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अफगानिस्तान में जारी हलचल का भारत पर क्या होगा असर?

पिछले कुछ समय से ग्लोबल पॉलिटिक्स का बड़ा हिस्सा अफ़ग़ानिस्तान पर केंद्रित है. चूंकि अफ़ग़ानिस्तान, भारत का पड़ोसी है. इसलिए, भारत के हित उससे सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं. अफ़ग़ानिस्तान में जो कुछ भी हो रहा है, इसका असर भारत की विदेश नीति और सुरक्षा-व्यवस्था सहित कई और अहम मुद्दों पर पड़ता है. आज हम अफ़ग़ानिस्तान की बात तो करेंगे ही. साथ में बाकी पड़ोसी देशों की भी. जैसे – श्रीलंका, बांग्लादेश और चीन. बताएंगे, उन देशों में क्या कुछ चल रहा है?

सबसे पहले चलते हैं भारत के दक्षिण की तरफ़. हिन्द महासागर में बसा श्रीलंका इस समय बड़े आर्थिक संकट का सामना कर रहा है. श्रीलंका के पास फ़ॉरेन एक्सचेंज की भारी किल्लत हो गई है. इसका असर खाद्यान्न और दवाओं जैसी बुनियादी ज़रूरत की चीज़ों के आयात पर पड़ा है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बुनियादी ज़रूरत की वस्तुएं अचानक से बाज़ार से गायब होने लगी हैं. श्रीलंका की करेंसी भी रुपया कहलाती है. डॉलर के मुकाबले इसका मूल्य काफी नीचे गिर गया है.

इसके मद्देनज़र श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने देशभर में फ़ूड इमरजेंसी लगाने का ऐलान किया है. मेजर जनरल (रिटायर्ड) एमएसपी निवुनहेला को ज़रूरी सेवाओं का आयुक्त बनाया गया है. उन्हें व्यापारियों और खुदरा दुकानदारों के पास जमा अनाज के स्टॉक को ज़ब्त करने, जमाखोरों को अरेस्ट करने और मूल्य निर्धारित करने का अधिकार भी दिया गया है.

राष्ट्रपति ने ऐलान के दौरान कहा कि संबंधित अधिकारी अनाज और दूसरी बुनियादी वस्तुओं को खरीदकर रियायती दर पर बेच सकेंगे. आसान भाषा में कहें तो सरकार अब इन वस्तुओं की खरीद-बिक्री करेगी. पहले ये काम निजी क्षेत्र का था. बाज़ार के हिसाब से दाम निर्धारित होते थे. ये सामान्य दिनों की बात थी. लेकिन, अभी इस बात का डर बढ़ गया था कि सामानों की कमी के कारण जमाखोरी बढ़ सकती है. और, इसके बाद कीमतें जमाखोरों की मनमर्ज़ी पर निर्भर हो जातीं.

श्रीलंका में चल रहे संकट की वजह क्या है?

इसका सबसे बड़ा कारण है, विदेशी मुद्रा भंडार में कमी. नवंबर 2019 में जब गोटाबाया राजपक्षे राष्ट्रपति बने, श्रीलंका के पास 750 करोड़ डॉलर्स का फ़ॉरेन रिजर्व था. जुलाई 2021 तक ये घटकर 280 करोड़ डॉलर्स तक पहुंच गया.

विदेशी मुद्रा का क्या लोचा है? दुनिया में कुछ करेंसीज़ ऐसी हैं, जिन्हें पूरी दुनिया में मान्यता प्राप्त है. जैसे कि डॉलर, यूरो, पाउंड, येन आदि. अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए इन करेंसीज़ की ज़रूरत होती है. ये काफ़ी मज़बूत होती हैं. यानी इनका मूल्य अचानक से बहुत ज़्यादा घटता या बढ़ता नहीं है.

मान लीजिए कि श्रीलंका ने सऊदी अरब से कच्चे तेल का आयात किया. अब श्रीलंका को उसका भुगतान करना है. चूंकि दोनों देशों की करेंसी अलग है. इसलिए, श्रीलंका भुगतान डॉलर्स में करेगा. यहां पर विदेशी मुद्रा भंडार की ज़रूरत पड़ेगी.

विदेशी मुद्रा भंडार बचाने के लिए श्रीलंका ने पिछले साल गाड़ियों, हल्दी और खाने के तेल के आयात पर रोक लगा दी थी. हालांकि इसका कोई बड़ा फायदा नज़र नहीं आया. आयातकों का कहना है कि जिन चीज़ों पर रोक नहीं है, उसे खरीदने के लिए भी डॉलर्स नहीं मिल रहे हैं.

विदेशी मुद्रा भंडार में कमी क्यों हुई?

– पहली वजह है कोरोना महामारी. कोरोना के कारण दुनियाभर में पर्यटन उद्योग ठप पड़ा हुआ है. श्रीलंका भी इससे अछूता नहीं है. साल 2019 में श्रीलंका की जीडीपी का लगभग 12 प्रतिशत हिस्सा पर्यटन से आया था. ये श्रीलंका के लिए सबसे अधिक विदेशी मुद्रा लाने वाले स्रोतों में से एक था. लेकिन लॉकडाउन और यात्रा की बंदिशों के चलते पर्यटकों का आना लगभग बंद हो गया. इसके कारण विदेशी मुद्रा की आमद में कमी आई.

श्रीलंका में इस समय भी लॉकडाउन चल रहा है. कोरोना के कारण रोज़ाना दो सौ से अधिक मौतें दर्ज़ हो रहीं है. जिस रफ़्तार से कोरोना के नए मामले सामने आ रहे हैं, लॉकडाउन में बढ़ोत्तरी की आशंका जताई जा रही है.

– दूसरी वजह है, ऑर्गेनिक खेती. श्रीलंका से निर्यात होने वाले सामानों की लिस्ट में चाय सबसे ऊपर है. चाय विदेशों में बेची जाती है, बदले में उससे विदेशी मुद्रा आती है. निर्यात से होने वाली आय का लगभग दस फीसदी हिस्सा चाय की बिक्री से आता है.

2019 में जब गोटाबाया राजपक्षे रैलियां कर रहे थे, तब उन्होंने वादा किया था कि फ़र्टिलाइज़र्स के आयात पर सब्सिडी दी जाएगी. गोटाबाया चुनाव जीत गए. लेकिन वो अपने वादे से मुकर गए. उन्होंने ये कहना शुरू कर दिया कि केमिकल फ़र्टिलाइज़र्स के कारण लोगों तक ज़हर पहुंच रहा है. 2021 में उन्होंने फ़र्टिलाइज़र्स के आयात पर ही रोक लगा दी.

गोटाबाया श्रीलंका को सौ फीसदी ऑर्गेनिक खेती करने वाला पहला देश बनाने का प्लान बनाया है. इसी के तहत खाद के इस्तेमाल पर भी रोक लगाई गई है. इस वजह से चाय के अलावा दालचीनी, काली मिर्च और धान की उपज कम होने की आशंका है. एक समय में जब श्रीलंका अनाज की किल्लत से जूझ रहा है, उपज में कमी का बड़ा असर देखने को मिलेगा.

जानकारों का मानना है कि ऑर्गेनिक खेती में सामान्य खेती की तुलना में दस गुणा अधिक खर्च आता है. वहीं, ऑर्गेनिक फ़ूड का मार्केट भी बेहद सीमित है. अगर चाय की उपज घटी तो श्रीलंका चाय का बना-बनाया बाज़ार खो देगा. इसका सीधा असर विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ेगा.

– तीसरी बड़ी वजह है भरोसे की कमी. श्रीलंका ने विदेश से भारी क़र्ज़ उठाया है. सरकार की कमाई का बड़ा हिस्सा क़र्ज़ की रकम अदा करने में खर्च हो रहा है. इसके बावजूद क़र्ज़ कम होने का नाम नहीं ले रहा. जब श्रीलंका, चीन का दिया पैसा नहीं लौटा पाया तो उसे हमबनटोटा बंदरगाह लीज पर देना पड़ा था. श्रीलंका की छवि डिफ़ॉल्टर की बनती जा रही है. यानी उसे दिया गया क़र्ज़ वापस मिलने की संभावना कम है. ऐसे में शायद ही कोई देश या संस्था श्रीलंका को लोन देने का मन बनाएगी.

श्रीलंका में आर्थिक संकट कोरोना आने के पहले से चल रहा है. सरकार हमेशा ये कहती रही कि सब नियंत्रण में है. लेकिन सब चंगा नहीं था. वास्तविक स्थिति को लगातार छिपाया गया. इसका नतीजा ये हुआ कि अब स्थिति नियंत्रण से बाहर चली गई है.

श्रीलंका के बाद अब चलते हैं बांग्लादेश. जहां पांच बरस पुराने हत्या के मामले में अदालत का फ़ैसला आया है. इस फ़ैसले को बुनियादी अधिकारों के लिए बेहद खास बताया जा रहा है.

बांग्लादेश: पूरा मामला क्या है?

ये घटना 25 अप्रैल 2016 की है. ढाका की. जुल्हास मन्नान दफ़्तर से घर लौटे थे. मन्नान गे और ट्रांसजेंडर कम्युनिटी पर केंद्रित ‘रूपबाण’ नाम की पत्रिका के संपादक थे. ये बांग्लादेश की अपने आप में पहली और इकलौती मैगज़ीन थी. मन्नान पहले बांग्लादेश में दो अमेरिकी राजदूतों के लिए बतौर प्रोटोकॉल ऑफ़िसर काम कर चुके थे.

25 अप्रैल को मन्नान के दोस्त महबूब रब्बी तोनोय भी उनके साथ ही थे. तोनोय पीपुल्स थिएटर नाम के एक संगठन में बच्चों को ड्रामा सिखाते थे. दोनों बैठे बात कर रहे थे, तभी अपार्टमेंट के दरवाज़े पर दस्तक हुई. बाहर पांच-छह लोग झुंड बनाकर खड़े थे. उनके हाथ में पार्सल दिख रहा था. सूरत और सीरत से वे लोग कुरियर वाले लग रहे थे. यही परिचय उन्होंने बिल्डिंग के सिक्योरिटी गार्ड को भी दिया था. लेकिन इन लोगों का इरादा कुछ और ही था. पार्सल के भीतर कुल्हाड़ी और तलवारें रखी थीं. वे लोग मन्नान की हत्या के इरादे से आए थे. लेकिन उन्होंने तोनोय को साथ में देखा तो उसे भी जान से मार दिया.

अगर तोनोय उस दिन वहां नहीं होते तो भी उनका बचना मुश्किल था. दरअसल, इस्लामिक कट्टरपंथियों ने नास्तिक लेखकों, स्वतंत्र विचारकों, अल्पसंख्यकों को मारने का प्लान बनाया हुआ था. ऐसा कोई भी व्यक्ति जो कठमुल्लाओं के नक़्शेकदम पर नहीं चलता, उनके ख़िलाफ़ फतवा जारी हो जाता था. रहस्यमयी हत्यारे आते और ऐसे लोगों को मारकर गायब हो जाते थे. उनके खौफ़ की कहानियां चलतीं थी. न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, ये अभियान 2013 से 2016 तक चला. इस दौरान कम-से-कम 39 लोगों की हत्या हुई.

आज हम ये कहानी क्यों सुना रहे हैं? ख़बर ये आई है कि मन्नान और तोनोय की हत्या के ज़ुर्म में छह लोगों को मौत की सज़ा सुनाई गई है. एंटी-टेररिज़्म स्पेशल ट्रायब्यूनल ने आठ में से छह आरोपियों को हत्या का दोषी करार दिया. सुनवाई के वक़्त उनमें से चार अदालत में मौजूद थे. दो दोषी अभी भी फरार चल रहे हैं. इनमें से एक मोहम्मद जियाउल हक़ बांग्लादेश की सेना में मेजर रह चुका है. 2012 में असफ़ल तख़्तापलट की साज़िश रचने के बाद उसे सेना से बर्ख़ास्त कर दिया गया था. जियाउल हक़ को इन हत्याओं का मास्टरमाइंड बताया जाता है. सभी दोषी अल-क़ायदा के ही ब्रांच अंसार अल-इस्लाम से जुड़े थे. अंसार अल-इस्लाम पर बांग्लादेश सरकार ने प्रतिबंध लगाया हुआ है.

अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा कि सभी दोषियों का इरादा एक था. वे लोग दूसरों को स्वतंत्र विचार व्यक्त करने से रोकने की कोशिश कर रहे थे. अदालत ने ये भी कहा कि मौत की सज़ा उदाहरण पेश करेगी कि बांग्लादेश में किसी भी तरह की हिंसा बर्दाश्त नहीं होगी.

बांग्लादेश में समलैंगिक संबंध रखना गैर-कानूनी है. इसके बावजूद अदालत के इस फ़ैसले ने बड़ी उम्मीद जगाई है. उम्मीद ये कि एक सभ्य और लोकतांत्रिक समाज में हर तरह की अभिव्यक्ति की आज़ादी ज़रूरी है. और, दूसरी बात ये कि असहमति का जवाब हिंसा से देना अपराध था, है और हमेशा रहेगा.

चीन सरकार का प्रोपेगैंडा

बांग्लादेश के बाद अब बारी है चीन की. वो देश, जहां प्रोपेगैंडा सरकार की शिराओं में बहता है. अबकी बार चीन सरकार ने प्रोपेगैंडा फैलाने का नया तरीक़ा निकाला है.

1 सितंबर से चीन में न्यू स्कूल ईयर की शुरुआत हुई. इस बार के सिलेबस में एक नई चीज़ जोड़ी गई है. इसका नाम है, शी जिनपिंग थॉट. इसकी पढ़ाई अनिवार्य होगी. इसका मकसद है राष्ट्रपति शी जिनपिंग की छवि को ईश्वरमयी बनाना.

शिक्षा मंत्रालय ने कहा है कि जिनपिंग के राजनैतिक विचारों को प्राइमरी स्कूल से लेकर ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई में शामिल किया जाएगा. सरकार की तरफ़ से जारी नोटिस के अनुसार, प्राइमरी स्कूल के टीचर्स को नई ज़िम्मेदारी सौंपी गई है. अब उन्हें बच्चों में पार्टी, देश और समाजवाद से प्यार करने की भावना बढ़ानी होगी.

Xi Jinping
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग. (तस्वीर: एपी)

स्कूल की किताबों में जिनपिंग की तस्वीरों और उनकी उक्तियों को भी शामिल किया गया है. चैप्टर्स के बीच में जिनपिंग की आम लोगों से मुलाक़ात के क़िस्से दर्ज़ हैं.

चीन में पहले से ही शी जिनपिंग के 14 सिद्धांतों का इस्तेमाल विस्तृत तौर पर हो रहा है. साहित्य और कला से लेकर इंजीनियरिंग के क्षेत्र में भी अधिकारी उन सिद्धांतों का उदाहरण देते हैं. इतना ही नहीं, कई यूनिवर्सिटीज़ ने इन सिद्धांतों को पढ़ाने के लिए अलग से इंस्टिट्यूट भी खोले हैं.

चीन ऐसा क्यों कर रहा है? इस समय शी जिनपिंग चीन के सबसे ताक़तवर व्यक्ति हैं. 2018 में उन्होंने संविधान में एक बदलाव किया. अब वे जब तक चाहें, चीन के राष्ट्रपति बने रह सकते हैं. जानकारों का कहना है कि जिनपिंग का कद आधुनिक चीन के संस्थापक माओ त्से-तुंग से भी बढ़ चुका है. किताबों के जरिए अब वो इस छवि को स्थापित कर देना चाहते हैं. एक ही चीज़ किसी को बार-बार दिखाई जाए तो वो उसके ज़हन में बैठ जाती है. अगर इसकी शुरुआत बचपन से ही कर दी जाए तो इसका असर आप सोच ही सकते हैं.

ये एक नेता के ईश्वरीकरण की तैयारी है. जैसा कि चीन में रिवाज़ है, आम लोगों की नाराज़गी के बावजूद इस कदम का विरोध होने की गुंज़ाइश बेहद कम है.

अफगानिस्तान: तालिबान को चुनौती

अब बात उस देश की, जो इस वक़्त पूरी दुनिया में चर्चा का केंद्र बना हुआ. अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की वापसी को टॉपिक ऑफ़ द ईयर कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. 30 अगस्त को अंतिम अमेरिकी सैनिक के अफ़ग़ानिस्तान से निकलते ही अमेरिका का 20 साल लंबा युद्ध खत्म हो गया. अब तालिबान की सरकार को कोई बाहरी चुनौती नहीं है. तालिबान को घर के अंदर चुनौती मिल रही है. पंजशीर प्रांत में.

पंजशीर इकलौता ऐसा प्रांत है, जिसने अभी तक तालिबान के आगे सरेंडर नहीं किया है. लोकल मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो पंजशीर में तालिबान और विरोधी सेनाओं के बीच ज़बरदस्त लड़ाई चल रही है. तालिबान का दावा है कि उसने पंजशीर को हर तरफ़ से घेर लिया है. दावा ये भी है कि विरोधियों के साथ समझौते की शर्तों पर बातचीत हो रही है. पहले से ही ये कहा जा रहा था कि बाहरी मदद के बिना पंजशीर बहुत अधिक समय तक तालिबान का मुक़ाबला नहीं कर पाएगा. आगे क्या होता है, इस पर हमारी नज़र बनी रहेगी.

Taliban Fighters
तालिबान लड़ाके. फोटो- AP

पंजशीर के अलावा अफ़ग़ानिस्तान में और क्या हो रहा है? एक नज़र डाल लेते हैं-

– 14 अगस्त को तालिबान ने काबुल पर क़ब्ज़ा कर लिया था. उसी दिन से अमेरिका और उसके सहयोगियों ने अपने नागरिकों को निकालने का काम तेज़ कर दिया था. काबुल एयरपोर्ट इस एयरलिफ़्ट कैंपेन का केंद्र था. अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने मिलकर एयरपोर्ट का ऑपरेशन जारी रखा. 30 अगस्त को आख़िरी अमेरिकी सैनिक के निकलते ही काबुल एयरपोर्ट सुनसान पड़ गया. एयरपोर्ट चलाने के लिए विशेषज्ञता और अनुभव की ज़रूरत होती है. ये दोनों चीज़ें तालिबान के पास नहीं है. पहले बात चल रही थी कि तुर्की काबुल एयरपोर्ट के ऑपरेशन में तालिबान की मदद करेगा.

लेकिन, अब ताज़ा ख़बर ये है कि एक सितंबर को क़तर से एक टेक्निकल टीम काबुल पहुंची है. ये टीम काबुल एयरपोर्ट पर परिचालन फिर से चालू करने के लिए तालिबान लीडरशिप से बात कर रही है. इससे पहले क़तर, तालिबान और अमेरिका के बीच पीस डील में मध्यस्थ की भूमिका निभा चुका है.

– यूनाइटेड नेशंस के मुखिया अंतोनियो गुतेरेस ने कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान अकल्पनीय मानवीय संकट की तरफ बढ़ रहा है. उन्होंने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान की आधी से अधिक आबादी को तत्काल मदद की ज़रूरत है. उन्होंने बाकी देशों से अफ़ग़ानिस्तान में मदद भेजने की अपील की है.

एक-तिहाई से अधिक लोगों को ये तक नहीं पता कि उनकी अगली खुराक कहां से आएगी. आशंका है कि पांच साल से कम उम्र के आधे से अधिक अफ़ग़ान बच्चे अगले बरस तक कुपोषण के शिकार हो जाएंगे. ये हालात कमोबेश पहले से ही बने हुए थे. तालिबान के आने के बाद इसकी तीव्रता और बढ़ने वाली है.

यूएन की अपील का अफ़ग़ानिस्तान पर क्या असर होगा, ये देखने वाली बात होगी. ताज़ा हाल यही हैं कि अफ़ग़ानिस्तान की बड़ी आबादी तालिबान के ख़ौफ़ के साथ-साथ भुखमरी की आशंका से भी जूझ रही है.


वीडियो- तालिबान से भारत की पहली बैठक में आतंकवाद और अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर क्या बात हुई?

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