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बॉबी देओल ने जिस जोजो के दांत जलाए, वो आजकल है कहां?

नाइंटीज़ का हीरो लार्जर दैन लाइफ होता था. इसलिए जब हॉल में एंट्री मारता, तो सीटियां बजवा देता. अपने स्वैग के साथ गुंडों की धुलाई करता. गाने गाता, डांस करता. जिसे जनता हॉल से बाहर निकल कर दोहराती. आज के समय में नाइंटीज़ वाले हीरो की ज़्यादातर हरकतें बचकानी लगती हैं. और वो फिल्में भी. अगर उन फिल्मों को याद करने भी बैठो तो दिमाग में पहली इमेज हीरो की नहीं आती. आती है उस खास किरदार की, जिसका रोल हीरो की तुलना में कुछ भी नहीं होता था. जिन्हें अक्सर सपोर्टिंग कैरक्टर्स कहा जाता है, उनको निभाने वाले कलाकार अब भी याद आते हैं. शायद नॉस्टैल्जिया की वजह से या उनके काम की वजह से.

आज बात करेंगे ऐसा ही एक यादगार सपोर्टिंग कैरक्टर निभाने वाले एक्टर की. 1998 में बॉबी देओल की फिल्म आई थी. ‘सोल्जर’. जो बॉबी देओल, प्रीति ज़िंटा और ‘नइयो नइयो’ के अलावा एक और फैक्टर के लिए याद की जाती है. उसके विलन जोजो के लिए. जो मेन विलन नहीं था. फिल्म में सिर्फ कॉमिक रिलीफ के लिए था. वो जोजो जिसके दांत बॉबी ने जला दिए थे. वो जोजो, जो टेबल पर रोलर स्केटिंग करते हुए पेप्सी के कैन गिरा देता था. मतलब इतनी बुरी तरह तो रोनाल्डो ने कोका कोला की बॉटल्स को टेबल से नहीं हटाया था. खैर, आज बात करेंगे जोजो का रोल प्ले करने वाले जीतू वर्मा की. जानेंगे कि कैसे रोलर स्केट्स की वजह से वो जोजो बने. और क्यों वो पहली बार सलमान खान के साथ स्क्रीन शेयर करने का क्रेडिट अपने घोड़ों को देते हैं. बताएंगे आपको कि आज कल जीतू कहां हैं.

Kaha Gaye Ye Log


# किस्मत में लिखा था फिल्मों में आना

जीतू बड़े होकर फिल्म इंडस्ट्री का पार्ट बनेंगे, ऐसा उनकी किस्मत में जन्म से पहले ही लिखा जा चुका था. इस बात की सबसे बड़ी वजह हैं उनके पिता बद्रीप्रसाद वर्मा. जो राजस्थान के दौसा जिले के खवारावजी गांव के रहने वाले थे. 50 के दशक की बात है. गांव में रोजगार के ज़्यादा संसाधन न होने की वजह से उनके पिता जयपुर आ गए. लेकिन वहां भी बात नहीं बनी. जयपुर से सीधा पहुंचे बंबई. उम्मीद थी कि जो शहर सबके सपने पूरा करता है, वो क्या उनके सपने पूरे नहीं करेगा. उन दिनों बॉम्बे का दूसरा पर्यायवाची था हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री. जीतू के पिता भी फिल्म इंडस्ट्री में काम करने लगे. बतौर एक स्टंट मैन.

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जीतू के पिता बद्रीप्रसाद वर्मा ने 60 और 70 के दशक की कई हिन्दी फिल्मों में बतौर स्टंटमैन काम किया. फोटो – शोले का स्क्रीनशॉट

बद्रीप्रसाद वर्मा ने 60 और 70 के दशक की हिन्दी फिल्मों के एक्शन डिपार्टमेंट्स में काम किया. इसका नतीजा ये हुआ कि उनके सबसे बड़े बेटे भीकू वर्मा ने भी अपने फिल्मी करियर की शुरुआत एक स्टंट कोऑर्डिनेटर के तौर पर की. जिन्होंने आगे चलकर ‘करण अर्जुन’, ‘बॉर्डर’ और ‘रेफ्यूजी’ जैसी फिल्मों के लिए एक्शन सीक्वेन्स डायरेक्ट किए. सिर्फ भीकू ही नहीं, बल्कि उनके छोटे भाई पप्पू वर्मा भी फिल्मों के एक्शन डायरेक्टर रह चुके हैं. उन्होंने ‘कुली’ और ‘मर्द’ पर भी काम किया. जीतू के तीसरे भाई टीनू वर्मा के काम से आप वाकिफ हैं. ऑफ स्क्रीन भी और ऑन स्क्रीन भी. उन्होंने ‘घातक’, ‘अंदाज़ अपना अपना’, ‘डर’, ‘ज़िद्दी’ और ‘कहो ना प्यार है’ जैसी अनेकों फिल्मों पर स्टंट और एक्शन कोऑर्डिनेटर की हैसियत से काम किया. एक्शन डायरेक्ट करने के अलावा उन्होंने फिल्मों में एक्टिंग भी की. आमिर खान की फिल्म आई थी, ‘मेला’. जहां गुज्जर सिंह का रोल अदा करने वाले टीनू ही थे. कुल मिलाकर, जीतू के छह भाइयों में से पांच फिल्मों से जुड़े हुए हैं. भाइयों का इंफ्लुएंस ऐसा था कि जीतू भी ऑटोमैटिकली फिल्मों में आ गए.


# सलमान को घुड़सवारी सिखाते-सिखाते एक्टिंग करने लगे

अगर आप गूगल करेंगे या यूट्यूब पर जीतू वर्मा से संबंधित वीडियोज़ देखेंगे, तो एक बात कॉमन दिखेगी. कि जीतू ने अपनी पहली स्क्रीन अपीयरेंस सलमान खान की फिल्म ‘औज़ार’ में दी. लेकिन ऐसा नहीं था. बॉम्बे में पले बढ़े जीतू ने अपने एक्शन डायरेक्टर भाइयों से थोड़ी अलग राह चुनी. उन्होंने डांस सीखा और कोरियोग्राफर बन गए. 1992 में जीतू के भाई पप्पू वर्मा अपने होम प्रॉडक्शन के तले एक फिल्म बना रहे थे. जो मणि रत्नम की फिल्म ‘अग्नि नतचित्रम’ का हिन्दी रीमेक थी. फिल्म का नाम था ‘वंश’. जीतू फिल्म का कोरियोग्राफी डिपार्टमेंट संभाल रहे थे. फिल्म का एक गाना शूट हो रहा था. ‘आके तेरी बाहों में’. गाने का अधिकतर हिस्सा एक्टर्स सिद्धार्थ और प्रियंका पर फिल्माया गया है. सिर्फ चंद सेकंड्स के लिए एक बांसुरी बजाता आदमी दिखाई देता है. अपने सिर पर गमछा बांधे. वो बांसुरी बजाने वाले जीतू थे. हुआ यूं कि गाने की शूटिंग के दौरान पप्पू को एक बांसुरी बजाते चरवाहे की ज़रूरत थी. आसपास कोई नज़र नहीं आ रहा था. तभी उनके दिमाग में जीतू को देखकर एक आइडिया आया. उन दिनों जीतू अपने साथ हमेशा गमछा रखते थे. भाई ने वही गमछा उनके माथे पर लपेट दिया. और खड़ा कर दिया कैमरा के सामने.

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जब ‘आके तेरी बाहों में’ गाने में जीतू ने पहली बार कैमरा फेस किया.

ये तो था लक बाय चांस वाला सीन. अब किस्सा सलमान वाली फिल्म में काम करने का. दरअसल, सलमान के भाई सोहेल खान बतौर डायरेक्टर डेब्यू करने जा रहे थे. फिल्म ‘औज़ार’ से. फिल्म में सलमान के अलावा संजय कपूर, शिल्पा शेट्टी और निर्मल पांडे जैसे एक्टर्स भी थे. ‘औज़ार’ में सलमान को एक्शन करना था. सिर्फ ज़मीन पर ही नहीं. बल्कि घोड़े पर चढ़कर भी. उन्हें फिल्म के दौरान घुड़सवारी सिखा रहे थे जीतू वर्मा. जो इस पॉइंट पर प्रोफेशनली हॉर्स राइडिंग सिखा रहे थे. फिल्म में एक राजस्थानी किरदार था. ठाकुर जयसिंह के नाम से. जिसके लिए अब तक किसी एक्टर को साइन नहीं किया गया था. सलमान जीतू के राजस्थानी बैकग्राउंड से अवगत थे. ऐसे ही एक दिन हॉर्स राइडिंग की ट्रेनिंग के दौरान उन्होंने जीतू को अप्रोच किया. कहा कि फिल्म में एक राजस्थानी कैरक्टर है. अच्छा रोल है. जिसे फिल्म में घुड़सवारी भी करनी है. सलमान ने आगे कहा कि किरदार के सारे पैमानों में आप फिट बैठ रहे हैं. तो क्या ये रोल करना चाहेंगे? जीतू ने ज़्यादा नहीं सोचा और सलमान को हां कर दिया.

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“ओए छोरे, तू कुण है रै”.

जीतू मानते हैं कि उन्हें अपने घोड़ों की वजह से ही ये फिल्म मिली. लेकिन वो अपने घोड़ों को एक और फिल्म के लिए क्रेडिट देते हैं. 2006 में एक इंग्लिश फिल्म रिलीज़ हुई थी. जिसका टाइटल था ‘द फॉल’. फिल्म को भारतीय मूल के डायरेक्टर तरसेम सिंह ने बनाया था. ‘द फॉल’ एक हिस्टॉरिकल फिक्शन फिल्म थी. पांच नायकों की. जिनमें से एक भारतीय भी था. इसलिए फिल्म का काफी हिस्सा इंडिया में भी शूट हुआ. पुराने ज़माने की कहानी थी. इसलिए एक्शन सीक्वेंसेज़ में घोड़ों की ज़रूरत थी. जो फिल्म की यूनिट को जीतू ने प्रोवाइड किए. लेकिन समस्या इसके आगे भी थी. इंडियन हीरो वाला किरदार फाइनलाइज़ नहीं हुआ था. एक दिन अचानक ही तरसेम ने जीतू से वो रोल करने को कहा. जीतू उस दौरान एक्टिव तौर पर एक्टिंग करते थे. उन्हें कोई हर्ज़ नहीं था. अपनी हामी भर दी. इस तरह जीतू मानते हैं कि उन्हें अपने करियर की एक और फिल्म अपने घोड़ों की वजह से मिली.

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‘द फॉल’ में घोड़े पर एक्शन करते जीतू.

खैर, ‘औज़ार’ पर काम करने के दौरान ही जीतू को अपनी अगली फिल्म मिल गई. जहां उनकी ज़रूरत एक एक्टर के तौर पर थी. फिल्म थी अक्षय कुमार और सुनील शेट्टी स्टारर ‘सपूत’. जीतू पहले ही ‘औज़ार’ के लिए शूट कर चुके थे. फिर भी वो ‘सपूत’ के बाद ही रिलीज़ हुई. ‘औज़ार’ और ‘सपूत’ के बाद जीतू ने एक्टिंग को एक सीरियस शॉट देने की सोची. लेकिन वो बिना तैयारी के नहीं उतरना चाहते थे. उन्होंने किशोर नमित कपूर का एक्टिंग स्कूल जॉइन किया और अपना कोर्स पूरा किया.


# अब्बास मस्तान को अपना जोजो कैसे मिला?

अब्बास मस्तान. सफेद कपड़े पहनने वाले वो डायरेक्टर भाइयों की जोड़ी जिन्होंने नाइंटीज़ की स्क्रीन को लाल किया. कभी शिल्पा शेट्टी को बिल्डिंग से गिरवाया. तो कभी शाहरुख को चिपकने वाले जूतों से दीवार पर चढ़ा दिया. नाइंटीज़ में अलग ही स्वैग था इनका. उस दशक में इस जोड़ी ने अपने करियर की एक और यादगार फिल्म बनाई. ‘सोल्जर’. उस दौर के राइटर श्याम गोयल पहली बार ‘सोल्जर’ के जरिए अब्बास-मस्तान के साथ कॉलैबोरेट कर रहे थे. श्याम उससे पहले ‘तहलका’ और ‘जीने दो’ जैसी फिल्मों के लिए डायलॉग्स भी लिख चुके थे. पप्पू वर्मा की फिल्म ‘वंश’ के डायलॉग्स भी उन्होंने ही लिखे थे. दरअसल, रिश्ते में श्याम वर्मा ब्रदर्स के जीजा हैं.

‘सोल्जर’ की कहानी लिखने के दौरान एक दिन अब्बास-मस्तान ने उन्हें अपने ऑफिस में बुलाया. कहानी को लेकर एक सजेशन दिया. कि उन्हें एक विलन चाहिए. जो खूंखार न हो. जिससे लड़ने के लिए हीरो को कांच की खिड़कियों से अंदर न घुसना पड़े. ऐसा कोई जो अपनी मस्ती में मस्त रहे. कुछ भी अटपटी हरकतें करता रहे. श्याम उनका इशारा समझ गए. कि उन्हें फिल्म में कॉमिक रिलीफ के लिए एक विलन चाहिए. जब ये सब घट रहा था, उसी दौरान जीतू भी अमेरिका से लौटे थे. और सिर्फ अकेले नहीं लौटे थे. अपने साथ ले आए थे रोलर स्केटिंग का नया शौक. जहां जगह मिलती, वहीं रोलर स्केटिंग शुरू कर देते. अब्बास-मस्तान की बात सुनकर एकाएक श्याम के दिमाग में रोलर स्केटिंग करते जीतू की तस्वीर आई. उन्होंने डायरेक्टर भाइयों को जीतू का नाम सुझाया. कहा कि वो इधर-उधर स्केटिंग करता रहता है. एक बार उसे देखिए. हम उसकी स्केटिंग के साथ कुछ कर सकते हैं.

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जोजो, वो हंसमुख विलन जिसपर कोई निर्दयी ही हाथ उठा सकता है.

अब्बास-मस्तान को बात पसंद आई. सिर्फ बात ही नहीं. बल्कि जीतू और उनकी स्केटिंग भी. फिल्म में उनके नाम पर जोजो का किरदार लिखा गया. अतरंगी-सा दिखने वाला जोजो फिल्म का यादगार पॉइंट बन गया. अब्बास-मस्तान भी जोजो के किरदार से इंप्रेस हुए. इतना कि उन्होंने ‘सोल्जर’ के बाद जीतू के साथ तीन और फिल्मों पर काम किया. तीनों में उनके किरदार का नाम जोजो ही था. ये फिल्में थीं ‘हमराज़’, ‘टार्जन: दी वंडर कार’ और कपिल शर्मा की डेब्यू फिल्म ‘किस किसको प्यार करूं’.


# वो हमला, जिसकी वजह से आंख खोने का खतरा मंडराने लगा

30 मार्च, 2017 की तारीख थी. जीतू अपनी गाड़ी से ट्रैवल कर रहे थे. माउंट अबू टू चित्तौड़गढ़. दिन का समय था. जीतू जिस रास्ते से ट्रैवल कर रहे थे. वहां बीच में जंगल पड़ता था. जहां आमतौर पर गतिविधि कम ही होती थी. जीतू अपने ड्राइवर के बगल वाली फ्रंट सीट पर बैठे थे. अचानक उनकी गाड़ियों पर पत्थर फेंके जाने लगे. कुछ संदिग्ध लोगों ने उनकी गाड़ियों को घेर लिया. और बिना थमे पथराव करने लगे. ड्राइवर ने हालात समझकर गाड़ी भगाई. फिर भी गाड़ी पर बरसने वाले पत्थर कम होने का नाम नहीं ले रहे थे. ऐसा ही एक पत्थर विंडशील्ड तोड़कर जीतू की आंख पर आकर लगा. लगते ही खून बहने लगा.

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हमले के बाद जीतू अपनी आंख तक खो सकते थे.

ड्राइवर किसी तरह जीतू को उस परिस्थिति से बाहर निकाल लाया. उन्हें फौरन हॉस्पिटल ले जाया गया. उनकी एक आंख बुरी तरह घायल हो गई थी. आइब्रो वाला हिस्सा फ्रैक्चर हो गया था. मौके की नज़ाकत समझते हुए उन्हें तुरंत प्रभाव से मुंबई ले जाया गया. जहां सुनील शेट्टी ने उनके लिए पहले ही हॉस्पिटल अरेंज कर दिया था. डॉक्टर्स ने परिजनों को बताया कि जीतू की एक आंख बुरी तरह डैमेज हो गई है. जिस वजह से उन्हें देखने में दिक्कत होगी. जीतू का ट्रीटमेंट करीब तीन साल तक चला. उन्हें अपनी दाईं आंख से दिखना लगभग बंद हो चुका था. ट्रीटमेंट के बाद चोटिल आंख की रोशनी लौटने लगी. लेकिन अभी भी उन्हें उस आंख से साफ नहीं दिखता. डॉक्टर्स के मुताबिक उन्हें थोड़ा और समय लगेगा.


# आज कल कहां हैं Jeetu Verma?

जीतू फिल्मों के लिए अपने घोड़े प्रोवाइड करवाते थे. ‘मणिकर्णिका’ और ‘रंगून’ जैसी फिल्मों में भी उनके घोड़े इस्तेमाल हुए. इसके साथ ही वो एक्टर्स को एक्शन और हॉर्स राइडिंग भी सिखाते. चूंकि वो ज़्यादातर एक्शन ही करते थे. इसलिए डॉक्टर्स ने हमले के बाद उन्हें एक्शन सीन्स से दूर रहने की हिदायत दी. अब उनकी आंख बेहतर होने लगी है. इसलिए वो एक्टिंग असाइनमेंट्स पर फिर से फोकस कर रहे हैं. लंबे समय के बाद उन्होंने ‘मिर्ज़ापुर सीज़न 2’ में काम किया. इसके अलावा उन्होंने सुनील शेट्टी और गोविंदा के साथ ‘अफरा तफरी’ नाम की फिल्म में भी काम किया. जिसे जल्द ही रिलीज़ किया जा सकता है.

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जीतू ने ‘बाहुबली’ के लिए तमन्ना भाटिया को भी हॉर्स राइडिंग सिखाई थी.

अपने फ्यूचर प्लांस पूछे जाने पर जीतू ने एक इंटरव्यू में जवाब दिया कि वो डायरेक्ट और प्रड्यूस करना चाहेंगे. ‘बेताब’, ‘अर्जुन’ और ‘अंजाम’ बना चुके राहुल रवैल को जीतू ने असिस्ट भी किया हुआ है.


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