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नए-नए कांग्रेसी बने इन 2 युवा नेताओं के बारे में जान लीजिए

28 सितंबर को सुबह से खबर थी कि राहुल गांधी आज कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवाणी को पार्टी में शामिल कराएंगे. फिर पार्टी कार्यालय पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे. लेकिन दोपहर के तीन क्या बजे, पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू ने इस्तीफे वाला बम दाग दिया. क्या कांग्रेस और क्या पत्रकार, सबके कार्यक्रम धरे के धरे रह गए. तेज़ी से बदलते घटनाक्रम में इतनी सूचनाएं आईं कि सब चौंधिया गए. जहां राहुल को दो नए साथियों के साथ मीडिया के सामने आना था, वहीं कांग्रेस के तमाम प्रवक्ता पंजाब के प्रकरण पर बाइट देने को मजबूर हो गए. पंजाब पर काफी बात हुई. लेकिन यहां हम बात करेंगे उन दो चेहरों की, जिनकी लाइमलाइट सिद्धू के इस्तीफे ने छीन ली. कन्हैया और जिग्नेश.

# कन्हैया कुमार

9 फरवरी 2016. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में कुछ अज्ञात लोगों ने संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरू को फांसी दिए जाने के खिलाफ प्रदर्शन किया. इस प्रदर्शन के दौरान देश विरोधी नारेबाजी के आरोप लगे. खूब बवाल हुआ. कन्हैया कुमार तब जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष थे. 12 फरवरी पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. करीब 20 दिन जेल में बिताने के बाद उन्हें जमानत मिली. जेल से वापस आए कन्हैया का जेएनयू में जोरदार स्वागत हुआ. जेल वापसी के बाद दिए उनके भाषण ने खूब सुर्खियां बटोरी. इस पूरे मामले ने कन्हैया को राष्ट्रीय स्तर की पहचान दिलाई और वे सरकार विरोधी आंदोलनों में नजर आने लगे. देश विरोधी नारेबाजी के मामले में कन्हैया समेत 10 आरोपियों के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने चार्जशीट दायर कर दी है. मामला अभी कोर्ट के विचाराधीन है.

मूल रूप से बिहार बेगूसराय जिले के रहने वाले कन्हैया कुमार ने जेल में बिताए दिनों पर एक किताब बिहार से तिहाड़ तक भी लिखी. जिसमें उन्होंने अपने पारिवारिक पृष्ठभूमि से लेकर जेएनयू और फिर जेल यात्रा तक की पूरी कहानी बताई. किताब के आगे की कहानी वापस बिहार से शुरू हुई. छात्रनेता से नेता बनकर कन्हैया वापस बिहार लौटे. 2018 में सीपीआई ने कन्हैया को अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल किया. 2019 के लोकसभा चुनाव में कन्हैया बेगूसराय से मैदान में उतरे. उनका सामना बीजेपी के गिरिराज सिंह और आरजेडी के तनवीर हसन से था. 2019 के लोकसभा चुनाव में सीपीआई, राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन का हिस्सा नहीं थी. इसके पीछे भी वजह कन्हैया कुमार को ही बताया गया. राजद के प्रवक्ता मनोज झा ने कहा था कि सीपीआई और राजद का गठबंधन नहीं हो सकता क्योंकि राजद अपने उम्मीदवार तनवीर हसन की बेगूसराय में लोकप्रियता से समझौता नहीं कर सकती.

Kanhaiya Kumar
कन्हैया कुमार ने 28 सितंबर को कांग्रेस जॉइन की. (फोटो- ANI)

हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का कहना था कि बात तनवीर हसन की लोकप्रियता से ज्यादा कन्हैया कुमार के बढ़ते कद की थी. अगर कन्हैया चुनाव जीत जाते तो राज्य में तेजस्वी यादव के सामने एक मजबूत प्रतिद्वंदी खड़ा हो जाता. और राजद ऐसा बिल्कुल नहीं होने देना चाहती थी. 2019 के लोकसभा चुनाव में गिरिराज सिंह ने कन्हैया को 4 लाख से अधिक वोटों से हराया. लोकसभा चुनाव बीतने के बाद कन्हैया कुमार काफी समय तक सार्वजनिक मंचों से गायब रहे. वापस लौटे तो CAA NRC के विरोध में रैलियां शुरू की. पहले दिल्ली और फिर बिहार में कन्हैया ने CAA NRC के मुद्दे पर कई जन गण मन यात्रा निकाली. इस यात्रा के दौरान रैलियों में कन्हैया को सुनने के लिए खूब भीड़ भी इकट्ठा हुई. हालांकि इस दौरान कई जगहों पर उनके ऊपर हमले भी हुए. इस यात्रा का राजनीतिक फायदा ये हुआ कि 2020 के विधानसभा चुनाव में राजद को गठबंधन के लिए मानना पड़ा. महागठबंधन ने तेजस्वी यादव के नेतृत्व में विधानसभा का चुनाव लड़ा. इस चुनाव में कन्हैया की सक्रियता पर भी खूब सवाल उठे. कन्हैया खुद उम्मीदवार नहीं थे लेकिन वे इक्का दुक्का सीटों को छोड़कर कहीं और प्रचार करने नहीं गए. तब से कन्हैया खबरों से लगभग बाहर रहे. अब लौटे हैं. क्योंकि कांग्रेसी हो गए हैं.

# जिग्नेश मेवाणी

अब दूसरी शख्सियत की बात करते हैं. 11 जुलाई 2016. गुजरात के ऊना में कुल लोगों ने दलित समुदाय के कुछ लोगों के साथ मारपीट की. जिन्होंने पीटा उनका कहना था कि ये लोग गौ-हत्या कर रहे थे. जो पिटे उनका कहना था कि गाय मृत थीं और वे शव से खाल निकाल रहे थे. मारपीट की इस घटना का वीडियो वायरल हो गया. जिसके बाद हुआ जमकर बवाल. इस पूरी घटना के एक महीने 4 दिन बाद यानी कि 15 अगस्त के दिन एक दलित युवा ने करीब 20 हजार लोगों की उपस्थिति में ऐलान किया कि अब वे गाय की खाल निकालने का काम नहीं करेंगे.

इस ऐलान ने युवा को दलितों का नया नेता बना दिया. नाम- जिग्नेश मेवाणी. अगले साल विधानसभा के चुनाव होने थे. तय हुआ कि जिग्नेश चुनाव लड़ेंगे. निर्दलीय. बनासकांठा के वडगाम सीट से चुनाव मैदान में उतरे जिग्नेश को कांग्रेस ने समर्थन दिया. जिसका उन्हें फायदा मिला. नतीजे आए तो बीजेपी की सरकार जरूर बनी मगर वडगाम की जनता ने जिग्नेश को 19 हज़ार वोटों से जिताया. जिग्नेश उन तीन युवा नेताओं में से एक हैं जो राज्य की बीजेपी सरकार को विधानसभा चुनाव से ठीक पहले चुनौती देते हुए उभरे थे. बाकी के दो में हार्दिक पटेल पहले से ही कांग्रेस में हैं जबकि अल्पेश ठाकोर बीजेपी में हैं.

ऊना कांड के खिलाफ आवाज संसद तक गूंजी और जिग्नेश राष्ट्रीय स्तर पर तेजी से उभरे. जिग्नेश गुजरात से बाहर भी रैलियां करने लगे और दलित युवाओं में लोकप्रिय होते गए. अपनी रैलियों के दौरान जिग्नेश सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरते रहते हैं. अक्सर उनके बयान पर विवाद पर विवाद भी खड़े होते रहे हैं. कभी वे कहते हैं कि प्रधानमंत्री अब बूढ़े हो गए हैं उन्हें हिमालय जाकर अपनी हड्डियां गलानी चाहिए तो कभी युवाओं से कहते हैं कि प्रधानमंत्री की सभा में घुस जाओ और कुर्सियां हवा में उछालो. इसके अलावा भीमा-कोरेगांव हिंसा के मामले में महाराष्ट्र पुलिस ने जिग्नेश पर हिंसा भड़काने के आरोप में मामला भी दर्ज कर रखा है.

Jignesh Mevani
कन्हैया कुमार के साथ जिग्नेश ने भी कांग्रेस जॉइन की. (फोटो- ANI)

लंबे वक्त से जिग्नेश के कांग्रेस में शामिल होने की अटकलें लगाईं जा रही थीं. लेकिन अब जाकर इस पर मुहर लगी है. कन्हैया कुमार और जिग्नेश के स्वागत वाले पोस्टर पार्टी कार्यालय के बाहर लगे. साथ में राहुल गांधी की तस्वीरें भी लगा दी गईं. हालांकि इन दोनों नेताओं की पार्टी में एंट्री पर कांग्रेस के ही नेता सवाल खड़े कर रहे हैं.

मनीष तिवारी ने ट्वीट कर लिखा कि कुछ कम्युनिस्ट नेताओं के कांग्रेस में आने की अटकलें चल रही हैं. ऐसे में 1973 में छपी ‘कम्युनिस्ट इन कांग्रेस’ पढ़ी जानी चाहिए, चीज़ें जितनी बदलती हैं उतनी ही समान लगती हैं. बीजेपी ने भी कन्हैया और जिग्नेश के बहाने कांग्रेस पर निशाना साधा है. पार्टी प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि भारत के टुकड़े करने वालों के साथ हाथ मिलाना कांग्रेस की आदत है. तो कुल मिलाकर 28 सितंबर के दिन द ग्रेट इंडियन पॉलिटिकल थिएटर में बहुत कुछ हुआ. आगे जो होगा, वो भी आपको बताएंगे.


कन्हैया कुमार को पप्पू यादव की राजनीति में क्या अच्छा लगता है?

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