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'फेमिनिज़म से शुरू होती हमारी बहसें अंत में सेक्स पर पहुंच जातीं'

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पिछले साल 2017 में 10 से 12 नवंबर तक आज तक ने तीन दिवसीय आयोजन ‘साहित्य आजतक’ के जरिए साहित्यिक हलचल बढ़ाई. सरगर्मियां बढ़ाने में बड़ा किरदार लल्लनटॉप कहानी कंपटीशन का भी रहा. इस  प्रतियोगिता का पहला इनाम एक लाख रुपए था. 15 दूसरी कहानियों को भी पांच-पांच हज़ार  रुपए का पुरस्कार दिया गया.  आज पढ़िए इन्हीं 15 कहानियों में से एक- बेटियां. इसे लिखा है चमन कुमार मिश्रा ने. चमन न्यूज़ वेबसाइट डेली हंट‘ के बेंगलुरु ऑफिस में कार्यरत हैं. न्यूज़ चैनल इंडिया टीवी में काम कर चुके हैं. ‘दी लल्लनटॉप’ में पहले भी इनकी कहानी छप चुकी है. एक उपन्यास भी प्रकाशित हो चुका है. पहले आईएनएस गाजियाबाद से फिर उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. रहने वाले मैनपुरी के हैं.


बेटियां

rape b

मैं जानती हूं, इसे लिखने के बाद मेरे बैंक मैनेजर पति मुझे तलाक दे देंगे. मेरी बच्ची प्रिया मुझे ‘गंदा’ समझेगी. माता-पिता की नाक उनके ‘सभ्य समाज’ में कट जाएगी. मेरे जानने वाले मुझे बदचलन और चरित्रहीन होने का तमगा देंगे. रंडी और वेश्या भी कही जाऊंगी. इसलिए यह कहानी लिखने के बाद मैं आत्महत्या कर लूंगी. कल जब मैं उसके बिस्तर में थी, मेरी उंगलियां उसकी कमजोर छाती के भूरे बालों में थीं. मेरे जवान गुलाबी होंठ उसके सूख चुके होंठों को चूम रहे थे. तब उसने कहा था, ‘सीमा, जानती हो खुदकुशी कला की दुनिया में सबसे खूबसूरत मौत है.’

मैं यानी कि सीमा अवस्थी. विरासत में मिले दरियागंज के ‘अवस्थी प्रकाशन’ को संभाल रही हूं. ग्रैजुएशन करने के बाद ही दूसरी भारतीय लड़कियों की तरह मुझे औरत बना दिया गया. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के ब्रांच मैनेजर राकेश अवस्थी से मेरी शादी कर दी गई. ताने मिलते, उससे पहले ही हमने प्रिया को पा लिया था. पारिवारिक, व्यवस्थित, नियमित, एक शब्द में कहूं तो ‘आइडियल’ जिंदगी चल रही थी.

यह नवंबर का पहला सप्ताह था. दिल्ली के आकाश में धुंधनुमा कोहरा छाने लगा था. अरावली की पहाड़ियों पर ठंड ने दस्तक दे दी थी. दिल्ली के दरियागंज में इन दिनों माहौल ठंडा रहता था. पिछले कई दिनों से मेरे पास एक फोन आ रहा था. कॉल मेरे ऑफिस वाले नंबर पर आता था. मैंने उससे कितनी बार गुजारिश की कि वो यहां आ जाए. डांटा भी-

किताब तुम्हारी है, तो तुम्हें ही आना पड़ेगा. प्रकाशक लेखक के पास नहीं जाते.

वो फोन काट देता. दूसरे दिन फिर वही कॉल-

मैं रवि हूं, आप एक बार मेरे कमरे पर आ जाइए, नोएडा.

मैं असमंजस में थी. लेखक के पास प्रकाशक? उसकी आवाज के पीछे मुझे निहायत ही टूटा हुआ इंसान दिखता था. इतवार का दिन था. सुबह के आठ बजे थे. मैं गाड़ी लेकर नोएडा चल दी. उसने मुझे एक पेनड्राइव दी. कहा-

यह अधूरी है, पूरा करके छाप देना.

अब मैं उसकी प्रतिलिपि से हू-ब-हू लिख रही हूं, जो उसने मुझे सौंपी थी-

वेदना में एक शक्ति है, जो दृष्टि देती है. जो यातना में है, वो दृष्टा हो सकता है. इसी एक कथन के साथ प्रयोग कर रहा हूं. इन्हीं प्रयोगों में मैंने, यानी कि रवि पंडित ने जिंदगी दांव पर लगा दी. हे प्रभु, मैं जो लिखने जा रहा हूं, उसके लिए मुझे माफ कर देना. मैं सच लिखने जा रहा हूं.

अभी तक 21वीं सदी छह साल की हो चुकी थी. दो साल पहले मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने थे. 2006 के अगस्त महीने में मैं अपने आवासीय विद्यालय पहुंचा. बड़े होने की सभी अर्हताएं मैं पूरी कर चुका था. लड़कियां मुझे आकर्षित करने लगी थीं. उन्हें छूने की ललक पैदा होने लगी थी.
तब मैं 11वीं में था, जब भावना ने मुझे यह चिट्ठी भेजी थी. दरअसल, यह एक लव लेटर यानी कि प्रेमपत्र था. हम दोनों एक-दूसरे से प्यार करते थे. चुंबन होने लगे थे. प्यार में जो कुछ औपचारिक होता है, सब कुछ हो रहा था. वो बड़े परिवार की लड़की थी. पिता कारोबारी और मां प्रफेसर थीं. भावना की उस चिट्ठी को मैं वैसे का वैसा ही यहां रख रहा हूं-

मेरी जान,
आई लव यू… आई लव यू. कैसे हो? आज-कल क्लास में बहुत जलवे में रहते हो. कल जब हम बात कर रहे थे, तब तुमने कहा था कि कोई ऐसी बात जो तुमने मुझसे छुपाई हो. आज मैं आपको वो बात बताना चाहती हूं. तब मैं करीब 10 साल की थी. रात को मैं सो रही थी. मेरे बिस्तर पर एक अंकल आए और मुझसे चिपकने लगे. मैं चिल्लाई, भागी, तो मेरी मां ने मुझे वापस भेज दिया. पूरी रात मैं रोती रही. एक घंटे बाद ही अंकल चले गए. तब से जब मैं घर जाती हूं, तो हर दिन कोई न कोई अंकल आते हैं. इसलिए मैं घर कम जाती हूं. मम्मी कहती हैं कि पापा ने पिछले सालों में कई फ्लैट खरीद लिए. पता नहीं तुम्हें यह सब बताना चाहिए या नहीं, लेकिन मैं कुछ भी छुपा नहीं सकती.
-तुम्हारी भावना

सांकेतिक इमेज (रायटर्स)
सांकेतिक इमेज (रायटर्स)

11वीं में इन बातों का आशय न तो ठीक से मैं समझता था, न ही वो. दूसरे दिन हम मिले. मैंने उसे समझाया-

कोई बात नहीं, चुप रहो. जो भी हो, होने दो. मम्मी-पापा हैं, जो भी करेंगे अच्छा ही करेंगे. परेशान मत हुआ करो.

हम लोगों ने किस किया. टाइट वाला हग किया. ये वो दिन थे, जब मैं ‘जिमि सुतंत्र भए बिगरहिं नारी’ अक्सर सुनता रहता था.

उन्होंने मुझसे कहा-

कुछ करो, हमें तो पैसा चाहिए.

उसने मुझसे बिल्कुल उन्हीं की भाषा में बोला था. आरफा खान मेरे कॉलेज की इकलौती मुस्लिम लड़की. जैसा नाम, वैसी ही सुंदरता. बड़ी-बड़ी आंखें, कमर के नीचे तक बाल. उस पर क्लास का हर लड़का मरता था और वो मुझसे बेइंतहा मुहब्बत करती थी. आज सब बातें रिपीट हो रही थीं. आरफा और मैं कई बार साथ सोते थे. मैंने किस से शुरुआत की, तो हम बिस्तर तक पहुंच गए. सप्ताह में दो-तीन दिन हम साथ सोते थे. कॉलेज से निकलने के तीन साल बाद आज हम मिल रहे थे. वो मुझसे चिपकर रोने लगी. वो बहुत रो रही थी. कितनी बातें उसने मुझे बताई. जाते-जाते जो उसने बताया, वो मेरे लिए डरावना था-

कुछ करो, हमें तो पैसा चाहिए.

कॉल सेंटर में मुझे 10-12 हजार मिल जाते थे. उनको (माता-पिता को) और चाहिए थे. कॉल सेंटर के मैनेजर ने मुझे अपने साथ सोने के 10 हजार दिए. कइयों के पास उसने मुझे भेजा. अब मैं यही करती हूं. मुझे तुम्हें छूने का अधिकार नहीं है. मेरे लिए तुम देवता हो, मैं तुम्हारी पूजा करती हूं. हां, मुस्लिम होकर पूजा करती हूं. मेरे अधिकतर ग्राहक हिंदू हैं और ग्राहक तो देवता ही होता है. सुनो मेरे देवता, मुझे इसी एक बात से सुकून मिलता है कि तुमने मुझे प्यार किया. तुम महान हो. पवित्र हो. सच्चे प्यार की प्रतिमूर्ति हो.
आरफा की बातें मुझे चुभ रही थीं. मुझसे सहन नहीं हो रही थीं. मैंने आरफा को बाय कर दिया-

मैं देवता हूं? मैं महान हूं? मेरी पूजा होती है? मैंने सच्चा प्यार किया है? किससे, भावना से? आरफा से? भावना भी फेसबुक पर बोल रही थी, मेरे देवता, एक बार दर्शन दे दो.

स्कूल की लड़की मेघा से कॉलेज टाइम में भी जुड़ा था. उससे मेरी लगातार बात हो रही थी. मेरे क्लास की बेहतरीन लड़कियों में से एक थी मेघा. स्कूल में मुझे बहुत सम्मान देती थी. हमारी लगातार बात हो रही थी. बातचीत बढ़ते-बढ़ते प्यार में बदल गई. वो बहुत प्यार करती थी. घर वालों से झूठ बोलती थी. कई बार ‘आउट ऑफ द वे’ जाकर मेरी मदद करती थी.

नैनीताल के एक होटल में हम दोनों एक-दूसरे से चिपक कर लेटे थे. उसका सिर मेरे सीने पर था. उसके बायें पैर का अंगूठा मेरे दायें पैर को छू रहा था. बार-बार मेरे होठों से वो अपने होंठ चिपका देती. मेरी गर्दन के बीच अपना मुंह रखकर उसने कहा-

रवि, मैं सातवीं क्लास में थी। मधु और प्रतीक्षा रात को मेरे बिस्तर पर आती थीं. दोनों तरफ से मुझे दबा लेती थीं. मेरी ब्रा उतार देतीं और मेरे स्तनों को बड़ी बेरहमी से दबातीं. रवि, मैं सातवीं में थी. छोटी थी. वो दोनों बड़ी थीं. तुम जानते हो.

इतना कहते-कहते मेघा की आंखों से निकलते हुए आंसुओं ने मेरी छाती भिगो दी थी. मैंने पूछा-

लेस्बियन थी?

उसने कहा-

पता नहीं.

थोड़ी देर चुप होकर वो बोली-

तुम मेरा पहला प्यार हो. मुझे सबसे अच्छे से जानते हो. तुम पर मैं अपने मम्मी-पापा से भी ज्यादा विश्वास करती हूं. जानते हो, प्यार और जिस्मानी संबंध की पहली महक मैंने तुम में पाई है, इसे नहीं भूल पाऊंगी. तुम देवता हो, मैं तुम्हारी पूजा करती हूं.

12 साल की लड़की से रेप के आरोप में पिता गिरफ्तार. (symbolic image)

मेरे दिमाग में भावना आ गई. तुम मेरे देवता हो. आरफा आ गई. तुम मेरे देवता हो. दोनों मुझसे दूर हो गईं. अब मेघा भी वही बात कह रही है. मेघा के जाने का भी वक्त हो गया. भावना और आरफा की तरह मेघा के लिए भी मैं देवता हूं. मैं पापी हूं. हवसी हूं. मैं देवता नहीं हो सकता.

‘रवि, इन लड़कियों ने तुमसे मन की बात कही. तुम हवसी नहीं हो. पापी नहीं हो.’ ‘रवि, तुमने इन्हें धोखा भी दिया है. क्यों तुम भावना के साथ नहीं रहे? आरफा को क्यों छोड़ दिया? क्या तुम वादा करते हो कि मेघा का साथ निभाओगे? र‌वि, तुम्हें शरीर की भूख शांत करनी होती है.’ नहीं-नहीं, ऐसा नहीं है. मैं राक्षस नहीं हूं. मैं देवता भी नहीं हूं. मैं इंसान हूं. कोई मुझे इंसान नहीं कहता.’ मेरी मानसिक स्थिति बिगड़ने लगी थी. रात-रात भर किताबें पढ़ता जाता. काफ्का, इशीगुरी, गोर्की, नेरुदा समेत कितनों को पढ़ता चला गया ये खुद ही भूलता गया. साहित्य से शुरू होकर अरस्तु, प्लेटो, मैकियावेकी तक पहुंचा. फ्रॉयड और डार्विन मेरे तकिये के नीचे थे.

मेदिनी नाम था उसका. दिल्ली में मिली, तो बिल्कुल आम लड़की लगी थी. हम दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई. मेदिनी को मैं ‘मिस फेमिनिस्ट’ बुलाता था. अपने हक के लिए लड़ना, अपनी बात कहना और महिलाओं के विरोध में कुछ भी नहीं सुनना, यही उसकी तीन खूबियां थीं. मैं और मेदिनी एक ही संस्थान के लिए काम करते थे. हमारा मिलना-जुलना, बहस चलती रही. पिछले कुछ दिनों से मेदिनी और मैं जमकर बातें कर रहे थे.

फेमिनिज़म से शुरू होती हमारी बहसें अंत में सेक्स पर पहुंच जातीं. मेदिनी अल्कोहल लेती थी. रात 10 बजे मेदिनी से ‘फ्री सेक्स’ पर मेरी बात हो रही थी. वॉट्सऐप पर मैंने लिख दिया-

मेरे साथ सेक्स करोगी?

उसने कहा-

गेट खुला रखना. मैं आ रही हूं.

आधे घंटे बाद मेदिनी मेरे बिस्तर पर थी-

मेरे देवता, मैं कब से तुम्हारे साथ सोना चाहती थी. तुम्हीं मुझे इग्नोर करते आए.

इतना सुनते ही मेरे ऊपर जैसे सन्निपात हो गया. मेरे शरीर से पसीना निकलने लगा. करीब 20 मिनट बाद मेदिनी कमरे से बाहर निकल रही थी, ये कहते हुए, ‘तुमने आज सिद्ध कर दिया कि तुम देवता ही हो. मेरी इतनी कोशिश के बाद भी तुमने मुझे छुआ भी नहीं.’ मेदिनी इन 20 मिनटों में कपड़े उतारने से लेकर उत्तेजित करने के सभी तरीके अपना चुकी थी. निकलते वक्त उसका मुझे देवता कहना मैं सहन नहीं कर पाया. बाहर जा रही मेदिनी को पकड़कर खींचा और उसे थप्पड़ मार दिया. मैं चीखने लगा, ‘मैं देवता नहीं हूं, मैं देवता नहीं हूं. समझी?’ किचन में चाय बना रही थी. 17 साल की थी. सब लोग बाहर थे. मेरे भाई ने मुझे पीछे से पकड़ लिया. मेरी ब्रा में हाथ डाल दिया. मैं उससे छुड़ाने की कोशिश करती रही-

प्लीज, मेदिनी जाओ.

नहीं रवि, इसीलिए तुम मेरे देवता हो. मैं तुम्हारी पूजा करती हूं.

शराब और सिगरेट का मैं आदी हो गया. आंखों के नीचे काले गहरे घेरे बन गए. मेरे दिलो-दिमाग से भावना, आरफा, मेघा और मेदिनी का दर्द निकल ही नहीं रहा था. उनकी पीड़ाएं मेरी रूह तक को डरा रही थीं. सोचता था देश में, दुनिया में ऐसी कितनी लड़कियां होंगी, जो बाल यौन शोषण का शिकार होती होंगी.

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मैं गूगल पर गया. बाप ने बेटी का किया बलात्कार. भाई ने बहन से रेप किया. मैं डर गया। कुछ दिन बाद हिंदुस्तान टाइम्स में वर्ल्ड विजन इंडिया की रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में हर दो में से एक बालक यौन शोषण का शिकार है. ये मेरे सबसे दुख भरे दिन थे. दुख, दर्द, तड़प, लालसा, बेचैनी और स्याह रातों की सड़न भरी दोपहरी में मुझे मेरी प्रिय प्रेमिकाएं याद आतीं.

इन दिनों मैं इंसानों से दूर होने की चाह में शहर से दूर कमरा लेकर रहने लगा. मेरे कमरे की खिड़की से एक घर दिखता था. उस घर का दरवाजा मेरी खिड़की के बिल्कुल सामने था. उस घर से रोज शाम को 7-8 बजे तक एक आदमी 17-18 साल की लड़की को लेकर बाहर निकलता. 2-3 घंटे बाद वापस लौट आता. मैं और दूसरे लोग लड़की को इसी वक्त देखते थे. बस. मेरे सामने यह सिलसिला एक महीने से चल रहा था. मैं स्तब्ध था. बरबस, उस लड़की ने बुलाने का इशारा किया था. मैं डर तो रहा था, लेकिन चला गया. जैसा ही अंदर पहुंचा, लड़की ने मुझे आलिंगन में ले लिया. वो रो रही थी. 17 साल की लड़की, जिसके चेहरे पर अभी भूरे रंग के रोएं दिख रहे थे. करीब 10 मिनट बाद मैंने उसे हटाकर पूछा, क्या हुआ? उसने जो कहा, उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता था मैं-

मेरा बाप रोज मेरा बलात्कार करता है. मुझे नंगा करके सिगरेट से जलाता है. (17 साल की लड़की के पास यही शब्द थे.) मेरे ऊपर शराब डालता है. मुझे पढ़ाने के नाम पर घर से लाया था. स्कूल नहीं जाने देता. मैंने कितने लोगों को बुलाया, कोई नहीं आया। तुम मेरे देवता हो, मैं उम्र भर तुम्हारी पूजा करती रहूंगी. मुझे बचा लो। प्लीज बचा लो.

मैंने घर भेजने को कहा-

नहीं घर नहीं जाऊंगी.

कितनी बार मम्मी को ये सब बताया, मैंने उसे मुंबई की ट्रेन में बिठा दिया. मेरे अंदर बीमारियां घर करती जा रही थीं. दुनिया से नफरत होने लगी. सभ्यता और संस्कार की बात करने वाला यह दकियानूसी समाज कितना नीच है. हर आदमी पर मुझे शक होने लगा. मैं जिससे भी मिलता, लगता जैसे इसने अपनी बहन, बेटी या मां का बलात्कार किया होगा. मैं एक अजीब से रोग से पीड़ित हो गया. अब बंद कमरा मेरे लिए ऑक्सीजन जुटा देता. उसी बंद कमरे में सच लिखने की हिम्मत जुटाने लगा. अब ज्यादा दिन नहीं बचे हैं. सीमा का फोन आया था, वो कल आएगी. सीमा, अवस्थी प्रकाशन वाली.

मैं उसके कमरे पर पहुंची, तो दरवाजा बंद था, लॉक नहीं. सेकंड फ्लोर के कमरा नंबर 206 की खिड़की भी लॉक थी. मैंने नॉक किया. ‘सीमा आ जाओ, खुला है.’ मैं अंदर गई. ‘बंद कर दो, आओ.’

मैं हैरान थी. वो जवान था, लेकिन बूढ़ा हो गया था. सिर के कुछ बाल काले, लेकिन छाती के सभी सफेद थे. गोरा रंग था उसका. बांहों पर खूब बाल थे. चेहरा मोटा था, लेकिन मांस लटकने लगा था. छाती के बाल गले तक पहुंच रहे थे. एक तरफ बेड था. दूसरे कोने में खाना बनाने का सामान. सब सामान जमीन पर था. उस कमरे में तीन फोटो लगे थे- मंटो का, आइंस्टाइन का और नेहरू का.

मैं हैरान थी कि इन तीन फोटो का आपस में कोई संबंध था? ‘तुम प्रकाशक हो या लेखिका?’ ये आवाज सुनकर मैं चौंक गई. ‘प्रकाशक ही हूं.’ ‘नहीं, तुम्हारी नजरें कह रही हैं कि तुम्हें लिखने का शौक है. तब से तुम्हारी निगाहों ने पूरे कमरे को स्कैन कर लिया है.’ जो बात अब तक मैं खुद से छुपाती आई थी, इसने कैसे जान ली? कितनी तो कविताएं लिखीं थीं मैंने. शुरू-शुरू में पापा ने उत्साह बढ़ाया. बाद में कॉलेज के टाइम पर एक कविता लिखी थी-

घर में ही लुटती हैं बेटियां
बहन कहने वाले जब बन जाते हैं हैवान
फेंक देते हैं, उतारकर लिहाज तब
पिटती हैं बेटियां
बलात्कार करने के बाद सीना तान कर
घूमता है भाई
घर के कोनों में छिपती हैं बेटियां
कई दिनों तक आंसुओं से खुद को ही
भिगोती हैं बेटियां
फिर एक‌ दिन हिम्मत करके
बाहर निकलती हैं बेटियां
शाम को फिर घर में पिटती हैं बेटियां.

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पापा ने देखा, तो एक थप्पड़ रसीद कर दिया था. तब से कुछ नहीं लिखा. ‘सीमा कहां खो गई?’ ‘हां, कहीं नहीं.’ ‘रवि जी, आप तो देवता हैं. आपकी पूजा करनी चाहिए.’ रवि की आंखों से आंसू निकल रहे थे. ‘मैं देवता नहीं हूं, नहीं हूं मैं देवता.’ मैं उसके बेड पर थी. उसके सूख चुके होंठों को चूम रही थी.

मैं उसके भूरे बालों वाली छाती में उंगली घुमा रही थी. तब उसने कहा-

सीमा जी, खुदकुशी कला की दुनिया में सबसे खूबसूरत मौत है. सीमा, मैं ऐसी दुनिया चाहता हूं जहां घर में और बाहर लड़कियां सुरक्षित हों. वो बार-बार बोले जा रहा था. दोस्तोयेव्स्की, नीत्शे, मेजिनी, मेरे… सीमा जी, इसे पूरा कर देना. छाप भी देना.

मैं घर आई, उसको रखकर सो गई. सुबह करीब आठ बजे मेरे पास फोन आया-

क्या आप मिस्टर रवि को जानती हैं?

मैंने कहा-

हां, मुख्तसर सा.

उन्होंने फांसी लगा ली है, अपने घर में. उनके फोन पर अंतिम नंबर आपका था. मैं लगभग गूंगी हो गई. कल मैं उसके साथ सोई थी. कुछ औपचारिकताएं पूरी करके मैं वापस आ गई. मुकम्मल तौर पर मैंने उसे देखा भी नहीं था. उसकी जिंदगी के वरक पर मौत के लफ्ज ही लिखे थे. मैं रास्ते भर सोच रही थी कि मैंने उस पंखे को उस दिन क्यों नहीं देखा, जो कमरे में शायद इसीलिए लगा था. ताकि उस पर लटककर फांसी लगाई जा सके. उस देवता की मौत के बाद मैं बहुत मजबूत हो गई थी शायद. मैंने कलम उठाई और कोरे कागज पर लिखने लगी-

घर में ही लुटती हैं बेटियां,
बहन कहने वाले, बेटी कहने वाले
जब बन जाते हैं हैवान
फेंक देते हैं…

पाठको, मैं अब आत्महत्या नहीं करूंगी. देवता की कुर्बानी को बेकार नहीं जाने दूंगी. अब मैं सच लिखूंगी, नतीजा चाहे जो हो. बेटियों, उठो. लिखो और ललकार दो.


वीडियोः

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