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'लल्लनटॉप कहानी कंपटीशन' में चुनी गई कहानी - अधूरा मक़सद

लल्लनटॉप कहानी प्रतियोगिता का चौथा संस्करण 2019 में आयोजित किया गया था और इसमें सैकड़ों लोगों ने भाग लिया था. कई चरणों के क्रमबद्ध चयन के बाद हमने 15 टॉप कहानियां सेलेक्ट कीं, जिनको फिर से हमारे तटस्थ निर्णायक दल ने जांचा.


Web Story Band 02
कई चरणों के क्रमबद्ध चयन के बाद हमने 15 टॉप कहानियां सेलेक्ट कीं, जिनको फिर से हमारे तटस्थ निर्णायक दल ने जांचा.

निर्णायक दल को इसमें से तीन कहानियां एक ही मयार की लगीं. इसलिए हर बार जहां प्रथम विजेता एक लेखक/लेखिका और उसकी एक कहानी को घोषित किया जाता था, अबकी बार हम घोषित करेंगे तीन विजेता. और बाकी 12 विजेता होंगे, उप विजेता. आज हम उन्हीं 12 विजेताओं में से एक अनुराधा मोहन की कहानी ‘अधूरा मक़सद’ आपको पढ़ा रहे हैं. ये कहानी इस दुनिया की करोड़ों लड़कियों और औरतों की सच्चाई है. यौन शोषण किस तरह किसी की मानसिक स्थिति को प्रभावित करता है, उसका एक उदाहरण है ‘अधूरा मक़सद’.

अधूरा मक़सद
अनुराधा मोहन

 

“ट्रेन का टाइम हो रहा है, तुम्हारा सामान ही नहीं लगा अब तक…, वाणी की मां गुस्साते हुए उससे बोली.

वाणी, 18 साल की एक लड़की, 12वीं के बाद की पढ़ाई के लिए इंदौर जा रही थी. शाम के 7:30 बज रहे थे और वाणी की ट्रेन का समय 11 बजे था. अभी उसे स्टेशन पहुंचने में 2 घण्टे का समय लगना था. वीणा की मां जल्दी-जल्दी काम कर रहीं थी और अब उसके पिताजी भी दफ़्तर से घर आ गए थे. बारहवीं तक वाणी जयपुर जिले के एक गांव में ही पढ़ी है. और अपनी आगे की पढ़ाई गांव से अलग शहर में करना चाहती थी. प्रतियोगिता पास करने की वजह से उसे प्रतिष्ठित कॉलेज में एडमिशन मिल गया. अब आगे उसे इंदौर के लिए रवाना होना था.

उसकी मां अलमारी से ताबीज लेकर आई और वाणी की भुजाओं में बांध दिया. एक उम्मीद भरी आवाज़ में बोलीं,

” बेटा, ये ताबीज तुम्हारी रक्षा करेगा लेकिन फिर भी तुम्हें अपनी रक्षा स्वयं करनी होगी”.

मम्मी के सामने तो वीणा ने हां में हां मिला दी मगर कहीं न कहीं उसके मन में बहुत डर था कि इतने बड़े शहर के तौर-तरीके अपनाकर जीना शायद थोड़ा मुश्किल होगा.
मम्मी ने हमेशा ही उसे साहसी बनने में मदद की है, अकेले जाने की आजादी, छोटी- छोटी जिम्मेदारियां उठाने से वो बहुत हिम्मती थी और अपनी यात्रा को लेकर निश्चिंत.
धीरे-धीरे 8 बज चुके थे. पिताजी दरवाजे पर उसका इन्तजार कर रहे थे. वाणी ने अपना सामना इकठ्ठा किया और गाड़ी के पास जा पहुंची. वाणी के लिए घर से दूर जाना नया नहीं था, लेकिन पहली बार वो मां से नज़रें नहीं मिला पा रही थी, कि वो रो देंगी. समय की कमी की वजह से वो ज्यादा देर रुक नही सकती थी, लेकिन उसकी आंखें मां को आश्वस्त कर रहीं थी कि वो अपना ख्याल रखेगी, अपना लक्ष्य पूरा करके वापस आएगी.

मोटरसाइकिल चालू हुई और इसी के साथ वाणी का सफर. जल्दबाजी में वो भूरी से नहीं मिल पायी, भूरी उसके घर की बिल्ली थी और वाणी के लिए एक छोटी बच्ची.

स्टेशन पहुंचे और 10 मिनट बाद ही ट्रेन चल दी. जल्दबाजी में पिताजी को नमस्ते करना भी फॉर्मेलिटी ही रहा. रात भर वाणी घर के बारे में सोचती रही. सुबह के 6 बज गए थे, वाणी स्टेशन पहुंच गयी. वहां उसको लेने उसके भैया, श्याम, आये थे. भैया, उसकी बुआ जी के लड़के थे, और वाणी से 12 साल उम्र में बड़े थे. प्रणाम करने के बाद सीमा उनके साथ बुआ के घर पहुंच गयी.

बहुत सालों बाद अपनी बुआ से मिलने से उसकी खुशी दुगनी हो गई. पहले तो वो इंदौर आने से खुश थी. अब वाणी को कोई डर नहीं था. वो सही सलामत यहां पहुंच गयी थी. और अपनी मां को फ़ोन करके उनको भी ये बता दिया.

“अकेले आने में डर नहीं लगा दीदी! हम तो बस स्कूल ही अकेले जाते हैं.” प्राची, बुआ की लड़की, ने पूछा.
“नहीं, हम तो हमेशा अकेले ही जाते हैं हर जगह, और मम्मी भी कहती हैं, अकेले चलना, आना चाहिए हमें. वाणी ने खुशी में बोला. कहीं न कहीं उसे अपने तथा अपनी मां पर इस बात के लिए गर्व हो रहा था. लेकिन किसी को सामने से ऐसे सुनना उसके लिए थोड़ा अजीब था, क्योंकि इससे पहले उसने ये सब बातें सुनी भर थीं. उसके सामने ऐसी बातों का कोई साक्ष्य नहीं. फिर भी बड़ी बहन होने के नाते वाणी ने कहा, ” एक बार जाओ, फिर सारा डर खत्म”.
प्राची उदास हो गयी, बोली,” आप नई हो यहां पर.”
वाणी को कुछ समझ नहीं आ रहा था, मगर वो बिना जाने कुछ बोलना नहीं चाहती थी.

वाणी को एक बार फिर डर ने घेर लिया कि आखिर इतना क्यों डरा रही है प्राची. उसने हिम्मत करके पूछना चाह की ऐसा वो क्यों कह रही है. तभी भैया आ गए और वो बात वहीं दब कर रह गयी.

कॉलेज और घर नए जरूर थे लेकिन अच्छे थे. एक परिवार से दूसरा परिवार सब अपना ही तो है.
शांति से वाणी की पढ़ाई होने लगी, और दिन अच्छे. बहन थी, भैया थे, बुआ थीं. वाणी घर की अकेली थी, तो उसके लिये बड़े भाई का मिलना एक वरदान हुआ. लेकिन कहते हैं न कि सुख के दिन दो तो दुख के चार.

एक दिन अचानक भैया के हाथों में दर्द होने लगा, और वो बहुत कराह थे , रात के 2 बज रहे थे और वाणी पढ़ रही थी. उठकर उसने भैया से पूछा कि क्या हुआ उन्हें. उन्होंने अपने हाथों की उंगलियां दिखाई, जिनमें बहुत सूजन थी. वाणी ने उनकी उंगलियां दबा दीं. अगली रात जब उसने प्राची से उंगलियां दबाने को कहा तब उसने मना कर दिया, भला भाई के साथ कोई बुरा बर्ताव कर सकता है क्या! लगभग 2-3 दिन मालिश के बाद उनकी उंगलियां ठीक हो गयीं.

एक सुबह वाणी उठकर कॉलेज गयी और शाम को वापस. घर में कोई नही था, सिर्फ भैया. उन्होंने वाणी को खाना परोस दिया और कुछ देर आराम करने के बाद जब वाणी, उठी तो उसने देखा कि भैया उसके पास ही बैठे थे. उसके उठते ही उन्होंने वाणी को गलत तरह से छूना शुरू कर दिया. वाणी डर गयी और जल्दी से भागकर छत पर पहुंच गयी. वो भैया छत पर भी पहुंच गए. लेकिन वहां पर वाणी सुरक्षित थी.

अगली सुबह उन्होंने वाणी से माफी मांगी और किसी को न बताने के लिए कहा. वाणी ने उन्हें माफ कर दिया और ये बात वहीँ पर दब गयी.
मगर वाणी का ये कदम भद्दा था, जोकि शायद बड़ा रूप भी ले सकता था. अब हर रोज यही हरकतें होने लगी और वाणी से रोकर माफी मांगना उनकी आदत बन गयी. अचानक एक दिन मौका देखकर उन्होंने वाणी को बुरी तरह छूने के अलावा उसके साथ दुष्कर्म कर दिया. वाणी के लिए बहुत बड़ा झटका था. भाई के रूप में हैवान, उसके जीवन के लिए अभिशापी बन गया, मगर वाणी किसी को कुछ नहीं बोल रही थी.
वाणी डरी सहमी रहने लगी. कहीं न कहीं उसके लिए अब ये सब कुछ एक आदत-सा हो गया था और वो किसी से शिकायत करने की सोचती भी नहीं थी.
धीरे-धीरे वाणी का स्वास्थ्य गिरने लगा, पढ़ाई लिखाई से दूर उसका मन अब भटका-भटका रहने लगा था. मगर कॉलेज जाकर उसे थोड़ी राहत महसूस होती थी. वहां अंश था, वाणी का दोस्त, सच्चा दोस्त. वो साथ पढ़ते और इस बहाने वाणी कुछ अच्छा वक़्त बिता पाती थी. वाणी अंश पर बहुत विश्वास करती थी. उसको सब सच बता देना चाहती थी, लेकिन अभी नहीं. जब दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ने लगी, वाणी को वो वक़्त सही लगा. लेकिन हैवानियत के नशे में चूर श्याम को वाणी की ये खुशी बर्दाश्त न हुई. उसने वाणी के फ़ोन से अंश से बात करना शुरू कर दिया और उन्हें अलग करने की कोशिश करने लगा.

अब वाणी के लिए ये सब असहनीय था. वो इस घर से निकल कहीं दूर जाना चाहती थी. ये सब बातें बताने के लिए जब वाणी ने अंश को फ़ोन किया, तब उसको डराकर बात बदलने को कहा गया. वाणी ने बताया कि “अंश, ट्रेन में मेरे साथ कुछ लोगों ने गलत किया, और ये बात मैंने तुमसे इसलिए छुपाई ताकि तुम मुझे छोड़ न दो.”
अंश बहुत समझदार और सुलझा हुआ इंसान था. उसने कहा की तुम परेशान न हो, मैं तुम्हारे साथ हूं.
वाणी के लिए अंश का साथ शायद संजीवनी बूटी थी, और वो इतने दुख से बाहर निकलने लगी. अब वाणी के लिए दूसरा काम था उस घर से निकलना, रिश्तेदार के घर से अलग होना मुश्किल होता है, किसी तरह वाणी वहां से निकल ही आयी.
लेकिन उसके मन में अंश को सब न बताने का दुख अभी भी था.

कहते हैं कि अतीत आसानी से पीछा नहीं छोड़ता. वाणी के साथ भी यही था. श्याम, वाणी को रोने धोने वाली पिक्चर भेजता, वाणी भी रोने के अलावा कुछ न कर सकती. उनके कहने पर वाणी उनसे बात करती और अंश को कुछ न बताती.

वाणी नादान थी, बेवकूफ या बुद्धू या भागीदार?? इसका अंदाजा उसे नहीं था.

एक दिन हिम्मत करके उसने अंश को सब बातें बता दीं. और ये भी बताया कि वो इंसान कोई और नहीं बल्कि उसकी बुआ का लड़का ही था और कैसे वाणी उनसे अभी भी बात करती है.

ये सब सुनकर अंश के पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गयी, उसे बहुत गुस्सा आ रहा था. अंश को समझ नहीं आ रहा था, कि जिस वाणी के पीछे वो पागल फिरता था, उसका जो सच उसे दिख रहा था, वो सब झूठ था. लेकिन वो तुरंत कोई निर्णय नहीं लेना चाहता था, उसने वाणी को समझा और उससे कहा कि जैसा मैं बोलूं वही करना, सब ठीक होगा.

अब वाणी की जिंदगी अच्छी होने लगी. उनका रिश्ता अच्छा हो गया. फिर से दोनों साथ पढ़ते, और साथ ही लंच करते. लेकिन अचानक एक दिन श्याम का फोन आया और उसने अंश को बहुत गालियां दीं. वाणी को कुछ समझ नहीं आया कि वो क्या करे.अंश के लिए एक भी बुरा शब्द वो नहीं सुन सकती थी. अगले दिन उसने फ़ोन करके पूछा कि वो अंश के लिए इतना बुरा कैसे बोल सकता हैं. फिर श्याम ने जो कहा वो शायद वाणी सोच भी नहीं सकती, उसके बाद से वाणी ने दोबारा मुड़कर नहीं देखा. श्याम ने कहा कि वाणी को श्याम और अंश में एक को चुनना होगा. नशे में चूर उस इंसान को वाणी अब तक सुधारने की कोशिश करती रही, लेकिन अब मर्यादाओं की सीमा टूट चुकी थी. उसे गलती का एहसास हुआ कि वो एक इंसान को अच्छा नहीं, एक जानवर को इंसान बनाने की कोशिश में लगी थी. उसने अंश को भी ये बातें बताई.

वाणी बहुत टूट चुकी थी. छोटी-सी उम्र में ये सब देखना, जो शायद उसकी दुगनी उम्र में किसी ने न देखा होगा. और वो दिन रात दुआ करती थी कि किसी भी लड़की की जिंन्दगी उसके जैसी न हो. वाणी को किसी से मिलना नहीं पसन्द था, इन सबके बाद वो पूरी दुनिया से कटकर रहने लगी.

उधर अंश के किये इतना बड़ा सदमा बर्दाश्त के बाहर था. वो कुछ भी सोचने में असमर्थ था अब. वाणी का साथ देना उसके जीवन का सबसे बुरा फैसला हो रहा था.

दोनों अपनी उम्र से ज्यादा दुख और बोझ लिए सबके सामने सामान्य थे. दिन बीतते गए. अंश और वाणी ने एक दूसरे को वक्त दिया और धीरे धीरे सब सही होने लगा. लेकिन अंश चाहता था कि वाणी किसी ऐसे इंसान को छोड़ नहीं सकती, जो समाज के किये अभिशाप था. वाणी के बात न मानने पर वो उसके साथ रिश्ता तोड़ देना चाहता था. अपने आप को शांत रखने के लिए वाणी से दूर जाना ही एकमात्र तरीका था.
अंश चाहता था कि वाणी श्याम को ऐसे जाने नहीं दे सकती. मगर वाणी इन सब में नहीं जी पा रही थी. वो अपनी इज्जत को डरती थी, अपनी मां को दिए वचन के टूटने से डरती थी. अंश के मन में ये बात घर करने लगी और धीरे-धीरे गलतफहमियां बढ़ती गयीं.
पढ़ाई लिखाई सब खराब हो गयी. मगर अंश को वापस पाने का एकमात्र तरीका श्याम को जेल पहुंचाना था. पर इसके किये वाणी को अपनी इज्जत भूलकर या कहो लड़कर आगे जाना था.

वाणी ने अंश से समय मांगा और प्रण किया कि जब तक वो कुछ करेगी नहीं, रिश्तेदारों से दूर ही रहेगी. वाणी के घर की आर्थिक स्थिति भी बिगड़ने लगी. पढ़ाई में आगे बढ़ने के लिए वो दृढ़निश्चय नहीं कर पा रही थी. लेकिन अंश और अपने लिए उसे ये सब करना था, सो वो अपने पथ पर आगे बढ़ने लगी. पढ़ाई करना, खुश रहना को ही अपनी आदत बना लिया. वक़्त बीतता गया और एक दिन वाणी अधिकारी बन गयी. सब खुश थे, अंश, मम्मी-पापा. लेकिन वाणी का मकसद अधिकारी बनना नहीं था. उसे तो श्याम को उसके किये की सजा देनी थी, जो कि आसान नहीं था. और वाणी इसके लिए योजना बनाने लगी.

एक दिन अचानक वाणी के पास प्राची का कॉल आया. प्राची ने वाणी को बताया कि आखिर क्यों वो घर अच्छा नहीं था. वाणी तो पहले से सब महसूस कर चुकी थी, यहां तक कि देख चुकी थी, पर प्राची के सामने जाहिर नहीं किया. प्राची ने बताया कि वो भैया प्राची को भी बुरी तरह छूते थे और उस पर निगरानी रखते थे और अभी भी रखते हैं. वाणी के लिए सब कुछ और मुश्किल हो गया, जिन योजनाओं पर वो काम करना चाहती थी. उसमें वो अकेली थी. लेकिन अब उसे प्राची को भी उस घर से बाहर निकालना था.
वाणी ने अपने पहले तरीके को पूरी तरह छोड़ दिया और प्राची के साथ मिलकर एक नई योजना बनाई, जिसमें वो दोनों मिलकर उस इन्सान को एक्सपोज़ करेगी.
वाणी को ये सब कुछ अपने आधिकारिक पद की सीमा में रहते हुए करना था. सबसे जरूरी अंश से बिना बताए.

अपने मकसद को पूरा करने के लिए वाणी एक आखिरी बार प्राची से मिली. लेकिन वाणी की किस्मत और प्राची दोनों ने उसका साथ छोड़ दिया. अंत समय में प्राची अपनी बातों से मुकर गयी.

वाणी के लिए ये बहुत बड़ा झटका था. वाणी की सारी उम्मीदें टूट गयीं, जिस प्राची के लिए, उसके हित के लिए, वाणी ने अपनी योजनाएं बदलीं, अपने को भूल गयी, सिर्फ प्राची के लिए सब करने की सोची, उसी ने वाणी का हाथ छोड़ दिया. वाणी को समझ नहीं आ रहा था कि प्राची की क्या मजबूरी होगी. फिर भी उसने प्राची से पूछना जरूरी नहीं समझा.
अपने मन को दिलासा दिया और प्रण किया कि अब उसे कुछ नहीं करना है. जिन्दगी में कोई साथ नहीं देता है, अपना दुख सिर्फ अपना ही होता है. छूटे रिश्तों में उलझकर जिंदगी में बस दुख ही दुख है. वाणी चुपचाप अपने घर आ गयी. किसी का गलत करने पर भगवान के द्वारा ही दण्ड दिया जा सकता है, यह सोचकर उसने अंश के साथ नई जिंदगी शुरू की. इतना वक्त बीतने पर अंश भी वाणी को समझने लगा था और उसे एहसास हो गया था, कि वाणी एक अच्छी इंसान थी. भले ही वो दोनों इतने बुरे हादसे से गुजरे, धोखों के साथ उनकी जिन्दगी गुजरी, लेकिन अब बदले की भावना नहीं रखनी थी.

अंश वाणी के साथ था, वाणी खुद के साथ थी, और मकसद धुंधला हो गया. वाणी उस धुंधलेपन को साफ नहीं करना चाहती थी, और उसी धुंधलाहट में अपनी और अंश की ज़िंदगी के पन्नों को खूबसूरती से भर देना चाहती थी. सब कुछ भूल वो अपनी ज़िन्दगी में हंसी और खुशी से जीने लगी.

एक शाम दफ़्तर से लौटने पर वाणी को पता चला कि उस इंसान का एक्सीडेंट हो गया और वो बच न सका. इंसान के रूप में उसे दुख होना चाहिए था, लेकिन वाणी के रूप में उसकी मनास्थिति शून्य थी. वो इस बारे में दुख और सुख कुछ भी महसूस नहीं करना चाहती थी.

उसने अंश को गले लगाया, और सोचने लगी, कि भले एक पल या कुछ महीनों के लिए वो इंसानियत खो बैठी थी, लेकिन उसे खुशी है कि उसकी तरफ से किसी का बुरा नहीं हुआ, वो अभी भी इंसान थी, और किसी इंसान के साथ थी. वो इस दिन से ज्यादा खुश नहीं हो सकती थी एक अधूरे मकसद ने इंसानियत को जिंदा रखा.


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