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पहले फेल हो चुकी मोदी सरकार क्या अबकी बार एयर इंडिया को प्राइवेट करके रहेगी?

पहले दो भागों में हमने आपको एयर इंडिया का इतिहास बताया था. सिर्फ़ JRD की उम्र तक. क्यूंकि उसके बाद एयर इंडिया में इतिहास नहीं सिर्फ़ फ़ाइनेंस रह जाता है. और वो भी नोज़डाइव लगाता हुआ. ‘नोज़डाइव’ मतलब किसी विमान का आगे वाले भाग (नाक) के बल पर तेज़ी से नीचे गिरना. इस शब्द को एयरलाइन इंडस्ट्री से ज़्यादा फ़ाइनेंस में यूज़ किया जाता है. कि अमुक कंपनी अपनी नाक के बल गिरी. लेकिन ये दुर्योग ही है कि एक विमान से जुड़े मेटाफ़र को विमानन से जुड़ी कंपनी की आर्थिक स्थिति बताने के लिए प्रयोग में लाया जा रहा है.

पढ़ें: एयर इंडिया की कहानी: पहला भाग

पढ़ें: एयर इंडिया की कहानी: दूसरा भाग

# रिवीज़न-

तो जब एयर इंडिया से पहली बार JRD अलग हुए, तभी एयर इंडिया के बुरे दिन शुरू हो गए थे, जिसे JRD भी दोबारा नहीं संभाल पाए.

रही सही कसर 2007 में पूरी हो गई थी. जब इंडियन एयरलाइंस और एयर इंडिया एक साथ मर्ज़ हो गए थे. दोनों लॉस मेकिंग कंपनियां. दो लॉस जुड़ते नहीं, गोया आपस में गुणा हो जाते हैं. कैसे? जानने से पहले याद कीजिए जब आठ एयरलाइंस को एक प्लेटफ़ॉर्म पर लाया गया था तो क्या दिक्कत आई थी. तो आइए इस नुक़सान के गुणा हो जाने को एयर इंडिया के माध्यम से भी समझते हैं. साथ ही एयर इंडिया के लॉस मेकिंग कंपनी होने के अन्य कारणों को भी.

क्या फिर से 'टेक ऑफ़' करेगी एर इंडिया? (तस्वीर: PTI)
क्या फिर से ‘टेक ऑफ़’ करेगी एर इंडिया? (तस्वीर: PTI)

# एयर इंडिया के नुक़सान में जाने के कारण-

# 1). मर्ज़र- जैसे ही इन दोनों कंपनियों (एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस) का मर्जर हुआ तो एक प्लेन के लिए 200 से ज़्यादा कर्मचारी हो गए. जो कि विश्व भर के औसत से बहुत ज़्यादा था. जैसे सिंगापुर एयरलाइंस के लिए ये औसत 160 के क़रीब था. ज़्यादा कर्मचारी मतलब ऑफ़ कोर्स ज़्यादा खर्च. हालांकि आप ये भी कह सकते हैं कि इस लॉजिक से तो कंपनी की प्रोडक्टीविटी और सर्विस भी बाकी कंपनियों से बेहतर होगी. इसके उत्तर में ये बात जानना काफ़ी होगा कि एयर इंडिया एक सरकारी कंपनी है. नौकरी भी सरकारी. तिस पर मज़बूत कर्मचारी संघ. और, ज़्यादा कर्मचारियों के होने के चलते कोलैटरल डैमेज ये कि कर्मचारी संघ और ज़्यादा स्ट्रॉन्ग होते चले गए.

अब सवाल ये कि इतने ज़्यादा कर्मचारी हुए कैसे? उसका कारण भी कंपनी का सरकारी होना था. मतलब कर्मचारियों की ज़रूरत नहीं लेकिन कई ‘ग़ैर आवश्यक’ कारणों के चलते भर्तियों पर भर्तियां चलती रहीं. साथ ही एक सरकारी जॉब में प्राइवेट कंपनी की तरह कर्मचारी कभी भी समय से पहले नहीं निकाले जाते. मतलब बहुत बड़े कारणों या कुछ एक्सेप्शन्स की बात हटा दी जाए तो. इसके चलते भी दो नुक़सान. एक तो कर्मचारी बढ़ते चले गए, और दूसरा कर्मचारियों की जवाबदेही कम हुई तो प्रोडक्टिविटी में उत्तरोत्तर कमी आते चले गई.

# 2). बेस्ट ऑफ़ बोथ- मर्ज़र के वक़्त सैलरी से लेकर हर एक चीज़ दोनों (एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस) में से जिसकी भी बेस्ट थी, या तो वो चुनी गई या फिर दोनों से बेहतर कोई व्यवस्था की गई. जैसे एयर इंडिया में दो दिन का वीक ऑफ़ था और इंडियन एयरलाइंस में एक दिन का. जब दोनों मर्ज़ हुईं तो नई ऑर्गनाइज़ेशन का वीक ऑफ़ दो दिनों का कर दिया गया.

इंडियन एयरलाइंस. जो बाद में एयर इंडिया में मर्ज़ हो गई. (तस्वीर: By Sean & Silva / planespotters.net/Aviation_Photos/photo.show?id=068571)
इंडियन एयरलाइंस. जो बाद में एयर इंडिया में मर्ज़ हो गई. (तस्वीर: By Sean & Silva / planespotters.net/Aviation_Photos/photo.show?id=068571)

# 3). उदारीकरण- एक दिक्कत 2007 से पहले और JRD की विदाई के बाद भी आई. उदारीकरण वाले मनमोहन, आई मीन मनमोहक दौर के चलते. सिविल एविएशन सेक्टर के डी-रेगुलेट होने के बाद, 1990-91 में निजी कंपनियां भी एयरलाइंस खोल सकती थीं. ईस्ट वेस्ट एयरलाइंस लगभग 37 वर्षों के बाद देश में संचालित होने वाली पहली राष्ट्रीय स्तर की निजी एयरलाइन थी. इससे एयर इंडिया की मोनोपॉली ख़त्म हो गई. और कंपटीशन के आ जाने पर एयर इंडिया अपने को उस तरह से रिवाइव भी नहीं का पाई. क्यूंकि जैसा हमने पहले जाना कि ये एक सरकारी कंपनी बनकर रह गई थी.

# 4). नैतिकता और प्रॉफ़िट क्या कभी दोस्त नहीं हो सकते? – जिस तरह BSNL देश के कोने-कोने में पहुंची हुई है. मतलब इसका नेटवर्क मुझे तब भी मिला था जब मैंने गैंगटॉक के रास्ते चीन बॉर्डर (नाथुला) तक की यात्रा की थी. ऐसे ही एयर इंडिया द्वारा, एक सरकारी कंपनी होने के चलते, इस बात का भी ख़्याल रखा गया कि वो देश के कोने कोने तक पहुंचे. और ये ग़लत नहीं, बल्कि एक सरकारी कंपनी के लिए नैतिक रूप से भी आवश्यक है. क्यूंकि उसको सर्वजन हिताय पर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए न कि प्रॉफ़िट-लॉस पर. जैसा कि एक बार जवाहर लाल नेहरू ने JRD टाटा से कहा था, ‘मुझे प्रॉफ़िट शब्द से नफ़रत है.’ लेकिन अभी हम एयर इंडिया के नुक़सान में जाने के कारणों की बात कर रहे हैं, इसलिए सही-ग़लत, नैतिक-अनैतिक, सभी कारण गिनना ज़रूरी है.

वैसे इंट्रेस्टिंग बात ये है कि एयर इंडिया के वही कुछ सेक्टर्स, जहां सिर्फ़ एयर इंडिया ही पहुंचने की हिम्मत और कुव्वत रख सकती है, कंपनी को प्रॉफ़िट कमा कर देते हैं. जैसे इंटरनेशनल में कोज़ीकोड़ी-जेद्दा जैसे सेक्टर्स और डॉमेस्टिक में दिल्ली-लेह जैसे सेक्टर्स. लेकिन ये फ़ैक्ट एक दुधारी तलवार हैं. क्यूंकि अगर एयर इंडिया सोचे कि इन सेक्टर्स से और प्रॉफ़िट कमाने के लिए हम दिल्ली-मुंबई सेक्टर्स से हटाकर यहां पर उड़ानें बढ़ा दें, तो फिर ‘सप्लाई डिमांड’ वाले सिद्धांत के चलते प्रॉफ़िट कम हो जाएगा. या कंपनी वहां पर भी घाटे में आ जाएगी. और अगर एयरलाइन उन जगहों पर से फ़्लाइट हटाती है, जहां इसे लॉस हो रहा है (जैसे दिल्ली-मुंबई, दिल्ली-कोलकाता) तो, वहां ये अन्य प्लेयर्स को प्ले ऑफ़ दे देने सरीखा होगा. क्यूंकि वहां पर इसे प्रीमियम टाइम स्लॉट मिले हुए हैं.

उदारीकरण के दो चेहरे. (तस्वीर: PTI)
उदारीकरण के दो चेहरे. (तस्वीर: PTI)

इसे ऐसे समझिए कि एयर इंडिया की पहले दिल्ली-मुंबई जैसे सेक्टर्स में मोनोपॉली तो रही ही थी. प्रॉफ़िट तो बाद में कंपटीशन खा गया. कोई ऐसा थोड़ी था कि एयर इंडिया ने उन जगहों में बाद में ऑपरेट किया जहां पहले ही प्रॉफ़िट था. यानी ये कि अगर दिल्ली-लेह सेक्टर्स में इतना ही प्रॉफ़िट होता तो प्राइवेट प्लेयर्स वहां भी आ ही जाते. आप देखिए एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन के नज़दीक ज़्यादा होटल होते हैं, गांवों-क़स्बों में इक्का दुक्का मिलना भी मुश्किल है. और वो इक्का-दुक्का होटल प्रॉफ़िट कमाएं तो भी वहां कोई और होटल खोलने की हिम्मत कम ही करेगा. जबकि रेलवे स्टेशनों के आसपास प्रॉफ़िट हो या लॉस, वहां पर पोटेंशियल बहुत ज़्यादा है. प्रॉफ़िट, अगर हो तो, बहुत ज़्यादा है.

# 5). फ़ुल सर्विसv/sलो कॉस्ट करियर-एयर इंडिया का कंपटीशन अपनी सरीखी फुल सर्विस एयरलाइंस से ही नहीं, लो कॉस्ट करियर से भी है. लो कॉस्ट करियर जैसे इंडिगो, गो एयर, स्पाइस जेट. फुल सर्विस जैसे, एयर इंडिया, विस्तारा, और अतीत में जेट एयर वेज़.

लो कॉस्ट को ऐसे समझ लीजिए कि वो आपको पिज़्ज़ा बेस देती हैं और उसी का चार्ज करती हैं. अगर आपको स्पेशल सीट, खाना, बैगेज अलाउंस चाहिए तो अलग से पेमेंट करिए. दूसरी तरफ़ ‘फुल सर्विस एयरलाइंस’ आपको पूरा पिज़्ज़ा बनाकर देती हैं और पूरे पिज़्ज़ा के ही पैसे लेती हैं. चाहे आपको टॉपिंग्स की ज़रूरत हो या नहीं. साथ ही लो कॉस्ट करियर में कोई क्लास डिफ़रेंस नहीं होती होता. मतलब ज़्यादातर इनमें सिर्फ़ इकॉनमी क्लास होती है. यूं कम लेकिन पर्याप्त लेग रूम के चलते सीटें बढ़ जाती हैं. और हर एक्स्ट्रा सीट का मतलब एक्स्ट्रा प्रॉफ़िट.

हालांकि ये तो सिर्फ़ दृश्य अंतर है, दूसरा बड़ा अंतर जिसके चलते लो कॉस्ट एयरलाइंस कम पैसे में ऑपरेट करके प्रॉफ़िट कमा लेती हैं, वो हैं इनका GDS पर न होना. GDS बोले तो ग्लोबल डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम. मतलब एक तरीक़े का सेंट्रल-नेटवर्क और सॉफ़्टवेयर जिसमें अगर आप अपनी एयरलाइंस को डालते हो तो दुनिया के किसी भी कोने में कोई भी ट्रैवल एजेंट लाइव अवेलेबिल्टी देख सकता है. बुकिंग कर सकता है. इस सबके लिए उसे आपकी एयरलाइन की वेबसाइट पर निर्भर नहीं रहना पड़ता. फ़ेयर, डिस्काउंट से लेकर सीट अवेलेबिलिटी तक सब कुछ सेंट्रलाइज़ होती है. साथ ही GDS का फ़ायदा ये भी होता है कि ये दो अलग-अलग एयरलाइंस के बीच भी कनेक्टिंग फ़्लाइट्स बनाकर दिखाता है. अगर दोनों फ़्लाइट्स GDS पर हैं.

इंडिगो जैसी लो कॉस्ट एयरलाइंस प्रॉफ़िट में आ गईं. कम से कम कोविड -19 से पहले तो यही स्टेट्स था. (तस्वीर: PTI)
इंडिगो जैसी लो कॉस्ट एयरलाइंस प्रॉफ़िट में आ गईं. कम से कम कोविड -19 से पहले तो यही स्टेट्स था. (तस्वीर: PTI)

जबकि लो कॉस्ट करियर के केस में ट्रैवल एजेंट या यात्री को उन एयरलाइंस की वेबसाइट पर जाना पड़ेगा. अगर किसी ट्रैवल एजेंसी की वेबसाइट पर इनकी बुकिंग मिल भी रही है तो मान लीजिए कि उनके बैकग्राउंड में लो कॉस्ट एयरलाइन का सिस्टम चल रहा होगा, जीडीएस नहीं.

यूं इतनी सुविधाओं को देने के चलते GDS वाली एयरलाइंस की ऑपरेटिंग कॉस्ट बढ़ जाती है. रेगुलेशन भी. हालांकि इंटरनेशनल फ़्लाइट्स के लिए GDS ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है, लेकिन डॉमेस्टिक के लिए नहीं. (वैसे एयर एशिया जैसी कई इंटरनेशनल एयरलाइंस भी GDS में नहीं हैं, लेकिन इनके इंटरनेशनल ऑपरेशन लिमिटेड हैं.)

तो अगर एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस मर्ज़ न की जातीं तो इंडियन एयरलाइंस को बिना GDS के ऑपरेट किया जा सकता था और दूसरी तरफ़ एयर इंडिया का तो वर्ल्ड में कंपटीशन उन्हीं एयरलाइंस से होना था, जो GDS पर हैं. हालांकि इसी कंपटीशन वाले सवाल के जवाब में आई, एयर इंडिया एक्सप्रेस. 2005 में. और ये प्रॉफ़िट में भी रहती है. लेकिन कुछ ही शहरों में ऑपरेट करने वाली ये कोच्चि बेस्ड एयरलाइंस कितना ही कमा कर दे देगी. अगर एयर इंडिया के लॉसेज़ ऊंट हैं तो एयर इंडिया एक्सप्रेस के प्रॉफ़िट ज़ीरो, मतलब ज़ीरा.

# 6). लीज़ v/s ओनरशिप- एयर इंडिया के नुक़सान में जाने का एक ये कारण तो बता ही चुके हैं कि एयर इंडिया कंपनी और उसके कर्मचारियों के बीच तलाक़ की कोई व्यवस्था नहीं है. इसी तरह एयर इंडिया कंपनी और उसके एयरक्राफ़्ट के बीच भी ऐसा संभव नहीं है. क्यूंकि ये उसके ख़ुद के एयरक्राफ़्ट हैं. न केवल इन सफ़ेद हाथियों को ख़रीदते वक़्त मोटा पैसा दिया गया होगा, बल्कि इनके मेंटेनेंस में भी कम खर्च नहीं होता. इस बात को शुरुआत में एयर इंडिया के पक्ष में माना जाता था कि उसके पास बाक़ी एयरलाइंस की तरह एयरक्राफ़्ट लीज़ में नहीं हैं. ठीक भी था. कोई कंपनी अगर प्रॉफ़िट में जाए तो ख़ुद के एयरक्राफ़्ट होना एक एसेट है. लेकिन अगर कंपनी नुक़सान में जा रही है तो यही एसेट लायबिलिटी बन जाते हैं. क्यूंकि लीज़ में लिए हुए एयरक्राफ्ट्स को तो वापस करके कॉस्ट कटिंग किया जा सकता है. लेकिन अब तो इनका मेंटेनेंस करना पड़ेगा. और जो इनको ख़रीदने के लिए लोन लिया है वो भी चुकाना पड़ेगा. ऐसा समझ लीजिए कि जो मकान आपने ख़रीदा उसका लोन तो हर महीने चुका रहे हैं, लेकिन पोज़ेशन मिला नहीं. तो जहां किराए में रह रहे हैं उसे पैसा भी दे रहे हैं.

GDS. बोले तो ग्लोबल डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम. सेबर, ऐमडेयस, गैलिलियो. (तस्वीर: company.hoteliers.com)
GDS. बोले तो ग्लोबल डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम. सेबर, ऐमडेयस, गैलिलियो. (तस्वीर: company.hoteliers.com)

और इन प्लेंस को लेकर करेले पे नीम चढ़ा वाली बात ये रही कि मर्ज़ होने से पहले एयर इंडिया ने 2004 में 50 हज़ार करोड़ रुपये के क़रीब में 50 प्लेंस का ऑर्डर दे रखा था और इंडियन एयरलाइंस ने 40 से ज़्यादा प्लेंस का ऑर्डर किया हुआ था. तो यूं जहां मर्ज़र से पहले प्लेंस का ज़ख़ीरा था वहां मर्ज़र के बाद तो पार्किंग में रखे प्लेंस ही बाकी एयरलाइंस की कुल फ़्लीट के बराबर हो गए थे.

# 7). शॉर्ट टर्म- साथ ही अगर एयर इंडिया का हेड, यानी इसका चेयरमैन, मन से इसे रिवाइव करने की सोचता भी तो उसे किसी प्राइवेट कंपनी के MD की तरह कई सालों का समय नहीं मिलता. लगातर चेयरमैन के बदलते रहने से उपायों में जिस कंसिसटेंसी की दरकार थी, वो कभी आई ही नहीं. इनके कार्यकाल की JRD टाटा के लंबे कार्यकाल से तुलना करके देखिए आपको समझ में आएगा कि ये कितना बड़ा और नेगेटिव अंतर लाया.

# 8). बदली प्राथमिकताएं- सरकारी होने के चलते इस एयरलाइंस के साथ ये भी दिक्कत थी कि इसके यात्रियों में आए दिन VIP और VVIP ट्रैवल कर रहे होते थे. न केवल ये यात्राएं फ़्री ऑफ़ कॉस्ट, या स्टेट सपॉन्सरड होतीं बल्कि इनके चलते बाक़ी यात्रियों की यात्रा में देरी भी होती और VIP मूवमेंट से होने के चलते बाकी यात्रियों को इग्नोर किया जाता. जिससे यात्री दूसरी एयरलाइंस में शिफ़्ट हो गए. आप ही बताइए मोनोपॉली न हो, सर्विसेज़ तुलनात्मक रूप से कम अच्छी हों, फ़्लाइट का ‘ऑन टाइम’ रिकॉर्ड ख़राब हो चुका हो और यात्रा स्टेट सपॉन्सर न हो तो कोई ये क्यूं ले, वो न ले.

# मोनोपॉली-

एयर इंडिया की हालत इतनी बुरी है कि इसकी इनकम का बड़ा चंक अब भी मोनोपॉली के चलते ही आता है. मतलब मोनोपॉली इसलिए कि उन जगहों पर कोई फ़्लाइट ही ऑपरेट नहीं करती, या मोनोपॉली इसलिए कि आप सरकारी यात्रा कर रहे हैं, या मोनोपॉली इसलिए क्यूंकि आप सरकारी कर्मचारी हैं और LTC के अंतर्गत यात्रा कर रहे हैं, जिसमें आपके पास एयर इंडिया के अलावा कोई और फ़्लाइट लेने का विकल्प नहीं होता. ख़ासतौर पर उन सेक्टर्स में जहां एयर इंडिया ऑपरेट करती है. और फिर इन LTC टिकट्स का मूल्य भी सामन्य टिकट से कई गुना अधिक होता है. मतलब कुल मिलाकर जहां ज़ोर-जबरदस्ती की जा सकती है, वहां से प्रॉफ़िट कमाया जा रहा है. प्रॉफ़िट भी क्या इनकम कहिए. और गौर कीजिए ज़रा, ऊपर दिए गए उदाहरणों में से कई उदाहरणों में एयर इंडिया की ये इनकम, दूसरे डिपार्टमेंट्स की फ़िज़ूलखर्ची के एवज़ में है.

ऐसे ही एयर इंडिया को रिवाइव करने के लिए कई बार इसको बेलआउट दिया जा चुका है. कई बार सरकार ने हज़ारों करोड़ रुपए इसमें झोंके हैं. वो पैसे भी सरकार के पास टैक्स से आए हैं या फिर घाटे वाले मद में गए हैं.

# क्या है अभी एयर इंडिया की आर्थिक स्थिति-

साल 2007 के बाद से, यानी जब से एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस का विलय हुआ है, अब तक एक भी ऐसा साल नहीं रहा जब एयर इंडिया फायदे में रही हो. फाइनेंशियल ईयर 2018-19 में उसे करीब साढ़े आठ हजार करोड़ रुपए का घाटा हुआ. वर्तमान मे एयर इंडिया की कुल देनदारी लगभग 60 हज़ार करोड़ रुपए और संचयी घाटा (कम्यूलेटिव लॉस) करीब 70 हज़ार करोड़ तक है.

लो कॉस्ट कैरियर को टक्कर देने के लिए एयर इंडिया ने भी 'एयर इंडिया एक्सप्रेस' सेवा लॉन्च की (तस्वीर: अजय रायदान डिसूज़ा / @FlyWithIX Twitter account)
लो कॉस्ट कैरियर को टक्कर देने के लिए एयर इंडिया ने भी ‘एयर इंडिया एक्सप्रेस’ सेवा लॉन्च की (तस्वीर: अजय रायदान डिसूज़ा / @FlyWithIX Twitter account)

# तो अब किया ही क्या जा सकता है-

सिंपल सा हल है. सरकार इसे बेच दे. लेकिन बेचे कैसे, जब कोई ख़रीदने वाला ही न मिल रहा हो तो?

कुछ दिन पहले की ही ख़बर है कि कभी अरबों मूल्य की कंपनी, फ़िनाबर्ल, सिर्फ़ एक डॉलर में बिक गई. क्या ऑल्मोस्ट फ़्री में मिली इस कंपनी से, फ़िनाबर्ल के ख़रीददार को बड़ा फ़ायदा हुआ होगा? क़तई नहीं. उसे नुक़सान और क़र्ज़ में चल रही कंपनी का पूरा रायता समेटना होगा. और इसमें खूब सारे रुपये और संसाधन लगेंगे. 50% संभावना है कि फ़िनाबर्ल अपने नए मालिक का भी नुक़सान करवा दे.

ऐसा ही हाल एयर इंडिया का भी है. इसे ख़रीदने के लिए बोली लगनी तो दूर, किसी ने EOI मतलब ‘एक्सप्रेशन ऑफ़ इंट्रेस्ट’ भी ज़मा नहीं किया. मतलब मोलभाव करना तो दूर लोग उस दुकान में रेट पूछने भी न गए, जिस दुकान की ‘फ़ॉर सेल’ वाली शेल्फ में एयर इंडिया सजा के रखी थी. अब जब दुकानदार ने कुछ ‘सेल’, ‘डिस्काउंट’ और ‘बाय टू गेट वन फ़्री’ जैसे ऑफ़र वाले रंगबिरंगे पेंफलेट इसके सामने रखे तब जाकर कुछ उम्मीद बंधी है.

दुकानदार कौन? सरकार.

और ऑफ़र क्या? आइए शुरू से समझते हैं.

# बेचने का प्रथम प्रयास-

आज से करीब 7 साल पहले, मार्च 2014 की एक सुबह जब नेशनल ट्रांसपोर्ट डेवलपमेंट कमिटी की 3 वॉल्यूम में छपी रिपोर्ट तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरकार द्वारा सार्वजनिक की गई तो थी पता चला कि उसमें सरकार को राय दी गई थी कि आने वाले 5 वर्षों में सरकार को एयर इंडिया में अपनी हिस्सेदारी को 26% तक सीमित करने पर विचार करना चाहिए है. कमिटी के अनुसार एयर इंडिया के लिए भविष्य में कोई ख़ास स्कोप नहीं था जिसकी प्रमुख वजह ओवर स्टाफिंग, मिस-मैनेजमेंट,और बदलती टेक्नोलॉजी के अनुसार ख़ुद को न ढालना था.

जानकारों के अनुसार 3 से 5 साल का समय भी बहुत लम्बा था. उनके अनुसार सरकार को अगले कुछ सालों में ही जल्द से जल्द डिसइनवेस्टमेंट की ओर कदम बढ़ाने चाहिए थे. लेकिन शायद ‘टू मच ऑफ़ ब्यूरोक्रेसी’ के चलते ऐसा हो नहीं पाया और 7 साल जितना लम्बा समय बीत जाने के बाद भी हम एयर इंडिया के डिसइनवेस्टमेंट की शुरुआती प्रक्रियाएं भी ढंग से पूरी नहीं कर पाए हैं.

बेशक मनमोहन सिंह सरकार के जाने के बाद मोदी सरकार ने अलग-अलग सरकारी एसेट्स के प्राइवेटाइज़ेशन की दिशा में कई ठोस कदम उठाये. 2014 से 2 बार एयर इंडिया के डिसइनवेस्टमेंट के प्रयास किये जा चुके हैं.

नरेंद्र मोदी सरकार शिद्दत से चाहती है कि अबकी डील स्ट्राइक हो जाए. (तस्वीर: बिज़नेस टुडे/PTI)
नरेंद्र मोदी सरकार शिद्दत से चाहती है कि अबकी डील स्ट्राइक हो जाए. (तस्वीर: बिज़नेस टुडे/PTI)

मार्च-अप्रैल 2018 में सरकार ने एयर इंडिया में अपनी हिस्सेदारी बेचने के उद्देश्य से एक इंफ़ॉर्मेशन मेमोरेंडम ज़ारी किया. इसमें डिसइनवेस्टमेंट से जुड़ी सभी ज़रूरी जानकारी और सरकार की शर्तों का एक प्राथमिक मसौदा था. सरकार ने एयर इंडिया की 76% हिस्सेदारी बेचने और 24% अपने पास रिटेन रखने का फैसला किया था. साथ ही एयर इंडिया की बुक्स से 29,000 करोड़ रुपये का क़र्ज़ सरकार द्वारा हटा लिया जाता और बाकी जितना क़र्ज़ बचता उसका भार खरीददार पर आना था.

लेकिन शर्तें पढ़-सुन कर एक भी खरीदार ने आधिकारिक तौर पर अपना इंटरेस्ट नहीं प्रकट किया. कारण कई थे-

# टाइमिंग-ये फैसला मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के अंतिम वर्ष में लिया गया था. निवेशकों के मन में कहीं न कहीं राजनैतिक अस्थिरता और सरकार बदलने का डर था. और इसके चलते डील पर करोड़ों अरबों के नुक़सान होने का भी.

# हिस्सेदारी-सरकार द्वारा 24% हिस्सेदारी अपने पास रखने से बहुत से निवेशकों के मन में ये डर पैदा हुआ कि सरकार की इस हिस्सेदारी के चलते उनकी स्वयत्तता और प्रशासनिक अधिकार में बाधा आएगी.

# आर्म ट्विस्टिंग का आरोप- जब सरकार अपनी शर्तों में कुछ बदलाव का मन बना बैठी थी तब एयर इंडिया के कर्मचारियों के संयुक्त समूह ने बयान दिया कि-

एयर इंडिया भारत के राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है. ज़रूरत की घड़ी में कई दफा देश के काम आ चुका है. इसको ऐसे निजी हाथों में सौपना कतई ठीक नहीं है.

कर्मचारियों के इस जॉइंट फोरम ने सरकार का निवेशकों के प्रति नरम रवैया देखते हुए कहा-

भावी निवेशक आर्म-ट्विस्टिंग स्ट्रेटेजी के तहत सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं.

आर्म-ट्विस्टिंग बोले तो ऐसी स्ट्रेटेजी जिसमें किसी को डरा धमका या अनैतिक दबाव बनाकर काम करवाने की मंशा हो.

# क़र्ज़- खरीददार को एयर इंडिया पर लदे कर्ज़ में से 33,392 करोड़ रुपए की जिम्मेदारी लेनी थी. यानी एयर इंडिया खरीदने वाले को सबसे पहले तो इतना बड़ा अमाउंट चुकाना पड़ता.

# दूसरी कोशिश-

दूसरी कोशिश साल 2020 में हुई. जनवरी के महीने में निवेशकों से एक्सप्रेशन ऑफ़ इंटरेस्ट(EOI) मंगवाने का काम किया गया.

एक्सप्रेशन ऑफ़ इंटरेस्ट किसी भी नीलामी या डिसइन्वेस्टमेंट प्रक्रिया का पहला स्टेप जानिए. इसमें इन्वेस्टर्स एक पूर्व-निर्धारित फॉर्मेट में किसी कंपनी की हिस्सेदारी खरीदने की इच्छा जताते हुए सरकार को अपना प्रस्ताव भेजते हैं. इसके बाद ही अगले स्टेप्स जैसे प्राइस कोटिंग, बिडिंग, नीलामी आदि होते हैं.

सरकार की मानें तो पिछली बार से उलट इस बार कई बड़ी कम्पनीज़ ने इस प्रक्रिया में अपना इंटरेस्ट दिखाया है. जिसमें टाटा ग्रुप्स की एक सब्सिडरी फर्म भी शामिल है. इसी के चलते हमने शुरुआत में कहा था कि शायद टाटा और एयर इंडिया के जुड़ाव का सर्किल यहां पर पूरा हो गया लगता है.

इसके अलावा एक अमेरिकी एनआरआई फर्म इंटरप्स इंक (Interups Inc.) का नाम भी सामने आ रहा है. इंटरप्स इंक ने एयर इंडिया के एक कर्मचारी समूह के साथ मिल कर अपना EOI सबमिट किया है.

हालांकि EOI देने वाली हर कंपनी को नीलामी में शामिल होने का मौका मिले, ये जरूरी नहीं. कुछ पैरामीटर हैं. उन पर ख़री उतरने वाली कंपनियों को ही बोली लगाने का मौक़ा मिलेगा. इसके बाद तारीख निकलेगी कि नीलामी होनी कब है. सरकार आशान्वित है कि प्राप्त हुए EOI को तय मानकों पर जांच लेने के बाद आधिकारिक तौर पर दिसंबर के अंत या जनवरी की शुरुआत तक अगली बिडिंग के लिए क्वालीफाइंड बिडर चुन लिए जाएंगे.

जिन JRD ने अपने करियर की शुरुआत पोस्टल स्टैम्प की कमाई से की थी बाद में उनके नाम का भी पोस्टल स्टैम्प बना. क्या अब एयर इंडिया भी टाटा की बनेगी. (तस्वीर: इंडिया पोस्ट, भारत सरकार)
जिन JRD ने अपने करियर की शुरुआत पोस्टल स्टैम्प की कमाई से की थी बाद में उनके नाम का भी पोस्टल स्टैम्प बना. क्या अब एयर इंडिया भी टाटा की बनेगी. (तस्वीर: इंडिया पोस्ट, भारत सरकार)

जानते हैं अबकी इतने EOI क्यूं आए हैं? क्यूंकि 2018 से सबक लेते हुए केंद्र सरकार ने इस बार नीलामी की शर्तें आसान कर दी हैं. दो बदलाव हैं. पहला, सरकार इस बार पूरी 100% हिस्सेदारी की नीलामी कर रही है. कोई शेयर अपने पास नहीं रखेगी. दूसरा, इस बार खरीददार को 23,286 करोड़ रुपए के कर्ज़ की ही जिम्मेदारी लेनी होगी. बाकी बचे करीब 37 हजार करोड़ रुपए का उधार सरकार चुकाएगी.

एयर इंडिया के यूं तो तमाम चीज़ों से जुड़े कर्ज़ हैं. लेकिन सिर्फ एयरक्राफ्ट से जुड़े जितने कर्ज़े हैं, उनका हिसाब कुल मिलाकर 23,286 करोड़ रुपए का है. इसीलिए अब नए मालिक को इतना कर्ज़ तो चुकाना ही होगा.

सरकार ने इस बार खरीददार के मामले में भी शर्तों में ढील दे दी है. 2018 में नियम था कि बोली लगाने वालों की नेटवर्थ कम से कम 5 हजार करोड़ रुपए होनी चाहिए. इस बार ये लिमिट घटाकर साढ़े तीन हजार करोड़ रुपए कर दी गई है. इसके अलावा एंप्लॉयी बेनेफिट का भी ख्याल रखा जाएगा. नए मालिक को 3% शेयर एयर इंडिया के कर्मचारियों के लिए रिजर्व रखने होंगे.

# ये सब मिलेगा नए मालिक को-

एयर इंडिया की पूरी 100% होल्डिंग तो मिलेगी ही साथ ही नीलामी सिर्फ एयर इंडिया की ही नहीं, बल्कि इसकी दो सब्सिडियरी कंपनियों की भी होगी. AI Express में सरकार अपनी 100% हिस्सेदारी बेचेगी. ये एक लो-कॉस्ट एयरलाइन सर्विस है. वहीं AISATS में 50% हिस्सेदारी बेची जाएगी. ये एक गेटवे एंड फूड सर्विस प्रोवाइडर कंपनी है.

एयर इंडिया के पास डोमेस्टिक फ्लाइट लैंडिंग के चार हजार से ज्यादा स्लॉट, इंटरनेशनल फ्लाइट के 1500 से ज्यादा स्लॉट हैं. एयर इंडिया के पास करीब सौ जहाज हैं. इसमें बोइंग से लेकर एयरबस तक शामिल हैं. इनकी कीमत 15 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा है. नए मालिक को एयर इंडिया खरीदने पर इतना कुछ मिलेगा. इसके अलावा करीब 20 हजार एंप्लॉयी एयर इंडिया के साथ काम करते हैं. (इसमें से कितने एसेट हैं, कितने लायबिल्टी ये तो ने मालिक को पता चल ही जाएगा.)

# नीलामी की कुछ और शर्तें-

#खरीददार को एयर इंडिया नाम रिटेन करना होगा. माने- जो भी पार्टी एयर इंडिया को खरीदेगी, वो इसका नाम नहीं बदल सकेगी.

# ये शर्त कुछ समय के लिए है. उसके बाद नाम बदला जा सकेगा. कितने समय बाद? इसका ज़िक्र नीलामी से पहले दिए जाने वाले रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) में होगा.

#दिल्ली में एयर इंडिया का कॉर्पोरेट ऑफिस है, मुंबई में हेड ऑफिस है. ये दोनों बिल्डिंग नहीं बेची जाएंगी. नीलामी की शर्तों में ये साफ लिखा है कि- दिल्ली और मुंबई के दफ्तर नीलामी की प्रोसेस से बाहर हैं.

#हालांकि नए खरीददार को कुछ समय तक दिल्ली और मुंबई के दफ्तरों से काम करने की परमिशन जरूर रहेगी.

तो ये थी एयर इंडिया से जुड़ी पूरी स्टोरी. इसकी मेन थीम थी अर्थशास्त्र, इतिहास और अर्थशास्त्र का इतिहास. हालांकि एयर इंडिया का इतिहास इतना लंबा और अर्थशास्त्र इतना पेचीदा है कि सब कुछ कवर किया जाए तो एक नॉन-फ़िक्शन किताब तैयार हो जाएगी. और फिर भी कई चीज़ें बची रह जाएंगी, जैसे कुछ बुरे हादसे. जिनमें सबसे कुख्यात था कनिष्क विमान हादसा. 23 जून, 1985 को मॉन्ट्रियल (कनाडा) से मुंबई (वाया लंडन, दिल्ली) आ रहे इस एयरक्राफ़्ट को हवा में ही बम से उड़ा दिया गया था. विमान में सवार सारे यात्री और क्रू मेम्बर के सभी 22 सदस्य (कुल संख्या 329) मारे गए थे.


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