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किसानों के लिए यूनीक आईडी; इसका फायदा किसान को होगा या सरकार और कंपनियों को?

मोदी सरकार ने किसानों के लिए यूनिक आईडी बनाने का काम शुरू कर दिया है. ये ID 12 अंकों की होगी. अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के मुताबिक, इसकी जानकारी केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दी है. 8 करोड़ किसानों की डिटेल जुटाई जा रही है.

किसानों के लिए लॉन्च होने वाली यूनिक ID क्या है? क्यों लाई जा रही है? पहले ही आधार जैसी ID है तो नई यूनिक ID की जरूरत क्यों पड़ी? इसे लेकर क्या आशंकाएं उठ रही हैं. इन सब सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करते हैं.

किसानों के लिए यूनीक आईडी क्या है?

किसानों की अलग-अलग सूची सरकार के पास है. जैसे पीएम-किसान का डेटा बेस है. इसी तरह Soil Health Card, लैंड रिकॉर्ड, क्रॉप लोन, इंश्योरेंस और अन्य डेटा बेस भी सरकार के पास है. लेकिन वो इसे लिंक नहीं कर पा रही है. यूनीक आईडी के जरिए सरकार चाहती है कि हर किसान की एक प्रोफाइल बन जाए, जिससे आईडी नंबर डालते ही एक ही जगह पर सरकार को सारी जानकारी मिल जाए.

Kisan Samman Nidhi Pm Modi
किसान सम्मान निधि योजना  फोटो- Twitter

उदाहरण के लिए अगर किसी किसान के पास यूनिक आईडी है, उसकी सारी जानकारी एक डेटा बेस से जुड़ी है तो सरकार के लिए ये पता लगाना आसान होगा कि किसान अपने खेत में क्या बो रहा है, उसके लिए कितना इंश्योरेंस प्रीमियम दे रहा है, उसके लिए कितना लोन लिया है. ये भी पता चलेगा कि किसान ने कितनी खाद खरीदी और उस पर कितनी सब्सिडी ली.

इस सबके मद्देनजर सरकार चाहती है कि किसानों के डेटा को एकत्र करके एक प्रोफाइल बना दी जाए. जैसे कंपनियां विज्ञापन के लिए लोगों के प्रोफाइल बनाती हैं. उसी तरह से डेटा बेस बनने के बाद सरकार और कंपनियों के लिए ये जानना आसान हो जाएगा कि फलां किसान क्या उगा रहा है तो उसे किस तरह के चीजों की जरूरत है.

यूनीक आईडी क्यों लाई जा रही है? 

ये जानने के लिए हमने बात की इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फाइनेंस के प्रोफेसर अमन अग्रवाल से. उन्होंने दी लल्लनटॉप से बातचीत में बताया,

उदाहरण से समझिए. किसान क्रेडिट कार्ड को ही लें तो देखा जा रहा है कि किसान क्रेडिट कार्ड का गलत इस्तेमाल हो रहा है. उसी तरह ‘डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर’ जो सरकार किसान को देना चाहती है या बाकी जो लाभ सरकार किसानों को देना चाहती है, ये क्लियर नहीं हो पाता है कि जरूरतमंद किसान को मिल रहा है कि नहीं. क्योंकि आज जो भी खुद को किसान के रूप में क्लेम करता है सरकार उसे किसानों को मिलने वाले लाभ देना शुरू कर देती है.लेकिन सरकार मापदंड के हिसाब से उन चीजों को कर नहीं पा रही है. 

यूनीक आईडी आने से किसानों को बहुत मदद मिलने वाली है. सिर्फ क्रेडिट सुविधा में ही नहीं बल्कि मंडियों में भी. आने वाले समय में अगर रिच किसानों पर टैक्स लगता है तो इसका फायदा उन किसानों को मिलेगा जो रिच नहीं हैं. यूनीक आईडी से सरकारी स्कीम को लागू करने में फायदा मिलेगा. इससे ये भी पता चलेगा कि कितने किसान हैं, किस किसान के पास कितनी जमीन है और उसका इस्तेमाल किस चीज के लिए हो रहा है. खेती के लिए हो रहा है या किसी और चीज के लिए इस्तेमाल हो रहा है.

आधार है फिर यूनीक आईडी की जरूरत क्यों?

कृषि से जुड़े एक एक्सपर्ट ने नाम न छापने की शर्त पर दी लल्लनटॉप को बताया कि आधार के लिए बने कानून के मुताबिक कोई इसे पब्लिकली शेयर नहीं कर सकता है. उन्होंने कहा कि हालांकि लोग करते हैं, ये अलग बात है. ये भी सच है कि यूनीक आईडी से आधार लिंक होगा. क्योंकि बाकी डिटेल लिंक हो रही है. लेकिन सरकार सीधे आधार से सारे डेटा बेस को लिंक नहीं कर रही है, उसकी जगह यूनिक आईडी ला रही है. सरकार ने माइक्रोसॉफ्ट और अमेजन जैसी कंपनियों से करार किया है. अगर सरकार किसी किसान के आधार का डेटा किसी कंपनी को देती है तो उसे बहुत कुछ पता चल जाएगा. लेकिन सरकार अगर किसी कंपनी को किसी किसान की खेती से जुड़ी जानकारी देना चाहती है तो ऐसे में यूनीक आईडी देगी. इसके आधार पर जो प्रोफाइल बनेगी वो किसान की खेती किसानी से जुड़ी होगी. किसानों की प्राइवेसी के प्वाइंट ऑफ व्यू से देखें तो ये अच्छा है.

Sugarcane Sap Up Farmer
(सांकेतिक-पीटीआई)

इसी महीने की शुरुआत में केंद्र सरकार ने मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन का आयोजन किया था. इस दौरान किसानों को ऐसी आईडी जारी करने और डेटाबेस बनाने की योजना पर चर्चा की गई थी. 6 सितंबर को केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा था कि उनके मंत्रालय ने 5.5 करोड़ किसानों का डेटाबेस बनाया है. इस दिसंबर तक इसे बढ़ाकर 8 करोड़ कर दिया जाएगा.

वहीं मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव ने बताया,

हमने आंतरिक रूप से यूनिक फार्मर आईडी बनाना शुरू कर दिया है. एक बार जब हम 8 करोड़ किसानों के डेटाबेस के साथ तैयार हो जाएंगे, तो हम इसे लॉन्च करेंगे. अब तक मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और आंध्र प्रदेश सहित 11 राज्यों के लिए डेटाबेस तैयार किया गया है. तेलंगाना, केरल और पंजाब सहित बाकी राज्यों को आने वाले महीनों में कवर किया जाएगा.

किस तरह के किसानों की यूनीक आईडी बनेगी?

एक्सपर्ट ने हमें बताया कि सरकार ने इसी साल 1 जून 2021 को एक पेपर सार्वजनिक किया था. उस पर फीडबैक मांगा गया था. एक्सपर्ट के मुताबिक, उस पेपर में साफ साफ लिखा है कि ये लैंड रिकॉर्ड पर आधारित होगा. अगर ये सिर्फ उन्हीं किसानों के नाम पर बनेगा जिनके नाम जमीन है तो बहुत किसान छूट जाएंगे. ज्यादातर घरों में पुरुषों के नाम पर ही जमीन है, जबकि महिलाएं भी खेती के काम में लगी हैं.

आंकड़े बताते हैं कि 70 प्रतिशत खेतों में काम करने वाली महिलाएं ही हैं. लैंड रिकॉर्ड के आधार पर यूनीक आईडी बनने से महिला किसानों के बाहर होने का खतरा है. बटाई पर खेती करने वाले को सरकार की योजनाओं का लाभ नहीं मिलेगा. उसी तरह पशु पालन से जुड़े किसानों को लाभ नहीं मिलेगा. पशुपालक, मछुआरे या वनउपज में लगे लोगों को किसान मानना चाहिए. लेकिन अगर यही रहा तो बहुत सारे लोग किसान होने की श्रेणी से बाहर हो जाएंगे.

लॉकडाउन में क्रय केंद्रों तक किसानों को अपनी फसल पहुंचाने में किन दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, खुद किसानों ने बताया. (फोटो-पीटीआई)
सांकेतिक फोटो

हालांकि प्रोफेसर अमन अग्रवाल का कुछ और कहना है. उनका मानना है कि हो सकता है पहले चरण में सरकार लैंड के बेसिस पर किसानों को यूनीक आईडी दे रही है. अगले चरण में उन किसानों को भी शामिल किया जाए जो दूसरों के खेतो में काम करते हैं यानी जिनके पास जमीनें नहीं है. प्रोफेसर अमन के मुताबिक, अगर सरकार ने इस बारे में सोचा नहीं है तो उसे सोचना चाहिए. और अगर ऐसी प्लानिंग है तो बहुत सही है.

इसे लेकर क्या आशंकाएं उठ रही हैं?

कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा का कहना है,

यूनीक आईडी को जब मैं एग्रीटेक स्टार्टअप के साथ मिलाकर देखता हूं तो एक चीज बड़ी स्पष्ट हो जाती है कि जब कंपनियों के पास किसान का डेटा आ जाएगा तो कंपनियां अपनी जरूरत के हिसाब से किसानों को वही एजुकेशन या अवेयरनेस देंगी जो वो चाहती हैं. उन्हें वही माल सप्लाई करेंगी. अभी उनके पास किसानों का कंक्रीट डेटा नहीं है. डेटा आने के बाद कंपनियां आसानी से किसानों तक पहुंच सकती हैं.

कृषि विशेषज्ञ ने अपने अनुभव के आधार पर बताया कि लैंड रिकॉर्ड का पहला डिजिटलाइजेशन कर्नाटक में हुआ था. भूमि प्रोग्राम के जरिए. उन्होंने बताया,

“मैं वहां गया था. उस समय कहा गया था कि इससे करप्शन रुक जाएगा. और भी कई तरह के दावे किए गए थे. लेकिन लैंड का डिजिटलाइजेशन होने के बाद कॉर्पोरेट के लिए या बिजनेस के लिए कौन सी जमीन लेनी है, उनके लिए रास्ता आसान हो गया. करप्शन कंट्रोल नहीं हुआ है. कंपनियों के लिए डेटा आसानी से उपलब्ध हो गया. यूनीक आईडी से ये एक चीज भी होने जा रही है.”

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सांकेतिक फोटो.

डेटा किसान से जमा कर रहे हैं और वो इसका मतलब नहीं समझेगा. देवेंद्र शर्मा ने कहा,

लैंड रिकॉर्ड के डेटा में बहुत खामिया हैं, इसलिए पीएम किसान निधि स्कीम का 6000 रुपया नहीं मिल पाता. 11 स्टेट का डेटा मिल चुका है. ये डेटा सरकार के पास आएगा तो उसमें एक्सक्लूजन हो जाएगा. सवाल ये भी है कि जो डेटा ठीक नहीं होगा उसका कैसे यूज करेंगे.

हालांकि प्रोफेसर अमन अग्रवाल  का कहना है,

जहां तक प्राइवेट कंपनियों के रोल की बात है तो मेरे विचार में सरकार की ये मंशा नहीं है. ये जरूर है कि ऐसी चीजें आने पर उस सेक्टर के प्लेयर को इसका फायदा मिलता है. जैसे ट्रैक्टर बेचने वाली कंपनी है तो उसे पता लगाना आसान होगा कि उसे किन किसानों को मार्केटिंग के लिए टारगेट करना है. उसी तरह इस सेक्टर से जुड़ी बाकी कंपनियों के लिए सहूलियत हो सकती है.

प्रोफेसर अमन अग्रवाल ने आगे कहा,

सरकार हर साल लोन माफ करती है.कर्जमाफी में ज्यादातर बड़े किसान होते हैं. उनके यहां छोटे किसान खेतों में काम करते हैं. बड़े किसान लोन लेते हैं. साथ ही कृषि से भी आमदनी कर रहे हैं. यूनीक आईडी से ये निकलकर आएगा कि किस किसान के पास कितनी जमीन है. कितनी बड़ी जमीन किसके पास है. कौन से किसानों के लोन माफ हो रहे हैं. ये सब आसानी से पता चलेगा. साथ ही ये भी पता चलेगा कि सही किसानों तक लाभ पहुंच रहा है कि नहीं.

अमन अग्रवाल की मानें तो यूनिक आईडी से एक चीज और निकलकर आएगी. वो ये कि सरकार को खाद, बीज, फर्टिलाइज के मामले में स्कीमों का लाभ देने में आसानी होगी.

Farm India
सांकेतिक फोटो- पिक्साबे

हालांकि एक एक्सपर्ट ने दूसरा पहलू रखा. उन्होंने नाम ना छापने की शर्त पर कहा,

सरकार के प्वाइंट ऑफ व्यू से देखें तो खाद सब्सिडी बड़ा अमाउंट है, जिसे वो कम करना चाहती है. LPG की तरह. सिलेंडर वाली कहानी सरकार खाद सब्सिडी के साथ दोहराना चाहती है. एक तरह से पूरी तरह सब्सिडी खत्म करना चाहती है. लैंड रिकॉर्ड और बाकी डेटा बेस को लिंक करने के बाद सरकार को ये पता लगाना आसान हो जाएगा कि किसी किसान के खाते में कितनी खाद की जरूरत होगी. उतनी ही सब्सिडी मिलेगी. किसान अगर ज्यादा खाद डालेगा तो उसे बिना सब्सिडी के खाद लेनी पड़ेगी. कंपनियों को ये फायदा होगा कि उनके पास एक डेटा होगा, तो उनके लिए कस्टमर प्रोफाइल बन रहा है.

इस एक्सपर्ट की मानें तो यूनीक आईडी बनने से किसानों को मार्केटिंग के लिहाज से टारगेट करना आसान हो जाएगा.


प्रश्न प्रदेश: मुजफ्फरनगर किसान महापंचायत से पहले योगी के इस दांव से टिकैत का खेल खराब होगा?

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