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भिखारी ठाकुर विवाद: भोजपुरी गायिका कल्पना के नाम एक खुला खत

भोजपुरी पट्टी में पिछले कुछ दिनों से हंगामा मचा हुआ है. बवाल है भोजपुरी गायिका कल्पना पटवारी को लेकर. हाल ही में एक अखबार ने कल्पना से बात करके एक खबर छापी. इसमें दावा किया गया था कि कल्पना ने भिखारी ठाकुर पर जो शोध किया, उससे भिखारी ठाकुर को वापस मेनस्ट्रीम का हिस्सा बनाने की मुहिम में मदद मिली. बवाल इसके बाद शुरू हुआ. लोग पूछने लगे कि कल्पना ने भिखारी ठाकुर पर क्या शोध किया है? कहां से शोध किया है? भोजपुरिया समाज के लिए भिखारी ठाकुर बड़ा संवेदनशील मुद्दा हैं. लोग उनके लिए भावुक हो जाते हैं. भिखारी ठाकुर को भोजपुरी भाषा का सबसे बड़ा कवि समझ लीजिए. भोजपुरिया समाज जिन बातों पर सबसे ज्यादा गर्व करता है, उनमें भिखारी ठाकुर के लोकगीत भी शामिल हैं. दूसरी तरफ हैं कल्पना पटवारी. वो अपने गाए अश्लील भोजपुरी गानों के लिए जानी जाती हैं. अपने अब तक के करियर में उन्होंने भिखारी ठाकुर के चार-पांच गीत भी गाए हैं. मगर इसके अलावा उनका ज्यादातर गीत-संगीत बेहद अश्लील और उथला माना जाता है. सेक्स और सस्ती बातों से भरा हुआ. उनके गाए गाने लोग परिवार के सामने नहीं सुन सकते, इस टाइप की छवि है उनकी. लोग नाराज हैं कि कल्पना ने ऐसे गाने गाए, लेकिन दावा वो भिखारी ठाकुर पर शोध करने का करती हैं. भिखारी ठाकुर के गीतों को नई जान देने का दावा करती हैं. इसी सिलसिले में भोजपुरिया बेल्ट के कुछ लोगों ने अपना लेख लल्लनटॉप को भेजा. इस पूरे मुद्दे पर अपनी बात रखने की उनकी ये कोशिश है. नीचे पढ़िए एक लेख.

धर्मदेव चौहान
धर्मदेव चौहान

ये लेख धर्मदेव चौहान ने लिखा है. धर्मदेव चंद्रशेखर आजाद यूनिवर्सिटी से PhD कर रहे हैं. विज्ञान के छात्र हैं, पर भिखारी ठाकुर के गीतों पर जान छिड़कते हैं. 

सवाल ये नहीं है कि उसने क्या शोध किया?
सवाल ये है कि उसने कैसे शोध किया?

गमछा बिछा के?
किल्ली तोड़ के?
बीचे फील्ड में विकेट हला के
रजइया में बोला के?
चोली से भाफ फेंका के?
जीजा से सेवा कराके ?
जादो जी से जोरन डलवा के ?
नींबू निचोड़ के ?
तंबू में बंबू लगा के ?
अथवा
कुंवारे में लरकोर होके?

लोग लिख रहे हैं कि चूंकि कल्पना ने भिखारी ठाकुर पर शोध करने का दावा किया है, सो उन्हें अपने शोध का प्रमाण देना चाहिए. भिखारी ठाकुर पर शोध करने वाले और कर चुके कई रिसर्चर और प्रफेसर भी कल्पना के इस दावे से नाराज हैं.
लोग लिख रहे हैं कि चूंकि कल्पना ने भिखारी ठाकुर पर शोध करने का दावा किया है, सो उन्हें अपने शोध का प्रमाण देना चाहिए. भिखारी ठाकुर पर शोध करने वाले और कर चुके कई रिसर्चर और प्रफेसर भी कल्पना के इस दावे से नाराज हैं.

लिस्ट बहुत लंबी है साहब, और लिस्ट में कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया है जो लिखा नहीं जा सकता. और अधिक डिटेल चाहिए, तो शोधार्थी के एक अल्बम ‘लईका चॉकलेटी लागेला‘ को you tube पर सर्च कर लीजिए. और आपको अब भी लगता है कि इन्होंने शोध किया है, तो शोध का एक चैप्टर होता है- मटेरियल ऐंड मेथड. उसको आप जरूर बताएं कि उपर्युक्त में से कौन सा मटेरियल मेथड यूज़ किया गया है शोधार्थी द्वारा? और हां, ये बात हम भोजपुरी में भी लिख सकते थे. मगर हिंदी में इसे लिखने का एक कारण ये है कि ये बात शोधार्थी तक पहुंचाई जाए क्योंकि आप जानते हैं कि क्या जाने कब शोधार्थी ये कह बैठे-

आई डोन्ट नो वॉट इज जोरन ऑफ जादो जी, वॉट इज द मीनिंग ऑफ लरकोर इन कुंवार, वॉट इज द प्रोसेस टू प्रोड्यूस भाप इन चोली, बिकॉज आई डोन्ट नो भोजपुरी वेल ऐंड आई कैन नॉट अंडरस्टैंड द रियल मीनिंग ऑफ दिज टर्म्स इन भोजपुरी

हे शोधार्थी! जब तुम भोजपुरी नहीं जानती हो तो तुमने शोध कैसे कर लिया? भिखारी ठाकुर पर कहां हैं तुम्हारे रिव्यू ऐंड लिट्रेचर? और रिफरेंस जो किसी भी शोध कार्य का सबसे महत्वपूर्ण भाग होते हैं. प्रभात खबर जी अपनी बुद्धि का प्रभात कीजिए और रिफरेंस लेकर आइए शोधार्थी का. अगर आपको नहीं पता है, तो शोधार्थी के उन भक्तों से मांग लीजिए जो शोधार्थी को अपनी मौसी मानकर उनकी तुलना कालिदास, तुलसी दास और वाल्मीकि जैसे संतो से कर रहे हैं और इनको भोजपुरी का उद्धारक घोषित कर रहे हैं. भिखारी ठाकुर को प्रसिद्धि दिलाने का तमगा अपनी मौसी के सिर पर बांध रहे हैं, जिन्होंने इनकी माई (मातृ भाषा भोजपुरी) का आंचल अपने हर गाने में मैला किया है.

(डिस्क्लेमर: प्रभात खबर ने अपने पोर्टल से अपनी वो विवादित न्यूज डिलीट कर दी है)

लोग सवाल कर रहे हैं कि भिखारी ठाकुर अप्रासंगिक कब हुए कि कल्पना उन्हें वापस मुख्यधारा में लौटा लाने का श्रेय लूट रही हैं.
लोग सवाल कर रहे हैं कि भिखारी ठाकुर अप्रासंगिक कब हुए कि कल्पना उन्हें वापस मुख्यधारा में लौटा लाने का श्रेय लूट रही हैं.

एक सवाल पूछना है शोधार्थी के भक्तों से. हे बुद्धि के शिखर पर विराजमान भोजपुरी के विद्वान देवतागण! ये बताइए कि क्या आपने कभी अपनी मौसी के गाए गानों को अपने माई, बाबूजी, भाई, बहन आदि के साथ बैठकर सुना है? नहीं सुना है, तो सुन लीजिए किसी दिन अपने बाबूजी के साथ बैठकर ‘बलमुआ छक्का मारी गईल’. केजरीवाल जी की सच्चाई की कसम, आपका पाकिस्तान लाल नहीं कर दिया आपके बाबूजी ने तो मान लूंगा आपकी मौसी उद्धारक हैं भोजपुरी की.
और एक बात सुन लो भक्तजनों, आपकी मौसी की मातृभाषा है असमिया (जैसा कि आप लोगों की मौसी बोलती हैं). कभी उनसे बोलना कि वो अपनी मम्मी के सामने असमिया में गाए ‘चोलिया से फेंकता भाप आई रे माई’ सुनें. कभी अपनी ननदिया से कहे ‘कुंवारे में लरकोर होने’ को और इस शोध को असमीया में भी प्रकाशित करें. ताकि असम के लोग भी तो जानें कि उनकी इस शोधार्थी ने कितना उत्तम शोध किया है. तब हम भी मान लेंगे कि उसने शोध किया है क्योंकि ये शोध सिर्फ भोजपुरी में ही प्रकाशित होने लायक नहीं है, बल्कि इसको तो वैश्विक स्तर पर प्रकाशित होना चाहिए.

#प्रभातख़बर जी, इसको इंग्लिश, चाइनीज़, जापानीज जिस भाषा में मन करे प्रकाशित करवाइए, लेकिन असमिया में जरूर कराइए. बताइए कि कैसे बलमुआ छक्का मारता है बीचे फील्ड में विकेट हिला के, कैसे जादव जी जोरन डालते हैं, कैसे इस शोधार्थी को पता चला कि मिसिर जी ठंडे हैं कि गरम और कैसे चोली से भाप फेंकता है.

जो बहस छिड़ी है, उसमें कल्पना की निंदा कर रहे वर्ग का कहना है कि वो सामाजिक स्वीकार्यता के लिए भिखारी ठाकुर जैसी भोजपुरी अस्मिता का इस्तेमाल कर रही हैं. लोगों की नाराजगी इसी बात से है.
जो बहस छिड़ी है, उसमें कल्पना की निंदा कर रहे वर्ग का कहना है कि वो सामाजिक स्वीकार्यता के लिए भिखारी ठाकुर जैसी भोजपुरी अस्मिता का इस्तेमाल कर रही हैं. लोगों की नाराजगी इसी बात से है भी है.

विज्ञान वर्ग का विद्यार्थी होने के नाते ये सोच रहा हूं कि अगर चोली भाप फेंकती है, तो इस शोधार्थी की चोली में रेल का इंजन जोड़ कर भारतीय रेलवे की गति बढ़ाई जा सकती है. क्योंकि कोहरे के कारण रेलवे की रफ्तार धीमी हो चुकी है और इस भाप को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करके इनके भक्तों के दिमाग की बत्ती जलाई जा सकती है. मैं मांग करता हूं शोधार्थी के इस शोध के लिए उनको भौतिक विज्ञान और ‘देंहिया से देंहिया सटा ल, लुत्ती फेंके लागी‘ के लिए जीव विज्ञान का नोबल पुरस्कार दिया जाए.

भक्त लोग हमको असभ्य और घमंडी घोषित कर सकते हैं इस पोस्ट के लिए. सो मैं बता दूं कि ये असभ्यता हमने आपकी मौसी से ही सीखी है. हां, हम घमंडी हैं बिकॉज योर मौसी सेड वन्स कि:

भोजपुरियाज आर सो इगोइस्टिक

ये हमारा घमंड ही हमारा स्वाभिमान है. जो हमारे स्वाभिमान को ललकरेगा, उसको हम कैसे छोड़ सकते हैं? सुन लो फूहड़ गायिका-गायक गिरोह (भद्र लोगों से माफी चाहता हूं ) अब तक बर्दाश्त करते रहे. कड़वी सच्चाई लिखने के लिए कुछ ऐसे शब्द जो नहीं लिखने चाहिए, हम गुस्से में लिख गए हैं. मैं कल्पना ही नहीं करता, बल्कि ऐसी गायिकी के पैरवीकार भक्तों को बताना चाहता हूं जिस दिन तुम सब भोजपुरिया माई बहन को भेंटा गए न, उस दिन वो लोग तुम सबको लतियाएंगे जरूर. और भक्तजनों, ऐसी गायिकी के बचाव में अगर तुम लोग हमारे पोस्ट में कूदे न तो देख लेना हम तुम्हारे पाकिस्तान को कोरिया के बादशाह किम जोंग-उन के हवाले करके कह देंगे- जोत के कोदो बो देना कोदो

एगो गुस्साया भोजपुरिया


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