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श्रीनगर में कश्मीरी पंडित एमएल बिंद्रू की हत्या का पूरा सच ये है!

कश्मीर घाटी में आतंकवाद कैसे शुरू हुआ. या कश्मीर पंडितों का पलायन कैसे हुआ, इसको लेकर कई थ्योरी दी जाती हैं. सब अपनी अपनी सहूलियत से. कुछ कहते मिलेंगे कि तब के गवर्नर जगमोहन की साजिश से कश्मीर पंडितों को भगाया गया. इस तरह के तमाम दावों के बीच ये सच्चाई है कि 1989 और 1990 में कश्मीरी पंडितों की हत्या हुई और उनका पलायन भी हुआ. हाई कोर्ट के जज नीलकंठ गंजू जैसे नामी लोगों की हत्या करके भय का माहौल कश्मीर घाटी में बनाया गया. और डर के चलते हज़ारों अल्पसंख्यकों को घाटी छोड़कर रातों रात भागना पड़ा. घाटी में ताला लगे कई घर आज भी अपने मालिकों के लौटने का इंतजार कर रहे हैं.

जब ज्यादातर कश्मीर पंडित कश्मीर घाटी छोड़ आए थे, तब भी कुछ परिवारों ने वहीं रहने का फैसला किया था. तीन दशक से वो घाटी में रह भी रहे हैं. लेकिन हाल के घटनाक्रम से लग रहा है कि नए सिरे से कश्मीर पंडितों को निशाने बनाया जा रहा है. आतंकी दहशत का माहौल पैदा करने में लगे हैं. आम नागरिकों की हत्याएं हो रही हैं. दो साल पहले जब जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किया गया था, तब सरकार की तरफ से मजबूती से कहा गया था कि इससे आतंक खत्म हो जाएगा. इसके बाद सरकार ने 2019 और 2020 के आंकड़े बताकर साबित भी किया कि देखिए आतंकवाद घट गया है.

लेकिन अब फिर सरकार के दावों पर सवाल उठ रहे हैं. लगभग हर दिन ही कश्मीर से आतंकी घटनाओं की खबरें आ रही हैं. और कश्मीर में आतंकवाद का नया स्वरूप इस मायने में ज्यादा खतरनाक दिख रहा है कि अब सड़क चलते किसी को भी गोली मारी जा रही है. किसी गोलगप्पे वाले को मार दिया जा रहा है, कभी कारोबारी की हत्या कर दी जा रही है या किसी पुलिस वाले को सिर में गोली मारकर आतंकी भाग जा रहे हैं. ये मामले थमने के बजाय ज्यादा बढ़ रहे हैं. इसी तरह 5 अक्टूबर को आतंकियों ने सिर्फ 2 घंटे में 3 आम नागरिकों की हत्या की दी. इनमें श्रीनगर के नामी कश्मीर पंडित मखन लाल बिंद्रू भी शामिल थे.

बिंद्रू हत्याकांड

मखन लाल बिंद्रू की श्रीनगर के इक़बाल पार्क के पास बिंद्रू हेल्थ ज़ोन नाम से दुकान चलाते थे. इनका परिवार 1947 से ही दवा की दुकान चलाता आया है. मखन लाल बिंद्रू भी श्रीनगर के जाने माने आदमी थे. श्रीनगर में किसी को कोई दवा नहीं मिलती है, तो कहा भी जाता है कि बिंद्रू साहब की दुकान से पर जाओ, वहां सब मिल जाएगा. जब 1990 में आतंकी वारदातों के बाद कश्मीरी पंडित घर छोड़कर भाग रहे थे. तब भी एमएल बिंद्रू के परिवार ने कश्मीर घाटी में रहने का फैसला किया. वो राजनीति से दूर थे, किसी से कोई दुश्मनी नहीं थीं. खुद पर कोई खतरा महसूस नहीं कर रहे थे. लेकिन 5 अक्टूबर को जब वो अपनी दुकान के बाहर थे तो सड़क पर किसी ने पिस्तौल निकाल कर उनके शरीर पर गोलियां दाग दी. उन्हें अस्पताल ले जाया गया लेकिन मौत हो गई.

एमएल बिंद्रू की मौत के बाद पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला और अल्ताफ बुखारी जैसे कई कश्मीरी राजनेता उनके घर पहुंचे. अल्ताफ बुखारी ने कहा कि उन्हें शर्म आ रही है कि वो इस जगह से हैं जहां बिंद्रू की हत्या कर दी जाती है. वहीं फारुख अब्दुल्ला ने कहा –

“उन्‍होंने लोगों के लिए सब कुछ किया. जब लोग यहां से चले गए तो वे लोगों की सेवा करने के लिए यहीं रुके. लेकिन आज कुछ अमानवीय लोगों ने उनकी हत्या कर दी.”

वीरेंद्र पासवान की भी हत्या

मंगलवार को ही एमएल बिंद्रू के अलावा श्रीनगर में ही गोलगप्पे का ठेला लगाने वाले वीरेंद्र पासवान की हत्या कर दी गई. वीरेंद्र पासवान बिहार के भागलपुर से श्रीनगर गए थे. रोज़गार के लिए देश में इस तरह का माइग्रेशन होता ही है. जैसे कश्मीरी कारोबारी शॉल बेचने के लिए देश के और हिस्सों में जाते हैं, उसी तरह वीरेंद्र पासवान भी श्रीनगर गए थे. और वीरेंद्र पासवान ही क्या, बिहार, यूपी, राजस्थान जैसे इलाकों से सैकड़ों लोग रोजगार के लिए जम्मू कश्मीर जाते ही हैं. पहले से ये होता आया है. आपको श्रीनगर में आराम से यूपी के बार्बर मिल जाएंगे. बैट फैक्ट्रियों में यूपी के कारीगर मिल जाएंगे. तो इसी तरह वीरेंद्र पासवान श्रीनगर के लाल बाज़ार इलाके में ठेला लगाते थे. लेकिन आतंकी उन पर गोली मारकर भाग गया.

इसी दिन बांदीपुरा में टैक्सी एसोसिएशन के अध्यक्ष की गोली मारकर हत्या कर दी गई. बांदीपुरा के शाहगुंड गांव में मोहम्मद शफी लोन की गोली मारकर हत्या कर दी. 5 अक्टूबर से सिर्फ तीन दिन पहले 2 अक्टूबर को भी आतंकियों ने इसी तरह दो आम नागरिकों की गोली मारकर हत्या की थी. अगर आप इस पूरे साल का आंकड़ा लेंगे तो करीब 26 आम नागरिकों की इसी तरह गोली मारकर हत्याएं हैं. इस तरह की हत्याओं में द रेजिस्टेंस फ्रंट यानी टीआरएफ नाम के आतंकी संगठन का नाम आ रहा है. टीआरएफ ने ही कश्मीर पंडित एमएल बिंद्रू की हत्या का जिम्मा लिया है. टीआरएफ और इस्लामिक स्टेट विलायत ए हिंद इन दोनों आतंकी सगंठनों के नाम से कश्मीर में आम नागरिकों की हत्याएं हो रही हैं.

फोर्स पर हमले बढ़े

अब इन हत्याओं के पैटर्न पर बात करते हैं. पिछले दो दशक में कश्मीर में ज्यादा मामले फोर्सेज पर हमले के लिए मिलेंगे. कश्मीर में ये कहा भी जाता है कि आतंकी टूरिस्ट या किसी बाहरी या पंडित को निशाना नहीं बनाते. मिलिटेंट्स की लड़ाई फोर्सेज से है, ऐसे तर्क देकर अलगाववादी नेताओं ने भी दुनिया के सामने कश्मीर के आतंकी संगठनों को सही ठहराने की कोशिश की है. लेकिन अब आतंकी की घटनाओं का टारगेट किलिंग का एक पैटर्न दिख रहा है. निशाने पर या तो जम्मू कश्मीर पुलिस के जवान होते हैं. या बीजेपी नेता होते हैं, या फिर गैर-मुस्लिम कारोबारी होते हैं. या वो कश्मीरी जो आतंकियों को अपने एजेंडे में बाधक लगते हैं.

इसी साल कश्मीर में तीन नामी कारोबारियों की हत्या हुई है. जनवरी में नामी ज्वेलर सतपाल निश्चल की हत्या हुई थी. फरवरी में श्रीनगर के मशहूर कृष्णा ढाबा के मालिक के बेटे आकाश मेहरा को गोली मारी गई थी. और अब 70 साल के बिंद्रू को आतंकियों ने मार दिया. इन तीनों मामलों में आतंकियों की कोई सीधी दुश्मनी किसी से नहीं रही होगी. लेकिन वो गैर-मुस्लिम कारोबारियों को लेकर खौफ पैदा करना चाहते हैं. इसी तरह जम्मू कश्मीर के बाहर के लोगों को लेकर वहां सोशल मीडिया पर प्रोपगेंडा चल रहा है. उन्हें पीटने की बात लिखी जाती है. उनके खिलाफ नफरती बातें लिखी जाती हैं. और इन सब का अंजाम ये वीरेंद्र पासवान नाम के गोलगप्पे वाली की हत्या हो जाती है. इस हत्या से आंतकी डर पैदा करना चाहते हैं ताकि बाहरी लोग घाटी छोड़कर जाएं और उनकी मंशा पूरी हो जाए.

खिसयाए आतंकी?

जब अनुच्छेद 370 हटाए जाने की बात हो रही थी, तब भी ज़ाकिर मूसा जैसे आतंकियों ने धमकी दी कि अगर ऐसा हुआ तो घाटी में एक भी नॉन-लोकल को नहीं रहने देंगे. अब लग रहा है कि आतंकी अपनी खीझ निकालने के लिए किसी को भी मार रहे हैं.

अब बात ये कि सिक्योरिटी फोर्सेज इन हमलों को रोक क्यों नहीं पाती. टारगेटेड किलिंग्स को लेकर कहा जाता है कि जैश के कमांडर ग़ाज़ी बाबा ने ये शुरू किया था. ग़ाज़ी बाबा वही आतंकी है जिसे 2001 में संसद पर हमले का मास्टर माइंड माना जाता है. उसके दौर में किसी भी ओवरग्राउंड वर्कर को या किसी लड़के को हथियार देकर हत्याएं करवाई जाती थी. अब भी वही हो रहा है. पिस्तौल पकड़ाकर ओवरग्राउंड वर्कर्स या नए लड़कों से हत्याएं करवाई जा रही हैं. ओवरग्राउंड वर्कर्स या OGW उन लोगों कहा जाता है जो आतंकियों की लॉजिस्टिक्स या सूचना देने में या किसी और तरह से मदद करते हैं. तो इस तरह के हमलावरों का सिक्योरिटी फोर्सेज के पास रिकॉर्ड नहीं होता. उनके मुवमेंट को ट्रेक नहीं किया जाता. वो सिविलियन्स के बीच आराम से जाकर हत्या कर देते हैं. हत्याओं के कई सीसीटीवी वीडियोज़ भी हमने देखा कि चुपचाप पीछे से आकर आतंकी गोली मारकर भाग जाते हैं.

आतंकियों के लिए ये जितना आसान है सिक्योरिटी फोर्सेज़ के लिए इन्हें रोकना उतना ही मुश्किल है. जब कश्मीर में हिज़्बुल मुजाहिद्दीन और जैश ए मोहम्मद जैसे बड़े आतंकी संगठनों को लगभग खत्म कर दिया है, उनके ज्यादातर बड़े कमांडर्स को मार दिया है. तब भी TRF या IS जैसे संगठनों के नाम पर भर्तियां हो रही हैं और निशाना बनाकर निर्दोषों की हत्याएं हो रही हैं. ये भी माना जा रहा है कि तालिबान के आने के बाद आतंकियों को मोरल बूस्ट हुआ है. उन्हें लगता है कि अफगानिस्तान में तालिबान ने अमेरिका को हरा दिया तो वो भी अपने मकसद में कामयाब हो सकते हैं. इसलिए एनकाउंटर्स में आतंकियों को मार गिराया जाता है लेकिन उतने ही नए लड़के भर्ती हो जाते हैं. पिछले महीने हिंदू में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक अगस्त तक 102 आतंकियों को मारा गया है जिनमें कई बड़े कमाडंर्स भी शामिल थे. जबकि 88 नए लड़कों के आतंकी तंज़ीमों में भर्ती होने की जानकारी है.

सीमापार से घुसपैठ बढ़ी

पिछले कुछ महीनों में सीमापार से आतंकियों की घुसपैठ भी बढ़ी है. पुलिस के सितंबर महीने के डेटा के मुताबिक उत्तर कश्मीर में 40 से 50 विदेशी आतंकी हैं. जबकि 11 स्थानीय आतंकी एक्टिव हैं. मिलिटेंसी के शुरुआती दौर में केंद्र रहा उतर कश्मीर पिछले 10-12 साल में शांत रहा है. ज्यादा आतंकवाद दक्षिण कश्मीर में रहा है. लेकिन अब उतर कश्मीर में भी विदेशी आतंकी बढ़ रहे हैं. इन तथ्यों के बीच सरकार का ये दावा भी है कि 370 को निष्प्रभावी करने के बाद कश्मीर में आतंकी घटनाओं में कमी आई है.

इसका डेटा भी सरकार ने संसद में बताया है. सरकार के मुताबिक 2019 में 594 आतंकी घटनाओं के मुकाबले 2020 में सिर्फ 244 घटनाएं ही हुई हैं. यानी आधी से कम रह गई हैं. लेकिन आंकड़ों वाले इस सुकून से इतर कश्मीर में जो घट रहा है वो दिख रहा है. और इसलिए कश्मीर पंडित भी पूछ रहे हैं कि कहां तो कश्मीर घाटी में बसाने की बात हुई थी और कहां जो हैं वो भी सुरक्षित नहीं हैं. मखन लाल बिंद्रू जैसे नामी कश्मीरी की सरेआम हत्या के बाद लोगों का डर और चिंताएं जायज भी हैं.


कश्मीरी पंडितों पर जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट ने क्या कह दिया?

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