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मंदिर और मस्जिद ढहाने में सरकार पक्षपात कर रही है?

अवैध धार्मिक स्थलों के साथ क्या होना चाहिए? आप बिना एक भी पल गवाएं कहेंगे कि तोड़ देना चाहिए. क्योंकि ऐसे निर्माण न सिर्फ कानून का उल्लंघन करते हैं, बल्कि बिना वजह धर्म और कानून को आमने-सामने भी कर देते हैं. ऐसी ही बातों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 2009 में एक फैसला दिया कि सार्वजनिक स्थलों और सड़कों पर मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे वगैरह नहीं बनने चाहिए. अच्छी बात है न. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इसी आदेश को जब कर्नाटक हाईकोर्ट ने लागू करवाना चाहा, तो क्या सत्ता और क्या विपक्ष, सब के सब धर्मरक्षक बनने की रेस में कूद गए. अब कर्नाटक सरकार कानून तक बनाने जा रही है, जो इन्हीं अवैध धार्मिक स्थलों को गिराए जाने से बचाएगा. है न हैरानी की बात?.

दलित के मंदिर जाने पर जुर्माना लगाया

कर्नाटक और मंदिर. पिछले करीब 10 दिन से ये दोनों शब्द खबरों में साथ-साथ आ रहे हैं. हम मुख्य खबर पर आएंगे. लेकिन पहले कर्नाटक में मंदिर से जुड़ी एक छोटी खबर पर बात कर लेते हैं, जो आज आई. कर्नाटक के कोप्पल ज़िले में कुस्तागी तालुक है. यहां मियापुरा नाम का गांव है. गांव के एक बच्चे का चौथा जन्मदिन था. अब बर्थ-डे था तो पिता ने सोचा कि बच्चे को मंदिर ले चलते हैं. मंदिर चले तो गए, लेकिन ये उनको महंगा पड़ गया. बच्चे के पिता पर 25 हज़ार रुपये का जुर्माना लगा दिया गया. मंदिर की सफाई के लिए 11 हज़ार रुपये चार्ज अलग से लगाया गया.

क्यों हुआ ये. क्योंकि गांव के तथाकथित ऊंची जाति के लोगों को लगता था कि बच्चा और उनके पिता दलित हैं, तो मंदिर में जाकर उन्होंने अपराध किया है. हालांकि इस मामले ने तूल पकड़ा तो स्थानीय प्रशासन ने गांव वालों को समझाया. सिर्फ समझाया, किसी पर केस दर्ज नहीं हुआ. हम बस इतना बताना चाहते हैं कि धर्म के नाम पर बने मंदिर या मस्जिद या अन्य आस्था के स्थलों में हमेशा सब सही हो, ये जरूरी नहीं है. अगर गलत हो रहा है तो उन पर कार्रवाई भी होनी चाहिए.

कर्नाटक में मंदिर को गिराए जाने को लेकर बवाल क्या है

कर्नाटक में मंदिर को गिराए जाने को लेकर पिछले कई दिनों से बवाल मचा है. बवाल ऐसा कि मंदिर की राजनीति करती आई बीजेपी को कांग्रेस और जेडीएस जैसी पार्टियां घेर रही हैं. कर्नाटक की सरकार को हिंदू विरोधी बताया जा रहा है. कई हिंदू संगठनों ने भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है. और आखिरकार बोम्मई सरकार को हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ विधानसभा में बिल लाना पड़ा है. अब ये पूरा मामला समझते हैं.

करीब हफ्तेभर पहले सोशल मीडिया पर एक मंदिर को बुलडोज़र से गिराने का वीडियो वायरल हुआ. इस वीडियो के साथ ये मेसेज इस तरह भी चले कि तमिलनाडु की स्टालिन सरकार हिंदू विरोध में मंदिर तोड़ रही है. लेकिन ये वीडियो कर्नाटक का निकला. मैसूर के नंजनगुड तालुक में उचागनी गांव है. यहां महादेवम्मा मंदिर को ढहाया गया था. मंदिर ढहाने के विरोध वाली राजनीति की मशाल थामी कांग्रेस ने. पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता सिद्दारमैया ने लिखा कि वो प्राचीन मंदिर को ढहाने का विरोध करते हैं. इलाके के लोगों से सलाह मशविरा किए बिना ये मंदिर ढहाया गया है, ये धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ है. फिर जेडीएस की तरफ से भी विरोध हुआ. हिंदू संगठनों ने बीजेपी सरकार को खुली धमकी देना शुरू कर दिया. यहां तक कहा गया कि हिंदू धर्म को बचाने के लिए हमने महात्मा गांधी तक को नहीं बख्शा.

अब बात आती है कि मंदिर को ढहाया क्यों गया था. वजह समझने के लिए हमें कुछ साल पीछे जाना पड़ेगा. अप्रैल 2006 में गुजरात हाई कोर्ट ने स्वत संज्ञान लेते हुए गैरकानूनी तरीके से बने धार्मिक स्थलों को गिराने का आदेश दिया था. तब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और अमित शाह थे गृह मंत्री. हाई कोर्ट के आदेश के बाद गुजरात में धार्मिक स्थलों को गिराने का काम शुरू हुआ. कुछ मंदिरों को ढहाया गया, मस्जिदों का नंबर भी आया. मई 2006 में गुजरात के वडोदरा में नगरपालिका कर्मचारियों ने एक मस्जिद को गिराने की कोशिश की. जिसके बाद वडोदरा में बड़े स्तर पर हिंसा भड़क गई थी. हिंसा में 8 लोगों की जान चली गई थी. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या है?

मामला कई सालों तक सुप्रीम कोर्ट में चला और 29 सितंबर 2009 को सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश आया. इसमें दो बड़ी बातें थी.

पहली. मंदिर, मस्जिद, चर्ज, गुरुद्वारा आदि के नाम पर सार्वजनिक सड़कों, पार्कों या किसी अन्य सार्वजनिक जगह पर बिना इजाजत के कोई नया निर्माण नहीं होगा.
दूसरा-पहले से बने गैर कानूनी धार्मिक निर्माणों को राज्य सरकारें केस टू केस रिव्यू करेंगी और उसके बाद उचित कदम उठाएंगी.

Supreme Court
सुप्रीम कोर्ट ने अवैध धार्मिक स्थलों को गिराए जाने से संबंधित फैसला सुनाया था. (फोटो- PTI)

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को लेकर वक्फ बोर्ड ने याचिका दायर की. मांग थी कि उनके स्थलों को ना ढहाया जाए. और इस याचिका के जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हम गैरकानूनी मंदिर और मस्जिद में भेद नहीं करते है. हालांकि जब फैसला लागू करने की बात आई तो मंदिर और मस्जिद में खूब भेद हुआ. सत्ताधारी पार्टियों ने अपनी सहूलियत से राजनीति शुरू कर दी. आपको दुर्गाशक्ति नागपाल का नाम याद होगा. उत्तर प्रदेश की IAS अधिकारी. 2013 में गौतम बुद्धनगर में गैरकानूनी मानकर एक मस्जिद की दीवार गिरा दी थी. तब यूपी में अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे. और सरकार दीवार गिराने वाली अफसर को निलंबित किया था. फिर तबादला कर दिया था. वो दीवार भी फिर से बन गई.

कई राज्यों में यही हाल

कमोबेश बाकी राज्यों में भी ये ही हाल रहा है. हाईकोर्ट्स आदेश देते रहे कि गैरकानूनी तरीके से धार्मिक स्थल नहीं बनने देना है, जो बन गए उनको ढहाना है. अदालतें सरकारों से रिपोर्ट्स भी मांगती रहीं, लेकिन कुछ राज्यों में थोड़ी बहुत कार्रवाई के अलावा ज्यादा कुछ नहीं हुआ.

कर्नाटक हाईकोर्ट को लगा कि गैरकानूनी निर्माण ढहाने में कोई खास काम नहीं हुआ है. इसलिए स्वत संज्ञान लेकर 27 जून 2019 को फैसला दिया कि सितंबर 2009 के बाद बने सारे गैरकानूनी निर्माण हटाए जाने चाहिए. सरकार ने इस फैसले पर कोई खास ध्यान नहीं दिया. लेकिन उसके बाद भी अदालत सरकार से पूछती रही कि क्या कार्रवाई की, प्रोग्रेस रिपोर्ट मांगगी. इसलिए कर्नाटक सरकार ने निर्माण ढहाने का काम शुरू किया.

प्रदेश के चीफ सेक्रेटरी पी रवि कुमार ने सभी जिलों के डिप्टी कमिश्नर को 1 जुलाई को चिट्ठी लिखी थी. इसके बाद कार्रवाई शुरू हुई, जिसमें 6 हजार से ज्यादा गैरकानूनी तरीके से बने धार्मिक स्थलों की पहचान हुई. तोड़ने का काम भी शुरू हुआ. अखबारों की रिपोर्ट के मुताबिक बड़ी संख्या में मंदिर टूटे. मस्जिद और चर्चों को भी तोड़ा गया. कुछ धार्मिक स्थलों को दूसरी जगह शिफ्ट करना तय हुआ. लेकिन फिर 10 सितंबर को नंजनगुड तालुक में मंदिर टूटा तो विवाद शुरू हो गया. जैसा हमने पहले बताया, कांग्रेस और जेडीएस ये साबित करने में लग गए, मंदिर टूटने से हिंदुओं का अपमान हुआ है. अखिल भारतीय हिंदू महासभा नाम के संगठन ने कर्नाटक के सीएम को धमकियां देना शुरू किया. संगठन के नेता धर्मेंद्र ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा –

“जो भी हिंदुओं की संस्कृति और सभ्यता के खिलाफ़ जाएगा, उसे नहीं बख्शा जाएगा. जब हिंदुओं को दुख पहुंचाया गया तो गांधी भी मारे गए. हमने गांधी को नहीं बख्शा तो आप कौन हो.”

विरोध की इस वाली धारा में बीजेपी के नेता भी शामिल हो गए. मैसूर से बीजेपी के सांसद हैं प्रताप सिम्हा. उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि सिर्फ मंदिरों को तोड़ा जा रहा है, दूसरे धर्मों के स्थलों को नहीं तोड़ा जा रहा है. वहां आम आदमी पार्टी भी अपने को ज्यादा बड़ा हिंदू हितेषी साबित करने में लग गई. AAP ने सवाल उठाया कि जब मंदिर टूट रहा था तो बीजेपी सांसद चुप क्यों थे.

Karnataka Temple Demolition2
कर्नाटक में अवैध मंदिरों के गिराए जाने का जमकर विरोध हो रहा है.

तो इस विरोध के आगे बोम्मई सरकार बैकफुट पर आग गई. विधानसभा में एक बिल लाया गया. कर्नाटक रिलिजियस स्ट्रक्चर प्रोटेक्शन बिल 2021. ये बिल कहता है कि कोर्ट का आदेश चाहे जो भी हो, ये कानून लागू होने के दिन से कर्नाटक अपने नियमों से धार्मिक स्थलों का संरक्षण करेगा.

कर्नाटक सरकार अपना रास्ता निकाल लाई

तो इस तरह से गैरकानूनी धार्मिक ढांचों को ढहाने से बचाने के लिए कर्नाटक सरकार ने अपना रास्ता निकाल लिया है. अब आपको एक पुराना मामला याद दिलाना चाहते हैं. इसी साल 17 मई को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में एक मस्जिद को ढहाया गया था. मस्जिद को ढहाने का खूब विरोध हुआ. यूपी में बीजेपी की सरकार है. प्रशासन ने कहा कि ये गैरकानूनी निर्माण है. इसलिए ढहाया गया. किसी बीजेपी नेता ने मस्जिद ढहाने का विरोध नहीं किया. लेकिन फिर हम इससे थोड़े वक्त पहले घटे दिल्ली की चांदनी चौक वाले मंदिर को ढहाने वाले वाकये पर आते हैं, तो हमें याद आता है कि कपिल मिश्रा जैसे बीजेपी नेता इस कार्रवाई का विरोध करते हैं. अब आप देखिए दिल्ली, यूपी और कर्नाटक. तीनों जगह एक ही पार्टी का रवैया कैसे अलग अलग दिखता है.

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बाराबंकी की रामसनेहीघाट तहसील में विवादित स्थल को प्रशासन ने गिरवा दिया है जिस पर जमकर बवाल हुआ था.

अगर गैरकानूनी निर्माण मानकर मस्जिद को गिराया जा सकता है, तो गैर कानूनी मंदिर क्यों नहीं गिराया जा सकता है. सेक्युलर वोट्स के नाम पर राजनीति करने वाली पार्टियां भी इसमें बराबर की भागीदार हैं. किसी को मस्जिद की दीवार गिरने पर अधिकारी का तबादला करना है तो कोई सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद मंदिर गिराए जाने का धार्मिक फायदा उठाने की कोशिश करता है.

अगर कोई भी धार्मिक स्थल बिना इजाजत के सार्वजनिक जगह पर बना है तो क्यों नहीं गिराया जाना चाहिए. कहने की जरूरत नहीं है कि ये तरीके जमीने कब्जा करने के लिए भी इस्तेमाल होते हैं. इसलिए कोर्ट के आदेशों के बावजूद इस तरह के निर्माणों की तरफदारी करने की राजनीति शर्मनाक है.


दी लल्लनटॉप शो: अवैध धार्मिक स्थलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ कर्नाटक में बिल क्यों?

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