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झांसी का लड़का, जिससे दुनिया का सबसे क्रूर आदमी डरता था

घनी रात थी. चांद रोशनी देने के यकीन से चमक रहा था. नीचे हरे मैदान में 17-18 साल का एक लड़का हॉकी खेल रहा था. सब देख खूब हंसे. ‘गर्लफ्रेंड से मिल आए हो’ जैसे सवालों से चिढ़ाया भी. पर सैनिक ध्यान सिंह बेफिक्र होकर हॉकी खेलता रहा. चेले की लगन देख सूबेदार बाले तिवारी खुश होकर बोले,

‘चांद की रोशनी में जैसे मेहनत कर रहे हो. एक दिन हॉकी का चांद बनकर चमकोगे. मैं आज से तुम्हें ध्यान सिंह नहीं ‘ध्यानचंद’ कहकर पुकारूंगा.’

यहीं से शुरू होती है हॉकी के उस खिलाड़ी की कहानी, जिस बाद में दुनिया ने जादूगर नाम दिया.

29 अगस्त, 1905 को ध्यानचंद पैदा हुए और 3 दिसंबर 1979 को इंतकाल हो गया.  पढ़िए ध्यानचंद की जिंदगी के कुछ रोचक किस्से…

1. 16 साल की उम्र में सेना में भर्ती हुए ध्यानचंद

ध्यानचंद के पिता सेना में थे. ट्रांसफर होता रहता था. पढ़ाई डिस्टर्ब होना लाजिमी था. छठी क्लास तक ही पढ़ पाए. 1922 में 16 की कच्ची उम्र में सिपाही की पोस्ट पर सेना में भर्ती हो गए. रेजीमेंट का नाम था ‘फर्स्ट ब्राह्मण रेजीमेंट’. दिलचस्प है कि सेना में भर्ती होने से पहले ध्यानचंद को न हॉकी खेलना आता था और न ही उनकी रुचि थी. सेना में लोगों को खेलते देखा तो मन में ख्वाहिश जगी. सिखाने का जिम्मा लिया सूबेदार बाले तिवारी ने. बारीकियां सिखाईं. मेहनत करवाई. ध्यान सिंह भी मेहनत से जुट गए और फिर एक दिन देश के बेस्ट हॉकी खिलाड़ी बन गए.

2. पहला विदेशी दौरा

साल 1926. सेना चाहती थी कि हॉकी टीम न्यूजीलैंड जाए. खिलाड़ियों की तलाश शुरू हुई. ध्यानचंद की भी ख्वाहिश थी, पर किसी से कुछ कहने के बजाय प्रैक्टिस में जुटे रहे. मन को समझाया कि अगर काबिल हूं, तो मौका मिल ही जाएगा. फिर एक दिन कमांडिग ऑफिसर ने बुलाया और कहा,

‘जवान, तुम हॉकी खेलने के लिए न्यूज़ीलैंड जा रहे हो.’

ध्यानचंद को खुशी इतनी थी कि मुंह से एक शब्द नहीं निकला. सैल्यूट ठोका और बाहर आ गए. यह पहला मौका था जब भारत की हॉकी टीम विदेश दौरे पर गई. न्यूजीलैंड में टीम ने कुल 21 मैच खेले. 18 में जीत का झंडा गाड़ा. भारत ने कुल 192 गोल दागे, जिनमें 100 गोल सिर्फ ध्यानचंद के थे. पूरी धमक के साथ टीम इंडिया ने हॉकी के मैदान पर दस्तक दी थी.

3. ध्यानचंद के स्वागत में 24 घंटे रुका जहाजों का ट्रैफिक

1928 में ओलंपिक में गोल्ड लेकर भारतीय हॉकी टीम बंबई लौटी. स्वागत में बंबई के डॉकयार्ड पर मालवाहक जहाजों को समुद्र में ही रोक दिया गया था. जहाजों की आवाजाही भी 24 घंटे नहीं हो पाई थी. हजारों लोगों की भीड़ जुटी. इसी साल ध्यानचंद का तबादला नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस वजीरिस्तान (अब पाकिस्तान) में कर दिया गया, जहां हाकी खेलना मुश्किल था. पहाड़ी इलाका था. मैदान था नहीं. इस वजह से 1932 ओलंपिक में ध्यानचंद के सेलेक्शन को लेकर भी दिक्कतें आईं.

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4. कर्नल से बोले ध्यानचंद, अब किसी से नहीं हारेंगे

21 की उम्र में साल 1926 में न्यूजीलैंड टीम को हराने वाली टीम में ध्यानचंद शरीक हो चुके थे. ब्रिटिश सैनिक अधिकारी ध्यानचंद का ओहदा बढ़ाकर उन्हें लांस-नायक बना देते हैं. वजह वाजिब थी. न्यूजीलैंड में भारत 21 में से 18 मैच जीता था. भारतीय हॉकी टीम न्यूजीलैंड में सिर्फ एक मैच हारी थी.

हॉकी टीम के भारत लौटने पर जब कर्नल जॉर्ज ध्यानचंद से पूछते हैं कि भारत की टीम एक मैच क्यों हार गई तो ध्यानचंद का जबाब होता है कि उन्हें लगा कि उनके पीछे बाकी 10 खिलाड़ी भी हैं. अगला सवाल, तो आगे क्या होगा. जवाब आता है कि किसी से हारेंगे नहीं. इस प्रदर्शन और जवाब के बाद ध्यानचंद लांस नायक बना दिए गए.

5. उधार लेकर ओलंपिक पहुंची हॉकी टीम

साल 1928. एम्सटर्डम में ओलंपिक होना था. भारत की पहली राष्ट्रीय टीम चुनने के लिए खिलाड़ी तलाशे गए. देश की कई टीमों के मैच करवाए गए. ध्यानचंद संयुक्त प्रांत की ओर से खेले और चुने गए. पर दिक्कत आई रुपयों की. हॉकी संघ के पास सिर्फ इत्ते ही रुपये जुट पाए, जिससे 11 खिलाड़ी ही एम्सटर्डम जा सकते थे. बाकी 2 खिलाड़ियों को नहीं भेजा जा सकता था. तब मदद के लिए आगे आया बंगाल हॉकी संघ.

एम्सटर्डम ओलंपिक में साड्डी टीम ने हिस्ट्री बना दी. एक के बाद एक मैच जीता. फिर आया खिताबी मैच. तारीख 26 मई 1928. परदेसी माहौल की आदत नहीं थी. ध्यानचंद समेत कई खिलाड़ियों की तबीयत खराब थी. लेकिन पस्त सिर्फ तबीयत थी, हौसला नहीं. हॉलैंड, जो आज की हॉकी का सूरमा है, फाइनल मैच में हमसे 3-0 से हारा था. तीनों गोल ध्यानचंद ने किए थे. जो टीम उधार लेकर ओलंपिक खेलने आई थी, वो वर्ल्ड चैम्पियन बन चुकी थी.

6. जब पहली बार किसी ने उसे ‘जादूगर’ कहा

इसी ओलंपिक के बाद पहली बार ध्यानचंद के नाम के साथ ‘जादूगर’ शब्द जोड़ा गया. विदेशी अखबारों ने मैच में ‘जादू, जादूगर, जादू की छड़ी’ जैसे अल्फाज इस्तेमाल किए. कहते तो ये भी हैं कि किसी अंग्रेज उच्च अधिकारी की बीवी ने ध्यानचंद से हॉकी के बजाय बंद छतरी से खेलने का चैलेंज दिया था, जिसे ध्यानचंद ने मुस्कुराते हुए पूरा कर दिया था. चूंकि भारत उस वक्त गुलाम था, इस वजह से हॉकी के मैच यूनियन जैक के झंडे तले खेलने पड़ते थे.

7. भाई के साथ ओलंपिक में फहराई विजय पताका

ध्यानचंद से प्रभावित होकर उनके भाई रूप सिंह भी हॉकी खेलने लगे. मेहनत की. अच्छे खिलाड़ी बने. फिर वो मौका आया, जब दोनों भाई साथ में ओलंपिक खेले. 1932 का ओलंपिक लॉस एंजेल्स में होना था. टीम चुनी जानी थी. सेना की तरफ से ध्यानचंद और संयुक्त प्रांत की ओर से रूप सिंह भारतीय हॉकी टीम के लिए चुने गए. दिक्कत इस बार भी रुपयों की हुई. मदद की पंजाब नेशनल बैंक ने.

पर जित्ती रकम बैंक ने दी, उससे भला नहीं हो पा रहा था. फिर बंगाल हॉकी संघ ने मदद का हाथ बढ़ाया. इस ओलंपिक में भी ताबड़तोड़ गोल करते हुए अपनी टीम जीती. फाइनल मैच 14 अगस्त 1932 को अमेरिका से था. 1 के मुकाबले 24 गोल दागकर हमने अमेरिकियों की वॉट लगा दी. भारत एक बार फिर विश्व विजेता बन चुका था.

8. ध्यानचंद से विदेशी महिला ने कहा, ‘मे आई किस यू?’

अब तक इंडियन हॉकी टीम का हर तरफ भौकाल सेट हो गया था. जर्मनी ने इंडिया को मैसेज भिजवाया कि अगर आपकी टीम हमारे यहां आएगी तो खर्चा हम उठाएंगे. फिर इंडियन टीम गई, कई मैच खेले और आखिरी मैच में बर्लिन-11 को 4 गोलों से हराया.

अब तक ध्यानचंद के दीवाने विदेशों में भी बहुत हो गए थे. इससे जुड़ा एक मजेदार किस्सा है. चेकोस्लोवाकिया में ध्यानचंद के खेल से इम्प्रेस होकर एक युवती उनके पास गई और बोली,

‘तुम किसी एजेंल की तरह लगते हो, क्या मैं तुम्हें किस कर सकती हूं?’

ये सुनते ध्यानचंद सकपका गए और बोले,

‘सॉरी मैं शादीशुदा हूं. मुझे माफ करें.’

9. सूरज की रोशनी से जली ओलंपिक मशाल

1936 के ओलंपिक जर्मनी में होने थे. वहां हिटलर का शासन था. टीम की पहली लिस्ट में ध्यानचंद का नाम ही नहीं था. खूब बवाल हुआ. बाद में टीम की कप्तानी ध्यानचंद को मिली. बर्लिन की दीवारों पर हर तरफ नाजी पार्टी का निशान स्वास्तिक अंकित था. हिटलर की जय जयकार थी. इस ओलंपिक के इंतजाम बेहद खर्चीले थे. ओलंपिक मशाल पहली बार सूरज की किरणों से जलाई गई. ये पहले ओलंपिक खेल थे, जिन्हें टीवी पर दिखाया गया. टूर्नामेंट में इंडिया का प्रदर्शन शानदार रहा.

10. हिटलर की टीम के खिलाफ घायल होकर खेले ध्यानचंद

1936 ओलंपिक में भारत का मुकाबला जर्मनी से था. हिटलर के देश की टीम जर्मनी. मैच होना था 14 अगस्त को. बारिश हुई तो मैच 15 अगस्त तक के लिए टाल दिया गया. 15 अगस्त को मैच शुरू हुआ. जर्मनी खिलाड़ियों ने आक्रामक रुख अपनाया. ध्यानचंद के दांत में चोट लगी. कुछ वक्त के लिए मैदान छोड़ना पड़ा. चोटिल हालत में ध्यानचंद मैदान में लौटे. टीम के साथियों को समझाया. बदले की भावना से नहीं, बढ़िया खेल खेलो. ध्यानचंद ने वापसी के साथ ताबड़तोड़ गोल दागने शुरू किया.

11. मैदान छोड़ भागा हिटलर

फाइनल मुकाबला हुआ भारत और जर्मनी के बीच. शुरूआती मिनटों में ही ध्यानचंद की टीम ने जर्मनी की ऐसी धुलाई की कि मैच देख रहा हिटलर स्टेडियम छोड़कर चला गया. भारत ने जर्मनी को 1 के मुकाबले 8 गोल से शिकस्त दी.

12. ध्यानचंद ने ठुकराया हिटलर का ऑफर

ध्यानचंद के चर्चे हर तरफ थे. जर्मनी तानाशाह भी हिटलर के किस्सों से अंजान नहीं था. हालांकि भारत और जर्मनी मैच में हिटलर ज्यादा देर तक मैदान पर नहीं रहा. पर ओलंपिक समापन 16 अगस्त को होना था. हिटलर से ध्यानचंद का सामना होना था. भारतीय हॉकी टीम गोल्ड मेडल पहनने वाली थी. हिटलर जब ध्यानचंद से मिला तो उनसे इत्ता इम्प्रेस हुआ कि उन्हें अपनी सेना में कर्नल बनने का ऑफर दिया. सहज भाव से ध्यानचंद ने ये ऑफर ठुकरा दिया. देश लौटे ध्यानचंद और हॉकी टीम का दमदार स्वागत हुआ.

ध्यानचंद कैसा खेलते थे इस बारे में लोग बताते हैं कि गेंद उनकी हॉकी स्टिक से चिपक सी जाती थी. लोगों को इस पर शक होता था. कई बार ध्यानचंद की हॉकी तोड़कर भी देखी गई. उन्हें नई हॉकी थमाई गई, फिर भी वह वैसा ही चमत्कारिक खेले. 2 दिसंबर 1979 को जब उन्होंने दुनिया से विदा ली तो उनके पार्थिव शरीर पर दो हॉकी स्टिक क्रॉस बनाकर रखी गई. उनके जाने के बाद भारतीय हॉकी का गोल्डन पीरियड धुंधलाता चला गया. पर ध्यानचंद ने मैदान पर जो ‘जादू’ दिखाया, वो इतिहास में दर्ज हो चुका है.


 

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