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कर्नाटक में कौन जीतेगा, इसका अंदाज़ा लगाना है तो इधर आएं

साल 1167. उत्तरी कर्नाटक में हुई एक शादी ने कल्याणी के कलाचुरी साम्राज्य को बेहद नाराज कर दिया. इस शादी के केंद्र में थे कवि, संत और दार्शनिक बसवन्ना. किसी दौर में राजा बिजला के यहां मंत्री रहे बसव ऐसा समाज चाहते थे जहां जाति और लिंग के नाम पर कोई भेदभाव ना हो. सदियों से जाति के नाम पर दबाए गए समाज ने उनके इस विचार को हाथों-हाथ लिया और अपनी जातिगत पहचान छोड़कर भगवान शिव के एक बड़े परिवार का हिस्सा बनने लगे. बसव अपनी बढ़ती लोकप्रियता की वजह से पहले से ही बिजला के निशाने पर थे. बावजूद इसके कि वो रिश्ते में उसके बहनोई होते थे.

इधर बसव जाति को खत्म करने के लिए नए-नए प्रयोगों करने में जुटे हुए थे. आखिरकार उन्होंने कुछ ऐसा करने का साहस दिखाया जिसके बारे में उस दौर में सोचा तक नहीं जा सकता था. उन्होंने एक ब्राह्मण लड़की की शादी एक गैर-ब्राह्मण लड़के से करवा दी. बसव की नजर में यह जाति का सबसे बड़ा तोड़ था. यह ब्राहमणों के धर्म पर एकाधिकार के खिलाफ खुली बगावत थी. बिजला ने इसे हद पार करने की तरह लिया.

बसवन्ना: लिंगायत समाज के आदिपुरुष
बसवन्ना: लिंगायत समाज के आदिपुरुष

बिजला के आदेश पर शादी में शामिल हुए सभी लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया. उनकी आंखें निकलवा दी गईं और उन्हें सरेआम हाथियों से कुचला गया. बिजला ने सोचा कि इतनी बर्बर सजा के बाद कोई उनके खिलाफ विद्रोह करने का साहस नहीं करेगा. लेकिन विद्रोह बर्बरता से कहां डरते हैं. देखते-देखते ही गलियां युद्ध का मैदान बन गई. बसव की लाख समझाइश के बावजूद उनके अनुयायी शांत नहीं बैठे. वो बिजला के सैनिकों को घेरकर मारने लगे. इन दंगों का अंत हुआ बिजला की मौत के साथ. अपने अनुयायियों द्वारा की गई हिंसा से दुखी बसव कुडालसंगम छोड़कर चले गए. वो जगह जहां से उन्होंने अपने इस आंदोलन की शुरुआत की थी. इसके थोड़े दिन बाद उनकी भी मौत हो गई. बसव चले गए लेकिन उनके अनुयायी बचे रहे. आज वो खुद को लिंगायत कहते हैं. बची रही वो जाति भी जिसको मिटाने की कसमें खाते हुए बसवा ने अपना नया संप्रदाय खड़ा किया था.

कर्नाटक का एकीकरण इस मानचित्र से समझिए
कर्नाटक का एकीकरण इस मानचित्र से समझिए

जाति और भूगोल दो ताने हैं जिनके ऊपर कर्नाटक की राजनीति बुनी हुई है. 1 नवम्बर, 1956 को जब कर्नाटक बना तो वो चार अलग-अलग रियासतों का हिस्सा था. बॉम्बे स्टेट और हैदराबाद स्टेट का जो हिस्सा कन्नड़ बोलता था उसे आज उत्तर कर्नाटक के नाम से जाना जाता है. मैसूर स्टेट का कन्नड़भाषी इलाका आज का दक्षिण कर्नाटक बनाता है. कोस्टल कर्नाटक या समुद्र के किनारे का कर्नाटक 1956 से पहले मद्रास स्टेट का हिस्सा हुआ करता था.

कर्नाटक में दो बड़े समुदाय हैं वोक्कालिगा और लिंगायत. दोनों बिरादरियों की तादाद लगभग 15 से 17 फीसदी आंकी जाती है. दलित वोट यहां का सबसे बड़ा वोटबैंक माना जाता है. कर्नाटक में दलितों की संख्या लगभग 23 फीसदी है. इसके अलावा कुरुबा यहां की अति पिछड़ी जाती है जिसकी आबादी 10 से 12 फीसदी है. मुस्लिम आबादी भी 10 फीसदी के लगभग है. 5 फीसदी आबादी सवर्ण मतदाताओं की मानी जाती है. कर्नाटक की हर सियासी पार्टी इसी हिसाब से अपना गेम प्लान तय करती है. इसे मोटा-मोटी इस तरह से समझा जा सकता है.

बीजेपी

भारतीय जतना पार्टी कर्नाटक में लिंगायत वोटों के भरोसे है. लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा दिए जाने की मांग का समर्थन करके सूबे के कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने बीजेपी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. उत्तरी कर्नाटक का ज्यादातर हिस्सा लिंगायतों के बाहुल्य वाला है. यहां कांग्रेस सीधे तौर पर बीजेपी से टक्कर लेगी.

कर्नाटक का तटीय इलाका सांप्रदायिक रूप से काफी तनाव वाला रहा है. यहां पर बीजेपी हिंदुत्व के नाम पर ध्रुवीकरण की कोशिश में लगी हुई है. यहां पिछले चुनाव में कांग्रेस को बढ़त मिली थी लेकिन इस बार स्थिति बदल भी सकती है.

कर्नाटक में यदुरप्पा बीजेपी का चेहरा हैं. वो लिंगायत समुदाय से आते हैं.
कर्नाटक में येदियुरप्पा बीजेपी का चेहरा हैं. वो लिंगायत समुदाय से आते हैं.

कर्नाटक के दलित मोटे तौर पर दो भागो में बंटे हुए हैं. पहले दक्षिणमार्गी जिन्हें स्थानीय भाषा में होल्या कहा जाता है. दूसरे वाममार्गी जिन्हें स्थानीय भाषा में मडिया कहा जाता है. कांग्रेस नेता मलिकार्जुन खड्गे होल्या समुदाय से आते हैं. ये लोग संख्या में मडिया के मुकाबले कम हैं और कांग्रेस के पक्ष में लामबंद हैं.

मडिया समुदाय का दावा है कि संख्या में ज्यादा होने के बावजूद कांग्रेस ने उन्हें वाजिब प्रतिनिधित्व नहीं दिया. मडिया समुदाय के ज्यादातर लोग उत्तरी कर्नाटक में हैं जो कि लिंगायत बाहुल्य वाला इलाका है. 2008 में कांग्रेस से नाराज होकर ये लोग बीजेपी के पाले में चले गए थे. उस समय येदियुरप्पा और मडिया समुदाय के बीच एक समझौता हुआ था. इसके मुताबिक उत्तर कर्नाटक में SC (अनुसूचित जाति) के लिए आरक्षित सीट पर लिंगायत समुदाय मडिया उम्मीदवार का समर्थन करेंगे और सामान्य सीट पर मडिया लिंगायत उम्मीदवार का. नतीजतन 36 में 23 आरक्षित सीट बीजेपी के पाले में गई थी. 2013 में येदियुरप्पा बीजेपी से अलग लड़ रहे थे और यह समझौता फिर कायम नहीं हो पाया. बीजेपी फिलहाल लिंगायत, ब्राह्मण और मडिया वोटो के समीकरण पर कर्नाटक में चुनाव लड़ने जा रही है. बाकी मोदी मैजिक और हिंदुत्व जैसे हथियार भी उसके पास हैं.

कांग्रेस

कांग्रेस का सूबे में गेम प्लान बहुत साफ़ है. लिंगायत और वोक्कालिगा एक जाति नहीं बल्कि जातियों का समुदाय हैं. दोनों ही समुदाय बहुत से टुकड़ो में बंटे हुए हैं. इनमें से कुछ धड़ों में कांग्रेस का अपना जनाधार है. इसके अलावा वो गैर-लिंगायत, गैर-वोक्कालिगा वोटरों में अच्छी पकड़ रखती है.

कर्नाटक में वोक्कालिगा और लिंगायत के बाद तीसरा बड़ा वोटबैंक कुरुबा समुदाय का है. इनकी तादाद तकरीबन 10 फीसदी मानी जाती है. मुख्यमंत्री सिद्धारमैया इसी बिरादरी से आते हैं. ऐसा माना जा रहा है कि सिद्धारमैया की बदौलत कांग्रेस कुरुबा वोटरों को अपने पक्ष में लामबंद कर पाने में सफल हो सकती है. इसके अलावा उत्तर कर्नाटक के मुस्लिम मतदाताओं का भी कांग्रेस के पक्ष में जाने के कयास लगाए जा रहे हैं. इसकी वजह यह है कि उत्तर कर्नाटक में जनता दल (एस) की मौजूदगी ना के बराबर है. यह लगभग वही समीकरण है जिसके दम पर 1994 में एचडी देवेगौड़ा जीते थे.

सिद्धारमैय्या: कर्नाटक में बड़ी बारीकी से कांग्रेस की जीत बुनने में लगे हुए हैं.
सिद्धारमैया: कर्नाटक में बड़ी बारीकी से कांग्रेस की जीत बुनने में लगे हुए हैं.

लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देना एक ऐसा दांव है जिसने बीजेपी को मुश्किल में डाल दिया है. कांग्रेस उम्मीद कर रही है कि इसके दम पर वो बीजेपी के परंपरागत वोटबैंक में सेंध लगाने में कामयाब हो पाएगी.

कांग्रेस सूबे में कन्नड़ पहचान को भुनाने की कोशिश में लगी हुई है. दक्षिण भारत में बीजेपी के साथ उत्तर भारतीय पार्टी होने का लेबल चस्पा है. इधर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया लगातार कन्नड़ पहचान को मजबूत करने में लगे हुए हैं. वो कर्नाटक के लिए अलग झंडे का प्रस्ताव केंद्र को भेज चुके हैं. उन्होंने बेंगलुरु मेट्रो में हिंदी साइनबोर्ड लगाए जाने का विरोध किया है. वो स्कूल की पढ़ाई में कन्नड़ पढ़ना अनिवार्य बना चुके हैं. सरकारी दफ्तरों में भी कन्नड़ में काम किए जाने पर जोर दिया जा रहा है. उत्तर बनाम दक्षिण भारत कर्नाटक में सियासी मुद्दा बनने की हैसियत रखता है. सिद्धारमैया इसे भुनाने की फिराक में हैं.

कुल मिलाकर कांग्रेस सूबे में लिंगायत, वोक्कालिगा में अपने जनाधार, होल्या दलित, कुरुबा और मुस्लिम मतदाताओं की बदौलत मैदान में है. इसके अलावा उसके पास कन्नड़ अस्मिता भी है जो कि काफी कारगर साबित हो सकती है.

जनता दल सेक्युलर

जनता दल सेक्युलर माने एचडी देवेगौड़ा की पार्टी. जैसे उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का दावा है कि उसे समाज के हर तबके का साथ मिला हुआ है और समाज का हर तबका कहता है कि वो यादवों की पार्टी है, ठीक वैसे ही जनता दल की बुनियाद वोक्कालिगा मतदाताओं पर टिकी है. दक्षिण कर्नाटक या फिर मैसूर स्टेट के हिस्से में वोक्कालिगा समाज का बाहुल्य है.

जेडीएस का जनाधार भी इन्हीं इलाकों में मजबूत है. देवेगौड़ा ने कर्नाटक में उसी सियासी समीकरण को अपनाया जिसे बिहार में लालू यादव और उत्तर प्रदेश में मुलायम यादव ने गांठा था. एक वर्चस्वशाली जाति और मुस्लिम मतदाताओं को एक छतरी के नीचे लाना. कर्नाटक में देवेगौड़ा ने यादव की जगह वोक्कालिगा को इस समीकरण में बैठा दिया. देवेगौड़ा खुद इसी बिरादरी से आते हैं और अपनी बिरादरी में उनकी लोकप्रियता मसीहा जैसी है.

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कांग्रेस जहां उत्तर कर्नाटक में सीधे तौर पर बीजेपी के मुकाबिल होगी वहीं दक्षिण कर्नाटक में यह मुकाबला जेडीएस बनाम कांग्रेस रहने की उम्मीद है. यहां कांग्रेस और जेडीएस मुस्लिम वोट साझा करेंगे. यहां वोक्कालिगा के बाद कुरुबा भी अच्छी तादाद में हैं. मुख्यमंत्री सिद्धारमैया भी दक्षिण कर्नाटक से आते हैं. ऐसे में जेडीएस के पास वोक्कालिगा-मुस्लिम समीकरण के चल जाने की उम्मीद है जो उसे मैदान में बनाए हुए है.

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