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कश्मीरी हिन्दुओं का क़त्ल कब रुकेगा?

जम्मू कश्मीर के बडगाम में एक कस्बा है चदूरा. 12 मई के रोज़ यहां के तहसील कार्यालय में एक सामान्य दिन था. सरकारी मुलाज़िम फाइलों को निपटाने में लगे थे और फरियादी अपने आवेदन लेकर एक कमरे से दूसरे कमरे में जा रहे थे. तभी वहां दो लोग घुसे. उन्होंने पूछा कि राजस्व शाखा में काम करने वाले राहुल भट कौन हैं? जैसे ही उन्हें इस सवाल का जवाब मिला, उन्होंने पॉइंट ब्लैंक रेंज से राहुल पर गोलियां दाग दीं और वहां से निकल गए.

राहुल को ये समझने का मौका ही नहीं मिला था कि जो उन्हें तलाशते हुए आए हैं, वो आम लोग नहीं, बल्कि आतंकवादी थे. राहुल को तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्होंने दम तोड़ दिया. इसके बाद से घाट में रह रहे कश्मीरी हिंदुओं में हाहाकार मचा हुआ है. एक छह साल की बच्ची के अनाथ हो जाने का दुख भी है और इस बात की चिंता भी कि जब एक सरकारी मुलाज़िम को उसके दफ्तर में घुसकर दिन दहाड़े इस तरह मारा जा सकता है, तो बाकी अल्पसंख्यकों की जान की कीमत कितनी होगी?

राहुल का परिवार अपनी आंखें पोछ भी नहीं पाया था, कि आतंकवादियों ने एक और कश्मीरी की हत्या कर दी. रियाज़ अहमद ठोकर जम्मू कश्मीर पुलिस में कॉन्स्टेबल थे. पुलवामा के गुदरू में हमलावरों ने उनके घर में घुसकर उन्हें गोली मार दी. रियाज़ को भी अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्होंने प्राण त्याग दिए.

कौनसा मकसद है, जो बेगुनाह लोगों को उनके दफ्तर और घर में घुसकर मारने से पूरा किया जा रहा है? और ये भी सवाल भी उठाएंगे कि जम्मू कश्मीर में चिर शांति के जो बड़े-बड़े दावे सरकार ने किए थे, वो खोखले साबित क्यों हुए? और जम्मू कश्मीर की राजधानी के इतने करीब दिन दहाड़े हो रही इन हत्याओं का ज़िम्मेदार कौन है?

राहुल भट की पत्नी मीनाक्षी भट, रोते रोते बेसुध हो गई हैं. घर वाले इस कोशिश में हैं कि थोड़ा पानी पी लें, तो ठीक रहेगा. मीनाक्षी, राहुल और उनकी 6 साल की बेटी बडगाम में ही शेखपुरा गांव में रहते थे. इस गांव में केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री पैकेज के तहत शासन के कश्मीरी हिंदू कर्मचारियों के लिए घर बनवाए थे. प्रधानमंत्री रिलीफ पैकेज मनमोहन सिंह सरकार के पहले कार्यकाल में आया था. साल था 2008. इसी पैकेज के तहत साल 2011 में राहुल को राजस्व विभाग में नौकरी मिली थी. राहुल की पहली पोस्टिंग थी बडगाम. बडगाम, राजधानी श्रीनगर के बिलकुल बगल में है.

2020 में राहुल का तबादला चदूरा तहसील में हो गया. मीनाक्षी ने आजतक के संवाददाता सुनील भट

को बताया कि जबसे राहुल का तबादला हुआ था, तभी से परिवार सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा था.

जम्मू कश्मीर में कश्मीरी हिंदुओं की टार्गेटेड किलिंग्स का बहुत लंबा इतिहास रहा है. दो महीने के भीतर ये तीसरा हमला था. पहली दो मिसालों पर गौर कीजिए –

4 अप्रैल को आतंकवादियों ने बाल कृष्ण भट को उनकी दुकान के अंदर गोली मार दी.

13 अप्रैल को आतंकवादियों ने सतीश कुमार सिंह की उनके घर के बाहर हत्या कर दी.

इन घटनाओं ने पिछले साल की याद दिला दी, जब एक ही महीने में 7 लोगों की हत्या हुई जिनमें कश्मीरी पंडित और प्रवासी मज़दूर, दोनों थे

मीनाक्षी ने यह भी बताया कि वो बार-बार राहुल से तबादला लेने को कहती थीं. लेकिन राहुल कहते थे कि मुझे अब यहां लोग जानने लगे हैं. इनके बीच वो सुरक्षित रहेंगे. उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उन्हीं लोगों में से कोई निकलकर उनके सीने में गोली उतार देगा. संतप्त मीनाक्षी ने ये सवाल भी किया कि जब शीर्ष नेताओं कश्मीर आने पर अपनी सुरक्षा का ध्यान रख लेते हैं, तो फिर राहुल जैसे आम लोग सुरक्षित क्यों नहीं रह पाए.

राहुल की मृत्यु की खबर आते ही पुलिस और प्रशासन ने कह दिया था कि मामले में जांच होगी और सख्त कार्रवाई भी होगी. इन वादों को लेकर भी मीनाक्षी ने एक सवाल किया,

राहुल की हत्या के विरोध में प्रदर्शन 12 मई की रात को ही जम्मू और कश्मीर के अलग-अलग इलाकों में शुरू हो गए थे. ज़्यादातर प्रदर्शनकारी वो कश्मीरी हिंदू थे, जो सरकारी नौकरी के चलते घाटी में परिवार सहित रहते हैं. प्रदर्शनकारियों ने बडगाम के डिप्टी कमिश्नर और जम्मू कश्मीर के लेफ्टिनेंट गवर्नर के खिलाफ नारे लगाए. प्रदर्शनकारियों ने सवाल किया कि जब सरकार सुरक्षा मुहैया करा ही नहीं पाई है, तो फिर वो कश्मीरी हिंदुओं को ऐसे इलाकों क्या सोच कर पोस्टिंग दे रही है. प्रदर्शनकारी चाहते थे कि लेफ्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा उनसे आकर मिलें.

नारेबाज़ी के बाद प्रदर्शनकारी मार्च की शक्ल में बडगाम की एयरपोर्ट रोड पर बढ़ने लगे. जब ये हुआ, तब पुलिस और सुरक्षा बलों ने बल प्रयोग किया. आंसू गैस के गोले भी दागे.

राहुल अब हमारे बीच नहीं हैं. लेकिन नेताओं के बयान हैं. चूंकि कश्मीरी हिंदुओं को लेकर राजनीति का मौका कोई नहीं चूकना चाहता, इसलिए आपको राजनैतिक प्रतिक्रियाओं के बारे में भी बता देते हैं. जम्मू कश्मीर की सभी राजनैतिक पार्टियों ने एक सुर में इस घटना की निंदा की है. भाजपा की राज्य इकाई के अध्यक्ष रविंदर रैना ने कहा कि इस घटना में शामिल लोगों पर बहुत जल्द कार्रवाई की जाएगी.

पूर्ववर्ती जम्मू कश्मीर राज्य में भाजपा-पीडीपी सरकार की मुख्यमंत्री रहीं महबूबा मुफ्ती ने कहा कि वो बडगाम जाकर संतप्त परिवार से मिलना चाहती थीं. लेकिन उन्हें नज़रबंद कर दिया गया.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के उमर अब्दुल्ला ने राहुल और रियाज़ की हत्या की निंदा की. साथ ही ये भी लिखा कि पर्यटन को ”नॉर्मलसी” नहीं माना जा सकता.

ये सिर्फ आर्थिक गतिविधि का सूचक है. नॉर्मलसी तो तभी आएगी जब डर का खात्मा होगा, उग्रवादी अपनी मर्ज़ी से हमले नहीं कर पाएंगे.

सारी पार्टियां लकीर पीटने में लगी हैं. इसीलिए कश्मीरी हिंदुओं के पास कोई रास्ता नहीं बचा है. सरकारी नौकरी कौन नहीं चाहता. लेकिन अब सब्र का बांध टूट रहा है. आज पूरे दिन कश्मीरी हिंदुओं ने घाटी में अलग अलग जगह सामूहिक इस्तीफे दिए. और इस्तीफे के पत्र को सार्वजनिक भी किया. ज़रा सोचकर देखिए उस बेबसी के बारे में. एक अदद नौकरी के पीछे दुनिया है, और यहां लोग उसी नौकरी को छोड़ने पर मजबूर कर दिए गए हैं.

इसीलिए हमने सुशील पंडित से बात की. सुशील लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. रूट्स इन कश्मीर नाम का एक संगठन चलाते हैं, जो ऐसे युवाओं के बीच काम करता है, जिनका जन्म 1990 से शुरू हुए विस्थापन के वक्त या उसके बाद हुआ था. सरकार लगाकार दावा कर रही है कि उसने हिंदुओं का पुनर्वास शुरू कर दिया है.

अब आते हैं कुतर्कों पर. कश्मीरी हिंदुओं की टार्गेटेड किलिंग्स के बाद प्रशासन की तरफ से एक बहाना हर बार बनाया जाता है. कि हर शख्स को, हर वक्त, हर जगह सुरक्षा देना संभव नहीं है. इसपर भी सुशील पंडित ने अपनी बात रखी है.

कुल मिलाकर बात ये है कि सरकार न कश्मीर की राजनैतिक समस्या का हल निकाल पाई है. और न ही वहां से विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं के पुनर्वास के तमाम दावों के बावजूद उन्हें सुरक्षा मुहैया करा पाई है. ज़रूरी है कि अब दावे और वादे बंद हों. और विस्थापन का दंश झेल रहे कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की पुख्ता व्यवस्था की जाए. और जो लोग इन टार्गेटेड किलिंग्स के पीछे हैं, उन्हें ऐसी सज़ा मिले कि दोबारा ऐसी वारदात से पहले कोई लाख बार सोचे.


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