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कश्मीर के अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को बैन करने वाली है भारत सरकार?

हुर्रियत कॉन्फ्रेंस. कश्मीर में अलगाववाद का ज़िक्र जब जब आता है, आप इसका नाम सुनते हैं. अब चर्चा है कि सरकार हुर्रियत कॉन्फ्रेंस पर रोक लगाने की सोच रही है. अगर वाकई ऐसा होता है, तो उसका नतीजा क्या होगा. और घाटी में जिस मत का प्रतिनिधित्व करने का दावा हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की पार्टियां करती हैं, उसका भविष्य क्या रह जाएगा.

अलगाववादी नेताओं के इशारे पर चलता था कश्मीर

22 जनवरी 2004. तब अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे. लालकृष्ण आडवाणी उप प्रधानमंत्री थे. आडवाणी से मुलाकात के लिए कश्मीर से कुछ खास नेता आए थे. इस मुलाकात की देश के बाहर भी खूब चर्चा थी. नॉर्थ ब्लॉक में आडवाणी ने कश्मीरी नेताओं से मुलाकात की. और इसके बाद नॉर्थ ब्लॉक के बाहर इंतजार कर रहे मीडिया से कहा था कि- इट हैज प्रूवड ए गुड बिगनिंग. यानी एक अच्छी शुरुआत हुई है, डायलॉग शुरू हो गया है.

इस मीटिंग को तब केंद्र सरकार का मास्टर स्ट्रोक कहा गया था. कश्मीर को लेकर वाजपेयी सरकार की बहुत बड़ी कामयाबी मान गया था. ये पहला मौका था जब कश्मीर के अलागाववादी नेताओं ने इतने बड़े स्तर पर भारत सरकार से मुलाकात की थी. यहां तक पहुंचने के लिए वाजपेयी सरकार को कई साल की मेहनत लगी थी. बैक चैनल बातचीत चल रही थी. सरकार ने वरिष्ठ पत्रकार आरके मिश्रा को कश्मीर के अलगाववादियों को मनाने का काम सौंपा था. इसके अलावा इंटेलिजेंस ब्यूरो जैसी एजेंसी भी इस काम में लगी हुई थी. तब जाकर कहीं अलगाववादी बातचीत के लिए दिल्ली आए थे.

इस घटना का ज़िक्र बस ये बताने के लिए कि एक दौर में केंद्र की सरकार के लिए अलगाववादी नेताओं की अहमियत कितनी थी. तब कश्मीर में शांति का सूत्र अलगाववादी नेताओं से होकर गुज़रता था. वाजपेयी के बाद मनमोहन सिंह सरकार में भी अलगाववादी नेताओं को मनाने की खूब कोशिश होती रही. खुद मनमोहन सिंह ने 2005 में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के कुछ नेताओं से दिल्ली में अपने आवास पर सीक्रेट मुलाकात की थी. और तब एक तरह से अलगाववादियों को राज़ी रखना सरकार की मजबूरी भी थी. उस दौर में कश्मीर में पत्थरबाज़ी से लेकर चुनाव के बहिष्कार तक, सब कुछ अलागाववादी नेताओं के कंट्रोल में था. कुछ साल पहले तक सैयद अली शाह गिलानी के दफ्तर से तय होता था कि कश्मीर में किस दिन बंद रहेगा. हड़ताल का पूरा कैलेंडर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की तरफ से जारी होता था.

2014 से बदलना शुरू हुए हालात

फिर 2014 में दिल्ली में सरकार बदलती है. कुछ सालों तक पहले की तरह अलगाववादियों की खबरें आती हैं. और फिर धीरे धीरे करके कश्मीर से नेशनल मीडिया में अलगाववादी नेताओं खबरें लगभग बंद सी हो जाती हैं. और फिर एक दिन सूत्रों के हवाले से खबर आती है कि नरेंद्र मोदी सरकार हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को बैन करने की तैयारी कर रही है. नरेंद्र मोदी सरकार अलगाववादियों के खिलाफ आखिरी चाल चलने की तैयारी में है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के दोनों गुटों पर सरकार Unlawful Activities (Prevention) Act यानी UAPA के तहत बैन लगा सकती है. UAPA की धारा 3(1) में बैन लगाने का प्रावधान है. ये धारा कहती है कि अगर किसी संगठन के बारे में केंद्र सरकार को ये लगा कि ये संगठन गैरकानूनी काम करने लगा है, तो सरकार उस संगठन को गैर कानूनी बताने वाली अधिसूचना जारी कर सकती है.” और अब इसी प्रावधान के तहत सरकार हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को बैन करने वाली फाइल तैयार कर रही है.

Amit Shah And Narendra Modi
पीएम मोदी के साथ गृहमंत्री अमित शाह. (तस्वीर: पीटीआई)

तो सरकार को अब जाकर क्यों लगा कि हुर्रियत गैरकानूनी काम कर रहा है. इस बैन की दो वजह गिनी जा सकती हैं. पहले तात्कालिक वजह की बात करते हैं. ताज़ा मामला एमबीबीएस कोटे की सीटें बेचकर पैसे उगाही का है. इस मामले का एक सिरा पाकिस्तान और दूसरा सिरा आतंक से जुड़ा है.

अलगाववादी नेताओं पर आरोप क्या हैं

पाकिस्तान के मेडिकल और इंजीनियरिंग इंस्टिट्यूट्स में कश्मीरी छात्रों के लिए कुछ सीट रिजर्व्ड होती हैं. स्कॉलरशिप कोटे के तहत कश्मीर के छात्रों की पढ़ाई फ्री होती है. इन सीटों पर दाखिला हुर्रियत नेताओं की सिफारिश से होता आया है. 2015 में जम्मू कश्मीर के अखबार डेली एक्सेलसियर में खबर छपी कि कोटे वाली सीटों पर अलगाववादी नेता गड़बड़ी करते हैं. अलगाववादी नेता या तो अपनी करीबियों का दाखिला करवाते हैं या फिर कश्मीर के छात्रों से पैसा लेकर ये सीटें बेचते हैं.

एमबीबीएस की एक सीट का 13 लाख रुपये लेते हैं. तब इस खबर पर तब ज्यादा चर्चा नहीं हुई. पिछले साल जब सैयद अली शाह गिलानी ने ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की चेयरमैनशिप से इस्तीफा दिया था. तब उसने भी अपने इस्तीफे में हुर्रियत संगठन में वित्तीय गड़बड़ी का ज़िक्र किया था, और जांच की बात भी कही थी. गड़बड़ी वाली ये बात सीटें बेचने वाले मामले से जोड़कर देखी गई थी.

जुलाई 2020 में जम्मू कश्मीर पुलिस ने इस मामले में केस दर्ज किया. जांच में ये बात आई कि कश्मीर के छात्रों से अलगाववादी जो पैसा लेते हैं उसका इस्तेमाल आतंक बढ़ाने के लिए होता है. हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से जुड़े चार लोगों की गिरफ्तारी भी इस मामले में हुई. इनके नाम हैं – मोहम्मद अकबर भट, फातिमा शाह, अब्दुल्ला शाह और सब्ज़ार अहमद शेख. हालांकि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ने इस आरोप को खारिज किया है. आज हुर्रियत नेता मीरवाइज़ उमर फारूख ने बयान जारी कर कहा कि सीट बेचने का आरोप सिर्फ प्रोपगेंडा है.

अलगाववादी नेताओं पर सख्त रहा है मोदी सरकार का रुख

बहरहाल, अभी इसी बात को आधार बनाकर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस पर बैन की तैयारी चल रही है. ये एक छोटी वजह हो सकती है. फैसले को जस्टिफाई करने वाली वजह. असल वजह मोदी सरकार की कश्मीर नीति में मिल सकती है. 2014 में सरकार बनाने के बाद से ही मोदी सरकार का अलगाववादियों को लेकर सख्त रुख रहा है. आपको याद होगा सरकार बनाने के कुछ महीने बाद ही पाकिस्तान और भारत के बीच विदेश सचिवों के स्तर की बातचीत तय हुई थी. लेकिन बातचीत से पहले पाकिस्तान के उच्चायुक्त ने दिल्ली में अलगाववादी नेता शब्बीर शाह से मुलाकात की थी.

इस आधार पर तब भारत ने पाकिस्तान के साथ बातचीत ही रद्द कर दी थी. कहा था कि ये भारत के मामलों में अंदरूनी दखल है. मोदी सरकार की तरफ से अलगाववादियों को तथाकथित कश्मीरी नेता कहकर इनकी प्रासांगिता खत्म करने की कोशिश हुई. हुर्रियत कॉन्फ्रेंस में शामिल कई संगठनों को बैन कर दिया गया. यासिन मलिक के जेकेएलएफ को बैन कर दिया. जम्मू कश्मीर जमात ए इस्लामी को बैन कर दिया.

अलगाववादी नेताओं के खिलाफ आतंकियों को पैसे देने के कई मामले चल रहे हैं. इनमें से एक मामले की जांच एनआईए कर रही है. इन मामलों में अलगाववादी नेताओं को जेल में डाला गया. अभी सैयद अली शाह गिलानी का दामाद अल्ताफ अहमद शाह, गिलानी का करीबी अयाज़ अकबर, कारोबारी ज़हूर वाटाली जेल में है. इनके ज़रिए सरकार ने गिलानी को कमज़ोर करने की कोशिश की.

इनके अलावा तहरीक ए हुर्रियत का प्रवक्ता पीर सैफुल्ला, मॉडरेट हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का प्रवक्ता शाहिद उल इस्लाम, मेराजुद्दीन कलवाल, नईम खान, फारुख अहमद डार उर्फ बिट्टा कराटे जैसे कई अलगाववादी नेता जेल में है. जेकेएलएफ का नेता यासिन मलिक जेल हैं. हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का चेयरमैन रहा सैयद अली शाह गिलानी पिछले साल इस्तीफा दे चुका है. मीरवाइज़ उमर फारूख को भी लंबे वक्त तक नज़रबंद रखा गया. तो कुल मिलाकर हुर्रियत की पूरी लीडरशिप भी कमज़ोर कर दी गई है. और UAPA के तहत बैन करने का फैसला हुर्रियत पॉलिटिक्स के ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है.

हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का इतिहास

कश्मीर में जितना लंबा इतिहास आतंक का है, लगभग उतनी ही उम्र हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की भी है. और जब इसकी शुरुआत खोजने इतिहास में उतरते हैं तो 1987 के विधानसभा चुनाव तक पहुंचते हैं. 1987 के चुनाव में कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के गठबंधन के खिलाफ मुस्लिम यूनाइडेट फ्रंट यानी MUF बना था. जमात ए इस्लामी जैसे कई मुस्लिम संगठनों ने मिलकर MUF बनाया था. उस चुनाव में MUF की अच्छी लहर थी. लेकिन नतीजे आए तो MUF को सिर्फ 4 सीटें मिली. इसमें एक सैयद अली शाह गिलानी भी थे.

वो जम्मू कश्मीर जमात ए इस्लामी के टिकट पर सोपोर से चुनाव जीते थे. MUF ने धांधली के आरोप लगाए. नतीजों पर खूब विवाद हुआ. इस चुनाव को जम्मू कश्मीर के इतिहास का सबसे विवादित चुनाव माना जाता है. चुनाव में हारे MUF के नेताओं का एक धड़ा आतंक के रास्ते निकल पड़ा. सहयोग मिला पाकिस्तान का. हथियार और ट्रेनिंग मिली. जबकि अली शाह गिलानी जैसे नेता ओवरग्राउंड रहकर आज़ादी की मांग बुलंद करने लगे. ये कहलाए अलगाववादी नेता. इनमें भी दो धड़े थे.

एक धड़ा कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने का समर्थक था. और दूसरा जम्मू कश्मीर की आज़ादी की बात करता था. हालांकि इस दूसरे धड़े के नेता पाकिस्तान को भी खास पसंद नहीं आए और ISI की शह पर कई नेताओं की हत्याएं हुईं. खैर, दिसंबर 1992 में मीरवाइज़ उमर फारूख ने एक बैठक बुलाई और सब पार्टियों से कहा कि हमें मिलकर लड़ना चाहिए.

इस बात पर सहमति बन गई और 31 जुलाई 1993 को ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस बनाई गई. हुर्रियत अरबी का शब्द है. मतलब होता है आज़ादी. 26 पार्टियां इसमें शामिल थी. इसके पहले चेयरमैन बने मीरवाइज़ उमर फारुख. हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की एक्सीक्यूटिव काउंसिल में 7 सदस्य थे.

1. जमात ए इस्लामी से सैयद अली शाह गिलानी.
2. जेकेएलएफ से यासीन मलिक,
3. मुस्लिम कॉन्फ्रेंस से अब्दुल गनी भट,
4. इत्तेहादुल मुस्लमीन से मौलवी अब्बास अंसारी,
5. पीपल्स लीग से शेख अब्दुल अज़ीज.
6. आवामी एक्शन कमेटी से मीरवाइज़ उमर फारूख
7. पीपल्स कॉन्फ्रेंस से अब्दुल गनी लोन.

अब्दुल गनी लोन बाद में चुनावी राजनीति में आ गए थे. लेकिन 2002 में उनकी हत्या हो गई. उनके बेटे सज्जाद लोन अभी पीपल्स कॉन्फ्रेंस पार्टी के प्रमुख हैं. दूसरे बेटे बिलाल लोन अब भी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का हिस्सा हैं.

तो हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के शुरुआती ये 7 बड़े चेहरे थे. हालांकि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस में भी आपस में खूब झगड़े हुए. कई नेता छोड़कर चले गए थे. कई निकाल दिए गए. 2003 में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस भी दो हिस्सों में बंट गई. एक खेमे मीरवाइज़ उमर फारूख वाला, जो भारत सरकार के साथ बातचीत का पक्षधर था. इस गुट को मॉडरेट हुर्रियत नेता कहते हैं. दूसरा धड़ा गिलानी की अगुवाई वाला. गिलानी हमेशा रेफरेंडम और आज़ादी पर ही अड़े रहे. सरकार के साथ बातचीत की मुखाल्फत करते रहे. इस धड़े को हार्डलाइन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस कहते हैं.

माना जाता है कि गिलानी कश्मीर में पाकिस्तान की सबसे भरोसेमंद आवाज़ हैं. वो कश्मीर में पाकिस्तान के झंडाबरदार हैं. अपनी रैलियों में कई बार पाकिस्तान के नारे बुलंद कर चुके हैं. मोदी सरकार आने तक गिलानी ही कश्मीर में हुर्रियत का सबसे बड़ा चेहरा थे. हालांकि अब उनकी राजनीति भी अवसान पर है. उनकी उम्र भी 90 से ऊपर हो चुकी है. हुर्रियत कॉन्फ्रेंस भी वो छोड़ चुके हैं. अब मीरवाइज़ उमर फारुख के अलावा कोई बड़ा हुर्रियत नेता नज़र नहीं आता है. इसलिए माना जा रहा है कि हुर्रियत क़ॉन्फ्रेंस की राजनीति भी अब खात्मे की तरफ है.

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अफगानिस्तान के हालात की जानकारी देगी सरकार

विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर संसद में मौजूद राजनैतिक दलों के नेताओं को अफगानिस्तान में बदलते हालात की जानकारी देंगे. ये जानकारी डॉ जयशंकर ने ट्वीट करके दी. इस ट्वीट को रीट्वीट करते हुए संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने ट्वीट किया कि ये बैठक 26 अगस्त को सुबह 11 बजे संसद भवन एनेक्सी के मेन कमेटी रूम में होगी. इसके लिए न्योता ईमेल के ज़रिए भेजा जाएगा. इसके बाद एक मज़ेदार चीज़ हुई. AIMIM के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने प्रह्लाद जोशी के ट्वीट पर रिप्लाई करते हुए कह दिया, सर मैं उम्मीद करता हूं कि AIMIM को भी न्योता मिलेगा.

अब तक भारत सरकार तालिबान को लेकर कुछ भी साफ-साफ कहने से बचती आई है. 1996 से लेकर 2001 तक जब तालिबान अफगानिस्तान पर काबिज़ रहा, भारत सरकार ने उसे मान्यता नहीं दी थी. लेकिन कंधार विमान हाईजैक के वक्त इस नीति के चलते हमें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. इसीलिए सरकार नहीं चाहेगी कि अफगानिस्तान जैसे पड़ोसी मुल्क को लेकर हम दोबारा ऐसे असमंजस में फंसें कि काम के वक्त हमें मालूम ही न हो कि बात किससे करनी है. फिर पिछले 20 सालों में भारत ने अफगानिस्तान में भारी निवेश किया है. अफगानिस्तान में तालिबान का शासन अब एक सच्चाई है. तो अगर भारत सरकार तालिबान से कोई संबंध ही न रखे, तो फिर न सिर्फ हम अरबों के अपने निवेश से हाथ धोएंगे, बल्कि अपने एक और पड़ोसी से संबंध खराब कर लेंगे.

इसीलिए सरकार अति के फेर में फंसकर कोई फैसला लेना नहीं चाहती. लेकिन वो तालिबान से जुड़े किसी फैसले में अकेले खड़ी नहीं दिखना चाहती. ऐसा क्यों है, समझना मुश्किल नहीं है –

– 20 अगस्त को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उज्जैन मामले को लेकर कहा कि तालिबानी मानसिकता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

– इससे पहले यूपी के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने भी यूपी विधानसभा में कहा था कि कुछ लोग देश का तालिबानीकरण करना चाहते हैं, इन्हें एक्सपोज़ करना ज़रूरी है.

तो साफ है कि भारत की देसी राजनीति में तालिबान का एक खास मतलब है. इसीलिए विदेश नीति से जुड़े इस मसले पर सरकार देसी राजनीति के अनुरूप फैसला लेना चाहती है. और इसी के लिए आम सहमति बनाने का पहला कदम है सर्वदलीय बैठक.

मरकज़ मामला: दिल्ली हाईकोर्ट का दिल्ली पुलिस को आदेश

नई दिल्ली के निज़ामुद्दीन मरकज़ मामले में आज दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली पुलिस को आदेश दिया कि निज़ामुद्दीन मरकज़ स्थित रहवासी परिसर की चाबियां तब्लीगी जमात के अध्यक्ष मौलाना मुहम्मद साद की मां को सौंप दी जाएं. हालांकि कोर्ट ने ये साफ किया कि वो मरकज़ के दूसरे हिस्सों में प्रवेश नहीं करेंगी. निज़ामुद्दीन मरकज़ के तीन हिस्से हैं, जिनमें एक मस्जिद, रहवासी परिसर और एक मदरसा है. पिछले साल निज़ामुद्दीन मरकज़ की पहचान कोरोना हॉटस्पॉट के रूप में हुई थी और इसे लेकर मामला भी दर्ज हुआ था. इसी के बाद से ये पूरा परिसर सील था.

सेना ने 5 महिला अधिकारियों को मिला प्रमोशन

सेना ने 5 महिला अधिकारियों को कर्नल टाइम स्केल के पद पर पदोन्नत कर दिया है. रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि महिला अधिकारियों को सेना में स्थायी कमीशन देने के साथ-साथ पदोन्नति का ये कदम बताता है कि सेना लैंगिक समानता की दिशा में काम कर रही है.

पदोन्नति पाने वाली अधिकारियों के नाम हैं-

लेफ्टिनेंट कर्नल संगीता सरदाना – कोर ऑफ सिग्नल्स
लेफ्टिनेंट कर्नल सोनिया आनंद – कोर ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मेकैनिकल इंजीनियर्स EME
लेफ्टिनेंट कर्नल नवनीत दुग्गल – कोर ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मेकैनिकल इंजीनियर्स EME
लेफ्टिनेंट कर्नल रीनू खन्ना कोर ऑफ इंजीनियर्स
लेफ्टिनेंट कर्नल रिचा सागर कोर ऑफ इंजीनियर्स

ये पहली बार है कि सिग्नल्स, EME और इंजीनियर्स जैसे कोर्स की महिला अधिकारियों को कर्नल रैंक तक प्रमोट किया गया हो. इससे पहले सिर्फ आर्मी मेडिकल कोर AMC, जज एडवोकेट जनरल JAG और आर्मी एडुकेशन कोर AEC की महिला अधिकारियों को ही कर्नल रैंक तक प्रमोट किया गया था.


 

वीडियो- कश्मीर में बड़े एक्शन की तैयारी, हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को बैन कर देगी मोदी सरकार?

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