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लद्दाख ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल चुनाव के बारे में सबकुछ जो आप जानना चाहते हैं

गुरुवार 22 अक्टूबर को लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद अंग्रेजी में कहें तो लद्दाख ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल (LAHDC) चुनाव के लिए वोटिंग हुई जिसमें 65.07 फीसदी मतदान हुआ. चुनाव में खड़े 94 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करने के लिए लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया. लेह जिले के छठे पर्वतीय परिषद की 26 सीटों के लिए भाजपा, कांग्रेस, आप के साथ ही 23 निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं. लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद की कुल 30 सीटें हैं जिनमें से 4 पार्षद सरकार द्वारा नामित होते हैं.

ये तो थी खबर. लेकिन ये पर्वतीय विकास परिषद चुनाव होता क्या है? कैसे होता है और ये परिषद करती क्या है. जानते हैं.

LAHDC के बारे में

LAHDC  एक स्वायत्त पहाड़ी परिषद है. इसके तहत इलाके का स्थानीय प्रशासन होता है. जम्मू कश्मीर के लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद अधिनियम 1995 के तहत लेह और कारगिल के लिए परिषदों का गठन किया गया. साल 2018 में LAHDC अधिनियम को संशोधित किया गया है जिसके बाद परिषदों को आर्थिक, विधाई और प्रशासनिक रूप से मजबूती मिली है.

क्यों बनाया गया LAHDC

लेह और लद्दाख के लोग बहुत वक्त से ऐसा चाहते थे कि उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक, सामाजिक और भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इस इलाके का विकास किया जाए. साल 1951 से ही केंद्र शासित राज्य के दर्जे की मांग यहां के नागरिक कर रहे थे. साल 1993 में केंद्र सरकार ने दार्जिलिंग की तर्ज पर लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद बनाने पर सहमति व्यक्त की.

इसके बाद जम्मू कश्मीर राज्य विधानसभा अधिकारों का विकेंद्रीयकरण अधिनियम 1992 के अनुच्छेद तीन के तहत प्राप्त अधिकारों के आधार पर स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद गठन का कानून लाया गया. 1995 में लेह में लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद आस्तित्व में आई.

इसके बाद साल 2002 में पीडीपी और कांग्रेस की सरकार के दौरान इस अधिनियम में संशोधन किया गया. साथ ही 2003 में कारगिल के लिए भी एलएएचडीसी का भी गठन किया गया था. स्वायत्त परिषदों के मुख्य कार्यकारी पार्षदों को कैबिनेट मंत्रियों के बराबर और पार्षदों को राज्य मंत्रियों के बराबर भत्ते आदि की व्यवस्था की गई.

आपको बता दें कि LAHDC के पास आर्थिक मामले, विकास, शिक्षा, जमीन, स्थानीय शासन आदि से जुड़े फैसले लेने का पूरा अधिकार है. यानी जम्मू-कश्मीर सरकार के पास न्याय, संचार, लॉ एंड आर्डर आदि व्यवस्थाएं थीं और LAHDC के पास स्थानीय प्रशासन की व्यवस्थाएं.

इन परिषदों को जो शक्तियां प्रदान की गई हैं वो कुल मिलाकर भारतीय संविधान की छठी अनूसूची के अनूरूप ही हैं. साल 2018 में LAHDC अधिनियम में संशोधन किया गया था जिसके बाद तो ये परिषदें देश की सबसे अधिक अधिकार वाली स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषदें हैं.

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LAHDC में कुल 30 सीटें होती हैं. (फोटो- PTI)

क्यों पड़ी LAHDC की जरूरत

इस सवाल का जवाब समझने के लिए हमें लेह लद्दाख की भौगोलिक स्थिति को समझना होगा. इस इलाके को बर्फीला रेगिस्तान कहा जाता है. लद्दाख की समुद्र तल से ऊंचाई 9800 फुट है. यहां की भौगोलिक परिस्थितियां बेहद कठिन हैं और यही कारण है कि यहां जनसंख्या का घनत्व भी बेहद कम है. सर्दियों में तो ये इलाका करीब छह महीने से बाकी देश से कट सा जाता है. इसी कारण यहां के लोगों को प्रशासनिक कामों में बेहद परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

काउंसलर क्या कहते हैं

लद्दाख के चुशूल इलाके के काउंसलर कॉनचौक स्टैनज़िन ने लल्लनटॉप से बात करते हुए कहा,”

1995 में LAHDC  की स्थापना की गई थी. लद्दाख का UT को लेकर पुराना डिमांड रहा है. 1948 से ये डिमांड था. 1989 में लद्दाख को शेड्यूल ट्राइब का दर्जा दिया गया था. लद्दाख जम्मू और कश्मीर से अलग होना चाहता था. 1995 में LAHDC बना फिर.”

कॉनचौक स्टैनज़िन ने कहा,

“इसमें 30 मेंबर होते हैं. 26 चुने और 4 नॉमिनेटेड. 2 अल्पसंख्यक, एक महिला और एक वीकर सेक्शन को जाता है. इसे गवर्मेंट डिसाइड करती है. UT एडमिन्स्ट्रेशन में डिविजनल कमिश्नर का जो ऑफिस है वो इलेक्शन कराता है. इसमें जिसके पास 14 सीट होती हैं वो इसमें सरकार बना सकते हैं. चीफ एक्जीक्यूटिव काउंसिल का स्टेटस कैबिनेट स्टेटस है. बाकी 4 एक्जीक्यूटिव काउंसिल होते हैं जो रीजनवाइज हैं उनका स्टेटस डेप्युटी मिनिस्टर का स्टेटस है.”

उन्होंने बताया,

“लेह और कारगिल में काउंसिल है. 40 से अधिक विभाग LAHDC के अंतर्गत आते हैं. बाकी डायरेक्टर के नीचे जिला लेवल ऑफिसर जो हैं वो हिल काउंसिल के अंतर्गत आते हैं. डेप्युटी कमिश्नर जो हैं वो हिल काउंसिल के सीईओ हैं. जिला स्तर पर जो भी काम होते हैं उनको हिल काउंसिल ही देखती है.”

उन्होंने कहा,

“ऐसे समझें कि यहां विकास का पूरा काम LAHDC ही देखती है. पंचायत के बाद बीडीसी और फिर जिला परिषद. ये थ्री टायर सिस्टम हो गया है. हर विभाग का काम यहां से होता है. अब UT बनने के बाद इसकी उपयोगिता और भी बढ़ गई है. पहले सरकारें होती थीं अब ब्यूरोक्रेट सीट पर हैं ऐसे में जनता द्वारा चुने गए काउंसिल की जरूरत है.”

कॉनचौक स्टैनज़िन ने कहा,

“हिल काउंसिल को और इम्पावर करना चाहिए. बजट की बात करें तो अभी 232 करोड़ काउंसिल के पास है. इसको किस विभाग को कितना खर्च करना है इसका फैसला काउंसिल करेगी. UT बनने के बाद इसका पावर डिस्ट्रीब्यूशन हुआ नहीं है. पहले जेएंडके जाना पड़ता था. अभी लोग गवर्नर के पास जाते हैं, UT एडमिनिस्ट्रेशन के पास जाते हैं और काउंसिल के पास आते हैं. तो ऐसे में पावर डिस्ट्रीब्यूशन भी जरूरी है.”

भारत में हिल काउंसिल कहां कहां हैं

इनको भारत के स्वायत्त प्रशासनिक क्षेत्र भी कहा जाता है. संविधान की छठी अनुसूची में 4 राज्यों के 10 स्वायत्त ज़िला परिषद शामिल हैं. दरअसल ये छठी अनुसूची जनजातीय समुदायों को स्वायत्तता देती है. ऐसे समझिए कि छठी अनुसूची के तहत जिला परिषद और क्षेत्रीय परिषद ताकतवर होते हैं.

असम-
बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद
दीमा हसाओ स्वायत्त जिला परिषद
कार्बी आंगलांग स्वायत्त जिला परिषद

मणिपुर-
सदर हिल्स स्वायत्त जिला परिषद

मेघालय-
गारो हिल्स स्वायत्त जिला परिषद
जयंतिया हिल्स स्वायत्त जिला परिषद
खासी हिल्स स्वायत्त जिला परिषद

मिजोरम-
चकमा स्वायत्त जिला परिषद
लाइ स्वायत्त जिला परिषद
मारा स्वायत्त जिला परिषद

त्रिपुरा-
त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद

पश्चिम बंगाल-
गोरखालैण्ड क्षेत्रीय प्रशासन जिसे दार्जिलिंग गोरखा पर्वतीय परिषद के नाम से भी जाना जाता है.

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह-
उत्तर प्रहरी द्वीप जिसी नार्थ सेण्टिनल द्वीप कहा जाता है.


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