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'मुन्नाभाई MBBS' के डॉक्टर रुस्तम आजकल कहां हैं?

'मुन्नाभाई' से पहले कुरुष आला दर्जे का काम कर चुके हैं, ऐसी फिल्में जिन्हें ढूंढकर देखना चाहिए.

एक शख्स था, जिसकी वजह से मुंबई का लोकल गुंडा मुन्ना आखिरकार डॉक्टर मुरली प्रसाद शर्मा बन पाया. जिसकी वजह से मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम सिर्फ क्रैक ही नहीं किया, बल्कि टॉप कर के निकला. बताएंगे उस शख्स के बारे में जिसके पप्पा का मंत्र था, “कैरम रमवानु, जूस पीवानु, मज्जानी लाइफ”. जानेंगे ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ के डॉक्टर रुस्तम पावरी यानी कुरुष देबू के बारे में. जानेंगे उस कमाल की फिल्म के बारे में, जो वो ‘मुन्नाभाई’ से एक दशक पहले कर चुके थे. कैसे अंग्रेज़ उनकी तारीफ करते नहीं थके, पर इंडिया में किसी ने उन्हें पूछा तक नहीं. और क्यों उन्हें शाहरुख के बेस्ट फ्रेंड बनने का कोई फायदा नहीं मिला.

# एक सफल फेलियर पिता का बेटा एक्टर कैसे बनेगा?

कुरुष पर बात की शुरुआत करने से पहले जाना होगा आज़ादी से पहले वाले भारत में. नहीं, उनका जन्म उस वक्त नहीं हुआ था. उनका जन्म तो 12 सितंबर, 1963 को बंबई शहर में हुआ था. लेकिन उनके एक्टर बनने की नींव उनके जन्म से पहले ही पड़ चुकी थी. फिल्म इंडस्ट्री में दो भाई थे. दिनशॉ बिलिमोरिया और एडी बिलिमोरिया. एडी साइलेंट एरा के वो एक्टर थे जिन्होंने पृथ्वीराज कपूर की एंट्री से पहले फिल्मों पर राज़ किया. 300 के करीब फिल्मों में एक्टिंग की. उनके भाई दिनशॉ ने भी अपने फिल्मी करियर की शुरुआत एक्टिंग से की. वो बात अलग है कि आगे चलकर उन्होंने डायरेक्शन में भी हाथ आज़माया.‘आज़ादी-ए-वतन’ और ‘जवान की पुकार’ जैसी फिल्में बनाईं.

करीब 300 फिल्में करने वाले एडी बिलिमोरिया.

उन दिनों दिनशॉ को डायरेक्शन डिपार्टमेंट में असिस्ट करते थे होमी एस देबू. जो कुरुष के पिता थे. होमी ने असिस्टेंट डायरेक्टर के साथ-साथ बतौर एसोसिएट डायरेक्टर भी कुछ अन्य फिल्मों पर काम किया. हर असिस्टेंट डायरेक्टर का सपना होता है खुद की फिल्म बनाने का. होमी का भी था. लेकिन वो कभी पूरा नहीं हो पाया. दरअसल, उन्हें डायरेक्ट करने के लिए एक फिल्म मिली थी. लेकिन वो कभी पूरी नहीं हो पाई. फिल्म बंद पड़ने के बाद उन्हें असिस्टेंट डायरेक्टर की जॉब के ऑफर्स ही आने लगे. लेकिन अपनी नाक के चलते उन्होंने मना कर दिया. एक समय फिल्म डायरेक्ट करने वाला अब भला किसी को असिस्ट कैसे कर सकता था. फिल्म इंडस्ट्री से हताश हो चुके थे. उधर इस सब के बीच देश का विभाजन भी हो गया. फिल्म इंडस्ट्री में काम कम हो गया. रेंट जैसी चीज़ें मैनेज करने में समस्या होने लगी. इसलिए होमी देबू ने बंबई छोड़ने का फैसला कर लिया. और गुजरात के नवसारी में अपने पैतृक स्थान पर आ गए.

सिनेमा को अपनी अधिकांश ज़िंदगी देने के बाद उससे दूर कहां रह पाते. सिनेमा एक्ज़िबिशन का काम शुरू कर दिया. साथ ही नाटक लिखते और डायरेक्ट भी करते. छोटे कुरुष को पिता के नाटकों ने ही एक्टिंग से पहला साक्षात्कार कराया. उन्हें फिल्मों का चस्का भले ही था, लेकिन पिता के असफल फिल्मी करियर को देखते हुए ऐसी बात सोचना भी बेमानी था. इसलिए वो अपनी पढ़ाई करते रहे. नवसारी के ही कॉलेज से कॉमर्स में ग्रैजुएट हो चुके थे. एमबीए कर के लाइफ सेट करने की इच्छा उन्हें बॉम्बे ले आई.

# गोविंदा, गुलशन ग्रोवर ने कैसे बागी बना दिया?

कुरुष बॉम्बे आकर एमबीए कॉलेजेस के एंट्रेंस एग्ज़ाम देने लगे. सोचा था कि किसी न किसी कॉलेज में तो एडमिशन हो ही जाएगा. लेकिन किस्मत के आगे किसका जोर चलता है भला. वो हर एग्ज़ाम में फेल होते गए. एमबीए करना अब दूर की दिल्ली लगने लगा. इसलिए सिटी के ज़ेवियर इंस्टिट्यूट ऑफ कम्यूनिकेशंस को जॉइन कर लिया. और वहां से एडवरटाइज़िंग एंड मार्केटिंग में डिप्लोमा करने लगे. उसके बाद उन्होंने जमनालाल बजाज इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट से मार्केटिंग मैनेजमेंट में डिप्लोमा किया. साल 1987 में. पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद कुरुष मार्केटिंग रिसर्च में जॉब करने लगे. एक्टिंग या फिल्म से भले ही दूर थे लेकिन फिल्मवालों से नहीं. उनके किस्से, कहानियां जानने के लिए फिल्मी मैगजीन पढ़ते. स्टारडस्ट, मायापुरी आदि.

एक्टर नहीं बन पाए. फिर भी एक्टर्स के इंटरव्यूज़ पढ़ते. ऐसे ही उन्होंने गोविंदा, गुलशन ग्रोवर और अनिल कपूर. सभी एक्टर्स में से सिर्फ ये तीन नाम क्यों याद रहे? इसका भी जवाब है. दरअसल, इन तीनों एक्टर्स ने अपनी एक्टिंग जर्नी में एक शख्स का नाम लिया हुआ था. जिसने उन्हें एक्टिंग सिखाई. उस शख्स का नाम था रोशन तनेजा. गोविंदा, गुलशन ग्रोवर और अनिल कपूर ने रोशन तनेजा की एक्टिंग स्कूल से एक साल का कोर्स किया था. इंटरव्यू पढ़ने के बाद कुरुष के दिमाग में एक ख्याल आया. कि क्यों न वो भी रोशन तनेजा का एक्टिंग स्कूल जॉइन कर लें. अपने इस फैसले का नतीजा चाहे अच्छा हो या बुरा, लेकिन वो फैसला न लेने के रिग्रेट में तो नहीं जीना चाहते थे. कुरुष अपने पिता के ‘फिल्म प्रेम’ से अवगत थे. इसलिए उन्होंने अपने इस फैसले की घर पर भनक नहीं लगने दी. कुरुष बॉम्बे ये सोचकर नहीं आए थे कि एक दिन इस शहर पर राज करूंगा. उनकी एक्स्पेक्टेशन वास्तविक किस्म की थी. सोचा कि अगर एक्टिंग कोर्स के बाद अगर बात बन गई तो बढ़िया है. वर्ना फिर से नौकरी करने का ऑप्शन तो था ही.

स्टारडस्ट और मायापुरी जैसी मैगजींस पढ़ते थे देबू.

कुरुष ने रोशन तनेजा का एक्टिंग कोर्स जॉइन कर लिया. वहां उनके बैचमेट आमिर के भाई फैसल खान थे. कुरुष अपने इंटरव्यूज़ में बताते हैं कि फैसल ने कोर्स के दौरान उनकी मदद भी की. कुरुष ने एक साल का अपना कोर्स पूरा कर लिया. इधर कोर्स पूरा किया और दूसरी ओर गुड न्यूज़ मिल गई. एक दिन उनका एक दोस्त अखबार लेकर आया. जिसमें एक गुजराती फिल्म की कास्टिंग का एड छपा था. फिल्म का टाइटल था ‘पर्सी’. जिसे NFDC प्रड्यूस करने वाला था. मेकर्स को पर्सी के लीड रोल के लिए एक एक्टर की तलाश थी. एड देखने के बाद कुरुष ने उन्हें कॉन्टैक्ट किया. उन्हें ऑडिशन और स्क्रीन टेस्ट के लिए बुलाया गया. जहां मेकर्स ने पाया कि वो किरदार में बिल्कुल फिट बैठ रहे थे. बस फिर क्या था. उन्हें अपनी पहली फिल्म ऑफर कर दी गई.

# जब शाहरुख की दोस्ती भी किसी काम नहीं आई

1989 में आई ‘पर्सी’ में कुरुष ने लीड रोल निभाया. एक ऐसे लड़के का जो ज्यादा तेज़ नहीं. टिपिकल ‘मम्माज़ बॉय’ टाइप. ये उनकी पहली फिल्म थी. बावजूद इसके, यहां उनकी एक्टिंग काफी मैच्योर थी. सटल थी. यही वजह रही कि अपनी पहले फिल्म के लिए उन्होंने बेस्ट एक्टर के नैशनल अवॉर्ड का नॉमिनेशन अपने नाम कर लिया. अब ये लड़का उस साल के बेस्ट एक्टर्स के साथ खड़ा था. जिसमें मामूटी, अनुपम खेर और पवन मल्होत्रा जैसे नाम शामिल थे. कुरुष अवॉर्ड तो नहीं जीत पाए. लेकिन इतने दिग्गज एक्टर्स के बीच अपने काम का लोहा मनवाना भी कोई छोटी बात न थी.

‘पर्सी’ खोजकर देखने वाली फिल्म है.

उस साल के नैशनल अवॉर्ड्स की जूरी में ‘जाने भी दो यारों’ बना चुके कुंदन शाह भी थे. जिन्होंने ‘पर्सी’ में कुरुष का काम देखकर अपनी अगली फिल्म दी थी. हालांकि, यहां वो लीड में नहीं थे. फिल्म थी ‘कभी हां कभी ना’. जहां कुरुष ने शाहरुख के किरदार सुनील के बेस्ट फ्रेंड का रोल निभाया. फिल्म भले ही अपने समय के हिसाब से फ्रेश थी. लेकिन बॉक्स ऑफिस रेज बनने में नाकाम रही. वो बात अलग है कि आज इसे शाहरुख की बेस्ट फिल्मों में गिना जाता है. फिल्म उस समय ज्यादा बज़ नहीं बना पाई. इसलिए एक्टर्स को कोई खास फायदा नहीं हुआ. अगर हुआ भी तो सिर्फ शाहरुख को. कुरुष को जितनी आसानी से अपनी पहली फिल्म मिली थी. उसके बाद की फिल्मों तक का सफर उतना ही जटिल होता गया. कमर्शियल सिनेमा की जगह आर्ट हाउस सिनेमा को प्राथमिकता देने की वजह से उन्हें कमर्शियल सिनेमा में कोई नहीं पहचानता था.

कुरुष ने अपना स्ट्रगल जारी रखा. जब फिल्मों में बात नहीं बनी. तो टीवी का रुख कर लिया. लेकिन अच्छा काम करना बंद नहीं किया. उन्होंने डॉक्टर चंद्रप्रकाश द्विवेदी के शो ‘चाणक्य’ में काम किया. दिवंगत एक्टर इरफान खान भी शो की कास्ट का हिस्सा थे. ‘चाणक्य’ के बाद एक बार फिर कुरुष को इरफान के साथ स्क्रीन शेयर करने का मौका मिला. वो भी एक टीवी शो में ही. शो का नाम था ‘बनेगी अपनी बात’. जहां इरफान और कुरुष के अलावा आर माधवन, वरुण बडोला और राखी टंडन जैसे एक्टर्स भी थे.

‘कभी हां कभी ना’ में शाहरुख का बेस्ट फ्रेंड येज़दी.

कुरुष की पढ़ाई गुजराती मीडियम स्कूल में हुई थी. इस वजह से उनकी अंग्रेजी पर इतनी मजबूत पकड़ नहीं थी. याद कीजिए, उनकी पहली फिल्म भी गुजराती भाषा में ही थी. लेकिन कुरुष अच्छे रोल्स करने चाहते थे. और इसके लिए वो भाषा के बैरियर को लांघने से नहीं कतराने वाले थे. जानते थे कि अंग्रेजी में हाथ तंग है. इसलिए लगातार अंग्रेजी बोलने की कोशिश करते. चाहे गलत ही सही. बिना किसी शर्म के. कहते हैं कि आप कोई नई भाषा तब तक नहीं सीख सकते, जब तक उसमें अपना मज़ाक नहीं उड़वा लेते. कुरुष के साथ भी यही हुआ. उन्होंने अंग्रेजी पर पार पाने के लिए एक फिल्म भी कर डाली. टाइटल था ‘Such A Long Journey’. अंग्रेजी भाषा में बनी इस फिल्म के लीड में रोशन सेठ, नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी और सोनी राज़दान जैसे एक्टर्स थे. कुरुष ने फिल्म में सपोर्टिंग किरदार निभाया. फिल्म विदेशी फिल्म फेस्टिवल्स में स्क्रीन की गई. जहां उसे सराहा गया. कुरुष के काम की तारीफ हुई. लेकिन बदकिस्मती से जिस फिल्म को अंग्रेज सराह रहे थे, उसे इंडिया में किसी ने पूछा तक नहीं.

# ‘हाउ वुड आई नो, सर?’

हर एक्टर के करियर में एक फिल्म होती है. जो उसके करियर को दो पलड़ों में बांट कर रख देती है. बिफोर और आफ्टर के पैमानों में. कुरुष के करियर में वो फिल्म थी ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’. वो फिल्म जिसके बाद कुरुष के चेहरे को हर कोई पहचानने लगा. भले ही उनका नाम सबको याद नहीं रहा. उनका किरदार डॉक्टर रुस्तम पावरी हिंदी सिनेमा के यादगार किरदारों में से एक बन गया. जब भी डॉक्टर अस्थाना हैरान होकर गुस्से में उससे कुछ पूछता तो एक ही जवाब आता. ‘हाउ वुड आई नो, सर’. कुरुष अपने एक इंटरव्यू में बताते हैं कि उनके इस डायलॉग के पीछे भी छोटा-सा किस्सा था. दरअसल, स्क्रिप्ट में लिखी इस लाइन को पढ़कर कुरुष इसे जस-की-तस डिलिवर कर रहे थे. बिना किसी मॉड्यूलेशन के. तब डायरेक्टर राजकुमार हिरानी उनके पास आए. उन्हें यही लाइन अलग-अलग तरीकों से कहने को कहा. कुरुष ने ट्राइ किया. और रिज़ल्ट हम सबके सामने हैं.

‘रानी तो पप्पा नी है.’

जब ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ की शूटिंग चल रही थी, उस दौरान जिमी शेरगिल, अरशद वारसी और राजकुमार हिरानी ने कुरुष से एक बात कही थी. ‘कुरुष, याद रखना तेरा कैरेक्टर हिट होने वाला है’. कुरुष को उस वक्त ये बस हौसला अफज़ाई के लिए कही जाने वाली बातें लगीं. क्योंकि उन्हें ऐसा ही भरोसा ‘कभी हां कभी ना’ के दिनों में भी दिलाया गया था. कि कुरुष, येज़दी का कैरेक्टर तुझे बहुत काम दिलवाएगा. ‘झंकार बीट्स’ के समय भी ऐसी ही बातें चली. कि इस फिल्म के बाद तुम्हारे दिन फिर जाएंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं था. इसलिए ‘मुन्नाभाई’ के बाद क्या वाकई उनके अच्छे दिन आएंगे, इसको लेकर वो श्योर नहीं थे. ‘मुन्नाभाई’ के बाद उनका करियर कितना बदला, ये बताने की ज़रूरत नहीं. उनका किरदार इतना पसंद किया गया कि ‘मुन्नाभाई’ के अगले साल आई ‘मुझसे शादी करोगी’ में भी उनके किरदार का नाम रुस्तम ही था. कुरुष बताते हैं कि चाहे वो कहीं भी ट्रैवल कर रहे हों, लोग उन्हें रुस्तम पावरी कहकर पुकारने लगते हैं. ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ हिंदी सिनेमा की एक मॉडर्न क्लासिक बन चुकी है. और इसके किरदारों को वैसे ही याद किया जाता है जैसे ‘शोले’ के किरदारों को किया जाता था.

# आज कल कहां हैं Kurush Deboo?

‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ के बाद भी कुरुष को स्ट्रगल करना पड़ा. लेकिन ये स्ट्रगल था अच्छे रोल्स पाने के लिए. उनके पास काफी ऑफर आने लगे. लेकिन अच्छे किरदार सिर्फ चुनिंदा ही थे. हालांकि, वो लगातार काम करते रहे. ‘पेज 3’, ‘क्योंकि’, ‘टैक्सी नंबर 9211’ जैसी फिल्में की. कुरुष ओटीटी प्रोजेक्ट्स पर भी एक्टिव तौर पर काम कर रहे हैं. वो 2020 में आई नेटफ्लिक्स की फिल्म ‘ये बैले’ का हिस्सा थे. साथ ही 2021 में आई वेब सीरीज ‘द कॉबवेब’ में भी वो लीड किरदारों में से एक थे. जहां उनके साथ मकरंद देशपांडे और कविता कौशिक भी थे.

‘द कॉबवेब’ का पोस्टर.

‘मुन्नाभाई’ के ट्रायल शो के दौरान फिल्म के प्रड्यूसर विधु विनोद चोपड़ा ने कुरुष को एक सलाह दी थी. जिसका वो आजतक पालन करते हैं. विधु ने कहा था कि हम अच्छी फिल्म बना रहे हैं. पूरी मेहनत कर रहे हैं. बस इतना ही हमारे हाथ में है. उसके बाद फिल्म का क्या होगा और क्या नहीं, ये ऊपर वाले पर छोड़ दो. कुरुष भी यही मानकर अपने प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं. कि अपनी तरफ से बेस्ट देना है. उसके बाद जो होगा, देखा जाएगा.

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