“क्यों? क्या चाहिए फिर?”
“पापा, मुझे आइसक्रीम चाहिए… ले आऊं?”
“ले आ, जो तेरा मन करे!” पापा ने पांचवे पेग वाला प्यार जताते हुए कहा.
“Pilot Pen भी चाहिए पापा… बॉल पैन से राइटिंग बड़ी ख़राब आती है.”
“ठीक है! पर्स में से पैसे ले ले.”
मैंने बिल्कुल देर नहीं की और निकल पड़ा pilot pen और आइसक्रीम लेने. पर आज मुझे ऐसा लग रहा था कि मानो मैंने भी आज किसी को बेवकूफ बनाया है, ख़ैर जाने दो, आइसक्रीम पर फ़ोकस करो!
जब तक मैं वापस लौट कर आया, चिकन वाला आ चुका था. मम्मी चिकन वाले भइया को पैसे दे रही थी, और मैने झट से मम्मी के हाथ से चिकन का पैकेट छीना और फट से किचन में जाकर चिकन की थैली बेरहमी से फाड़ डाली. ऊपर से मम्मी आ गईं, “ज़रा भी चैन नहीं है तुझे…”
“पापा! पापा!” मैं चिल्लाते हुआ पापा के पास गया.
“अब क्या हुआ?” पापा ने नशीली आवाज़ में पूछा.
“पापा, इसमें तो सिर्फ दो ही लेग पीस हैं… पापा दो लेग पीस मिसिंग हैं…”
“फोन कर साले को, लूट मचा रखी है इन लोगो ने…. ये लोग पैसे पूरे लेते हैं, माल आधा ही भेजते हैं…” पापा ने खुद को होश में लाते हुए कहा.
मैंने फिर से फ़ोन मिलाया
2 …टक …टक
3 …टक …टक …टक …टक
4 …टक …टक …टक

“हेलो अंकल, मैं मदान के यहां से बोल रहा हूं, आपने हमें लूट लिया… हमने फुल चिकन आर्डर किया था, पर लेग पीस सिर्फ दो ही निकले हैं, बाकी के दो लेग पीस भिजवा दो… जल्दी!! क्या? ओके… ओह हां! सॉरी अंकल!” ये कहते हुए मैंने फ़ोन वापस रख दिया.
“पापा कह रहे हैं.. चिकन की तो दो ही टांगे होती हैं…”

“उल्लू के पट्ठे! मुझे भी कंफ्यूज कर दिया तूने… आज इंसल्ट करवा दी तूने! हेलो सुनो… इस गधे को सिर्फ़ ग्रेवी देना आज… दाल के साथ… बस!’’


वीडियो – लल्लनटॉप कहानी कॉम्पिटिशन का रिजल्ट आ गया है, जानिए टॉप 15 कहानियां किनकी निकलीं!

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