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'क' से कविशाला, नए कवि अपनी कविताओं को लावारिस न समझें

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‘कविशाला’ एक अभिनव उपक्रम है, जो नए कवियों को एक मंच प्रदान कर रहा है. कविशाला डॉट इन (www.kavishala.in) एक वेबसाइट है जो उभरते हुए कवियों की अच्छी कविताएं लोगों तक पहुंचाने का ज़रिया बन रही है. व्यक्तिगत काम को डिजिटलाइज्ड करने की ख्वाहिश में बनी ये वेबसाइट, बहुत कम समय में प्रतिभाशाली कवियों के लिए स्टेपिंग स्टोन बन गई है.

कविता. उसमें भी हिंदी कविता. टेक्नोलॉजी के इस दौर में ग़ज़ल तो फिर भी थोड़ी-बहुत सर्वाइव कर गई है, लेकिन कविता की उपेक्षा में बढ़ोतरी ही हुई है. ग़ज़ल के प्रासंगिक बने रहने में शायद उसका मीटर में होना, उसे सुरों में ढालने की आसानी होना भी एक वजह होगी. लेकिन मुक्त कविता के साथ ऐसा नहीं है. इसीलिए कविता के पाठक तेज़ी से घटे हैं. फिर फेसबुक जैसा सहज-सुलभ मंच मिलने के बाद कितने ही लोग अपनी कविताई का शौक़ वहां लिख कर पूरा किए दे रहे हैं. ये इल्ज़ाम लगता आया है कि ऐसी कविताएं एंटरमार कविताएं होती हैं. यानी गद्य लिख कर बीच-बीच में एंटर मार दिया.

वहीं दूसरी तरफ कविता में रुची रखने वाले पाठक ज़्यादातर पुराने और प्रतिष्ठित कवियों पर ही निर्भर हैं. कविता के नाम पर निराला, पंत, दिनकर, बच्चन को ही पढ़ना चाहते हैं. ऐसे में उन कवियों का क्या जो संजीदगी से इस विधा में अपना योगदान दे रहे हैं, लेकिन हज़ारों-हज़ार कविताओं की भीड़ में उनका काम खो जा रहा है! जवाब है ‘कविशाला’.

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इसको बनाने वाले हैं अंकुर मिश्रा. गुडगांव में रहते हैं. उद्यमी, लेखक, कवि, इंजीनियर, मार्केटियर, सोशल एक्टिविस्ट, फोटोग्राफर और न जाने क्या-क्या हैं. एक डिजिटल मार्केटिंग कंपनी फोरेंटेक के फाउंडर और सीईओ हैं. ‘लव इज़ स्टील फ़्लर्ट’ नाम का एक नॉवेल लिख चुके हैं. तीन कविता संग्रह भी आए हैं इनके. ‘क्षणिक कहानियों की विरासत’, ‘नई किताब’ और ‘कविशाला’. अंकुर ने कोई 11 महीने पहले मई 2016 में अपना खुद का काम डिजिटली सेव करने के लिए एक वेबसाइट बनाई. अपने दोस्तों से शेयर की. कुछ ही दिनों में लोग पूछने लगे कि क्या हमारी कविताओं को भी इस वेबसाइट पर जगह मिल सकती है? फिर सिलसिला चल निकला नए-नए कवियों के जुड़ने का.

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अंकुर मिश्रा.

रेख्ता, कविताकोश जैसी वेबसाइट्स बड़े कवियों के काम को जगह देती हैं. पुराने और प्रसिद्ध कवियों को आप इन वेबसाइट्स पर पढ़ सकते हैं. नए कवियों को मंच प्रदान करती ‘कविशाला’ पर आज लगभग 750 कवियों की उपस्थिति है. 1500 के करीब पाठक रोजाना वेबसाइट पर विजिट करते हैं.

प्रकाशित किताबें.
प्रकाशित किताबें.

‘कविशाला’ के ही 50 कवियों की कविताओं को लेकर एक किताब भी छप चुकी है. वेबसाइट का अब तक कोई रेवेन्यू मॉडल नहीं है. सारे खर्चे अंकुर खुद उठाते हैं. एक एंड्राइड एप्प भी बनाया है. समय-समय पर दिल्ली में इवेंट्स भी आयोजित किए जाते हैं. महीने के सेकंड या थर्ड वीकएंड पर. ऐसी हर एक काव्यगोष्ठी में होने वाले तमाम छोटे-बड़े खर्चे अंकुर खुद उठाते हैं. ये उनकी कविता के प्रति दीवानगी का ही नतीजा है. इवेंट्स के लिए स्पेस कभी बुक करना पड़ता है, तो कभी ‘अस्मिता थिएटर’ के अरविंद गौड़ जैसे मेहरबान मित्र मुहैया करा देते हैं. ‘कविशाला’ अपने आगे के इवेंट्स में किसी बड़े कवि को इनवाइट कर के अपने मेंबर्स को उनके अनुभव से लाभान्वित कराना चाहती है. इससे नए कवियों को मोटिवेशन मिलेगा.

एक इवेंट की तस्वीरें.
एक इवेंट की तस्वीरें.

‘कविशाला’ सोशल मीडिया पर भी है. फेसबुक पेज है, ट्विटर हैंडल भी है. लोग वहां से सीधे जुड़ते हैं. कोई अपनी रचना poetry@kavishala.in पर डायरेक्ट मेल भी कर सकता है. इसके अलावा होम पेज पर भी एक ऑप्शन है ‘पोस्ट योर पोएट्री’ के नाम से. आप यहां सीधे अपनी कविता अपनी डिटेल्स के साथ सबमिट कर सकते हैं. एडमिन पैनल अगर उसे योग्य पाएगा, तो वेबसाइट पर पब्लिश कर देगा. अब तक 6000 से ज़्यादा कविताएं वेबसाइट पर पब्लिश हो चुकी हैं.

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कविताएं सीधे प्रकाशित करने का रास्ता.

कहते हैं कविता सबसे कारगर माध्यम है अभिव्यक्ति का. कम शब्दों में अपने भाव ज़ाहिर करने का. वो भाव किसी नाइंसाफी के प्रति आपका आक्रोश हो सकता है, या प्रेम की भावविव्हलता. आप अगर कविता करते हैं और चाहते हैं कि आपके शब्द ज़ाया न चले जाएं तो ये वेबसाइट आपके लिए ही है.

टीम कविशाला अपने कवियों के साथ.
टीम कविशाला अपने कवियों के साथ.

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