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धर्मशाला बनेगी किसकी शाला इस बार

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शिमला और कुल्लू मनाली के बाद हिमाचल प्रदेश के टूरिस्ट मैप पर उभरा तीसरा शहर. धर्मशाला-मैक्लॉइडगंज. वजह, तिब्बतियों का वास, दलाई लामा का आवास, भागसू नाग जल प्रपात, त्रिउंड की ट्रैकिंग. लंबी फेहरिस्त है. विदेशी सैलानी खूब आते हैं तो खाने के भी अच्छे ठिए विकसित हो गए हैं. मगर ये सब बाहरियों के लिए है. धर्मशाला विधानसभा के रहवासियों को इस चश्मे से मत देखिए. यहां भी बाकी हिमाचल की तरह समस्याएं हैं. शहर के लोग स्मार्ट सिटी के ऐलान से खुश हैं, मगर वह और चाहते हैं. उन्हें वीरभद्र के वो ऐलान याद आ रहे हैं, जिसमें धर्मशाला और उससे सात किलोमीटर दूर ऊंचाई पर बसे मैक्लॉइडगंज के लिए रोप वे का इंतजाम करने की बात है. मोनो रेल के भी वादे यहां के राजनेता कर चुके हैं. हमने इन वादों, दावों के लिए कई शहर वालों से बात की. फॉर ए चेंज धर्मशाला में वीडियो कम किए, बात ज्यादा. उसे पढ़ें तो कई बातें साफ हो जाती हैं.

पुराने बाजार में मिले पूरण शू मेकर के बड़े भाई ने. सड़क किनारे फट्टी बिछा जूता मरम्मत करते. श्रीगंगानगर से यहां आए. वसुंधरा सरकार की बहुत आलोचना की. हिमाचल पर बोले, यहां के लोग अच्छे हैं. जीएसटी पर भी उन्हें गुस्सा आया. बोले, गरीब आदमी चिनाई भराई का काम करता था. मोदी सरकार के आने के बाद मकान बनने कम हो गए. ऐसे में मजदूरी के लाले पड़ गए. उनके उलट बात की खादी भंडार में काम करने वाले प्रमोद ने. वह बोले, अभी लोगों को जीएसटी समझने में समय लग रहा है. बस उसी की नाराजगी है.

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शाहपुर में प्रधानमंत्री मोदी की परिवर्तन रैली. हिमाचल में ज्यो-ज्यों चुनाव नज़दीक आते जा रहे हैं, पार्टियां आक्रामक प्रचार कर रही हैं

चेक से चंदा देने वाला कारोबारी

मुख्य बाजार में ही श्रीराम स्वीट्स है. मिठाई और स्नैक्स की बड़ी दुकान. इसके मालिक अशोक मेहरा बीजेपी सपोर्टर हैं. उन्होंने लंबा चौड़ा ज्ञान दिया इलाकाई मुद्दों पर. अपने चेक बुक दिखाकर बोले, हमें जीएसटी से क्या डरना. नंबर एक का काम है. अपना डेरी फॉर्म है. वहीं का दूध दही खोया यूज करते हैं मिठाई में. इस बातचीत के दौरान ही उनका पोता भी आ गया. पहले दादा को चूमा फिर पीछे खड़े पापा को. और फिर बच्चे के पापा बोले. अभी ये बच्चे यहां से वर्कशॉप जाएंगे. कुछ भी खा सकते हैं वहां. हमें चिंता करने की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि कोई मिलावट नहीं.

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फिर अशोक मेहरा ने बताया कि देखिए ईमानदारी का तो ऐसा है कि मैं नेताओं को चंदा भी चेक से देता हूं. बीजेपी के किशन कपूर आए तो उन्हें 51 हजार का चेक दिया. मैंने पूछा, कांग्रेस को भी दिया क्या. इस पर मेहरा बोले, नहीं हम तो हिंदू महासभा वाले हैं. पहले उसमें थे, जब पेशावर में बाप दादा थे. फिर जनसंघ से होते हुए बीजेपी वाले हो गए. ये बीजेपी के उत्तर भारत में बने पंजाबी वोट बैंक की एक बानगी है. दिल्ली में इसके लक्षण लंबे अर्से तक स्पष्ट नजर आए. विभाजन के चलते पाकिस्तान के हिस्से आई जमीन छोड़ने को मजबूर ये लोग कांग्रेस को माफ नहीं कर पाए. जाते-जाते अशोक मेहरा ने एक सलाह भी दी. अपनी पार्टी के लिए. बोले बीजेपी वाले डफर हैं, अपने काम का प्रचार नहीं कर पाते. हो सकता है कि स्थानीय स्तर पर बीजेपी कैंडिडेट और पूर्व विधायक किशन कपूर के मामले में ये बात दुरुस्त हो. उससे आगे नहीं जमता ये मामला. हिमाचल के अखबारों में बीजेपी के प्रचार की धूम है. कांग्रेस बेतरह पिछड़ी नजर आती है. उससे आगे का क्या कहें. सब जानते हैं.

बीजेपी के लिए धर्मशाला गढ़ मानी जाती थी. पिछले चुनाव तक. यहां शांता कुमार के खास रहे किशन कपूर चुनाव लड़ते थे औ जीतते भी थे. वह गद्दी समुदाय से आते हैं, जिसकी यहां बहुतायत है. परंपरागत रूप से यह भेड़पालक समुदाय होता है. आज भी धर्मशाला में कई गांव पूरे के पूरे इनसे आबाद हैं. किशन कपूर ने 1985 में पहला चुनाव लड़ा और हार गए. मगर 1990 से उनकी जीत का सिलसिला जो शुरू हुआ तो हैट्रिक लगी. फिर 2003 में राज परिवार से आने वाली चंद्रेश कुमारी से हार गए. पांच साल बाद उन्हें हराकर बदला पूरा किया. मगर 2012 में वह बैजनाथ की सीट से यहां शिफ्ट हुए सुधीर शर्मा के सामने फिर ढेर हो गए.

धर्मशाला से भाजपा कैंडिडेट किशन कपूर
80 के दशक से राजनीति करते आ रहे धर्मशाला से भाजपा कैंडिडेट किशन कपूर विधायकी में इन आउट होते रहे हैं (फोटोःफेसबुक)

उनके समर्थकों को लगता है कि अब किशन कपूर जीतेंगे तो पहले की तरह मंत्री बनेंगे. ये बात वीरभद्र भी समझते हैं कि धर्मशाला को लाल बत्ती का चस्का है. इसीलिए पूरे तामझाम के साथ इसे दूसरी कैपिटल जैसा बनाया गया. सांकेतिक तौर पर ही सही पूरी सरकार एक हफ्ते के लिए शिमला से उठकर धर्मशाला आती है. इससे अपर हिमाचल, लोअर हिमाचल के विवाद को भी दफनाने में मदद मिलती है, ऐसा सरकारों को लगता है. विरोधी इसे पैसों की बर्बादी बताते हैं. यहां से कांग्रेस विधायक सुधीर शर्मा वीरभद्र के खास हैं. उनकी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे. पूरी विधानसभा में उनके पोस्टर, होर्डिंग में एक ही बात लिखी है, झूठे वादे नहीं करेंगे. काम किया है काम करेंगे.

क्या किया है सुधीर शर्मा ने

लंबी फेहरिस्त गिनाते हैं साथ वाले. पार्क, पार्किंग से लेकर कॉलेज तक. मगर शीला चौक में बस पत्थर दिखा, कम्युनिटी पार्क नहीं. कांग्रेस का ये हाल कई जगहों पर हमें नजर आया. सरकार ने कई बड़े प्रोजेक्ट शुरू किए, मगर चुनाव से एक बरस पहले. तो ज्यादातर या तो शिलान्यास पट्टिका तक सीमित हैं या फिर अभी आधे-अधूरे बने हैं. एक नागरिक के तौर पर मैं बस यही कामना करता हूं कि जो भी सरकार बने, ये काम पूरे हो जाएं. आका बदलने पर अधूरे विकास के नजारे हमने कई सूबों में देखे हैं. उसी से ये प्रार्थना जन्मी है.

धर्मशाला से हालिया विधायक सुधीर शर्मा हिमाचल कैबिनेट में शहरी विकास मंत्री हैं (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स)
धर्मशाला से हालिया विधायक सुधीर शर्मा हिमाचल कैबिनेट में शहरी विकास मंत्री हैं (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स)

क्या बाली के लोग शर्मा को निपटा रहे हैं

चौक-चौराहों की गप्प और साजिश की थ्योरीज से चुनाव के असल तापमान का पता चलता है. खड़ा डंडा रस्ता जहां शुरू होता है, वहां कई बतोलेबाज मिले. बोले, इस पर तो शर्मा को बाली ही निपटा रहा है. बाली मतलब जीएस बाली, पास की नगरोटा बगवां सीट से विधायक और मंत्री. दोनों में वीरभद्र के बाद कमान संभालने के लिए होड़ है. वैसे इस रेस में मंडी के कौल सिंह ठाकुर और हरोली के मुकेश अग्निहोत्री भी शामिल हैं. खैर, हमें बताया गया कि धर्मशाला में ये जो निर्दलीयों की बाढ़ है, इसमें सबसे ज्यादा कांग्रेसी हैं. इनमें से कई को बाली ने खड़ा किया है ताकि शर्मा शिमला न पहुंच पाएं. दिग्विजय पुरी कांग्रेस के पुराने कार्यकर्ता रहे, अब निर्दलीय मैदान में हैं. मगर शर्मा को सबसे बड़ा खतरा है रविंदर राणा से. वह गोरखा समुदाय से आते हैं. गद्दी के अलावा यही समुदाय संख्या बल में जोर रखता है और इकतरफा बटन दबाता है. पिछली मर्तबा यह सुधीर शर्मा के साथ हो लिया था. मगर इस बार राणा मैदान में हैं तो यह स्थिति बदलती दिख रही है.

सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनी खींचतान की जगह

यूपीए सरकार के दौरान धर्मशाला को एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी मिली. चालू भी हो गई. मगर किराये के भवन में. अभी भी चल रही है. मगर दूसरे स्कूलों कॉलेजों के भवन में. और वह भी कई जगहों पर. पहले शाहपुर चली. फिर कुछ डिपार्टमेंट धर्मशाला वालों के विरोध के बाद यहां के बीएड कॉलेज में शिफ्ट कर दिए गए. फिर मांग उठी कांगड़ा की ही देहरा सीट से. तो वहां भी पंजीरी देने की बात हुई. जदरांगलव में जमीन ले ली गई है. मगर काम शुरू नहीं हुआ. पहले जहां शुरू होना था, वहां पहाड़ी धसकी तो फिर कहा गया कि ये जगह ठीक नहीं. इन सबके फेर में स्टूडेंट खूब परेशान हैं. स्थानीय नागरिक कहते हैं कि पूरी की पूरी यूनिवर्सिटी धर्मशाला में बननी चाहिए, बाद में सरकार चाहें तो कहीं और एक एक्सटेंशन खोल दे.

धर्मशाला से चंबा तक का रास्ता काफी खराब है.
धर्मशाला से चंबा तक का रास्ता काफी खराब है.

ये सब सुनने के बाद हमने भी अपने घोड़े खोल दिए. कांगड़ा के दूसरे इलाकों और चंबा की तरफ. रास्ते में खूब खराब सड़कें मिलीं. यहीं आलम धर्मशाला से मैक्लॉइडगंज जाने की तरफ भी था. बीजेपी वाले कह रहे हैं कि एनएच देख लीजिए, हमारी नीति नीयत दिख जाएगी. कांग्रेस वाले कह रहे हैं कि भरपूर बजट दिया है, काम होने में समय तो लगता ही है.

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