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खुशवंत सिंह के मैड किस्सेः जब उन्होंने धर्मेंद्र को पुलिस से बचाया था

सरदार खुशवंत सिंह. तमाम जिंदगी कागज कारे करता रहा. मर गया है तो क्या हुआ. उसका लिखा तो अभी भी छप रहा है. तो जब तक कोई पढ़ता रहेगा, खुशवंत का नाम लिया जाता रहेगा. सब जतन भी तो इसी का है.
खुशवंत टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप की एक मैगजीन के एडिटर थे. इलस्ट्रेटेड वीकली. इस मैगजीन का एक कल्ट था. लोग फाइल बनाकर रखते थे. इसमें छपना गुरूर में इजाफा करता था. दफ्तर मुंबई में था. तो सरदार जी को सिनेमा वालों की सोहबत का सुख मिला.
और जब उसने बनैले अंदाज में जिंदगी की किताब लिखी, तो इस दुनिया को भी लपेटे में ले लिया. धर्मेंद्र, मीना कुमारी, देवयानी चौबल, दिलीप कुमार, लता मंगेशकर, नरगिस और जौहर समेत कई किस्से सुनाए.
आप भी पढ़िए. ये हिस्से. किताब का नाम सच, प्यार और थोड़ी सी शरारत (love truth and little malice का अनुवाद) इसे छापा है राजकमल प्रकाशन ने. इसमें खुशवंत लिखते हैंः

एक लोकप्रिय साप्ताहिक का सम्पादक होने के कारण, फिल्म-उद्योग में मेरी बड़ी पूछ थी. मुझे फिल्म देखने जाने का खास शौक न पहले था, न अब है. मैंने जो थोड़ी-बहुत हिन्दी की फिल्में देखी हैं उनसे अभिनेताओं, निर्देशकों, प्रोड्यूसर्स, संगीतकारों या प्लेबैक सिंगर्स के बारे में मेरे मन में कोई सम्मान-भावना पैदा नहीं हुई. मेरे कुछ लाहौर के मित्रों ने बड़ी सफलता हासिल की थी. बलराज साहनी, उमा कश्यप (कामिनी कौशल) और देवानंद बड़े ऊंचे दर्जे के अभिनेता थे. चेतन आनन्द को कई फिल्मों के फ्लॉप होने का श्रेय प्राप्त था. बड़ी संख्या में नए अभिनेता, निर्देशक और गायक सामने आ गए थे. मैंने उनके चित्र फिल्मफेयर और स्टारडस्ट जैसी फिल्मी पत्रिकाओं में देखे थे.

फिल्म-जगत के लोगों में मेरी दिलचस्पी में तेजी से बढ़ोतरी देवयानी चौबल की वजह से हुई. उसकी बड़ी बहन नलिनी ने मेरे साथ लन्दन में थोड़े-से समय तक काम किया था. मैंने फिल्म-स्टारों की व्यक्तिगत जिन्दगी पर देवयानी के पाजीपन से लिखे हुए लेख पढ़े थे. वह इन्हें एक खास तरह की हिन्दुस्तानी इंग्लिश (हिंग्लिश) में लिखती थी जिसे पढ़ने में मुझे मजा आता था. हमारी पहली मुलाकात एक लंच पार्टी में हुई और हमें लगा कि हमें एक-दूसरे के लिए बनाया गया है. वह बड़ी कद-काठी की औरत थी. मुझसे एकाध इंच लम्बी और काफी भारी-भरकम. इसके बावजूद वह आकर्षक थी. उसकी काली पलकें शमशीरों की तरह ऊपर घूमी हुई थीं. उसकी आवाज भारी और मर्दाना थी और वह अदभुत नकल उतारती थी. वह फिल्म स्टारों के बारे में जो कुछ लिखती थी उसे लेकर अक्सर मुसीबत खड़ी होती थी.

एक बार देवयानी ने धर्मेन्द्र का एक खाका खींचा. उस समय वह फिल्मी दुनिया में चोटी पर था. उसने उसका चित्रण एक ऐसे विजेता घोड़े के रूप में किया जो हर रोज तीन-चार औरतों को कृतार्थ कर सकता था. धर्मेन्द्र की एक पत्नी और बच्चे थे. साथ ही एक रखैल थी – हेमामालिनी जो बाद में उसकी दूसरी बीवी और दो बच्चों की मां बनी. देवयानी ने कहा कि इन दोनों के अलावा, यदि उसके साथ काम करने वाली कोई अभिनेत्री सेक्स-सम्बन्ध की इच्छा प्रकट करती थी तो धर्मेन्द्र उसे खुशी-खुशी अनुगृहीत कर देता था. धर्मेन्द्र आगबबूला हो गया. उसने रेसकोर्स के आसपास कहीं देवयानी का रास्ता रोका. देवयानी ने भागने की कोशिश की पर साड़ी और मुटापे के कारण वह बहुत दूर नहीं पहुंच पाई. मुझे ठीक से पता नहीं है कि धर्मेन्द्र ने उसकी पिटाई की या नहीं, पर उसने धर्मेन्द्र के खिलाफ हमले और मारपीट की रपट दर्ज कराई.

अगले दिन इस घटना की रिपोर्ट अखबारों ने अपने मुखपृष्ठ पर छापी. देवयानी के लिए अपने स्नेह के बावजूद, मैंने अपने कॉलम में लिखा कि अगर मैं धर्मेन्द्र की जगह होता तो मैंने भी उसके साथ ठीक वैसा ही किया होता जैसा धर्मेन्द्र ने किया. पुलिस ने देवयानी की रपट पर ध्यान नहीं दिया. धर्मेन्द्र मेरे पास उसे पुलिस केस से बचाने के लिए धन्यवाद देने आया.

कुछ महीनों के बाद देवयानी एक और लफड़े में फंसी. इस बार मामला ऐसे अभिनेता का था जिसका भाव तेजी से गिर रहा था. देवयानी ने उसके सेक्स-सम्बन्धों के किस्सों के अलावा, उसके अभिनय-कौशल की भी निन्दा की. इत्तफाक से वह जूहू के सन-एंड-सैंड्स होटल में फिल्म-जगत की एक पार्टी में मौजूद थी. मेहमानों के साथ गपशप करने के बाद, वह समुद्र तट की तरफ निकली एक मुंडेर पर बैठी हुई समुद्र की तरफ टकटकी लगाए थी. उस अभिनेता के दो बेटों की नजर उस पर गई. वे दोनों नशे में धुत थे. उनके आने का उसे पता भी नहीं चला. ‘यू ब्लडीविच, हमारे पिता के खिलाफ इतनी बेहूदी बातें लिखने की तुमने हिम्मत कैसे की ?’ – वे चिल्लाए, ‘अब यह ले, उनमें से एक ने बोतल की बियर उसके सिर पर उडेलते हुए कहा. वह मदद के लिए चिल्लाई, ‘बचाओ !’ किसी मेहमान ने उसे बचाने की शराफत दिखाने की जरूरत नहीं समझी. उन्हें उसे परेशान देखकर आनन्द आ रहा था. उन लड़कों ने उसके सिर पर एक बियर की बोतल और खाली कर दी और दो-टूक शब्दों में उसे समझा दिया कि अगर उसने दुबारा उस किस्म की कोई बात लिखी तो वे उसकी क्या दुर्गत बनाएंगे. बड़ी मुश्किल से देवयानी ने वहां से छुटकारा पाया और पुलिस स्टेशन जाकर रपट दर्ज करा दी.

अगले दिन सुबह वह इस भयावह अनुभव को सुनाने मेरे दफ्तर आई. उसके गालों पर आंसू बह रहे थे. पर मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि उसे जिस तरह की धमकियां दी गई हैं, उनसे वह सचमुच परेशान है या वह उनके पूरा होने की आस लगाए बैठी है. ‘तुम्हें मालूम है उन लोगों ने क्या कहा ? उन्होंने कहा कि हम तब तक तुम्हारी चु** करेंगे जब तक तुम्हारे नील न पड़ जाएं, हम तब तक तुम्हारे साथ लौंडेबाजी करेंगे जब तक तुम्हारा थुलथुला पिछाड़ा जख्मी न हो जाए.’ वह आंसू बहा-बहाकर उनके शब्दों को दोहरा रही थी और साथ में वे भद्दे इशारे भी कर रही थी जो उन लड़कों ने किए थे, जैसे वह उस अनुभव का मजा ले रही हो.

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देवयानी मुझे ‘सत्यम, शिवम, सुन्दरम्’ के आरम्भिक दृश्य दिखाने के लिए राजकपूर के प्राइवेट सिनेमा में ले गई. मैंने अपने साथ उस सिंधी परिवार को भी ले लिया, जो मेरे ऊपर की मंजिल में रहता था. शीला, उसकी बेटी ज्योति और उनकी नौकरानी फातिमा, सब उस महान अभिनेता से मिलने के लिए बहुत लालायित थे. ज़ीनत अमान भी मौजूद थी. मैं राजकपूर और ज़ीनत के बीच में बैठा था. देवयानी मेरे मेहमानों के साथ हमारे पीछे वाली लाइन में बैठी थी.

हमने ज़ीनत को गांव के तालाब से बाहर निकलते हुए देखा. उसकी भीगी हुई साड़ी उसके बदन से चिपक गई थी और उसके बड़े सुडौल वक्ष साफ दिखाई दे रहे थे. राज ने बड़े उत्साह से मुझसे कहा, ‘मैं तो वक्षस्थल का प्रेमी आदमी हूं. क्या तुम नहीं हो.’ मैंने सहमति जाहिर की कि सुडौल वक्षस्थल की अपनी खूबियां होती हैं. ‘तुम्हारी लाल परी के कैसे हैं ?’ उसने पूछा. संकेत शीला की तरफ था जो लाल साड़ी पहने थी. उसने सोचा कि वह मेरी रखैल है. ‘मुझे कोई अन्दाज नहीं है,’ मैंने जवाब दिया. ‘जाने भी दो तुम…!’ उसने आग्रह किया. ‘मुझे देखने में तो वह ठीक-ठाक लगती है. पर कोई यह ठीक-ठीक नहीं बता सकता कि ब्लाउज के अन्दर क्या है, भला बता सकता है कोई ?’

एक बार रफ़ीक़ ज़कारिया मुझे एक संगीत-सभा में ले गया. हम लोग कुछ देर से पहुंचे. उसने पहली पंक्ति की सीट जो उसके लिए रखी गई थी, मुझे देते हुए कहा, ‘तुम उनसे बात करो.’ वह महिला जो मेरे बराबर की सीट पर बैठी थी, मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई. वह निश्चित रूप से असाधारण सुन्दरी थी, पर मैं उसे ठीक-ठीक पहचान नहीं सका. जब रोशनी हुई तो मैंने उससे कहा कि हम लोगों का परिचय नहीं कराया गया. ‘मैं मीनाकुमारी हूं,’ उसने जवाब दिया. इस नाम से मुझे कुछ थोड़ा-थोड़ा याद-सा आया पर बात पूरी तरह साफ नहीं हुई. ‘आपका पेशा क्या है ?’ मैंने उससे पूछा. उसने जवाब देने की मेहरबानी नहीं की – सिर्फ अपना सिगरेट सुलगाया और दूसरी तरफ बैठे व्यक्ति से बात करने के लिए उधर घूम गई. मीनाकुमारी उस समय हिन्दी-स्क्रीन की सबसे ऊंची अभिनेत्री थी.

नरगिस से मेरा परिचय फेमिना के सम्पादक गुलशन इविंग के माध्यम से हुआ. मैंने उसे मदर इंडिया में नायिका की भूमिका में देखा था. गुलशन ने मुझसे कहा कि नरगिस मुझसे मिलना चाहती है. मुझे बहुत अच्छा लगा. दत्त दम्पति की स्थिति उस समय बहुत अच्छी नहीं थी. नरगिस फिल्मों से रिटायर हो चुकी थी, और सुनील दत्त को स्वतन्त्र रूप से अभी अपनी जगह बनानी थी. उनके दो बच्चे सनावर स्कूल में थे, जो मेरे कसौली वाले कॉटेज से दूर नहीं था. नरगिस जब द टाइम्स ऑफ इंडिया बिल्डिंग पहुंची, तो सबने उसे पहचान लिया. मेरा भाव और बढ़ गया. बड़े संकोच से उसने मुझसे पूछा कि क्या वह अक्टूबर में सनावर फाउंडर्स वीक के मौके पर मेरी कॉटेज में रह सकती है. ‘सिर्फ एक शर्त पर,’ मैंने उससे कहा. वह कुछ आशंकित दिखाई पड़ी.

‘मेरी शर्त यह है कि उसके बाद आप मुझे सबसे यह कहने की इजाजत देंगी कि नरसिग मेरे बिस्तर में सोई थी.’ वह हंस-हंसकर दोहरी हुई जा रही थी. ‘शर्त मंजूर है!’ उसने अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा. राज्यसभा में हम दोनों का नामांकन एक साथ हुआ और हमें अगल-बगल सीटें दी गईं. जब भी कोई हमारा परिचय कराने की कोशिश करता तो वह कहती, ‘आपको हमारा परिचय कराने की जरूरत नहीं है, मैं इनके बिस्तर में सो चुकी हूं.’

परवीन बाबी से मेरी मुलाकात देवानंद की एक पार्टी में हुई. सामान्यतः कॉकटेल पार्टियों में मैं चुपचाप एक कोने में दो-एक पैग पीकर, सबकी नजर बचाकर खिसक जाता था. उस शाम परवीन आकर मेरी कुर्सी के पास कालीन पर बैठ गई. उसके बाल कितने खूबसूरत और लम्बे थे! कैसी सम्मोहक आंखें थीं उसकी! मैंने उसकी भरसक चापलूसी की. मैं पार्टी में आधी रात के बाद तक टिका रहा. अगर मुझे अगले दिन सुबह-सुबह दिल्ली के लिए फ्लाइट नहीं पकड़नी होती तो मैं और देर तक रुकता. मुझे सोने के लिए बहुत कम वक्त मिला और मैं नियमानुसार उड़ान के एक घंटे पहले सांता क्रूज हवाई अड्डे पर पहुंच गया. मैं कुछ पत्रिकाएं खरीदने के इरादे से किताबों की दुकान पर पहुंचा. एक युवती जो कुछ-कुछ परिचित-सी लग रही थी, मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई. मैंने उसके पास जाकर कहा, ‘हम लोग निश्चित रूप से पहले मिले हैं,’ ‘अब आप यह तो न कहिए कि आप मुझे नहीं पहचानते! अभी कुछ ही घंटे पहले आप मुझसे कह रहे थे कि आपने मेरे-जैसी खूबसूरती पहले कभी नहीं देखी! मैं परवीन बाबी हूं.’ उसने मुझे माफ कर दिया और दिल्ली में आकर हमारे साथ डिनर खाने की इज्जत भी बख्शी.

फिल्मों के साथ मेरा सबसे नजदीक का रिश्ता तब बना जब आइवरी-मर्चेंट वाली जोड़ी ने मेरे उपन्यास ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ पर फिल्म बनाने का प्रस्ताव किया. उन्होंने ज़फ़र हई से उसका निर्देशन करने के लिए कहा. एक बड़े प्रसिद्ध उर्दू-लेखक को संवाद लिखने के लिए बुलाया गया. उसने पंजाबी शब्दों को सही-सही पकड़ने में मेरी मदद चाही, और हफ्तों तक शाम-दर-शाम मेरी स्कॉच पीकर संवाद लिखने का काम पूरा किया. शशि कपूर फिल्म में पैसा लगाने और उसके मुख्य पुरुष पात्र की भूमिका निभाने के लिए तैयार हो गए. मेरी मुलाकात शबाना आज़मी से भी हुई. उसे मैं हिन्दी-स्क्रीन की सबसे अच्छी अभिनेत्री मानता हूं और उसी को इस फिल्म में नायिका की भूमिका अदा करनी थी. छह महीने के बाद यह योजना रद्द कर दी गई. मेरा समय और कई गैलन स्कॉच बर्बाद हुई. पर किसी ने खेद प्रकट करने के लिए एक शब्द भी नहीं कहा.

 

खुशवंत सिंह.
खुशवंत सिंह.

जिन तमाम फिल्मी व्यक्तित्वों से मेरी मुलाकात हुई, उनमें सबसे रंगीन व्यक्तित्व अभिनेता आई.एस. जौहर का था. अभिनेता के रूप में उसके बारे में मेरी राय कोई बहुत अच्छी नहीं थी. प्रचार के लिए वह जैसे फूहड़ प्रयास करता था मैं शुरू में उनसे उखड़ गया. जैसे-जैसे अभिनेता के रूप में उसकी लोकप्रियता में गिरावट आती गई, वैसे-वैसे अपने को खबरों के केन्द्र में रखने का उसका अभियान बढ़ता गया. मैंने द इलस्ट्रेटेड वीकली में उसके कुछ लेख छापे. उसने प्रोतिमा बेदी से अपनी सगाई की घोषणा सिर्फ इसलिए की क्योंकि मीडिया को बेचने के लिए उसके पास इससे ज्यादा दिलचस्प और कोई बात नहीं थी. दोनों शादीशुदा थे और उनके बड़े-बड़े बच्चे थे. प्रोतिमा ने कबीर बेदी को तलाक दे दिया था और जूहू समुद्र की रेत में तेजी से कपड़े उतारते हुए अपने फोटो खिंचवाकर हिन्दुस्तान की अधिकांश पत्रिकाओं में रास्ता बना लिया था. उसका आकार सुन्दर था.

जौहर ने रमा से शादी की थी. उससे एक बेटा और एक बेटी थी. रमा ने उसे छोड़ दिया और उससे बिना तलाक लिए, दिल्ली में उसके रिश्ते के भाई हरबंस से शादी कर ली. इस तरह उसका नाम रमा बंस पड़ा. वह जौहर के पास बम्बई लौटी. वह मेरी जान-पहचान में अकेली ऐसी औरत थी जिसके दो जीवित पति थे और वह इन एकाधिक पतियों की पत्नी के रूप में खुश थी. वह जौहर के साथ रहती नहीं थी, पर अकसर उसके साथ डिनर खाने जाती थी. हफ्ते में एक बार वह मुझे भी अपने साथ ले जाती थी. जौहर ब्रिज खेलने का बड़ा लोभी था. लोटस कोर्ट में उसके अपार्टमेंट से, रमा उसे क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया फोन करके हमारे पहुंचने की खबर देती, और उसे क्लब से ‘चाइनीज’ खाने का ऑर्डर देने के लिए कह देती. हम उसके लौटने का इन्तजार करते और इस बीच मैं उसके बड़े प्यारे से चपटी नाकवाले कुत्ते फीनू के साथ खेलता रहता. रमा उसके गद्दे के पासवाली दराज को खाली करके (वह जमीन पर सोता था) मुझे उन लगभग नग्न युवतियों के फोटो दिखाती जो जौहर से, फिल्मों में जगह दिलाने के लिए, सहायता चाहती थीं. लौटकर वह अपनी बेहतरीन स्कॉच निकालता था. वह बहुत कम पीता था और रमा शराब नहीं पीती थी.

जौहर बहुत आला दरजे का किस्सागो था. जो कहानियां वह सुनाता था उनमें उसके सेक्स-जीवन के किस्से भी शामिल रहते थे. मैं कभी यकीनन नहीं कह सकता था कि वह मुझे अपनी गुजरी हुई जिन्दगी के बारे में जो कुछ सुनाता था उसमें से कितना सच होता था और कितना इसलिए गढ़ा हुआ होता था ताकि मेरी दिलचस्पी उसमें बनी रहे. बम्बई छोड़ने के बाद मेरा जौहर से किसी तरह का संपर्क नहीं रहा. मैंने उसे अभिनेता या फिल्म प्रोड्यूसर – किसी भी रूप में गम्भीरता से नहीं लिया. मुझे उसके द्वारा लिखे गए नाटक ‘भुट्टो’ को देखकर सुखद आश्चर्य हुआ. यह नाटक दिल्ली में खेला गया था. उसकी कल्पना बहुत अच्छी तरह की गई थी. उसकी विदग्धता ऑस्कर वाइल्ड के टक्कर की थी. सुहेल सेठ ने भुट्टो की भूमिका में गजब किया था. काश, जौहर ने उसे देखा होता. लेकिन तब तक उसकी मृत्यु हो चुकी थी.

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