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कौन है मुल्ला बरादर, जिसका अफगानिस्तान का राष्ट्रपति बनना लगभग तय माना जा रहा है?

अफगानिस्तान में जल्दी ही तालिबान के नेतृत्व वाली सरकार बन सकती है. लेकिन इस सरकार की बागडोर किसके हाथ में होगी, इसे लेकर अटकलें जारी हैं. इसी हफ्ते सूत्रों के हवाले से मीडिया रिपोर्टों में कहा गया था कि तालिबान का सुप्रीम लीडर हिबतुल्लाह अखुंदजादा अफगानिस्तान में तालिबान सरकार का लीडर होगा. हालांकि ये भी कहा गया कि हिबतुल्लाह केवल नाम का मुखिया होगा. तालिबान सरकार के कामकाज की जिम्मेदारी मुल्ला बरादर की होगी.

रॉयटर्स ने शुक्रवार 3 सितंबर को सूत्रों के हवाले से बताया है कि तालिबान का सह-संस्थापक मुल्ला बरादर नई अफगान सरकार का नेतृत्व कर सकता है. मुल्ला बरादर तालिबान का राजनीतिक कार्यालय का प्रमुख है. कहा जा रहा है कि तालिबान सरकार में उसके साथ मुल्ला मोहम्मद याकूब और शेर मोहम्मद अब्बास स्टेनकजई भी सीनियर पदों पर होंगे. मुल्ला मोहम्मद याकूब तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर का बेटा है. वहीं, शेर मोहम्मद अब्बास स्टेनकजई का भारत से कनेक्शन है. वो यहां आईएमए देहरादून में डेढ़ साल ट्रेनिंग ले चुका है. रॉयटर्स की रिपोर्ट की मानें तो नई अफगान सरकार के गठन के लिए तैयारियां अतिंम चरण में हैं. तालिबान के सभी टॉप लीडर्स काबुल पहुंच चुके हैं.

ये भी पढ़ें: IMA देहरादून का ‘शेरू’, जो अब तालिबान के सबसे ताकतवर नेताओं में से एक है

मुल्ला बरादर ही क्यों?

तालिबान अफगानिस्तान पर कब्जा तो कर चुका है, लेकिन उसे वहां सरकार चलाने के लिए पैसा चाहिए. वो उसे मिल नहीं पा रहा, क्योंकि अफगानिस्तान का अधिकतर सरकारी खजाना दूसरे देशों के बैंकों में जमा है. वहां की सरकारों ने उसे फिलहाल के लिए जब्त कर लिया है. वहीं, आईएमए जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी अफगानिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक मदद पर रोक लगा दी है. ऐसे में कहा जा रहा है कि पहले से बड़े आर्थिक संकट का सामना कर रहे अफगानिस्तान के लोगों के लिए भूखों मरने की नौबत आ सकती है. ऊपर से पंजशीर में विद्रोही लड़ाकों से चल रहे भीषण हिंसक संघर्ष के लिए भी तालिबान को पैसे की जरूरत है.

जानकारों का कहना है कि इन सब कारणों के चलते ही तालिबान खुद को उदारवादी दिखाने की कोशिश कर रहा है. इसके तहत उसने बार-बार ये आश्वासन दिया है कि अफगानिस्तान में तमाम दूसरे देशों के दूतावासों को उससे कोई खतरा नहीं है. साथ ही तालिबान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वो उसके नेतृत्व वाली नई अफगान सरकार को मान्यता दे. कहा जा रहा है कि मुल्ला बरादर को इस भावी सरकार का लीडर चुनना इसी कोशिश का हिस्सा हो सकता है. मुल्ला उमर की तुलना में मुल्ला बरादर की छवि कुछ कम कट्टर तालिबानी नेता की है और संगठन के हर छोटे-बड़े नेता और लड़ाके का वो विश्वासपात्र है.


दी लल्लनटॉप ने कुछ दिन पहले मुल्ला बरादर के इतिहास पर ये विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इसे पढ़कर समझ आ जाता है कि क्यों बरादर अफगानिस्तान में नई तालिबान सरकार का मुखिया होने का सबसे प्रबल दावेदार है.


कौन है मुल्ला बरादर?

अब्दुल गनी बरादर उर्फ मुल्ला बरादर के जन्म के शुरुआती वर्षों के बारे में ज़्यादा जानकारी मौजूद नहीं है. इंटरपोल के हिसाब से उसका जन्म 1968 में हुआ. कहां?

पोपलजाइ जनजाति का ये दुर्रानी पश्तून, अफ़ग़ानिस्तान के ओरूज़गान प्रांत के देह-राहवूद ज़िले में पैदा हुआ.

80 के दशक में जब सोवियत ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया तो 12 साल की उम्र का ‘अब्दुल गनी बरादर’ मुजाहिदीन के साथ शामिल हो गया. सोवियत ने एंट्री ली तो उसका ‘बेस्ट फ़्रेंड’ अमेरिका कहां पीछे रहता. अमेरिका ने पीछे से मुजाहिदीनों को हथियार सप्लाई करने शुरू किए. 1989 में सोवियत को अफ़ग़ानिस्तान छोड़ना पड़ा. जिसके बाद वहां के लोकल वॉर लॉर्ड्ज़ के बीच क़ब्ज़े को लेकर रस्साकशी शुरू हो गई. इस सबके बीच एक नाम उभर कर आया. अमीर-उल मोमिनीन, मुल्ला मुहम्मद उमर.

मुल्ला मुहम्मद उमर. तालिबान का जन्मदाता.
मुल्ला मुहम्मद उमर. तालिबान का जन्मदाता. (फ़ाइल फोटो)

मुल्ला उन दिनों कंधार के पास एक मदरसे में पढ़ाता था. इन्हीं दिनों अब्दुल गनी बरादर की मुल्ला उमर से मुलाक़ात हुई. और वो मुल्ला उमर का ख़ास सिपाह सलाहकार बन गया. कहते हैं कि उसने और मुल्ला ने दो बहनों के साथ शादी की थी. इसलिए दोनों का आपसी रिश्ता भी था. ये बात कितनी सच है कितनी झूठ, पता नहीं. लेकिन जानकार कहते हैं कि दोनों की दोस्ती एकदम पक्की थी.

उमर और बरादर ने फ़ौज के साथ मिलकर काबुल पर चढ़ाई की और उसे जीत लिया. कुछ ही सालों में पूरे अफ़गानिस्तान पर तालिबान का कब्ज़ा हो गया. वक्त से साथ बरादर, उमर का सबसे विश्वासपात्र और ख़ास कमांडर बन गया. 1996 से लेकर 2011 तक वो अफ़ग़ानिस्तान में उप-रक्षामंत्री के पद पर तैनात रहा.

9/11 के बाद 

अक्टूबर 2001 में अमेरिका ने अफ़गानिस्तान पर हमला किया. तालिबान की ग़द्दी छिन गई. उसकी लीडरशिप को भागकर पाकिस्तान में शरण लेनी पड़ी. बताया जाता है कि जब अमेरिका ने कंधार पर बम गिराना शुरू किया तो वो बरादर ही था जो मुल्ला उमर को अपनी मोटरसाइकल में बिठाकर पहाड़ों की तरफ़ ले गया. एक कहानी है कि उस वक्त अफ़ग़ान सैनिकों ने बरादर को पकड़ लिया था. लेकिन ISI की मदद से वो निकल भागा.

एक डच पत्रकार हैं, बैटी डैम. ब्रिटेन के ‘द गार्डियन’ अख़बार के लिए लिखती हैं. चार साल अफ़ग़ानिस्तान में रहकर रिपोर्टिंग कर चुकी हैं. 2010 में इन्होंने एक लेख लिखा, जिसका शीर्षक था, ‘मुल्ला बरादर: दोस्त या दुश्मन’.

इस लेख में बैटी डैम ने बताया कि 2001 में मुल्ला बरादर ने हामिद करजाई की जान बचाई थी. जिसके बाद करजाई ने उसे आश्वासन दिया था कि अफ़ग़ानिस्तान में लोकतांत्रिक सरकार बनने के बाद तालिबान को हिस्सेदार बनाया जाएगा. हालांकि करजई के विरोध के बावजूद अमेरिका ने देह-राहवूद स्थित बरादर के घर पर हमला किया. जिसके बाद अपनी जान बचाने के लिए उसे पाकिस्तान जाकर छुपना पड़ा.

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अमेरिका के विशेष प्रतिनिधि जलमय खलीलजाद और तालिबान के सह-संस्थापक मुल्ला अब्दुल गनी बरादर 2 फरवरी को कतर की राजधानी दोहा में.(तस्वीर: AFP)

अमेरिका की हिट लिस्ट में नम्बर एक पर था मुल्ला उमर. उसके एक-एक कदम पर अमेरिका की नज़र थी. ऐसे में तालिबान के लड़ाकों तक संदेश पहुंचाना मुश्किल हो रहा था. ये देखते हुए उमर ने तालिबान की कमान मुल्ला बरादर को सौंप दी. बताते हैं कि इस दौरान वो 18 घंटे काम करता था. और कभी भी एक जगह पर दो रातों तक नहीं रुकता था. तब तालिबान का हेडक्वॉर्टर था पाकिस्तान में बलूचिस्तान की राजधानी- क्वेटा.

बरादर के काम करने का तरीक़ा 

मीडिया रिपोर्टों में तालिबानी सूत्रों के हवाले से बतया गया है कि बरादर के काम करने का तरीक़ा पुराने ज़माने के पश्तून आदिवासी मुखियाओं जैसा था. वो केवल सीनियर तालिबानी कमांडरों से ही नहीं मिलता, बल्कि छोटे दर्जे के अधिकारियों और आदिवासी बुजुर्गों के साथ भी बातचीत करता. जब वो नागरिकों से मिलता, तो सबसे आदर से पेश आता. फिर चाहे वे स्थानीय शेख हों या तालिबान का राजनीतिक अभिजात वर्ग. अपनी सभी मीटिंग्स में वो सारी डिटेल्स को बराबर नोट करता और लगातार मुल्ला उमर का नाम लिया करता था.

इसके अलावा तालिबान की लड़ाई की रणनीति भी वही तय करता था. मुल्ला उमर से इतर मुल्ला बरादर ने अमेरिकी और नाटो फ़ोर्सेस की सप्लाई पर हमला करना शुरू किया. उसने उज्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान से आने वाली सैन्य आपूर्ति को निशाना बनाया. इसके अलावा उसका आदेश था कि तालिबान के कमांडर अपने लड़ाकों के साथ साल में कम से कम दो महीने ज़मीन पर समय बिताएं.

अमेरिका को लग रहा था कि मुल्ला उमर के अंडरग्राउंड हो जाने से तालिबान कमज़ोर हो जाएगा. लेकिन बरादर के आने से उनकी मुश्किलें और भी बढ़ गईं. उसके कमान सम्भालने के बाद से अमेरिकी सैनिकों की मौतों में अभूतपूर्व बढ़त हुई.

वेट एंड वॉच

उसने अमेरिकी फ़ौज से लड़ने की जो रणनीति बनाई, उसका एक ही मंत्र था. वो जानता था कि अमेरिकी फ़ौज को हराया नहीं जा सकता. इसलिए उसने ‘वेट एंड वॉच’ की नीति अपनाई. उसने अपने लड़ाकों से कहा,

‘केवल एक बात पर ध्यान दो. तालिबान की कम से कम हानि हो और दुश्मन की ज़्यादा से ज़्यादा. अमेरिकी सेना से आमना-सामना नहीं करना है. गुरिल्ला तकनीक का सहारा लो. कच्चे पक्के रास्तों पर फूल (यानी एक्सप्लोसिव डिवाइस) बिछा दो. रॉकेट से छोड़े जाने वाले ग्रेनेड और ऑटोमेटिक हथियारों का सहारा लो.’

इस सब के बीच पाकिस्तान भी अफ़ग़ानिस्तान में अपना प्रभाव बढ़ाने की राह देख रहा था. सामने से तो वो अमेरिका का समर्थन करता और पीठ पीछे तालिबानी लड़ाकों को अपने यहां पनाह दे रहा था. मुल्ला उमर भी क्वेटा से ही अपना ऑपरेशन चला रहा था. और अंदर ही अंदर पाकिस्तान उसे पूरा समर्थन भी दे रहा था.

2008 में ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद हालात कुछ बदले. नया-नया कार्यकाल शुरू हुआ था और विदेश नीति में उन्हें जॉर्ज बुश से अलग भी दिखना था. इसलिए इस दौरान अमेरिका ने पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाना शुरू किया.
उसने पाकिस्तान से दो टूक कहा कि अगर वो आतंक के ख़िलाफ़ अमेरिका का समर्थन करता है, तो केवल बातों से काम नहीं चलेगा. कुछ बड़े कदम उठाकर ये साबित भी करना पड़ेगा.

क्या था ये बड़ा कदम?

मुल्ला बरादर की धर-पकड़. जानकारों का कहना है कि ये पाकिस्तान की क़िस्मत थी कि मुल्ला कराची में पकड़ा गया. वहीं कुछ कहते हैं कि पाकिस्तान जब चाहे मुल्ला बरादर को पकड़ सकता था. लेकिन उसे सही वक्त का इंतज़ार था.

दरअसल कथित तौर पर उन दिनों अफगान सरकार बरादर के साथ गुप्त वार्ता कर रही थी. और पाकिस्तान बिलकुल भी ऐसा होने देना नहीं चाहता था. अगर तालिबान और अफ़ग़ान सरकार की बातचीत शुरू हो जाती तो पाकिस्तान का कोई महत्व ना रह जाता. एक थियोरी ये भी है कि ये सब जनरल अश्फ़ाक परवेज़ कियानी के इशारों पर हुआ था. उनके रिटायरमेंट के दिन नज़दीक थे. ऐसे में बरादर को पकड़ कर वो अमेरिका की नज़रों में आना चाहते थे. ताकि पाकिस्तान सरकार पर दबाव बने और उनका कार्यकाल आगे बढ़ाया जाए.

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अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पेओ ने तालिबान के सह-संस्थापक मुल्ला अब्दुल गनी बरादार से दोहा में मुलाकात की (तस्वीर: AFP)

बरादर के गिरफ़्तार होने से तत्कालीन राष्ट्रपति हामिद करजई बहुत नाराज़ हुए. उन्होंने बैक चैनल से पाकिस्तान को संदेश भेजा कि बरादर को अफ़ग़ानिस्तान को सौंप दें. अधिकारिक बयानों में पाकिस्तान ने भी कहा कि अगर अफ़ग़ानिस्तान चाहेगा तो वो बरादर को उन्हें सौंप देगा. इस दौरान उसने अफ़ग़ानिस्तान को तालिबानी नेताओं की एक सूची भी सौंपी. लेकिन जानबूझकर उसने इस सूची से मुल्ला बरादर को अलग रखा. 2012 में उसने 9 तालिबानी नेताओं को अफ़ग़ान सरकार को सौंपा. बरादर इनमें शामिल नहीं था.

2013 में मुल्ला उमर अमेरिकी हमले में मारा गया. तालिबान की लगाम मुल्ला अब्दुल कय्यूम ज़ाकिर के हाथ आ गई. बरादर पाकिस्तान की कैद में था. लेकिन तालिबानी फुट सोल्जर्स के लिए वो ही मुल्ला उमर की गद्दी का असली वारिस था.

बरादर की रिहाई 

2018 तक आते-आते अमेरिका को ये समझ आ चुका था कि उसे कभी ना कभी तो अफ़ग़ानिस्तान से लौटना होगा. ऐसे में ज़रूरी था कि तालिबान से शांति की बात चलाई जाए. लेकिन कोई भी नेता ऐसा ना था जो तालिबान की रहनुमाई का दावा कर सके. ऐसे में अमेरिका को बरादर की याद आई. इस मामले में उसने पाकिस्तान से बात चलाई, जिसके नतीजे में 25 अक्टूबर 2018 को मुल्ला बरादर को रिहा कर दिया गया. इसी साल दोहा में अमेरिका और तालिबान की बातचीत शुरू हुई. कुल नौ राउंड चली बातचीत कई बार पटरी से उतरी और फिर से शुरू हुई.

अगस्त 2019 में ख़बरें आईं कि अमेरिका और तालिबान डील पर सहमत होने ही वाले हैं. मगर सितंबर 2019 में एक ट्रेज़ेडी हो गई. अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में एक कार धमाका हुआ. इसमें अमेरिका के एक सर्विसमैन की मौत हो गई. इससे नाराज़ ट्रंप ने वार्ता ख़त्म करने का ऐलान कर दिया.

लेकिन चुनाव सर पर थे और कोरोना के कारण ट्रंप के सामने काफ़ी मुश्किलें थीं. चुनाव में अफ़ग़ानिस्तान से सैनिकों की वापसी एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनी. ट्रंप अपने पूरे चुनाव अभियान के दौरान प्रतिद्वंद्वी बाइडेन को एक कमज़ोर नेता के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे थे. ऐसे में तालिबान से वार्ता कर विदेश नीति पर कुछ ज़रूरी पॉइंट जुटाए जा सकते थे. इसे देखते हुए ट्रंप दुबारा शांति वार्ता को लेकर राज़ी हुए.

दोहा समझौता 

आख़िरकार बरादर ने फरवरी 2020 में अमेरिका के साथ दोहा समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसके अनुसार, अमेरिका और तालिबान लड़ाई रोकने पर सहमत हुए. इस समझौते में बरादर के सामने कुछ शर्तें रखी गईं. इन्हें पूरा करने के बाद ही अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से पूरी तरह निकलता. लेकिन इसी बीच जनवरी 2021 में अमेरिका में सत्ता बदल गई. जो बाइडेन राष्ट्रपति बन गए. उन्होंने एलान किया कि अमेरिका बिना किसी शर्त के अफ़ग़ानिस्तान से निकल जाएगा. अमेरिका को बैकफुट पर देख तालिबान फ़ुल ऑफ़ेन्सिव मोड में आ गया. और उसने एक-एक कर कर चंद हफ़्तों में ही पूरे अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा कर लिया.

मुल्ला बरादर ने दुनिया के सबसे मज़बूत राष्ट्र के दो राष्ट्रपतियों को पटखनी दे दी थी. ट्रंप की कुर्सी चली गई और बाइडेन के कार्यकाल के पहले 6 हफ़्ते में ही उन्हें इतनी बड़ी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी.

अफ़ग़ानिस्तान में सबको पटखनी देने के बाद मुल्ला अपनी सल्तनत पर ताजपोशी का इंतज़ार कर रहा है.


वीडियो- अफगानिस्तान में अब पूरी तरह से तालिबान का कब्जा, राष्ट्रपति अशरफ गनी ने दिया इस्ती

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