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जिसे 21 सालों तक इंडिया ने एक मैच भी नहीं खिलाया, उसे साउथ अफ्रीका ने कोच बना लिया

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अमोल अनिल मुज़ुमदार.

वो खिलाड़ी, जिसके नाम रणजी में डेब्यू पर हाईएस्ट स्कोर करने का रिकॉर्ड बरसों तलक रहा.
वो खिलाड़ी, जो तब पैड बांधे इंतज़ार कर रहा था जब सचिन और कांबली 664 रनों की पार्टनरशिप वाला रिकॉर्ड बना रहे थे.
वो खिलाड़ी, जो मुंबई के बैट्समैन पैदा करने वाले कारखाने का शानदार प्रॉडक्ट माना जाता था. 
वो खिलाड़ी, जिसने बरसों तलक इंडियन टीम के दरवाज़े पर दस्तक दी.
वो खिलाड़ी, जो 21 साल तक क्रिकेट खेलता रहा लेकिन कभी इंडिया की जर्सी न पहन सका.

बदकिस्मत लोगों का अगर कोई मुल्क बसाया जाएगा तो अमोल मुज़ुमदार को यकीनन उसकी ऑनरेरी सिटीज़नशिप मिल जाएगी. कहते हैं कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती. अमोल मुज़ुमदार को यकीनन इस कहावत से नफरत होगी. वजह भी है. चौथाई सदी तक जो शख्स क्रिकेट खेलता रहा उसे अपने वतन की नुमाइंदगी का एक भी मौका न मिल सका. ये दुर्भाग्य की ही बात है.

एक ही कोच के दो शिष्य. एक भगवान बना, एक गुमनाम रहा.
एक ही कोच के दो शिष्य. एक भगवान बना, एक गुमनाम रहा.

बहरहाल, अमोल मुज़ुमदार फिर से चर्चा में हैं. उन्हें साउथ अफ्रीका की टीम ने अपना बैटिंग कोच बनाया है. वो भी भारत दौरे के लिए. 2 अक्टूबर से भारत-साउथ अफ्रीका के बीच तीन टेस्ट मैचों की सीरीज शुरू हो रही है. इसी सीरीज में अमोल मुज़ुमदार साउथ अफ्रिकंस को इंडियन स्पिन से निपटने के गुर सिखाएंगे.

पहले परिचय प्राप्त कर लें

11 नवंबर 1974 को मुंबई में पैदा हुए अमोल के जीवन का बड़ा हिस्सा क्रिकेट के नाम रहा है. वो भी सचिन की ही तरह कोच रमाकांत आचरेकर के शिष्य थे. अभी 14 साल के ही थे कि मुंबई की तरफ से खेलने लगे. विजय मर्चंट ट्रॉफी में अंडर-15 कैटेगरी में सौराष्ट्र के खिलाफ उन्होंने अपना पहला मैच खेला. और खाता शतक मारकर खोला. नॉट आउट 125 रन बनाए. इससे कुछ ही महीने पहले वो इंतज़ार का दंश क्या होता है ये सीख चुके थे. आगे चलकर क्रिकेट के भगवान बन जाने वाले सचिन और उनके यार कांबली के हाथों. हैरिस शील्ड के सेमी-फाइनल मैच में सचिन-कांबली ने 664 रनों की पार्टनरशिप का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था. सबको पता है. कम लोगों को ये पता है कि उसी मैच में अमोल पैड बांधे अपनी बारी आने का इंतज़ार कर रहे थे. जो कि कभी आई ही नहीं. पूरे दो दिन इंतज़ार करने के बावजूद.

इंतज़ार तबसे अमोल मुज़ुमदार की किस्मत में कुंडली मारकर बैठ गया. इतना लंबा हो गया कि उनका एक निक नेम ही इंतज़ार रख लेते तो भी चल जाता.

अमोल रणजी विजेता टीम का आठ बार हिस्सा रहे.
अमोल रणजी विजेता टीम का आठ बार हिस्सा रहे.

क्रिकेट में करियर

पॉइंटर्स में देखते हैं.

# 1991 में मुंबई के लिए अंडर-16 खेला और लगातार तीन शतक मारे. जिनमें से तीसरा तो ट्रिपल सेंचुरी थी.
# 1992 में मुंबई अंडर-19 टीम में चुने गए और यहां भी तीन शतक मारे.
# 1994 में अंडर-19 चिदंबरम ट्रॉफी हुई. अमोल ने पांच शतक मार दिए एक ही टूर्नामेंट में.
# फिर हुआ रणजी करियर का आगाज़. 12 फ़रवरी 1994 को. अमोल ने पहले ही मैच में 260 रन टांग दिए. जो कि तबका रिकॉर्ड था. जिसे 2018 में अजय रोहेरा ने तोड़ा.
# 1994 ख़त्म होते-होते उन्हें इंडिया की अंडर-19 टीम में चुन लिया गया. वीवीएस लक्ष्मण के साथ. इंग्लैंड टूर पर गए. एक शतक और एक अर्धशतक मारा.
# 1995 साल उनके करियर में सफलतम रहा. 15 मैच में उन्होंने 1068 रन बनाए. 50 के एवरेज से.

आगे चलकर फर्स्ट क्लास क्रिकेट में उन्होंने ढेर रन बनाए. 11,167 रन. 48 से ज़्यादा की एवरेज से. 21 सालों में फैले अपने फर्स्ट क्लास करियर में उन्होंने 30 शतक और 60 अर्ध शतक मारे. एक वक्त तो ऐसा था जब रणजी में सबसे ज़्यादा रन बनाने का रिकॉर्ड अमोल के ही नाम था. 9202 रन बनाए उन्होंने. बाद में ये रिकॉर्ड वसीम जाफर ने ओवरटेक कर लिया. अमोल मुंबई रणजी टीम के कप्तान भी रहे और टीम को ट्रॉफी भी जिताई.

बदकिस्मती से दोस्ती

अमोल मुज़ुमदार बिलाशक बदनसीब क्रिकेटर रहे हैं. जब उनका प्राइम टाइम चल रहा था, उनके साथ कई और सितारे उभर रहे थे. एक साथ टैलेंट का जैसे विस्फोट हो रहा था. इसका खामियाज़ा सिर्फ अमोल ने ही भुगता. सचिन-कांबली के हाथों बैटिंग को तरस जाना भले ही छोटी सी घटना थी लेकिन थी सिंबॉलिक. ऐसा उनके साथ बार-बार हुआ. 1995 में उन्हें इंडिया-ए की जिस टीम में चुना गया, उसमें राहुल द्रविड़, सौरभ गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण थे. इंग्लैंड-ए के खिलाफ द्रविड़, लक्ष्मण टेस्ट मैच में कमाल कर रहे थे, तो गांगुली वन डे में करिश्मा. मिडल ऑर्डर के कमाल के बैट्समैन मुज़ुमदार के लिए इंडिया की जर्सी दूर का सपना लगती रही.

इंडियन क्रिकेट की चार्मिंग चौकड़ी की चमक ने मुज़ुमदार का रास्ता अंधकार से भर दिया.
इंडियन क्रिकेट की चार्मिंग चौकड़ी की चमक ने मुज़ुमदार का रास्ता अंधकार से भर दिया.

ऐसा ही थोड़े समय बाद तब हुआ, जब पहले रवि शास्त्री और बाद में नवजोत सिंह सिद्धू की रिटायरमेंट के बाद मध्यक्रम में वैकेंसी निकल आई. अप्लाई करने के लिए दुलीप ट्रॉफी का टेस्ट पास करना था. फिर से लक्ष्मण, द्रविड़ और गांगुली चमके. तीनों ने एक ही साल में इंडियन टीम में जगह बनाई. अमोल रह गए. फिर इन तीनों ने मध्यक्रम में ऐसी जगह बनाई कि किसी और की एंट्री की गुंजाइश ही न रही.

अमोल डॉमेस्टिक क्रिकेट खेलते रहे. बढ़िया प्रदर्शन करते रहे. 15 साल मुंबई के लिए खेले. फिर आसाम के लिए खेले और अंत में आंध्र प्रदेश के लिए. 2013 में उन्होंने अपना आखिरी मैच खेला. 2014 में रिटायर होने की घोषणा कर दी.

कोचिंग करियर

रिटायरमेंट के बाद उन्होंने खिलाड़ियों को कोचिंग भी दी.

# नैशनल क्रिकेट अकैडमी में भारत की अंडर-19 और अंडर-23 टीम को कोच किया.
# दिसंबर 2013 में नीदरलैंड्स की टीम के बैटिंग कोच बने.
# आईपीएल में राजस्थान रॉयल्स टीम के बैटिंग कोच रहे.

और अब साउथ अफ्रीका की टीम को कोच करने का बड़ा मौक़ा मिला है.

कोचिंग का तजुर्बा भी है अमोल को.
कोचिंग का तजुर्बा भी है अमोल को.

भारतीय क्रिकेट बेशुमार टैलेंट से भरा पड़ा है. ऐसे कितने ही खिलाड़ी हैं, जो भरपूर प्रतिभा के बावजूद कुछ बड़ा हासिल न कर सकें. वजहें अलग-अलग रहीं. कुछ बुरी पॉलिटिक्स में फंस कर गायब हुए, कुछ असमय चोटिल हुए तो कुछ अच्छा फॉर्म बरकरार न रख सके. अमोल मुज़ुमदार उन दुर्लभ खिलाड़ियों में से एक हैं, जो महज़ बुरी टाइमिंग का शिकार हुए. वो एक ऐसे दौर में दरवाज़ा खटखटा रहे थे जब इंडियन क्रिकेट के महानतम खिलाड़ी टीम में जमे हुए थे. इसे बदकिस्मती न कहें तो और क्या कहें! आज भारत के मध्यक्रम की हालत देखते हैं और नंबर चार के लिए जारी डेस्परेट तलाश पर नज़र मारते हैं, तो अमोल का संघर्ष और भी चुभता है.

बहरहाल, उम्दा कोचिंग करियर के लिए अमोल को ढेर सारी शुभेच्छाएं.


वीडियो:

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