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यूपी में जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव होता कैसे है, जिसके लिए इतनी मारामारी हो रही है?

यूपी के 75 जिलों में से 22 में जिला पंचायत अध्यक्ष निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए गए हैं. बीजेपी 21 जिलों में अपना कब्जा जमाने में कामयाब रही है. 53 जिलों के लिए 3 जुलाई को मतदान और मतगणना होगी. इस रिपोर्ट में हम ये समझने की कोशिश करेंगे कि यूपी में जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव कैसे होता है, चुनाव की प्रक्रिया क्या है, कौन ये चुनाव लड़ सकता है, जिला पंचायत अध्यक्ष का काम क्या होता है, काम कराने के लिए फंड कहां से मिलता है.

चुनाव की प्रक्रिया क्या है?

यूपी में जिला पंचायत अध्यक्ष के प्रत्याशी कई मामलों में निर्विरोध चुन लिए जाते हैं. लेकिन अगर वोटिंग की नौबत आई तो क्या होगा? यहां पहली और सबसे जरूरी बात ये है कि जनता सीधे जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए वोटिंग नहीं करती है. ये यूपी की बात है. कई राज्यों में जनता सीधे जिला पंचायत अध्यक्ष चुनती है, लेकिन यूपी में मामला अलग है. जनता चुनती है जिला पंचायत सदस्य. यही जिला पंचायत सदस्य मिलकर चुनते हैं जिला पंचायत अध्यक्ष. यानी यह चुनाव प्रत्यक्ष न होकर अप्रत्यक्ष होता है. यूपी में 3051 पंचायत सदस्य हैं. ये 75 जिला पंचायत अध्यक्ष चुनते हैं. जिला पंचायत अध्यक्ष का प्रत्याशी इन्हीं के बीच से हो सकता है. यानी वो व्यक्ति जिसने जिला पंचायत सदस्य का चुनाव जीता हो. जो व्यक्ति जिस जिले से जिला पंचायत सदस्य चुना गया है, वह उसी जिले से जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव लड़ सकता है.

Up Panchayat
ये तस्वीरें बस्ती की हैं. सपा का आरोप है कि पुलिस की मौजूदगी में भाजपा प्रत्याशी संजय चौधरी ने सपा के जिला पंचायत सदस्य और प्रस्तावक को खींचकर अपहरण करने का प्रयास किया. (फोटो- समाजवादी पार्टी ट्विटर)

नामांकन कैसे होता है?

भले ही आपको खबरों में ये सुनने को मिल रहा हो कि बीजेपी के प्रत्याशी निर्विरोध चुने गए. सपा के प्रत्याशी पर्चा दाखिल नहीं कर पाए. लेकिन इन चुनावों से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि यह पार्टी बेस्ड चुनाव नहीं होता है. ना ही पार्टी का सिंबल अलॉर्ट होता है और ना ही लिखित रूप से पार्टी का कोई अधिकार पत्र होता है. हो सकता है कि पार्टियों की तरफ से अपने आप घोषित उम्मीदवार हों, लेकिन यहां पार्टी का सिंबल नहीं होता है. ना ही पार्टी का कोई अधिकार पत्र पार्टी के नाम पर होता है. मामला व्यक्तिगत होता है.

Up Panchayat (1)
(सांकेतिक फोटो)

इस बार जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए पर्चे का मूल्य 1500 रुपये तय हुआ था. आरक्षित वर्ग या महिला प्रत्याशी के लिए 750 रुपये तय हुआ था. जमानत राशि 10 हजार रुपये निर्धारित की गई है. लेकिन आरक्षित और महिला वर्ग के लिए यह राशि पांच हजार है. अध्यक्ष पद का प्रत्याशी चुनाव में अधिकतम चार लाख रुपये तक खर्च कर सकता है.

एक और बात है. बाकी चुनावों की तरह सभी क्राइटेरिया पूरी नहीं करने पर पर्चा खारिज भी हो जाता है.

वोटिंग कैसे होती है?

जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए मतदान बैलेट पेपर पर मुहर लगाकर नहीं होता. बल्कि पेन से 1 लिखकर किया जाता है. कहने का मतलब है कि प्रत्याशी के आगे मतदाता एक लिखेगा. अगर चाहे तो अन्य प्रत्याशियों के सामने वरीयता के हिसाब से दो और तीन भी लिख सकता है. लेकिन जिसके आगे एक लिखेगा, मत उसी को मना जाता है.

ये भी जानना जरूरी

अब तक आपने जो पढ़ा वो होती है आदर्श स्थिति. किताबों वाली. लेकिन मीडिया में आने वाली खबरें कुछ और ही बताती हैं. एक सीनियर पत्रकार बताते हैं कि पंचायत सदस्यों को जीतने के बाद एक प्रमाणपत्र मिलता है. वो इसके बिना जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए वोट नहीं डाल सकते. प्रत्याशी सबसे पहले इन प्रमाणपत्रों को अपने पास जमा करवा लेता है. चाहे लालच देकर या डरा धमका कर. हाल ही में सपा ने अपने प्रत्याशियों के अपहरण का आरोप लगाया था. वहीं एक सपा नेता का BDC को पैसों का लालच देने का ऑडियो वायरल हुआ था. इस तरह के आरोप हर जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में लगते हैं.

कार्यकाल कितने टाइम का होता है?

जिला पंचायत का एक निश्चित कार्यकाल होता है. यह जिला पंचायत की पहली बैठक की तारीख से शुरू होकर पांच साल तक होता है. सदस्यों का कार्यकाल भी पांच साल का होता है. यदि किसी कारणवश जिला पंचायत को निर्धारित समय से पहले भंग कर दिया जाता है, तो इसके लिए 6 माह के अन्दर चुनाव कराया जाता है. हर दो महीने में कम से कम एक बैठक का आयोजन करना जरूरी होता है. जिला पंचायत अध्यक्ष द्वारा बैठक का आयोजन कभी भी किया जा सकता है. यदि अध्यक्ष उपस्थित नहीं है तो उपाध्यक्ष जिला पंचायत की बैठक बुला सकता है.

जिला पंचायत अध्यक्ष का काम क्या होता है?

जिला पंचायतें जिलों के विकास की रूपरेखा तैयार करती हैं. ये एक तरह से गांव के लिए वही काम करती हैं जो नगर निगम शहरों के लिए करते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो विकास कराने के मामले में ग्राम प्रधान का जो रोल गांव के स्तर पर होता है, वही जिला स्तर पर जिला पंचायत का होता है. हालांकि हूबहू ऐसा हो, हम ये नहीं कह रहे हैं. जिला पंचायत अध्यक्ष के पास विकास पर खर्च करने के लिए बहुत बड़ी रकम होती है. वह विकास की रूप रेखा तैयार करता है. जिला पंचायत की कार्यकारणी योजना बनाती है. जिला पंचायत अध्यक्ष के जिम्मे, सड़क, सफाई, बिजली पानी और अन्य बुनियादी सुविधाओं को जुटाने की जिम्मेदारी होती है. तमाम विकास कार्य इन्ही के मार्फत होते हैं.

फंड कहां से आता है?

जिला पंचायत को विकास के लिए फंड मिलता है केंद्र और राज्य सरकारों से. इसके अलावा वह टैक्स के जरिए भी फंड जमा करती है. कर वसूली, मकानों के नक्शे पास करने, बाजार से वसूली और अन्य तरह के टैक्स लगाकर वह फंड जमा करती है.

अक्सर इस तरह की खबरें देखने को मिलती हैं कि फलां ने करोड़ो खर्च कर जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव जीत लिया. इन चुनावों पर नजर रखने वाले एक पत्रकार बताते हैं कि इस चुनाव में एक-एक व्यक्ति आइडेंटिफाइड होता है. ऐसे में मैनेज करना आसान हो जाता है. किसी ना किसी तरह से अपने पाले में पंचायत सदस्यों को करने के लिए चालें चली जातीं हैं. धनबल का इस्तेमाल होता है. पत्रकार का कहना है कि इन चुनावों में सत्ता पक्ष इनवॉल्व हो गया है. उन्होंने बताया कि जब से हर इलेक्शन को पब्लिक परसेप्शन का पैरामीटर बनाए जाने की कावायद शुरू हुई, तब से कोई भी सरकार किसी भी चुनाव को हल्के में नहीं लेती. इसलिए पंचायत चुनाव में भी सत्ता अपनी पूरी ताकत का इस्तेमाल करती है ताकि उसके प्रत्याशी चुनाव जीतें. यही कारण है कि जैसे ही सरकारें बदलती हैं तख्ता पलट हो जाता है. कभी भी एक-तिहाई सदस्य एक सभा बुलाकर अपने अध्यक्ष के खिलाफ विश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे देते हैं.

Yogi Akhilesh
अखिलेश यादव ने ट्वीट करके प्रदेश भाजपा सरकार पर जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं. (फाइल फोटो- PTI)

कई राज्यों में जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव प्रत्यक्ष निर्वाचन के जरिये होता है. लेकिन यूपी में ऐसा नहीं है. हालांकि राज्य चुनाव आयोग प्रत्यक्ष चुनाव का प्रस्ताव दिया था, लेकिन लंबी प्रक्रिया की वजह से ये इस बार भी नहीं हो पाया. अगर जनता सीधे पंचायत अध्यक्ष चुनेगी तो भ्रष्टाचार कम होगा. अभी कम लोग होने की वजह से उन्हें मैनेज करना आसान हो जाता है.


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