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केरल सरकार का ये बिल पास होने पर पुलिस लोगों की हर तरह की जासूसी कर सकती है

केरल सरकार एक नया बिल लाई है. Kerala Control of Organised Crimes Act. शॉर्ट में कहें तो KCOCA. केरल संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम का मसौदा राज्य पुलिस को यह अधिकार देता है कि वह हर तरह के कम्युनिकेशन की जासूसी कर सकती है, बशर्ते वह इंटरसेप्शन संगठित अपराध से संबंधित किसी भी तरह का सबूत दे सकता है.

अंग्रेजी अखबार द हिन्दू की रिपोर्ट के मुताबिक, इस ड्राफ्ट बिल की जांच एक पैनल करेगा जिसकी अध्यक्षता चीफ सेक्रेटरी करेंगे. बिल सुझाव देता है कि एडिशनल डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (ADGP) और उनके ऊपर की रैंक का अधिकारी जांच अधिकारी द्वारा किए गए आवेदन पर 48 घंटे के भीतर तार, इलेक्ट्रॉनिक या मौखिक संचार के इंटरसेप्शन की अनुमति दे सकता है.

ड्राफ्ट बिल में कहा गया है कि ADGP तब इंटरसेप्शन की अनुमति दे सकता है, जब वह इस बात को लेकर आश्वस्त हो कि स्थिति इतनी आपातकालीन है कि जिसमें राज्य की सुरक्षा या हित के खिलाफ ‘षड्यंत्रकारी गतिविधियां’ या ‘किसी भी व्यक्ति की मौत या गंभीर शारीरिक चोट पहुंचने का खतरा शामिल है.

Phone Cover
फोन टैपिंग को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं. फोटो सोर्स- आजतक

ड्राफ्ट के मुताबिक, संगठित अपराध की जांच को सुपरवाइज कर रहा SP (सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस) इसके लिए सक्षम प्राधिकारी से संपर्क कर सकता है. ड्राफ्ट में कहा गया है कि इंटरसेप्शन के लिए आवेदन करते समय जांच और सुपरवाइज कर रहे अधिकारियों की डिटेल के अलावा दर्ज किए गए अपराध की डिटेल, आरोपियों की पहचान और उस जगह की जानकारी देनी होगी जहां से संचार को इंटरसेप्ट किया जाना है.

हालांकि ड्राफ्ट कहता है कि राज्य के मुख्य सचिव के नेतृत्व में एक समिति 10 दिनों में सक्षम प्राधिकारी के आदेशों की समीक्षा करेगी. यदि अनुमति अस्वीकार कर दी जाती है, तो इंटरसेप्शन तुरंत बंद कर दिया जाएगा और जो जानकारी जुटाई गई है वो तुरंत नष्ट कर दी जाएगी.

इकबालिया बयान सबूत के तौर पर पेश होगा

द हिन्दू के मुताबिक इस बिल में एक और बड़ी बात है. SP रैंक के अधिकारी के सामने दिया गया इकबालिया बयान, बयान देने वाले व्यक्ति के खिलाफ सबूत के तौर पर मान्य होगा. इकबालिया बयान दर्ज करने से पहले, पुलिस अधिकारी बयान देने वाले व्यक्ति को समझाएगा कि वह इस कबूलनामे के लिए बाध्य नहीं है. और वह इकबालिया बयान देता है तो उसके खिलाफ सबूत के रूप में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है. इकबालिया बयान उसी भाषा में दर्ज किया जाएगा जिसमें व्यक्ति की जांच की जा रही हो.

फोन टैपिंग को लेकर क्या नियम हैं?

हम सबको भारतीय संविधान के तहत कई मूल अधिकार मिले हैं, लेकिन निजता का अधिकार उसमें शामिल नहीं है. हालांकि संविधान के अनुच्छेद 19, 20, 21 के अधिकारों में इसे अंतर्निहित माना गया है. इसके मुताबिक जीवन जीने के अधिकार में ही निजता की स्वतंत्रता भी आती है. इस स्वतंत्रता में ही जीवन में बेवजह के हस्तक्षेप को गलत बताया गया है. इस वजह से कोई भी आपकी व्यक्तिगत बातचीत को सुन या टेप नहीं कर सकता. हालांकि सुरक्षा एजेंसियों को ‘विशेष परिस्थितियों’ में निजता के अधिकार को सीमित करने के अधिकार मिले हुए हैं.

Ashwini Vaishnav
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव (फाइल फोटो-PTI)

पेगासस स्पाईवेयर का मामला उठने के बाद केंद्र सरकार ने संसद में बताया था कि लॉफ़ुल इंटरसेप्शन या क़ानूनी तरीके से फ़ोन या इंटरनेट की निगरानी या टैपिंग की देश में एक स्थापित प्रक्रिया है जो लंबे समय से चली आ रही है. इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने संसद में कहा था कि भारत में एक स्थापित प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से राष्ट्रीय सुरक्षा के उद्देश्य से या किसी भी सार्वजनिक आपातकाल की घटना होने पर या सार्वजनिक सुरक्षा के लिए केंद्र और राज्यों की एजेंसियां इलेक्ट्रॉनिक संचार को इंटरसेप्ट करती हैं. उन्होंने बताया था कि आईटी (प्रक्रिया और सूचना के इंटरसेप्शन, निगरानी और डिक्रिप्शन के लिए सुरक्षा) नियम, 2009 के अनुसार ये शक्तियां राज्य सरकारों के सक्षम पदाधिकारी को भी उपलब्ध हैं.

क्या कहता है नियम?

भारतीय टेलीग्राफ एक्ट 1885 के अधिनियम 5 (2) के तहत केंद्र और राज्य सरकार को टेलीफोन रिकॉर्ड करने और मॉनिटरिंग करने का अधिकार है. कानून में इस पर नियंत्रण करने के लिए एक रिव्यू कमेटी के गठन का प्रावधान है. यह कमेटी फोन रिकॉर्ड करने के आदेश पर निगरानी करती है. सिर्फ बहुत जरूरी होने पर ही या देशहित में किसी बड़ी घटना को रोकना के लिए खुफिया रिपोर्ट तैयार करने के लिए फोन टैपिंग की जा सकती है. पहले इस श्रेणी में आर्थिक अपराध को भी रखा गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की वजह से इसे टैपिंग की श्रेणी से बाहर करना पड़ा.

क्या होता है फोन टैपिंग का प्रोसेस?

एक सीनियर पुलिस अधिकारी ने दी लल्लनटॉप को बताया था,

# किसी भी व्यक्ति की टेलीफोन रिकॉर्डिंग या सर्विलांस करने के लिए जांच एजेंसी को सरकार के गृह विभाग में आवेदन करना होता है.

# इस आवेदन पर राज्य के गृह सचिव ही आदेश दे सकते हैं.

# किसी भी फोन को लंबे वक्त तक टैपिंग या सर्विलांस पर नहीं रखा जा सकता. पहली बार में किसी के फोन को अधिकतम 2 महीने तक सर्विलांस पर रखा जा सकता है.

# इसके बाद नए सिरे से आदेश जारी करवाने होंगे. इसके बाद जरूरत पड़ने पर 6 महीने तक सर्विलांस पर रख सकते हैं.

# फोन टैपिंग करने या सर्विलांस पर रखने से पहले एजेंसी को फोन टैप करने का कारण बताना जरूरी होता है. उसे बताना होता है कि आखिर किन वजहों से फोन टैपिंग की जानी है.

# गृह सचिव के आदेश की समीक्षा कैबिनेट सचिव, विधि सचिव और टेलीकॉम सचिव की कमेटी करती है.

फोन टैप होने की आशंका होने पर इसकी शिकायत मानवाधिकार आयोग के अलावा पुलिस में भी की जा सकती है. निजता के उल्लंधन के मामले की शिकायत पर पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज करवाने के साथ अदालत में केस भी किया जा सकता है. अगर गैरकानूनी फोन टैपिंग का मामला साबित होता है तो इसे लेकर सजा का प्रावधान है. भारतीय टेलीग्राफ एक्ट की धारा 26 में 3 साल तक सजा और जुर्माने का प्रावधान किया गया है.


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