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कल्पना पटवारी नेग नहीं जानतीं तो भोजपुरी संस्कृति सहेजने का दावा न करें

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rohit kumarमूलतः पूर्वी चम्पारण, बिहार के रोहित हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय से कबीर गायन की विविध शैलियों पर रिसर्च कर रहे हैं. शास्त्रीय संगीत और कला में दिलचस्पी रखते हैं. कल्पना पटवारी के भोजपुरी संस्कृति को सहेजने के दावों से शुरू हुए विवाद पर वो भी एक राय रखते हैं. उन्होंने हमें लिख भेजी. हम आपको पढ़वा रहे हैं. यदि आप इस विषय में कुछ कहना चाहते हैं, तो हमें lallantopmail@gmail.com पर लिख भेजें.


बीते दिन लोक संगीत की एक महफिल में था, रस में सभी श्रोता सराबोर थे. उस वक़्त लोक और लोक से जुड़ी कई परतें मेरे मन में खुलती जा रही थीं. कारण श्लील- अश्लील के विमर्श से मन का बोझिल होना था. कल्पना पटवारी के गाने और भोजपुरिया अस्मिता को लेकर जाति, क्षेत्र, लिंग, बॉलीवुड-टॉलीवुड तक इस विमर्श को नया-नया एंगल दे चुका है. कल्पना कहां से हैं, उनकी मातृभाषा क्या है, उनकी प्रसिद्धि का कारण क्या है, इन सब विषयों से अबतक इस बहस में कूदने वाले भली-भांति परिचित हो चुके हैं ऐसी आशा की जा सकती है.

तो भूत के चक्कर में न पड़ते हुए भविष्य से जुड़ी खबर बताती है कि कल्पना इसी वर्ष ऑस्ट्रेलिया में आयोजित हो रहे 12 वें कॉमनवेल्थ गेम्स में बतौर भारतीय लोक-गायिका अपनी प्रस्तुति देने वाली हैं. जैसा कि कल्पना ने मीडिया को बताया है, वे वहां भिखारी ठाकुर को भी  गाएंगी. समाचार काफी सुखद है, इसमें कोई शक नहीं है. ‘कल्पना विमर्श’ में कूदे हर झंडाबरदार को खुशी होगी, आखिरकार उनकी भोजपुरी को ‘असमिया मातृभाषा वाली भोजपुरी लोक-गायिका’ जो गाने वाली हैं. इनवर्टेड कॉमा का अर्थ स्पष्ट कर दूं – कल्पना ने अपने ऊपर लगे विगत इल्ज़ामात से यह कहते हुए पल्ला झाड़ा था कि उनका तब उन असभ्य गीतों के मर्म से परिचय ही नहीं था. हम लोग भी मान लेते हैं कि ऐसा रहा होगा.

वीडियोः भोजपुरी में अश्लील गानों के लिए भगवान के नाम की आड़ लिए जाने की सच्चाई सुन लीजिए

अब थोड़ा फ़्लैशबैक में चलिए और 2 मिनट 4 सेकेंड के उस वीडियो को फिर से देखिए जहां उनसे भीड़ ने उन गानों को गाने की फरमाइश की, जिसकी वजह से भीड़ के वे लोग कल्पना को जानते थे और उस कार्यक्रम में सुनने आए थे. स्टेज से बने उस 2 मिनट 4 सेकेंड के वीडियो का षड्यंत्र जो भी हो, सवाल कई हैं. पहला तो यह कि उसके पहले या उस 2 मिनट के बाद का वीडियो कहां है? अब कुछ लोगों के मन में कीड़ा उठेगा कि ये क्या सवाल है, तो भैया जवाब यह है कि उसके बाद क्या कल्पना ने वो वाले गाने गाए या नहीं?

अब असल सवाल पर आता हूं. जब वह वीडियो 1 मिनट 19 सेकेण्ड चलता है, तब ‘लोकगायिका कल्पना’ कहती हैं,

‘एक-दो चीज़ भोजपुरी कल्चर की पसंद नहीं है. मैं बात नहीं करूंगी तो कौन करेगा? एक तो जो ऐसे-ऐसे पैसा देते हैं, I don’t know what is that culture, I don’t like that culture.’

जिस वीडियो की यहां बात हो रही है, वो ये रहा –

कल्पना जी! आपको तब भोजपुरी भाषा का मर्म न मालूम था और ‘देवरा से किल्ली तुड़वा गईं’ और ‘यादव जी से कटवा गयीं’ गा लिए. अब आपको उस संगीत की संस्कृति और परंपरा का भी ज्ञान नहीं है. जिस पैसा वार के देने को आप नापसंद करती हैं और कल्चर यानी भोजपुरिया संस्कृति से जोड़कर अधम-पतित-सा बताने की कोशिश करती हैं, वो किसी भाषिक-संस्कृति विशेष का हिस्सा नहीं, बल्कि संगीत-नृत्य की उत्कृष्ट परंपरा में वर्षों से चली आ रही रवायत है.

नाम गिनाकर ज्ञान बघारने का काम हम नहीं करेंगे. लेकिन जिनका भी लगाव संगीत की परंपरा और महफिलों से रहा है वे जानते हैं इस दाद-अदायगी के अंदाज़ को. मुझे जहां तक ज्ञात है शास्त्रीय संगीत की दुनिया में किसी ने आपके अंदाज़ में इसका निरादर नहीं किया, न उसे संस्कार-संस्कृति से जोड़कर मज़ाक बनाया. आपने ‘दाद’ के जिस अंदाज़ को दुत्कारा उसे ‘नेग’ कहते हैं.

जिस भोजपुरी ने आपको पहचान दी और आप विदेशों में जिसके नाम पर तालियां और पैसे बटोरने जा रही हैं उसकी संस्कृति का यह हिस्सा आपको इसलिए मंजूर न हुआ क्योंकि आप भाषा ही नहीं भोजपुरिया संस्कार से भी अछूती हैं अब तक. जिस भिखारी ठाकुर को गाने (भी) आप ऑस्ट्रेलिया जा रही हैं न, उन्हें भी शर्म नहीं आती थी, ऐसे नेग लेने से. शोध के दौरान यह बात मिली नहीं होगी न! और हां, अब तो रूप-स्वरूप स्टेज और खड़ी जनता-सा हो गया है वरना शामियाना और बैठक वाली महफिल में ‘साटा’ करते वक़्त यह तय होता रहा है कि नेग के रूप में इतना और एडवांस इतना. नेग को कलाकार की लोकप्रियता और कार्यक्रम के दौरान उसकी प्रस्तुति की उत्कृष्टता से जोड़कर देखा जाता रहा है.

कीर्तिदान गडवी. कई कलाकार सहर्ष नेग स्वीकार करते हैं.
कीर्तिदान गडवी. कई कलाकार सहर्ष नेग स्वीकार करते हैं.

चलिए, आपको एक प्रसंग सुनाता हूं. विद्या विंदु सिंह का लिखा उपन्यास है ‘हिरण्यगर्भा’. उसमें बिरहा गायन का बखूबी जिक्र है और बताया गया है कि किस तरह बिरहा गायक नेग लेने के लिए भांति-भांति के गीत रचकर सुनाते थे. ‘जौनी जगह तुम बैठेव मालिक, भुईया लागी गुरुवाय’ (अर्थात, मालिक अब तो आपको भीतर जाकर नेग लाना ही चाहिए). आप तो दंभ भरती हैं कि Coke Studio में जाकर आपने बिरहा गाया है. फिर बिरहा की परंपरा को स्टारडम के चक्कर में भूल गईं?

और हां, आपका ये कहना कि शब्दों के मर्म को न जानकर आपने ‘बीचे फील्ड में विकेट’ गाड़ा तो बात यह भी है कि विगत दिनों तक जिस हाव-भाव से आप ‘गमछा बिछाई के’ गाती रही हैं उसको देखकर साफ कहा जा सकता है कि आपको कोई मलाल है ही नहीं, अपने उस ‘अश्लील’ कृत्य के लिए. फिर इस तरह का अपराधबोध क्यों कि ‘कुछ लोग सुधरने का मौका नहीं देना चाहते/कुछ लोग मुझे टारगेट कर रहे हैं/कुछ लोग मुझ अबला, बाहरी स्त्री को परेशान कर रहे हैं?

अब तो आपके उन तमाम दावों की धज्जियां और अपने ननिहाल समर्थकों की खिल्ली आपने खुद ही क़तर के स्टेज से उड़ा दी है. अब किसी और को कहिएगा कि भोजपुरी का उद्धार आपने किया है. शायद वह मान ले, लेकिन उसके लिए उस व्यक्ति में दो बातें जाहिर तौर पर होनी चाहिए. पहला, वह अनिवार्यतः भोजपुरिया न हो, दूसरा वह पेड न हो. लेकिन छोड़िए, मैं भी क्या लेके बैठ गया, आपके सारे तमंचे तो पहले ही वासेपुर स्टाइल में ‘फट के फ्लावर’ हो चुके हैं.

भोजपुरी संगीत में अक्सर पाई जाने वाली अश्लीलता की जवाबदेही तय हो रही है.
भोजपुरी संगीत में अक्सर पाई जाने वाली अश्लीलता की जवाबदेही तय हो रही है.

खैर, पुराने फ़साने की बाकी तफसील ये है कि जिस कल्चर का एक खास हिस्सा आपको चोट कर गया, वह लोक की निश्छ्लता का द्योतक है. लोक तर्क और कारण से इतर है मैडम और जब आजकल आप खुद के नाम के आगे ‘लोक गायिका’ लगाती हैं न तब जाकर ये चीज़ें याद आ जाती हैं. नुसरत साहब के वीडियो खूब देखे होंगे आपने भी. उनपर पैसों की बरसात होती थी. बच्चे, बूढ़े सब स्टेज पर चढ़कर लुटाते थे उनपर, लेकिन उन्होंने बुरा नहीं माना.

मैं यह नहीं कहता कि आपको बुरा मानने का हक़ नहीं है. लेकिन आपकी प्रसिद्धि जिस संस्कृति से है, उसे जान तो लीजिए. आप लोक को समझे बिना ‘लोकगायिका’ बनने नहीं, उस ‘लोक’ को बेचने की कोशिश में लगी हैं बस. आपने शारदा सिन्हा के गाए विवाह गीतों के मर्म को भी समझ लिया होता न तब भी इस अदायगी को ‘छी-छी’ वाले अंदाज़ में न नकारतीं. ‘परीछावन’ एक रस्म होती है, जिसमें दूल्हे की नज़र विभिन्न तरीकों से उतारी जाती है जिसमें एक पैसा सिर के चारों ओर घुमाकर भी परीछावन किया जाता है. यह नेग भी उस परीछावन जैसा ही है, जहां आपका चाहने वाला चाहता है कि आपको किसी भी तरह कि नज़र न लगे और आपकी यह विशिष्ट कला फलती-फूलती रहे.

कल्पना का दावा है कि उन्हें स्त्री होने की वजह से निशाने पर लिया जा रहा है.
कल्पना का दावा है कि उन्हें स्त्री होने की वजह से निशाने पर लिया जा रहा है.

मैंने लोकगायकों को एक छोटे बच्चे द्वारा दिए गए नेग के सिक्के को चूमते देखा है और उस सिक्के को अपनी सबसे बड़ी कमाई बताते देखा है. संगीत भावजगत की चीज़ है, और भाव लोक से संबद्धता के बाद उपजता है. अब जब आपको उस संस्कृति के एक सच्चे, निष्काम सेवी के काम को बेचना ही पसंद है फिर आपको बहुत कुछ खटक सकता है. हमारी बस इतनी सी अरज है कि संगीत के घरानेदार अतीत में झांकिए ही नहीं बल्कि उस संस्कृति के संस्कारों पर भी थोड़ा शोध कर लीजिए जिसकी बदौलत आप कॉमनवेल्थ गेम्स में बतौर ‘लोकगायिका’ प्रस्तुति देने जा रही हैं.

लेकिन छोड़िए, मैं भी क्या उम्मीद पाल बैठा? खुश रहिए. पर दोधारी तलवार पर चलने की ख्वाहिश और उसी राह पर चलने के लिए चार लोग तैयार करके जो बैटल ग्राउंड तैयार आपने तैयार किया है, उससे आप केवल अपना उल्लू सीधा कर पाएंगी बस.


कल्पना पटवारी और भोजपुरी गानों में अश्लीलता के विषय पर लल्नटॉप की और पेशकश यहां पढ़ेंः

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Kalpana Patwari’s claims of curating Bhojpuri culture are hollow if she doesn’t understand what neg is

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