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कोई भाषा किसी प्रदेश की राजभाषा बनती है, तो लोगों को क्या फायदा होता है

जम्मू-कश्मीर की राजभाषाएं इन दिनों चर्चा में हैं. केंद्रीय कैबिनेट ने हाल ही में इस केंद्रशासित प्रदेश की राजभाषाओं में डोगरी, कश्मीरी और हिंदी को शामिल करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. संसद के मॉनसून सेशन में इस बारे में बिल लाया जाएगा. बिल पास होते ही प्रदेश के लोगों की मन की पुरानी मुराद पूरी हो जाएगी. लेकिन सवाल ये है कि क्या एक से ज्यादा भाषाओं को राजभाषा का दर्जा दिया जा सकता है? साथ ही राजभाषाओं की लिस्ट में शामिल होने से उन भाषाओं को जानने-समझने वालों को क्या हासिल होता है?

अब तक की स्थिति

जम्मू-कश्मीर की राजभाषा अब तक रही है उर्दू और अंग्रेजी. प्रदेश का राज-काज अब तक आधिकारिक तौर पर इन्हीं दोनों भाषाओं में किया जाता रहा है. अब इनमें डोगरी, कश्मीरी और हिंदी को शामिल किए जाने का रास्ता साफ हो रहा है. दिलचस्प बात तो ये कि इन पांच में दो स्थानीय भाषाएं ऐसी हैं, जो संविधान की आठवीं अनुसूची में पहले से ही शामिल थीं, पर अब राज्य की आधिकारिक भाषा बनने जा रही हैं. आठवीं अनुसूची में अब तक कुल 22 भारतीय भाषाओं को जगह दी जा चुकी है.

वैसे जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी, डोगरी के अलावा लद्दाखी (भोटी), शीना, गोजरी, पंजाबी, पहाड़ी, भद्रवाही और किश्तवाड़ी भाषाएं भी बोली जाती हैं.

डोगरी: एक नजर में

# इंडो-आर्यन भाषा है. इसकी लिपि है डोगरा, जिसे ‘डोगरा अक्खर’ भी कहते हैं.
# बाद के दौर में डोगरी की लिपि के दौर पर देवनागरी का इस्तेमाल बढ़ा. आज ढेर सारा डोगरी साहित्य देवनागरी में भी उपलब्ध है.
# जम्मू-कश्मीर के अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश और पंजाब के कुछ हिस्सों में भी ये बोली जाती है.
# एक आकलन के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में 50 लाख के आसपास लोग डोगरी भाषा का उपयोग करते हैं.

कश्मीरी: एक नजर में

# कश्मीरी लोग अपनी भाषा को ‘काशुर’ और कश्मीर प्रान्त को ‘कशीर’ कहते हैं.
# कश्मीर घाटी और आसपास की कुछ पहाड़ियों पर बोली जाती है.
# कश्मीरी भाषा पहले शारदा लिपि में लिखी जाती थी. ये देवनागरी की ही ‘बहन’ है. बाद में चलकर मुसलमानों ने कश्मीरी भाषा के लिए अरबी लिपि अपना ली.
# प्रदेश से बाहर गए कश्मीरी पंडित कश्मीरी भाषा के लिए देवनागरी लिपि इस्तेमाल करने लगे.
# एक आकलन के अनुसार, कश्मीरी बोलने वालों की संख्या भी 45 लाख से अधिक है.

राजभाषा के बारे में संविधान क्या कहता है

# संविधान के अनुच्छेद 345 में राज्य की राजभाषा के बारे में जिक्र है. इसमें साफ निर्देश है-

किसी राज्य का विधानमंडल विधि द्वारा उस राज्य में प्रयोग होने वाली भाषाओं में से,
– किसी एक या इससे अधिक भाषाओं को या हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार कर सकेगा.

– अंग्रेजी का प्रयोग पहले की ही तरह होता रहेगा, जब तक कि विधानमंडल ये व्यवस्था खत्म न कर दे.

# संविधान के अनुच्छेद 347 में किसी राज्य की जनसंख्या के किसी भाग द्वारा बोली जाने वाली भाषा के बारे में जिक्र हैं. इसमें कहा गया है-

अगर राष्ट्रपति को ऐसा लगता है कि किसी राज्य की पर्याप्त आबादी यह चाहती है कि उसकी भाषा को राज्य मान्यता दे, तो वह इस बारे में जरूरी निर्देश दे सकेंगे.

# अनुच्छेद 351 में हिंदी भाषा के विकास के लिए निर्देश दिया गया है:

– संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए.

– हिंदी का विकास करे, जिससे वह भारत की मिली-जुली संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का जरिया बन सके.

– हिंदी की प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों के जरिए भंडार बढ़ाए.

लोगों को किस तरह फायदा होगा

सबसे जरूरी बात. राजभाषा/प्रदेश की आधिकारिक भाषा का दर्जा मिलने के बाद कई स्तर पर बदलाव देखने को मिलेंगे. आने वाले दिनों में जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी, डोगरी और हिंदी का इस्तेमाल इस तरह बढ़ता नजर आएगा-

# राज्य का राजपत्र, अधिसूचना या आदेश आदि उन भाषाओं में भी ट्रांसलेट होंगे, जो उसकी राजभाषाएं होंगी.

# राज-काज की भाषा बनने के बाद उन भाषाओं से जुड़े संस्थान आदि की स्थापना होगी. स्वाभाविक तौर पर उन भाषाओं का विकास होगा.

# उन भाषाओं की प्रशासनिक शब्दावलियां तैयार होंगी, जिससे सरकार के कामकाज में उनका बेहतर इस्तेमाल हो सके.

# उन भाषाओं का मानकीकरण होगा. मतलब उन भाषाओं का व्याकरण एक निश्चित आकार लेता जाएगा.

# सरकारी संस्थानों के नाम, कार्यालयों के पदाधिकारियों के पदनाम आदि उस राजभाषा में लिखे जा सकेंगे. हालांकि हर राजभाषाओं में ऐसा हो ही, ये कोई जरूरी नहीं है.

# उन भाषाओं से जुड़े लोग खुद को उपेक्षित महसूस नहीं करेंगे.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

राजभाषा या राज्य की आधिकारिक भाषा से जुड़े व्यावहारिक पक्ष को समझने के लिए ‘दी लल्लनटॉप’ ने एक्सपर्ट से बात की. उत्तर प्रदेश सचिवालय के भाषा विभाग में समीक्षा अधिकारी शांतनु श्रीवास्तव ने बताया-

‘जम्मू-कश्मीर संघशासित प्रदेश की आबादी का एक बड़ा तबका ऐसा है, जो डोगरी और कश्मीरी भाषा ही समझता है. हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू के साथ इन दोनों को भी राजभाषा का दर्जा मिलने से सरकार की नीतियों को सभी लोगों तक पहुंचाने में सहूलियत होगी. 

भाषा की एक खास सांस्कृतिक अपील होती है. जब किसी भाषा को राजभाषा का दर्जा दिया जाता है, तो उसे बोलने वाले लोगों को लगता है कि सरकार उनके सांस्कृतिक प्रतीकों की रक्षा कर रही है. ये बात उनको मानसिक संतुष्टि देने वाली होती है.’

जाहिर तौर पर प्रदेश के लोगों की नजरें अब संसद के मॉनसून सत्र की ओर टिकी होंगी, जहां इस बारे में बिल लाए जाने की तैयारी हो चुकी है.


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