Submit your post

Follow Us

तालिबान के हाथ लगे अमेरिका के छोड़े हथियार, दुनिया के लिए खतरे की घंटी?

ये सितंबर 1996 की बात है. काबुल की गद्दी पर तालिबान को क़ाबिज हुए एक महीना हो चुका था. तालिबान की सरकार को सिर्फ़ तीन देशों का समर्थन मिला. पाकिस्तान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात. जिस सरकार को बाकी दुनिया में मान्यता मिली हुई थी, उसके रक्षामंत्री अहमद शाह मसूद अपने गुरिल्ला लड़ाकों के साथ भागे-भागे फिर रहे थे.

उसी समय अमेरिका की दिलचस्पी फिर से अफ़ग़ानिस्तान में जगी. अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए को पता चला कि ओसामा बिन लादेन अफ़ग़ानिस्तान में अपना अड्डा जमा रहा है. तालिबान के संरक्षण में. एक समय तक लादेन और अमेरिका एक ही मकसद के लिए लड़ रहे थे. वो मकसद था, अफ़ग़ानिस्तान से सोवियत संघ को निकालना. सोवियत संघ तो हारकर निकल गया. लेकिन लादेन और अमेरिका एक-दूजे से गुत्थगुत्था हो गए थे. लादेन की सरपरस्ती में चलने वाले गुट अल-क़ायदा का नाम अमेरिकी नागरिकों की हत्या में आ रहा था. इसलिए, सीआईए लादेन का पीछा कर रही थी.

27 अगस्त 1996 को नजीबुल्लाह की हत्या करने के बाद तालिबान सत्ता में आ गया. तालिबान और अल-क़ायदा एक-दूसरे के लंगोटिया यार थे. अमेरिका को डर था कि ये कॉम्बिनेशन उनके लिए ख़तरनाक हो सकता है. ऐसे में उन्हें अफ़ग़ानिस्तान में एक सहयोगी की तलाश थी. इसी के मद्देनज़र सितंबर 1996 में गैरी श्रोन नाम के एक सीआईए अधिकारी अहमद शाह मसूद से मिलने पहुंचे. श्रोन इस्लामाबाद स्थित एक सीआईए स्टेशन के मुखिया थे. उन्हें अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति पर नज़र रखने के लिए कहा गया था.

गुपचुप तरीके से अफ़ग़ानिस्तान में दाखिल होने के बाद उन्हें अहमद शाह मसूद के पास ले जाया गया. मसूद उस समय तालिबान को टक्कर देने के लिए नॉर्दर्न अलायंस का गठन कर रहे थे. उन्हें मदद की दरकार थी. अमेरिका को मसूद में अपना पार्टनर नज़र आ रहा था. वो उन्हें मदद देने के लिए तैयार था. लेकिन अलग रास्ते से. अमेरिका को कुछ वापस चाहिए था, बदले में वो मसूद को पैसे की मदद करता.

इसी मुलाक़ात के दौरान गैरी श्रोन ने एक काग़ज़ पर कुछ लिखा और मसूद की तरफ़ बढ़ा दिया. मसूद ने उसे गौर से पढ़ा और कलम से कुछ लिखकर श्रोन को लौटा दिया. काग़ज़ पर एक संख्या लिखी थी. आठ.

इस संख्या का मतलब क्या था? अहमद शाह मसूद को सोवियत-अफ़ग़ान वॉर के दौरान केवल आठ स्टिंगर मिसाइलें मिली थीं. स्टिंगर मिसाइलें कंधे पर रखकर चलाईं जाती थी. ये हल्की होती थीं. इन्हें आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया सकता था. साथ ही, इनका निशाना सटीक था. सीआईए ने मुजाहिदीनों को कम-से-कम तीन हज़ार स्टिंगर मिसाइलों की सप्लाई की थी. मुजाहिदीनों ने इनकी मदद से कम-से-कम 270 सोवियत हेलिकॉप्टर्स को उड़ाया था. कहते हैं कि इन मिसाइलों ने युद्ध की दशा और दिशा बदलकर रख दी. और, अंतत: सोवियत संघ को अफ़ग़ानिस्तान से लौटना पड़ा.

Taliban Weapons
तालिबान के पास ज्यादातर हथियार वही हैं जो उसने अफगानिस्तान की सेना और पुलिस से लूटे हैं.

मसूद सोवियत संघ के ख़िलाफ़ लड़ाई के दौरान सबसे अहम मुजाहिदीनों में गिने जाते थे. इसके बावजूद उन्हें इतनी कम संख्या में मदद मिली थी. इसने सीआईए को चौंकाया ज़रूर, लेकिन ये पूरी तरह से अकल्पनीय नहीं था. दरअसल, सीआईए किसी भी तरह की मदद सीधे मुजाहिदीनों को नहीं देती थी. मदद पहले पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के पास आती थी. उसके बाद आईएसआई लिस्ट के हिसाब से मुजाहिदीनों के बीच इसका बंटवारा करती थी. आईएसआई और अहमद शाह मसूद की आपस में पटरी नहीं खाती थी. इसलिए, उसने उन्हें गिनती के हथियार दिए. श्रोन को अंदाज़ा हो चुका था कि अब उन मिसाइलों की वापसी अब बहुत मुश्किल है. और, एक दिन ये पलटकर अमेरिका पर ही भारी पड़ेगा.

हथियारों को तलाश क्यों कर रही थी सीआईए?

अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि सीआईए बांटे हुए हथियारों की तलाश क्यों कर रही थी? अफ़ग़ानिस्तान से सोवियत संघ के निकलने के बाद अमेरिका ने मुजाहिदीनों को दी जा रही मदद बंद कर दी थी. लेकिन मिसाइलें तो वहीं छूट गईं थी. अमेरिका को शंका हुई कि इन हथियारों को कहीं और उसके हितों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल में लाया जा सकता है. इससे बचने के लिए एक खुफिया प्रोग्राम शुरू किया गया. स्टिंगर मिसाइलों को मुजाहिदीनों से खरीदने का प्रोग्राम. सोचिए, एक समय का उदार दानदाता अपने ही दिए दान को मनचाही क़ीमत देकर वापस खरीदना चाहता था.

खैर, ये मिशन बहुत हद तक असफ़ल रहा. उसने मसूद को अपने साथ मिलाया. ताकि वो मिसाइलों की खरीद में मदद कर सकें. इस प्रोग्राम के लिए लगभग पांच अरब रुपये खर्च किए गए. इसके बावजूद सैकड़ों की संख्या में स्टिंगर मिसाइलें मुजाहिदीनों के पास बची रह गईं. इनमें से कुछ तालिबान के पास भी थीं.

अफ़ग़ानिस्तान में एक मशहूर कहावत चलती है. वहां लड़ाई के बाद हथियारों को हटाया नहीं जाता, बल्कि उसे स्टोर रूम में रख दिया जाता है. ताकि अगली लड़ाई में इस्तेमाल किया जा सके. स्टिंगर मिसाइलों के साथ भी यही हुआ. 9/11 के हमले के बाद जब अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया, तब तालिबान ने इन मिसाइलों को झाड़-पोंछकर बाहर निकाला. और, उनका इस्तेमाल अमेरिकी सैनिकों पर हमले के लिए किया गया.

Taliban 2
अफगानिस्तान लंबे वक्त से हिंसा झेल रहा है. फोटो सोर्स- आजतक

अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी कैंपेन का ये 20वां साल है. अभी ताज़ा हालात क्या हैं? 30 अगस्त 2021 को आख़िरी अमेरिकी सैनिक ने अफ़ग़ानिस्तान छोड़ दिया. इस तरह अमेरिका के इतिहास का सबसे लंबा युद्ध खत्म हो गया. जिस तालिबान के खात्मे के लिए अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में सैन्य अभियान शुरू किया था, वहां से उसे मुंह छिपाकर लौटना पड़ा. ‘साम्राज्यों के क़ब्रिस्तान’ अफ़ग़ानिस्तान ने एक और साम्राज्य की क़ुर्बानी ले ली.

अफ़ग़ानिस्तान वॉर के इस नतीजे से कई पुरानी कहानियां पुन: साकार हुईं है. इनमें से एक है, अमेरिकी हथियारों का अफ़ग़ानिस्तान में विलीन हो जाना. जिस तरह सोवियत-अफ़ग़ान युद्ध के बाद स्टिंगर मिसाइलें गुम हो गईं थी, उसी तरह इस बार भी अमेरिकी हथियारों का बड़ा ज़खीरा अफ़ग़ानिस्तान में जमा हो गया है. इस बार तो एक सेना भर के लायक साज़ो-सामान तालिबान के क़ब्ज़े में आया है. इनमें से बड़ी संख्या में अल्ट्रा-मॉडर्न सैन्य गाड़ियां और हेलिकॉप्टर्स भी हैं. तालिबान इस साजो-सामान के साथ क्या करेगा? और, पड़ोसी देशों पर इसका क्या असर पड़ सकता है?

तालिबान अब और भी ताकतवर हो गया है?

जब अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने का ऐलान किया, तभी से तालिबान के आने की सुगबुगाहट तेज़ हो गई थी. तालिबान और अमेरिका ने समझौता कर लिया था कि वे एक-दूसरे के मामले में टांग नहीं अड़ाएंगे. इसका मतलब ये था कि अमेरिका के जाने के बाद सुरक्षा की ज़िम्मेदारी अफ़ग़ान सेना की होगी. अमेरिका का अफ़ग़ानिस्तान से जाना तय था. लेकिन उनके जाने के बाद, विकृत रूप में ही सही पर, लोकतंत्र कायम रहे, इसके लिए सशक्त सेना की दरकार थी. अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान नेशनल आर्मी को ट्रेन करने और उन्हें ज़रूरी साजो-सामान देने का प्लान बनाया.

सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, 2003 से 2016 के बीच अमेरिका ने अफ़ग़ान सेना को लगभग साढ़े तीन लाख राइफ़ल्स, 64 हज़ार मशीनगन्स, 25 हज़ार से अधिक ग्रेनेड लॉन्चर्स और 22 हज़ार से अधिक हमवी देकर मदद की. इसके बाद भी जब-जब ज़रूरत पड़ी, अमेरिका ने पुराने सामानों को बदलकर अपडेट भी किया. जब तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान के प्रांतों पर क़ब्ज़े के लिए अभियान शुरू किया, ये सारी मदद गौण साबित हुई. अफ़ग़ान सेना तमाम ट्रेनिंग और अत्याधुनिक हथियारों के बावजूद तालिबान का मुक़ाबला करने में नाकाम रही. सेना ने आसानी से घुटने टेक दिए. इसके बाद हथियारों का पूरा स्टॉक तालिबान के क़ब्ज़े में आ गया.

अफ़ग़ानिस्तान एयरफ़ोर्स के पास कुल 167 एयरक्राफ़्ट थे. इस बेड़े में ब्लैक हॉक हेलिकॉप्टर्स से लेकर सी-130 हरक्युलिस विमानों का स्टॉक है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इनमें से बड़ा हिस्सा तालिबान के हाथ लग चुका है. पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर ऐसी कई तस्वीरें और वीडियोज़ सामने आए हैं, जिनमें तालिबानी लड़ाकों को इन एयरक्राफ़्ट के साथ देखा जा सकता है.

Afghanistan 2
हथियारों के साथ बैठा एक तालिबान लड़ाका. फोटो- PTI

इन सबके अलावा, अमेरिका ने काबुल एयरपोर्ट पर भी बहुत सारा साजो-सामान छोड़ा है. 30 अगस्त को अंतिम अमेरिकी सैनिक के निकलने के वक़्त काबुल एयरपोर्ट पर 73 एयरक्राफ़्ट, काउंटर-रॉकेट्स, आर्टिलरी, टेक्टिल वाहन के साथ-साथ मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम भी छूट गए. मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम ने एयरपोर्ट की तरफ दागे गए ISKP के रॉकेट्स को बेकार किया था. वरना काबुल एयरपोर्ट और भी कई मौतों का गवाह बन सकता था.

यूएस सेंट्रल कमांड के कमांडर जनरल केनेथ एफ़ मैकेंज़ी जूनियर ने ये जानकारी मीडिया को दी. मैकेंज़ी ने कहा कि इन हथियारों को वापस लाने की बजाय सैनिकों को बचाना ज़्यादा ज़रूरी था. हालांकि, उन्होंने ये भी दावा किया कि इन सामानों का सैनिक इस्तेमाल नहीं हो सकेगा. मतलब ये कि जिस काम के लिए उन्हें बनाया गया था, अब वे इस लायक नहीं बचे. मिसाल के तौर पर, हेलिकॉप्टर पड़ा रह गया, उसके अंदर के सिस्टम हटा लिए गए या बर्बाद कर दिए गए. या, कारतूस में विस्फ़ोट करा दिया गया. ताकि उन्हें कोई और इस्तेमाल न कर सके.

इस लूट से बाकी दुनिया को क्या ख़तरा है?

जो भी हथियार तालिबान के हाथ लगे हैं, वे सभी अत्याधुनिक हैं. अगर कोई देश इन्हें खरीदना चाहे तो उसे बाकायदा डील करनी होती है. नियम-कायदे तय करने होते हैं. इस खरीद में अपने बजट का अच्छा-खास हिस्सा लगाना पड़ता है. लेकिन तालिबान को ये सब घर बैठे मिल गया है. उसकी कोई जवाबदेही भी नहीं है. तालिबान जैसे चाहे, इन हथियारों का इस्तेमाल कर सकता है.

वो चाहे तो इसे दुनियाभर के आतंकी गुटों के बीच बांट सकता है. या फिर ये हथियार अफ़ग़ानिस्तान में ही मौजूद किसी दूसरे आतंकी गुट के हाथ लग सकते हैं. जैसे कि इस समय इस्लामिक स्टेट ऑफ़ खुरासान प्रॉविंस (ISKP) का तांडव बढ़ा हुआ है. आप बस अंदाज़ा लगा सकते हैं जब धार्मिक कट्टरता में अंधे हो चुके आतंकियों के हाथ में ये हथियार पहुंचेंगे तो क्या होगा.

ये तो हुई बंदूकों, गाड़ियों और ग्रेनेड लॉन्चर्स की बात. जहां तक एयरक्राफ़्ट का सवाल है, वहां ख़तरा कम नज़र आता है. जानकारों का कहना है कि एयरक्राफ़्ट पर क़ब्ज़ा करना जितना आसान था, उससे ज़्यादा मुश्किल है उसे ऑपरेट करना. एयरक्राफ़्ट को चलायमान बनाए रखने के लिए रेगुलर रिपेयरिंग और स्पेयर पार्ट्स की ज़रूरत होती है. इसके लिए प्रशिक्षित टेक्नीशियन्स होते हैं. अफ़ग़ान एयरफ़ोर्स के रख-रखाव का ज़िम्मा अमेरिकी ठेकेदारों के पास था. काबुल पर क़ब्ज़े के बाद वे लोग देश छोड़कर जा चुके हैं.

विशेष एयक्राफ़्ट को उड़ाने के लिए विशेष तौर पर प्रशिक्षित पायलट होते हैं. तालिबान के आने के बाद उनमें से कई या तो देश छोड़कर भाग चुके हैं या उन्होंने काम छोड़ दिया है. ये संभव है कि तालिबान उनसे ज़बरदस्ती धमकी देकर काम करवाए. लेकिन ऐसा कब तक चल सकेगा, ये देखने वाली बात होगी.

तो, क्या इस तरफ़ ध्यान देने की कोई ज़रूरत नहीं है?

जानकारों का दावा है कि ऐसा करना बड़ी भूल होगी. क्यों? तालिबान की वापसी के साथ ही उसके तीन बड़े सहयोगी उभर कर सामने आए हैं – पाकिस्तान, चीन और रूस. आशंका जताई जा रही है कि चीन या रूस रिवर्स इंजीनियरिंग के ज़रिए यूएस मशीनरी की जटिलताओं को डिकोड कर सकते हैं. पाकिस्तान हमेशा से तालिबान का सहयोगी रहा है. अगर एयरक्राफ़्ट या बाकी दूसरे सामानों के स्पेयर पार्ट्स अगर तालिबान को नहीं मिले तो वो अपने नाम से खरीदकर स्मगल कर सकता है.

America Left Kabul Afghanistan
अमेरिका ने 20 साल की जंग के बाद अफगानिस्तान में अपना अभियान खत्म कर दिया है. दूसरी तस्वीर में अमेरिका का वो आखिरी सैनिक जिसने काबुल की धरती छोड़ी. (फोटो एपी/अमेरिकी डिफेंस डिपार्टमेंट)

इसके अलावा, रख-रखाव और ट्रेनिंग के लिए तालिबान के सहयोगी देश आगे आ सकते हैं. इसलिए ये दावा करना कि तालिबान इन साजो-सामान का सही से इस्तेमाल नहीं कर पाएगा, बड़ी जल्दबाजी होगी. ये तो हुई सैन्य साजो-सामान की बात. अब आते हैं पीछे छूट गए लोगों पर. 30 अगस्त को अंतिम अमेरिकी सैनिक के निकलते ही एयरलिफ़्ट कैंपेन बंद हो गया. 14 अगस्त के बाद से काबुल स्थित हामिद करज़ई इंटरनैशनल एयरपोर्ट इस कैंपेन का केंद्र था. तीन हज़ार से अधिक अमेरिकी सैनिक एयरपोर्ट को सुरक्षा दे रहे थे. उन्हीं की निगरानी में अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने के इच्छुक लोगों को बाहर निकाला जा रहा था.

अमेरिका के निकलते ही तालिबानियों ने काबुल एयरपोर्ट पर हवाई फ़ायरिंग शुरू कर दी. ये फ़ायरिंग अमेरिकी सैनिकों की वापसी की खुशी में की गई थी. तालिबान ने ऐलान किया कि इस्लामिक एमिरेट्स ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान अब एक ‘आज़ाद और संप्रभु’ देश है. ये आज़ादी और ये संप्रभुता आम जनता के लिए बेइंतहा शर्तों के साथ थोपी गई है. जो तालिबान की मर्ज़ी के अनुसार बदलती रहती है. इसी खौफ़ के चलते लाखों लोग देश छोड़कर भागने की फ़िराक़ में थे. उनमें से कई सफ़ल हुए. जबकि कईयों का भविष्य अधर में लटक गया है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने एक लाख बीस हज़ार से अधिक लोगों को बाहर निकालने में मदद की. इसके बावजूद ये कैंपेन अधूरा छूट गया है. अभी भी अफ़ग़ानिस्तान में हज़ारों लोग ऐसे हैं, जिन्हें तत्काल मदद की दरकार है. इनमें कई ऐसे भी हैं, जिन्होंने तालिबान के ख़िलाफ़ लड़ाई में अमेरिका और नाटो की मदद की थी.

अब उनके साथ क्या होगा?

अंतिम अमेरिकी सैनिक के काबुल छोड़ने के बाद पेंटागन के प्रवक्ता जॉन किर्बी और यूएस सेंट्रल कमांड के कमांडर जनरल मैकेंज़ी ने साझा प्रेस कॉन्फ़्रेंस की. जनरल मैकेंज़ी ने कहा कि 31 अगस्त की डेडलाइन तय थी. अगर हम 10 दिन और वहां रुकते, तब भी कुछ लोग छूट जाते. ये मुश्किल स्थिति है. जनरल मैकेंज़ी ने ये दावा किया कि अमेरिका की सरकार पीछे छूट गए लोगों को निकालने के लिए हरसंभव प्रयास करती रहेगी.

अमेरिका के विदेश मंत्री हैं, एंथनी ब्लिंकेन. उनका बयान आया कि एक नया अध्याय शुरू हो रहा है. ब्लिंकेन ने कहा कि यूएस पासपोर्ट-धारक अफ़ग़ान नागरिकों को बाहर निकालने के लिए अमेरिका काम करता रहेगा. अमेरिका ने काबुल में अपना दूतावास बंद कर दिया है. उसके दफ़्तर को क़तर की राजधानी दोहा में शिफ़्ट कर दिया गया है. जो पीछे छूट गए हैं, उनके साथ अफ़ग़ानिस्तान में क्या हो रहा है? एक अफ़ग़ान, जिसके पास ब्रिटेन जाने की परमिशन है, उसने अपनी कहानी बीबीसी को बताई. ब्रिटेन ने पिछले हफ़्ते ही अपना एयरलिफ़्ट कैंपेन बंद कर दिया था. भीड़ के चलते उस व्यक्ति का नंबर नहीं आ पाया और वो बाहर निकलने में नाकाम रहा.

Us Ary
अफगानिस्तान से निकलते अमेरिकी सैनिक. फोटो- IndiaToday

उसने बताया कि पिछले दो हफ़्ते में कम-से-कम 15 बार उसे अपना ठिकाना बदलना पड़ा है. वो भी परिवार के साथ. जब भी दरवाज़े पर दस्तक होती है तो लगता है कि तालिबान आ गया. तालिबान मुझे खोज रहा है. अगर मुझे नहीं निकाला गया तो मेरी हत्या निश्चित है.

ये कहानी इकलौती नहीं है. एनजीओ, मानवाधिकार संस्थाओं, नाटो फ़ोर्सेज़ के साथ काम करने वाले इंटरप्रेटर्स समेत कई और लोग भी तालिबान के रहमोकरम पर हैं. तालिबान के पास ऐसे लोगों की पूरी लिस्ट है. अमेरिका ने इस उम्मीद के साथ लिस्ट तालिबान को दी थी कि सेफ़ पासेज में मदद मिलेगी. लेकिन तालिबान इसका ग़लत फायदा उठा रहा है.

तालिबान ने वादा किया था कि बाहर निकलने के हक़दार लोगों को बिना किसी बाधा के निकलने दिया जाएगा. तालिबान ने ये भी कहा था कि किसी के दरवाज़े पर जाकर नहीं पूछा जाएगा कि वे किसके लिए काम करते हैं या थे. लेकिन उसकी कथनी और करनी में बड़ा अंतर है. और, ये साफ़-साफ़ देखने को भी मिल रहा है. अमेरिकी सैनिकों के निकलते ही अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का एकाधिकार हो चुका है. किसे मारा जाए या किसे छोड़ा जाए, ये पूरी तरह से उसकी नीयत पर निर्भर है.

दुनिया की बड़ी खबरें-

1. पहली सुर्खी इंडोनेशिया से है. अक्टूबर 2002 में बाली के दो नाइटक्लब्स में आत्मघाती बम-विस्फोट हुआ था. अगले बरस अगस्त में राजधानी जकार्ता के मैरिएट होटल में ऐसा ही हमला हुआ. दोनों घटनाओं में दो सौ से अधिक लोग मारे गए थे. इन हमलों की ज़िम्मेदारी ली थी, जेमाह इस्लामिया नामक गुट ने. ये गुट ओसामा बिन लादेन के अल-क़ायदा से जुड़ा हुआ था.

उस समय जेमाह इस्लामिया का सरगना एनसेप नूरजमां उर्फ़ हम्बाली था. वो लादेन का करीबी था. नूरजमां को 2003 में थाईलैंड में यूएस और थाई सैनिकों के जॉइंट ऑपरेशन में पकड़ा गया था. सबसे पहले सीआईए ने उससे किसी अनजान जगह पर पूछताछ की. अरेस्ट करने के तीन साल बाद उसको ग्वांतनामो की कुख्यात जेल में लाया गया. तब से उसके ऊपर कोई अदालती कार्रवाई नहीं हुई थी.

30 अगस्त 2021 को नूरजमां और उसके दो मलेशियाई सहयोगियों को पहली बार अदालत में पेश किया गया. गिरफ़्तार किए जाने के लगभग 18 बरस बाद. इन तीनों के ऊपर वॉर क्राइम्स, हत्या, आतंकवाद और आतंक फैलाने की साज़िश रचने के आरोप हैं. बाइडन प्रशासन ग्वांतानामो की जेल पर ताला लगाने की कोशिश में जुटा है. ये मुकदमा इसी अभियान का हिस्सा है. ग्वांतानामो में फिलहाल 39 क़ैदी बंद हैं. एक समय पर इस जेल में तकरीबन आठ सौ क़ैदियों को रखा गया था.

2. दूसरी सुर्खी कोरोना वायरस से जुड़ी है. साउथ अफ़्रीका में वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस के नए वैरिएंट का पता लगाया है. इस वैरिएंट को फिलहाल C.1.2 का नाम दिया गया है. ये वैरिएंट लगभग बाकियों की तुलना में दोगुनी रफ़्तार से म्यूटेट हो रहा है. वैज्ञानिक ये मालूम करने में जुटे हैं कि ये पुराने वैरिएंट्स की तुलना में कितना अधिक संक्रामक है और कोरोना की वैक्सीन इस पर कितनी कारगर है.

उधर, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने यूरोप के देशों में कोरोना के नए मामलों की बढ़ती संख्या पर चिंता जताई है. WHO ने आगाह किया है कि यूरोप में दिसंबर तक कोरोना 02 लाख 36 हज़ार लोगों की जान ले सकता है. वैक्सिनेशन की धीमी रफ़्तार और डेल्टा वैरिएंट के प्रसार से मामला और बिगड़ सकता है. इसका सबसे अधिक असर ग़रीब देशों पर पड़ेगा.

अफ़्रीका और यूरोप के बाद अब चलते हैं ऑस्ट्रेलिया. 31 अगस्त को राजधानी कैनबरा में कोरोना संक्रमण के 13 नए मामले दर्ज़ किए गए. इसके बाद राजधानी में लॉकडाउन को 17 सितंबर तक के लिए बढ़ा दिया गया है. ऑस्ट्रेलिया के दो अन्य प्रांत न्यू साउथ वेल्स और विक्टोरिया पिछले कई हफ़्तों से लॉकडाउन में हैं. जिस तरह से नए संक्रमण की रफ़्तार बढ़ रही है, जल्द ही वहां भी लॉकडाउन की तारीख़ बढ़ाई जा सकती है.

3. आज की तीसरी और अंतिम सुर्खी श्रीलंका से है. राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने देशभर में फ़ूड इमरजेंसी लगाने का ऐलान किया है. दरअसल, श्रीलंका बड़े आर्थिक संकट का सामना कर रहा है. प्राइवेट बैंकों के पास फ़ॉरेन एक्सचेंज की भारी कमी हो गई है. जिसके चलते खाद्यान्न के आयात के लिए पैसा नहीं मिल रहा है. आपातकाल का ऐलान इसलिए किया गया है ताकि ज़रूरी खाद्य पदार्थों की जमाखोरी रोकी जा सके.

अब अधिकारियों को जमाखोरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई का लाइसेंस मिल गया है. साथ ही, सरकार ज़रूरी सामानों का दाम नियंत्रित कर सकती है. सरकार के ऐलान के तुरंत बाद चावल, चीनी, आलू और प्याज जैसी चीजों के दाम अचानक से बढ़ गए. श्रीलंका में इस वक़्त कोरोना कर्फ़्यू चल रहा है. इसके बावजूद दुकानों के बाहर लंबी कतारें लग रहीं है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जल्दी ही देशभर में पेट्रोल और डीजल की खरीद का क़ोटा निर्धारित किया जा सकता है. श्रीलंका के ऊर्जा मंत्री ने अपील की है कि लोग ईंधन का बचा-बचाकर इस्तेमाल करें, ताकि उस पैसे से भोजन और दवाओं का आयात किया जा सके.


वीडियो- दुनियादारी: तालिबान के हाथ लगा हथियारों का जखीरा दुनिया के लिए बड़ा खतरा बन सकता है?

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

'स्क्विड गेम' के प्लेयर नंबर 199 'अली' की कहानी, जिनके इंडियन होने ने सीरीज़ में एक्स्ट्रा मज़ा दिया

'स्क्विड गेम' के प्लेयर नंबर 199 'अली' की कहानी, जिनके इंडियन होने ने सीरीज़ में एक्स्ट्रा मज़ा दिया

अली का रोल करने वाले इंडियन एक्टर अनुपम त्रिपाठी का सलमान-शाहरुख़ कनेक्शन क्या है?

IPL का कित्ता ज्ञान है, ये क़्विज़ खेलकर चेक कल्लो!

IPL का कित्ता ज्ञान है, ये क़्विज़ खेलकर चेक कल्लो!

ईमानदारी से स्कोर भी बताते जाना. हम इंतज़ार करेंगे.

'मनी हाइस्ट' वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी, जिनकी पत्नी ने कहा था, 'कभी फेमस नहीं हो पाओगे'

'मनी हाइस्ट' वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी, जिनकी पत्नी ने कहा था, 'कभी फेमस नहीं हो पाओगे'

अलवारो मोर्टे ने वेटर तक का काम किया हुआ है. और एक वक्त तो ऐसा था कि बकौल उनके कैंसर से जान जाने वाली थी.

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

हीरो बनने आए शरत सक्सेना कैसे गुंडे का चमचा बनने पर मजबूर हुए?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

एक वक़्त इंडस्ट्री में टॉप पर थे कुणाल और उनके गाने पार्टियों की जान हुआ करते थे.

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

IPL स्कैंडल, मॉडल्स के आरोप, अंडरवर्ल्ड कनेक्शंस के आरोप, एक्स वाइफ के इल्ज़ाम सब हैं इस कहानी में.

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रेन्सन की कहानी, जहां भी गए तहलका मचा दिया.

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

पहला चुनाव हार गए थे, बीजेपी ने राज्य की जिम्मेदारी सौंपी है.

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

उनके गाए 'पल' गाने के बगैर आज भी किसी कॉलेज का फेयरवेल पूरा नहीं होता.

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

आन्हां, ऐसे नहीं कि योग बस किए, दिखाना पड़ेगा कि बुद्धिबल कित्ता बढ़ा.