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जस्टिस रोहिंगटन फाली नरीमनः एक पारसी पुजारी, जिसने सुप्रीम कोर्ट का जज बनकर कई बड़े फैसले दिए

साल 1972. मशहूर मराठी नाटककार विजय तेंदुलकर के नाटक सखाराम बाइंडर का पहला मंचन हुआ. एक पुरुषवादी समाज में महिलाओं की दशा पर बात करता ये नाटक कुछ लोगों को प्रगतिशील लगा, तो ज्यादातर ने हंगामा मचाना शुरू कर दिया. लोग बोले-

‘ये नाटक अश्लील है.’

‘इस नाटक की वजह से भारतीय विवाह संस्था को ख़तरा पैदा हो गया है.’

‘ये नाटक भारतीय संस्कृति पर कालिख मल रहा है.’

सेंसर ने इस नाटक पर बैन लगा दिया. नाटक के लेखक विजय तेंदुलकर कोर्ट चले गए. कोर्ट में उनके लिए बहस करने के लिए खड़े हुए एक युवा और प्रतिभाशाली वकील. इनका नाम था रोहिंगटन फाली नरीमन. कोर्ट में उन्होंने जमकर दलीलें दीं. आठ महीने की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद केस का नतीजा आया, विजय तेंदुलकर के पक्ष में.

रोहिंगटन फाली नरीमन (Rohinton Fali Nariman) इसे अपनी जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण केसों में से एक बताते हैं. रोहिंगटन फाली नरीमन जो आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट में जज की कुर्सी पर बैठे. कॉर्पोरेट मामलों के एक वकील के तौर पर सुप्रीम कोर्ट में अपना करियर शुरू करने वाले रोहिंगटन फाली नरीमन 7 जुलाई 2014 को सुप्रीम कोर्ट में जज बने थे. गुरुवार 12 अगस्त को वह रिटायर हो रहे हैं. आइए आपको किस्से-कहानियों के जरिए ले चलते हैं उनकी जिंदगी और करियर के सफर पर.

‘स्पेशल 4’ में से एक

जस्टिस रोहिंगटन फाली नरीमन उन चंद जजों में शुमार हैं, जो सुप्रीम कोर्ट बार से सीधे जज बने. मतलब वह सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस किया करते थे और उन्हें सीधे जज बनाया गया. ऐसा सिर्फ तीन बार हुआ था. इन तीन जजों के नाम हैं – जस्टिस संतोष हेगड़े, जस्टिस कुलदीप सिंह और जस्टिस एस.एम. सीकरी. 2014 में मोदी सरकार आने के बाद चीफ जस्टिस आर.एम लोढ़ा की अध्यक्षता वाले कॉलीजियम ने रोहिंगटन फाली नरीमन को जज बनाने का फैसला लिया.

ऐसा पहली बार नहीं था कि जस्टिस नरीमन सुप्रीम कोर्ट में किसी खास परंपरा का हिस्सा बने हों. दिल्ली के एसआरसीसी से कॉमर्स ग्रेजुएट और दिल्ली की लॉ फैकल्टी से लॉ की डिग्री लेने के बाद नरीमन मास्टर्स डिग्री लेने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी अमेरिका चले गए. वापस आए तो सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की. 1979 में सुप्रीम कोर्ट बार असोसिएशन जॉइन कर ली.

बात 1993 की है. उम्र में रोहिंगटन अभी 37 साल के ही थे लेकिन साथी वकीलों से लेकर जजों तक में उनके टैलेंट की चर्चा थी. 15 दिसंबर 1993 को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सीनियर एडवोकेट की पदवी देने का फैसला लिया. लेकिन नियमों के हिसाब से ऐसा मुमकिन नहीं था. सुप्रीम कोर्ट में किसी भी वकील को सीनियर एडवोकेट का डेजिगनेशन पाने के लिए 45 साल का होना जरूरी होता था. तत्कालीन चीफ जस्टिस वेंकटचलैया ने रोहिंगटन फाली नरीमन के लिए ये नियम बदल दिया. इस तरह रोहिंगटन फाली नरीमन के नाम सुप्रीम कोर्ट में सबसे कम उम्र के सीनियर एडवोकेट होने का रिकॉर्ड भी दर्ज है.

एक पारसी पुजारी, जो सुप्रीम कोर्ट का जज भी है

रोहिंगटन फाली नरीमन ने हार्वर्ड में अपनी मास्टर्स डिग्री के लिए Affirmative action: a comparison between the Indian and US constitutional law को टॉपिक के तौर चुना. इसके बाद उन्होंने कॉर्पोरेट मामलों के वकील के तौर पर न्यू यॉर्क के कोर्ट में प्रैक्टिस की, लेकिन वो अपनी पारसी जड़ों से हमेशा जुड़े रहे. न सिर्फ एक विद्वान जज के तौर पर बल्कि पारसी समाज में एक पुजारी के तौर भी. जी हां, वो सुप्रीम कोर्ट में जज के साथ पारसी पुजारी भी बने रहे. वह पारसी शादियों में पुजारी के तौर पर शामिल होते रहे और नवजोत कार्यक्रम का हिस्सा भी बनते रहे. ‘नवजोत’ एक रस्म है जिसके होने के बाद किसी पारसी लड़का या लड़की को 7 से 11 साल की उम्र में जरथुस्त्री मजहब में दाखिल किया जाता है.

जस्टिस नरीमन उन खास पारसी पुजारियों में से हैं, जो पूजापाठ के मुख्य स्थान में दाखिल हो सकते हैं. इस खास जगह को गर्भ गृह या sanctum sanctorumकहते हैं. जस्टिस नरीमन के पिता फाली एस. नरीमन अपनी किताब में लिखते हैं कि उनका परिवार काफी पूजापाठी रहा है. ऐसे में उनकी पत्नी ने सुनिश्चित किया कि 12 साल की छोटी उम्र में बेटे रोहिंगटन को पुजारी के रूप में नियुक्त किया जाए. उन्होंने किताब में आगे बताया कि रोहिंगटन ने ही पुजारी के तौर पर अपनी बहन अनहीता के नवजोत की रस्म में पूजापाठ किया था.

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जस्टिस नरीमन 12 साल की उम्र में ही पारसी पुजारी के रीति-रिवाज से परिचित हो गए थे. वह अब भी नवजोत (राइट) कार्यक्रम में पुजारी की तरह हिस्सा लेते हैं. लेफ्ट में है दिल्ली का पारसी पूजा स्थल. (फोटो- विकीपीडिया)

पिता की तरह कड़क लेकिन ज्यादा सॉफेस्टिकेटेड

हम भले ही आज जस्टिस रोहिंगटन नरीमन की बात कर रहे हों लेकिन उनकी कहानी उनके पिता के किस्सों के बिना अधूरी है. जस्टिस रोहिंगटन नरीमन के पिता फाली सैम नरीमन ऐसे बड़े वकील थे कि उनका डंका देश के सुप्रीम कोर्ट से लेकर इंटरनेशनल कमीशन ऑफ जस्टिस तक बोलता था. वो एडिशनल सॉलिसिटर जनरल रहे. 1999 में राष्ट्रपति ने उन्हें राज्यसभा सदस्य के तौर पर मनोनीत किया. 1991 में पद्मभूषण और 2007 में पद्मविभूषण से नवाजे गए.

लेकिन फाली सैम नरीमन की सबसे बड़ी खासियत रही विद्रोही स्वभाव. किस्सा इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री काल का है. 1972 में उन्हें भारत का अडिशनल सॉलिसिटर जनरल बनाया गया था. 26 जून 1975 को वो दिन आया, जिसे भारत के लोकतंत्र में सबसे काला दिन कहा जाता है. इंदिरा ने इमरजेंसी की घोषणा कर दी. इसके एक दिन बाद ही इस फैसले से नाखुशी जताते हुए फाली नरीमन ने इस्तीफा सौंप दिया था.

ऐसा ही एक मौका 1999 में आया. फाली सैम नरीमन नर्मदा मामले में गुजरात सरकार के वकील थे. उन्हें पता चला कि गुजरात में ईसाइयों पर लगातार हमले हो रहे हैं. उन्होंने हमले की निंदा करते हुए गुजरात की तरफ से केस लड़ने से मना कर दिया.

Justice Nariman Fali Nariman
जस्टिस रोहिंगटन नरीमन (लेफ्ट) को करीब से जानने वाले लोग बताते हैं कि वो भी अपने पिता फाली एस नरीमन (राइट) की तरह विद्रोही स्वभाव के हैं. जो मान्यताएं हैं, उन पर कायम रहते हैं.

जस्टिस रोहिंगटन नरीमन को करीब से जानने वाले कहते हैं कि वह भी अपने पिता की तरह विद्रोही स्वभाव के हैं. जो नहीं जंचता, उसे छोड़ देते हैं. पिता फाली नरीमन ने अडिशनल सॉलिसिटर जनरल के पद से इस्तीफा दे दिया था, तो बेटे रोहिंगटन नरीमन ने सॉलिसिटर जनरल के पद को झिड़क दिया था. वाकया मनमोहन सिंह सरकार के यूपीए-2 काल का है. 23 जुलाई 2011 को रोहिंगटन नरीमन को सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया बनाया गया. उन्होंने 11 महीने बाद ही इस पोस्ट से इस्तीफा दे दिया. इसके पीछे का कारण उनके और लॉ मिनिस्टर अश्विनी कुमार के बीच का समीकरण को बताया गया. खबरें आईं कि वह अश्विनी कुमार के कुछ विचारों से संतुष्ट नहीं थे, और उन्होंने समझौता करने से बेहतर इस्तीफा देना समझा.

सुप्रीम कोर्ट में रोहिंगटन फाली नरीमन के सामने कुछ केसों में पेश हो चुके वकील विराग गुप्ता कहते हैं कि-

“जस्टिस नरीमन अपने विषय के बहुत ही ज्ञानी और बहुत अनुशासन में रहने वाले जज हैं. वो हर मामले को बहुत बारीकी से सुनते हैं. अपने नियम-कायदे के बहुत पक्के हैं. जो जैसा है, वैसा ही होना चाहिए. वो युवा वकीलों का वक्त-वक्त पर हौसला भी बढ़ाते हैं.”

सुप्रीम कोर्ट में 20 साल से ज्यादा वक्त से प्रैक्टिस कर रहे एक सीनियर वकील बताते हैं कि-

“जस्टिस नरीमन एक बड़े वकील के बेटे हैं और कॉर्पोरेट वकील के तौर पर उनका लंबा करियर रहा है. इस वजह से उनका उठना-बैठना ज्यादातर अभिजात्य वर्ग में ही रहा है. इस वजह से सुप्रीम कोर्ट बार में भी उनका एक सॉफेस्टिकेटेड सर्कल रहा है.”

बरसों से सुप्रीम कोर्ट कवर कर रहे और जस्टिस नरीमन को करीब से जानने वाले एक सीनियर पत्रकार ने बताया कि जस्टिस नरीमन से नियम-कायदे के खिलाफ कोई काम नहीं कराया जा सकता. फिर चाहे भारत सरकार का कोई मंत्रालय हो या फिर कोई सीनियर जज. उनके रिटायरमेंट से सरकार में कुछ लोग राहत की सांस जरूर लेंगे.

जस्टिस नरीमन के बड़े केसेज

रोहिंगटन फाली नरीमन अपने 30 साल के करियर में एक वकील और जज के तौर पर 500 से ज्यादा बड़े केसों का हिस्सा रहे हैं. जज के तौर पर उनके खाते में कई बड़े केस हैं. इनमें सबरीमाला से लेकर LGBT के अधिकारों से जुड़े बड़े मामले शामिल हैं.

सीनियर वकील मेनका गुरुस्वामी कहती हैं कि

“जस्टिस नरीमन बेहतरीन, ज्ञानी और विचारवान जज हैं. संवैधानिक लोकतंत्र में उनके दिए फैसले बड़ी धरोहर हैं. इनमें दो केस बहुत महत्वपूर्ण हैं. एक के.एस. पुट्टुस्वामी का केस. इसमें राइट टु प्राइवेसी का अधिकार सुनिश्चित किया गया है. दूसरा नवतेज सिंह जोहर के मामले में उन्होंने LGBT के साथ भेदभाव को लेकर ऐतिहासिक फैसला दिया था. इसके अलावा उन्होंने कमर्शियल कानून में भी कई बड़े फैसले दिए हैं.”

उनके कुछ महत्वपूर्ण फैसलों में शामिल हैं-

श्रेया सिंघल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2015) – आईटी एक्ट से जुड़ा ये केस आज भी मील का पत्थर माना जाता है. इस फैसले में जस्टिस नरीमन ने आईटी एक्ट की धारा 66A को असंवैधानिक घोषित कर दिया था. इस धारा में किसी की भावना आहत होने पर 3 साल तक की सजा का प्रावधान बनाया गया था. जस्टिस नरीमन ने कहा कि जरूरी नहीं कि जो किसी एक की भावना आहत करे, वो दूसरे की भी करे.

शायरा बानो बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2017) – सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ट्रिपल तलाक मूल शरिया कानून का हिस्सा नहीं है. फैसला सुनाने वाली 5 जजों की बेंच में जस्टिस रोहिंगटन नरीमन भी शामिल थे. उन्होंने अपने फैसले में लिखा कि इस तरह का तलाक संविधान में दिए गए मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है.

इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम स्टेट ऑफ केरल (2019) – इसे लोग सबरीमाला केस के नाम से ज्यादा जानते हैं. इस केस को सुनने के लिए बनाई गई 5 जजों की संवैधानिक बेंच में जस्टिस रोहिंगटन नरीमन भी शामिल थे. उन्होंने भी अपने आदेश में 10 से 50 साल की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में एंट्री न दिए जाने को असंवैधानिक ठहराया था.

जोसेफ शाइन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2019) – इस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि एडल्ट्री के केसेज में औरतों के साथ भेदभाव न किया जाए. इसे महिलाओं के मामले में गेम चेंजर केस माना गया है.

जस्टिस रोहिंगटन नरीमन को उनके तरह-तरह के शौक के लिए भी जाना जाता है. उन्होंने पारसी धर्म पर एक किताब लिखी है. इस किताब के लॉन्च के मौके पर उन्होंने बच्चों के लिए किताब लिखने के प्लान के बारे में खुलासा किया था. उन्हें करीब से जानने वाले बताते हैं कि जस्टिस नरीमन को वेस्टर्न क्लासिकल म्यूजिक का बड़ा शौक है. उनके पास बेहतरीन कलेक्शन है.


वीडियो – पेगासस मामले में सुप्रीम कोर्ट की ये बात गौर करने वाली है

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