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रेमडेसिविर, फैबिफ्लू, डेक्सोना के पीछे भागने के पहले ये पढ़ लीजिए

रेमडेसिविर चर्चा में है. क़िल्लत और कालाबाज़ारी की ढेर सारी ख़बरें रेमडेसिविर से जुड़ी हुई हैं. लेकिन सवाल उठता है कि ये इंजेक्शन कोरोना पीड़ित व्यक्ति के लिए कितना ज़रूरी है? मेदांता समूह के चेयरमैन डॉ. नरेश त्रेहान की मानें तो ये कोई रामबाण नहीं है और ये हर किसी को नहीं दिया जाना चाहिए. 22 अप्रैल को अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि अगर किसी को कोविड हो गया है तो उसे रेमडेसिविर नहीं दिया जाना चाहिए. सिर्फ ऐसे लोग जो दूसरी गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं और डॉक्टरों को लगे कि अब इसके बिना काम नहीं चलेगा, तब ही ये इंजेक्शन दिया जाना चाहिए.

एम्स के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया का भी यही कहना है. उन्होंने कहा है कि 85 प्रतिशत कोरोना पीड़ितों को रेमडेसिविर की जरूरत नहीं पड़ती है. केवल 15 प्रतिशत मरीज ही ऐसे हैं जिनको इस इंजेक्शन या फिर स्टेरॉयड की जरूरत पड़ सकती है. चंडीगढ़ के Post Graduate Institute of Medical Education & Research यानी PGI के डॉक्टर जी. डी. पुरी कहते हैं कि रेमडेसिविर का इस्तेमाल अक्लमंदी से ही किया जाना चाहिए. उनके मुताबिक अगर मरीज वेंटीलेटर पर है तब इस दवा को नहीं दिया जाना चाहिए. इस दवा के साइड इफेक्ट भी हो सकते हैं. यानि पिछले काफी दिनों से जिस रेमडेसिविर को वायरल संदेशों में कोरोना का अचूक इलाज बताया जा रहा था, वो केवल खास परिस्थितियों में ही दी जा सकती है. जब साल 2020 में दुनिया के कई हिस्सों में रेमडेसिविर का इस्तेमाल कोरोना के इलाज के लिए शुरू हुआ, तो उस समय भी इस दवा की क्षमता के लिए इसे बनाने वाली कम्पनी गिलियड फ़ार्मा का ख़ुद का ही दावा मौजूद था. बाद में WHO ने भी कोविड के केस में इस दवा की उपलब्धि पर सवाल खड़े किए थे.

रेमडेसिविर के बाद बात आती है दूसरी दवा डेक्सोमेथासोन की

डेक्सोमेथासोन एक स्टेरॉयड है. टैब्लेट और इंजेक्शन दोनों ही रूप में उपलब्ध है. गठिया, दमा, एलर्जी और शरीर के अंदरूनी हिस्सों में सूजन के लिए इस दवाई को लम्बे समय से इस्तेमाल किया जाता रहा है. साल 2020 में यूके के नेशनल हेल्थ सर्विसेज़ और अमरीका के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ हेल्थ ने कहा कि कोरोना से संक्रमित जिन मरीज़ों को ऑक्सिजन की ज़रूरत है, उन्हें डेक्सोमेथासोन दिया जा सकता है. इसके बाद काफी लोगों पर इसका टेस्ट किया गया. दावे काफी हद तक सही पाए गए. WHO ने भी कहा कि जिन लोगों के लक्षण बहुत गम्भीर नहीं हैं, उन्हें ये दवा नहीं दी जानी चाहिए.

ये तो विदेशों की बात हो गयी. देश की बात करें तो, CSIR के महानिदेशक डॉक्टर शेखर मांडे ने एक रिसर्च के हवाले से मीडिया को बताया कि, कोरोना के संक्रमण से जूझ रहे और ज़्यादा लक्षण वाले कई मरीज़ों पर इस दवा का असर दिखा है. हालांकि डेक्सोमेथासोन का असर उन मरीज़ों पर नहीं दिखा जिनमें लक्षण कम थे. हम पूरी स्टडी के छपने का इंतज़ार करेंगे लेकिन लोगों को ये दवा ख़ुद से बिलकुल भी नहीं लेनी चाहिए. इसके लिए मेडिकल सुपरविज़न अनिवार्य है.

डेक्सोमेथासोन के बाद नम्बर आता है फ़ेविपिराविर का

आपमें से कई लोग इसे फैबिफ्लू के नाम से भी जानते होंगे. फ़ेविपिराविर का इस्तेमाल बीते कुछ समय से जापान और चीन में फ़्लू के इलाज करने के लिए किया जाता रहा है. दवाईयों की जानकारी वाली एक वेबसाइट है जिसका नाम है – One MG. इस वेबसाइट के मुताबिक डॉक्टर की सलाह पर ही इस दवा को खाना चाहिए, खुद से ये दवा नहीं लेनी चाहिए. बिना किसी जानकारी के इन दवाओं को खाया, तो शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ जाने या डायरिया हो जाने का ख़तरा बना रहता है. खून में पाए जाने वाले व्हाइट ब्लड सेल भी कम हो सकते हैं. इसके अलावा गर्भवती महिलाओं के लिए भी ये दवा सेफ नहीं है. लेकिन सवाल उठता है कि कोरोना में ये दावा कितना फ़ायदा करती है?

मैक्स हेल्थकेयर में इंटरनल मेडिसिन के सहायक निदेशक डॉ. रोमिल टिक्कू ने मीडिया से बातचीत में कहा है कि फ़ेविपिराविर कोरोना में फायदा करती है लेकिन हर मरीज की स्थिति का आंकलन करके ही ये दवा दी जानी चाहिए. यानी बिना डॉक्टरी सलाह के इसे लेना सेफ नहीं है. लेकिन एम्स के डॉक्टर नीरज निश्चल का भी कहना है कि कोरोना पर ये दवा किस तरह असर कर रही है, ये बात पूरी तरह साफ नहीं है. इसको घरों में जमा न करें. कोरोना होने पर इसे खुद से न लें. डॉक्टर जो दवा बताए वही लें.

फ़ेविपिराविर के बाद अब बात बुडेसोनाइड की

ये एक स्टेरॉइड है और अक्सर अस्थमा यानी दमा के मरीज़ों को सांस लेने के लिए ये दवा दी जाती रही है. हाल फ़िलहाल इस दवा का नाम भी कोरोना के इलाज में लिया जा रहा है. साइंस जर्नल लैंसेट में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक कोरोना होने पर बुडेसोनाइड इनहेलर यूज करना ठीक है. तो क्या लैंसेट की स्टडी आख़िरी रास्ता है? सबकुछ का दी एंड? शायद नहीं. पहली बात तो ये कि जिस स्टडी के आधार पर ये दावा किया गया है, उस स्टडी में केवल 73 लोगों को ही बुडेसोनाइड दिया गया था. दूसरी बात ये भी कही गयी है कि बुडेसोनाइड केवल माइल्ड कोरोना पेशेंट्स को ही दिया जाना चाहिए. ये बात एम्स के डॉक्टर भी मानते हैं. एम्स ने कोरोना मरीजों को तीन श्रेणियों में बांटा है.

हल्के लक्षण वाले मरीज
ज्यादा लक्षण वाले मरीज
और, गंभीर लक्षण वाले मरीज.

अपने लक्षण आप खुद न तय करें तो बेहतर होगा. और यही कारण है कि बुडेसोनाइड को भी किसी डॉक्टर के कहने पर ही इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है.

बुडेसोनाइड के बाद नाम आता है एजिथ्रोमाइसिन का

एंटी बॉयोटिक दवा है जो बैक्टीरिया के विकास को रोकती है. एजिथ्रोमाइसिन न्यूमोनिया, ब्रोंकाइटिस, कान, गला, फेफड़े का संक्रमण और सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज के इलाज में दी जाती है और अधिक मात्रा में ली जाए तो ऐसे दावे हैं कि इससे किडनी, लीवर के साथ-साथ दिल पर भी असर होता है. यूएस नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन ने कहा है कि ये दवा वायरल संक्रमण जैसे सर्दी या फ्लू के लिए काम नहीं करती है. कुछ लोगों को एजिथ्रोमाइसिन से एलर्जी होती है और ये दवा आमतौर पर पीलिया जैसे लिवर के रोग वाले मरीजों को नहीं दी जाती है.

जून 2020 तक एजिथ्रोमाइसिन और मलेरिया और गठिया में इस्तेमाल में आने वाली दवा हाईड्रॉक्सीक्लोरोक्विन को कोविड पीड़ितों को दिया जा रहा था लेकिन एम्स ने इसमें से एजिथ्रोमाइसिन को हटा दिया. एम्स के डिपार्टमेंट ऑफ मेडिसिन के प्रमुख और क्लिनिकल रिसर्च पर बने नेशनल टास्क फोर्स के सदस्य डॉ नवीत विग ने इस बारे में कहा था कि, कोरोना वायरस के इलाज में ये एंटी बायोटिक दवाएं ज्यादा कारगर साबित नहीं हो रही हैं. इलाज प्रक्रिया में धीरे-धीरे बदलाव हुआ है. पहले एजिथ्रोमाइसिन और हाईड्रॉक्सीक्लोरोक्विन दी जाती थी. अब अध्ययन के बाद ये बात सामने आ रही है कि हाईड्रॉक्सीक्लोरोक्विन के साथ एजिथ्रोमाइसिन की जरूरत नहीं है. डॉक्टर्स का कहना है कि एजिथ्रोमाइसिन किस मरीज को देनी है और किसको नहीं ये फैसला डॉक्टर लक्षण देख कर करते हैं.

चलते-चलते

Drugs Controller General of India यानी DCGI ने जायडस कैडिला कंपनी की एक दवाई, वीराफिन को मॉडरेट कोविड-19 इन्फेक्शन के इलाज के लिए मंजूरी दे दी है. ये मंजूरी केवल वयस्कों के यूज़ के लिए ही है. जायडस कैडिला ने 5 अप्रैल को दावा किया था कि वीराफिन की एक खुराक लेने से 91.15 प्रतिशत कोविड पेशेंट 7वें दिन तक कोरोना नेगेटिव हो गए. इस दवा के वायरस जनित रोगों के खिलाफ़ काम करने के दावे मौजूद हैं. लेकिन अभी स्टडी पूरी नहीं है. इसलिए डॉक्टरी सलाह का हर हाल में इंतज़ार करिए. और आप सुनना चाहेंगे कि डॉक्टर क्या कहते हैं. नालंदा मेडिकल कॉलेज, बिहार की डॉक्टर तनवी श्रीवास्तव बताती हैं-

“रेमडेसिविर जैसी दवाइयों की शॉर्टेज से ये मेसेज जा रहा है कि जैसे यही कोरोना की रामबाण दवा है. लेकिन ऐसा नहीं है. रेमडेसिविर को लेकर अभी ट्रायल चल रहे हैं. कुछ रिसर्च में देखा गया है कि रेमडेसिविर से भर्ती रहने और रिकवरी का समय घट जाता है. लेकिन कहीं भी ये बात सामने नहीं आई कि इससे कोरोना के मरीज ठीक हो जाते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तो इसे सजेस्ट तक नहीं किया है कोरोना के इलाज के लिए. और भी दूसरी दवाइयां हैं. लेकिन इन दवाइयों को खुद से लेने से बहुत नुकसान हो सकता है. रेमडेसिविर, डेक्सोना और फैबी फ्लू जैसी दवाइयों को कोरोना के गंभीर मरीजों को ही दिया जा रहा है. बिना डॉक्टरी सलाह के इन्हें किसी को भी नहीं लेना चाहिए. डॉक्टर ही तय करेंगे कि ये दवाइयां कब और कितनी मात्रा में दी जानी हैं.”

आपने डॉ. तनवी की बात पढ़ी इन दवाओं पर. अब भी अगर आप बिना सोचे समझे दवाएं ख़रीद रहे हैं, और घर में रख रहे हैं तो पढ़िए जेजे अस्पताल मुंबई के डॉक्टर हेमंत गुप्ता क्या कहते हैं –

“लोग काफी डरे-सहमे हुए हैं. इस वजह से काफी सारी दवाइयां अपने घर में स्टॉक कर रहे हैं. डॉक्टर की सलाह नहीं ले रहे हैं. व्हाट्सएप पर उन्हें जो जानकारी मिल रही है, वो दवाएं ले रहे हैं. लगभग हर व्यक्ति डॉक्टर बन गया है. लेकिन लोगों को समझना होगा कि दवाओं को लेकर हर व्यक्ति की जरूरत अलग होती है. ये जरूरी नहीं है कि अगर किसी को कोरोना हुआ है तो उसे रेमडेसिविर और फैबी फ्लू की जरूरत है. उदाहरण के तौर पर बताता हूं कि रेमडिसिविर केवल शुरुआत के 10 दिन में ही काम आती है, वो भी सिर्फ उन मरीजों में जिनमें कोरोना का संक्रण काफी गंभीर हो जाता है. लेकिन हर कोई उसके पीछे पागलों की तरह भाग रहा है. इन दवाओं को केवल डॉक्टरी सलाह पर ही लेना चाहिए. खुद से इलाज नहीं करना चाहिए.”

इन दवाओं के अलावा कुछ लोगों ने विटामिन सी, विटामिन डी और जिंक सप्लीमेंट्स भी लेना शुरू कर दिए हैं. इन्हें लेना कितना सही या गलत है, इस बारे में भी हमें डॉक्टर तनवी श्रीवास्तव ने बताया. उन्होंने बताया-

कोरोना के शुरूआती समय में एक स्टडी हुई थी. जिसमें पता लगा था कि जो लोग कोरोना पॉजिटिव आ रहे हैं, उनमें विटामिन डी की कमी है. ऐसे में ये विटामिन देना शुरू हुई थी. लेकिन इसे भी बहुत ज्यादा डोज में नहीं लेना है. 600 से 1000 यूनिट के बीच ले सकते हैं. इसी तरह विटामिन सी की भी एक सीमा है. इसकी रोजाना जरूरत 90 एमजी है. इसका रेंज बड़ा है तो 2000 एमजी तक भी ले सकते हैं. इनका कोई साइड इफेक्ट नहीं है. लेकिन ज्यादा मात्रा में लेने पर क्रैम्प हो सकते हैं. डायरिया भी हो सकता है.


विडियो- मेदांता अस्पताल ने कोरोना से बचने के लिए जो गाइडलाइन बताई है, उसे नोट कर लीजिए!

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