Submit your post

Follow Us

खत्म हुई एक सिरफिरे की अजब कहानी, जिसका सॉफ्टवेयर हम सबने इस्तेमाल किया!

आज कुछ अमर पंक्तियों से शुरुआत करते हैं. ये शोले फ़िल्म का संवाद है. गब्बर अपने आदमियों के सामने एक खेल का ऐलान करते हुए कह रहा है-

इसके तीन खानों में गोली है, तीन खाली. अब हम इसको घुमाएंगे. अब कहां गोली है, कहां नहीं, हमको नहीं पता. इस रिवॉल्वर में तीन ज़िंदगी, तीन मौत बंद है. देखें, किसे क्या मिलता है.

गब्बर ने जो खेल खेला, उसका नाम है- रशियन रूलेट. ये एक ख़तरनाक खेल है. इसका खिलाड़ी ज़िंदगी से खेलता है. वो रिवॉल्वर में एक गोली डालता है. रिवॉल्वर का सिलिंडर घुमाता है. फिर रिवॉल्वर की नोक अपने माथे से सटाकर ट्रिगर दबा देता है. आगे उसकी क़िस्मत. अगर खाली चैंबर दबाया हो, तो जान बच जाएगी. वरना ख़ुद उसके हाथों चलाई गोली उसके माथे में धंस जाएगी. खेल ख़त्म हो जाएगा. आज जो प्रसंग मैं आपको सुनाऊंगा, वो ऐसे ही ख़त्म हो चुके खेल का क़िस्सा है.

एक 66 साल का आदमी था. बेहद कामयाब और अमीर, लेकिन हरक़तें बड़ी बहकी-बहकी. वो अपना देश छोड़कर भाग आया. जिस नई जगह बसा, उसकी सरकार ने इल्ज़ाम लगाया. कहा, ये आदमी अपनी प्राइवेट आर्मी बनाकर ड्रग्स की तस्करी का इंतज़ाम कर रहा है. एक पत्रकार इस आरोप का सच जानने निकला. वो उस आरोपी का इंटरव्यू लेने सीधे उसके घर पहुंच गया. ड्रॉइंग रूम में दोनों आमने-सामने बैठे थे. कि तभी उस कारोबारी ने एक रिवॉल्वर निकाली. उसमें एक बुलेट डाली, रिवॉल्वर का सिलिंडर घुमाया और उसे अपने सिर से सटा लिया.

पत्रकार के होश उड़ गए. उसने कारोबारी से रिवॉल्वर नीचे रखने को कहा. मगर कारोबारी नहीं माना. उसकी आंखें एकटक पत्रकार को ताकती रहीं. डर के मारे स्याह हो चुके पत्रकार का देखकर उसे जैसे कोई नशा हो रहा था. उसने अपने माथे पर तनी रिवॉल्वर का ट्रिगर दबाया. कुछ नहीं हुआ. फिर उसने तेज़ी से तीन बार और ट्रिगर दबाया. पांच चैंबर्स वाले रिवॉल्वर का ट्रिगर चार बार दबाया जा चुका था. अब प्रॉबेबिलिटी नहीं, सर्टेनिटी बची थी. तय था कि अबकी ट्रिगर दबाया गया, तो मौत निश्चित है. और इस पॉइंट पर कारोबारी रुका. उसने कहा-

मैं पूरे दिन ये खेल सकता हूं. दसियों हज़ार बार ये खेल दोहरा सकता हूं. मुझे कभी कुछ नहीं होगा.

आज उसी कारोबारी की ख़बर आई है. वो जेल की एक कोठरी में मरा हुआ पाया गया. इस शख़्स का नाम था, जॉन मैकफ़ी. कंप्यूटर सिक्यॉरिटी सॉफ़्टवेअर बनाने वाली एक मशहूर अमेरिकन कंपनी है, मैकफ़ी कॉर्पोरेशन. इसके फ़ाउंडर थे जॉन मैकफ़ी. उन्हें कंप्यूटर ऐंटीवायरस सॉफ़्टवेअर का रचनाकार माना जाता है. इतना मशहूर और क़ाबिल टेक कारोबारी जेल में क्यों बंद था? उसकी मौत क्यों हुई? विस्तार से बताते हैं.

इस कहानी की शुरुआत हुई थी पाकिस्तान में

वहां लाहौर में दो भाई रहते थे. उनके नाम थे- बासित फ़ारुक़ अल्वी और अमजद फ़ारुक़ अल्वी. अमजद 24 साल का था और बासित 17 बरस का. दोनों भाई एक कंप्यूटर स्टोर चलाते थे. उन्होंने मिलकर हार्ट की मॉनिटरिंग से जुड़ा एक सॉफ़्टवेअर प्रोग्राम बनाया. कुछ रोज़ बाद दोनों को पता चला कि उनके साथ धोखाधड़ी हो रही है. कैसी धोखाधड़ी? उनसे सॉफ़्टवेअर खरीदकर ले गए कुछ ग्राहक उसकी पायरेटेड कॉपी बेच रहे थे. वो भी बिना बताए.

अमजद फ़ारुक़ अल्वी अपने भाई और दोस्त के साथ.
अमजद फ़ारुक़ अल्वी अपने भाई और दोस्त के साथ.

अल्वी ब्रदर्स को गुस्सा आया. उन्होंने सोचा, ये रोकना होगा. यही सोचकर उन्होंने एक कोडिंग की. ये कोडिंग प्रोग्राम सॉफ़्टवेअर को पायरेसी से बचाने के लिए बनाया गया था. अल्वी ब्रदर्स ने इसे नाम दिया था- ब्रेन. ये कैसे काम करता था? जब कोई यूज़र सॉफ़्टवेअर की पायरेटेड कॉपी अपने कंप्यूटर में इन्स्टॉल करता, तो साथ में वायरस भी कॉपी हो जाता. उस शख़्स को अपने कंप्यूटर पर एक मेसेज दिखता. इसमें लिखा होता-

वेलकम टू दी डंजन कॉपीराइट 1986 ब्रेन ऐंड अमजद्स (प्राइवेट) ब्रेन कंप्यूटर सर्विसेज़, 730 इज़ानामी ब्लॉक, अल्लाम इक़बाल टाउन, लाहौर पाकिस्तान, फ़ोन- 430791. बीवेअर ऑफ़ दिस वायरस. कॉन्टैक्ट अस फॉर दी वैक्सीनेशन…

अल्वी ब्रदर्स ने वायरस कोडिंग में अपना नाम, पता, फ़ोन नंबर सब डाल दिया था. ताकि लोग उन्हें कॉन्टैक्ट करके ऑरिजनल सॉफ़्टवेअर का पैसा दें. और, अपने कंप्यूटर को वायरस से रिहा करवाएं. अल्वी ब्रदर्स का फ़ॉर्मूला सफल रहा. उनके पास वायरस छुड़वाने के लिए कई फोन आने लगे. मगर फिर एक ट्विस्ट आया कहानी में. अल्वी भाइयों के पास विदेशों से भी कॉल आने लगे. लोग कहते, तुम्हारा वायरस हमारे कंप्यूटर में आ गया है. इसे ठीक करो. अल्वी ब्रदर्स का बनाया वो वायरस देश-विदेश में फैल गया था. इसे दुनिया का पहला कंप्यूटर वायरस अटैक माना जाता है.

अल्वी ब्रदर्स ने वायरस कोडिंग में अपना नाम, पता, फ़ोन नंबर सब डाल दिया था ताकि लोग ऑरिजनल सॉफ़्टवेअर का पैसा दें. (तस्वीर: एएफपी)
अल्वी ब्रदर्स ने वायरस कोडिंग में अपना नाम, पता, फ़ोन नंबर सब डाल दिया था ताकि लोग ऑरिजनल सॉफ़्टवेअर का पैसा दें. (तस्वीर: एएफपी)

इसी प्रसंग से होती है जॉन मैकफ़ी की एंट्री

जॉन की पैदाइश स्कॉटलैंड की थी. छुटपन में माता-पिता अमेरिका ले आए. पिता क्या थे, जल्लाद थे. ख़ूब शराब पीते. हरदम नाख़ुश रहते. जॉन और उसकी मां को बेरहमी से पीटते. जॉन 15 साल का था, जब पिता ने ख़ुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली.

मैकफ़ी की पढ़ाई चालू रही. वो कॉलेज पहुंच गया. उसने बीए इन मैथैमेटिक्स के कोर्स में दाखिला लिया. पढ़ाई का ख़र्च निकालने के लिए वो घर-घर जाकर झांसा देता. लोगों से कहता, तुम लॉटरी जीते हो. तुम्हें मैगज़ीन का फ्री सब्सक्रिप्शन मिला है. बस शिपिंग वगैरह का ख़र्च देना होगा. लोग झांसे में आ जाते. जॉन की ख़ूब कमाई होती. इतनी कमाई की पढ़ाई का भी ख़र्च निकलता और जमकर शराब पीने के भी पैसे आ जाते. ग्रेजुएशन हो गया. उसने पीएचडी में दाखिला लिया. मगर एक जूनियर के साथ सेक्स करते हुए पकड़े जाने के बाद PHD के दरवाज़े बंद हो गए. जॉन ने एक छोटी-मोटी नौकरी पकड़ी. मगर एक दफ़ा गांजा बेचते हुए पकड़े जाने के बाद नौकरी से निकाल दिया गया.

जॉन की एक ख़ासियत थी. वो एकदम कॉन्फ़िडेंस से झूठ बोल लेता था. इसी आत्मविश्वास से उसने फ़र्जी रेज्यूमे बनाया. रेलवे के लिए काम करने वाली एक कंपनी में नौकरी पा ली. इस दौर तक आते-आते जॉन ने नशे में ख़ूब प्रमोशन ले लिया था. अब वो रात-दिन ड्रग्स लेता रहता था. इसी ड्रग्स की आदत के चलते नौकरी गई. शादी टूटी. जो इक्का-दुक्का दोस्त थे, वो भी रुख़सत हो गए. जॉन उस कग़ार पर पहुंच गया, जहां उसे रह-रहकर आत्महत्या करने का जी करता. फिर किसी की सलाह से जॉन एक मनोवैज्ञानिक की मदद ली. और इसके बाद जाकर उसकी ज़िंदगी ढर्रे पर लौटी. वो एक टेक कंपनी के लिए काम करने लगा.

जॉन मैकफ़ी की कंपनी को 2010 में कंप्यूटर चिप बनाने वाली कंपनी 'इंटेल' ने ख़रीद लिया था. (तस्वीर: एएफपी)
जॉन मैकफ़ी की कंपनी को 2010 में कंप्यूटर चिप बनाने वाली कंपनी ‘इंटेल’ ने ख़रीद लिया था. (तस्वीर: एएफपी)

अब आते हैं 1986 के साल पर

एक रोज़ जॉन एक मैगज़ीन के पन्ने पलट रहा था. इसमें उसे ब्रेन वायरस पर एक आर्टिकल दिखा. बस यहीं से जॉन की ज़िंदगी बदल गई. उसने तय किया कि अब वो ऐंटी-वायरस प्रोग्राम्स बनाएगा. उसने एक छोटी सी कंपनी बनाई. अपने ही नाम पर उसका नाम रखा- मैकफ़ी असोसिएट्स. वो कंप्यूटर्स को वायरस से बचाने के लिए सॉफ़्टवेअर्स बनाने लगा. अपने पहले कोड प्रोग्रैम को उसने नाम दिया- वायरस स्कैन.

शुरुआत में वो अपना बनाया ऐंटीवायरस बड़ी-बड़ी कंपनियों को मुफ़्त में बांटता. कहता कि वो ऐंटीवायरस इस्तेमाल ना करना अफॉर्ड नहीं कर सकती. अगर रिस्क घटाना है, तो ऐंटी वायरस यूज़ करना ही चाहिए. पांच साल के भीतर फॉर्चून 100 की करीब आधी कंपनियां मैकफ़ी का ऐंटीवायरस यूज़ करने लगीं. उन्होंने मैकफ़ी को लाइसेंस फी भी देना शुरू किया. 1990 आते-आते मैकफ़ी की सालाना कमाई करोड़ों में पहुंच गई.

1992 में मैकफ़ी असोसिएट्स पब्लिक कंपनी बन गई. जॉन के पास करीब 600 करोड़ रुपये के स्टॉक आ गए. दो साल बाद 1994 में उसने इस कंपनी से इस्तीफ़ा दे दिया. उसके एक्ज़िट के बाद भी कंपनी का ऊपर बढ़ना रुका नहीं. आगे चलकर साल 2010 में कंप्यूटर चिप बनाने वाली कंपनी ‘इंटेल’ ने इसे ख़रीद लिया.

ख़ैर, हम दोबारा जॉन की कहानी पर लौटते हैं. मैकफ़ी असोसिएट्स से निकलने के बाद भी वो टेक बिज़नस में बना रहा. उसने फ़ायरवॉल सॉफ़्टवेअर्स बनाने वाली कंपनियों में निवेश किया. विंडोज़ के लिए इंस्टेंट मेसेज़ और चैट प्रोग्राम्स बनाने वाली कंपनियों में पैसा लगाया. निवेशक होने के अलावा जॉन बिज़नस गुरु भी हो गया था. स्टार्टअप्स शुरू करने वाले उससे सलाह लेते थे. बिज़नस स्कूल उसे लेक्चर देने बुलाते थे. कुल मिलाकर अब जॉन के पास पैसा और प्रतिष्ठा, दोनों थी.

फास्ट फॉरवर्ड करके आते हैं नई सदी पर. ये 2007-2008 की बात है. दुनिया में वैश्विक मंदी आ गई. मैकफ़ी का बिज़नस धराशायी हो गया. उसके निवेश डूब गए. न्यू यॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मंदी के पहले उसके पास करीब 750 करोड़ रुपए की संपत्ति थी. मंदी के चलते उसकी वैल्यू लुढककर करीब 30 करोड़ रुपए पर आ गई.

1992 में एक और वायरस आया- माइकल एंजेलो

मैकफ़ी ने माइकल एंजेलो से जुड़े सनसनीखेज़ दावे किए. कहा ये दुनिया के लाखों कंप्यूटर्स को तबाह कर देगा. मीडिया मैकफ़ी को हाथोहाथ लेने लगी. मीडिया कवरेज़ के रास्ते मैकफ़ी की वॉर्निंग दूर-दूर तक फैल गई. उसके ऐंटीवायरस सॉफ़्टवेअर की बिक्री रातोरात कई गुना बढ़ गई. मैकफ़ी ने माइकल एंजेलो से जो ख़तरे बताए थे, वो ग़लत साबित हुए. उस वायरस ने उतना नुकसान नहीं किया. वायरस का रिज़ल्ट जो भी हो, मगर छह महीने के भीतर मैकफ़ी कंपनी की आय 50 गुना तक बढ़ गई. वो ऐंटी-वायरस मार्केट के सबसे बड़े खिलाड़ियों में शामिल हो गया.

मैकफ़ी ने माइकल एंजेलो से जो ख़तरे बताए, वो ग़लत साबित हुए थे. (तस्वीर: एएफपी)
मैकफ़ी ने माइकल एंजेलो से जो ख़तरे बताए, वो ग़लत साबित हुए थे. (तस्वीर: एएफपी)

अब हम नई सदी में प्रवेश करते हैं

सदी के पहले ही दशक में दुनिया को एक बड़ा झटका लगा. 2007-2008 में वैश्विक मंदी आ गई. मैकफ़ी का बिज़नस धराशायी हो गया. उसे बहुत नुकसान हुआ. बिज़नस के अलावा भी जॉन पर कई मुसीबतें मंडरा रही थीं. कई लोगों ने उसपर नालिश ठोक दी थी. जॉन को डर था कि कहीं उसे भारी आर्थिक मुआवज़ा न भरना पड़े.

इस आशंका से बचने के लिए जॉन ने बनाया एक एस्केप प्लान. उसने देश छोड़ने की सोची. उसे लगा, अगर सबकुछ बेचकर कहीं और चला जाऊं, तो मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा. शायद इसीलिए जॉन ने अमेरिका की करीब-करीब अपनी समूची जायदाद नीलाम कर दी. घर, कार, अपना प्राइवेट एयरपोर्ट, सब बेच दिया. सारा पैसा बटोरकर वो जा पहुंचा- बलीज़.

कहां है बलीज़?

ये सेंट्रल अमेरिका में बसा एक छोटा सा देश है. एक तरफ़ घने जंगल. दूसरी तरफ़ ख़ूबसूरत समंदर. अप्रैल 2008 में यहीं पर शिफ़्ट हो गया जॉन. जल्द ही जॉन के दिल में शहंशाहों की तरह जीने की इच्छा जागी. वो ऐसा जीवन जीना चाहता था, जो आलीशान हो. जहां कोई चिंता, कोई शोर, कोई रोक-टोक न हो. उसने नदी के किनारे एक आलीशान घर बनवाया. वो यहां चैन से पियानो बजाता और गाने गाता. इस घर में सबकुछ था, सिवाय इंटरनेट के. इंटरनेट क्यों नहीं था? क्योंकि जॉन को अब इंटरनेट पर यकीन नहीं रहा था. उसे लगता, इंटरनेट के चलते उसकी प्रिवेसी ख़त्म हो जाएगी. उसे फॉलो किया जाएगा.

बलीज़ में जॉन की ज़िंदगी के कई पक्ष बड़े स्याह थे. मसलन, नाबालिग गर्लफ्रेंड्स. वो खुलकर मानता कि उसकी गर्लफ्रेंड नाबालिग है. बल्कि वो एकसाथ कई नाबालिगों से संबंध बनाने की बात भी कबूलता. जवान बने रहने के लिए टेस्टोस्टेरॉन के इंजेक्शन लेता. ऐसा नहीं कि जॉन बस मौज-मस्ती ही कर रहा हो. उसने कई बिज़नस भी शुरू किए.

जॉन खुलकर मानता कि उसकी गर्लफ्रेंड नाबालिग है. (तस्वीर: एएफपी)
जॉन खुलकर मानता कि उसकी गर्लफ्रेंड नाबालिग है. (तस्वीर: एएफपी)

जॉन अपनी प्राइवेट आर्मी बना रहा था?

मगर बलीज़ में बनाई उसकी ये हसीन दुनिया ज़्यादा दिन तक हसीन नहीं रही. उसकी गतिविधियां सरकार के निशाने पर आ गईं. आरोप था कि जॉन अपनी प्राइवेट आर्मी बना रहा है. ताकि वो बड़े स्तर पर ड्रग्स का कारोबार कर सके. हमने एपिसोड की शुरुआत में आपको जॉन के खेले रशियन रूलेट का क़िस्सा सुनाया था. वो घटना जिन पत्रकार के आगे हुई, उनका नाम है- जोशुआ डेविस. उन्होंने ‘वायर्ड’ के लिए जॉन मैकफ़ी का डिटेल्ड प्रोफ़ाइल लिखा है. वो इसी प्राइवेट आर्मी वाले आरोप के सामने आने के बाद जॉन का इंटरव्यू लेने पहुंचे थे.

ख़ैर, ड्रग्स ट्रैफ़िकिंग और प्राइवेट आर्मी वाले आरोप को लेकर बलीज़ सरकार ने जॉन के घर पर कई बार छापा मरवाया. ये केस सॉल्व भी नहीं हुआ था कि नवंबर 2012 में जॉन पर अपने पड़ोसी की हत्या का आरोप लगा. पुलिस ने पूछताछ के लिए उसे अरेस्ट किया. उसे कुछ दिनों तक जेल में रखा गया. इस प्रकरण के बारे में बताते हुए जॉन ने एक इंटरव्यू में कहा था-

मुझे पुलिस स्टेशन के लॉकअप में रखा गया था. वो कोठरी 10 बाय 10 की थी. मैं सीमेंट की नंगी और ठंडी फ़र्श पर बैठा रहता. वहां पेशाब की भभकती सी गंध भरी रहती थी. कोठरी के एक किनारे प्लास्टिक का एक कंटेनर था. वैसा ही डब्बा, जिसमें दूध लाते हैं. उसी को काटकर टॉइलेट बना दिया गया था. कहने को वो लॉक अप क्वीन स्ट्रीट पुलिस थाने का हिस्सा था. मगर सारे लोग उसे ‘पेशाबघर’ कहते थे.

जॉन पर कोई केस दर्ज नहीं हुआ था. ना ही आरोप तय हुए थे. पुलिस ने शक़ के आधार पर उसकी गिरफ़्तारी की थी. छापेमारी के दौरान पुलिस को जॉन के घर से बिना लाइसेंस की दो रिवॉल्वर मिली थीं. वो जॉन की सफ़ाई से संतुष्ट नहीं थे. मगर बहुत कोशिश के बाद भी पुलिस को जॉन के खिलाफ़ कोई ठोस सबूत नहीं मिला. जॉन छूट गया.

मगर अब उसे बलीज़ में रहना रिस्की लग रहा था. उसने वहां से भागने की कोशिश की. ख़बर आई कि उसे गुआटेमाला में अरेस्ट किया गया है. उसे अवैध तरीके से देश में घुसने के लिए गिरफ़्तार कर लिया गया. जॉन ने कहा, वो असाइलम चाहता है. मगर गुआटेमाला ने उसे अमेरिका डिपोर्ट कर दिया.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जॉन कई महीनों तक समंदर में एक जहाज़ पर रहा. (तस्वीर: एएफपी)
रिपोर्ट्स के मुताबिक, जॉन कई महीनों तक समंदर में एक जहाज़ पर रहा. (तस्वीर: एएफपी)

जॉन अमेरिका क्यों नहीं जाना चाहता था?

जॉन जिस अमेरिका से भागकर गया था, हालात ने उसे वापस वहीं पटक दिया. मगर यहां भी उठापटक चलती रही. उसे शराब पीकर गाड़ी चलाने और हथियार रखने के इल्ज़ाम में अरेस्ट किया गया. इसके बाद 2016 में ख़बर आई कि वो राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की कोशिश कर रहा है. अपने कैंपेन विडियो में जॉन ने कहा-

उनके लिए, जो मेरी तरह क्रेज़ी हैं.

2019 में फ़्लोरिडा की एक अदालत ने एक मर्डर केस में जॉन को मुआवज़ा भरने का आदेश था. मगर जॉन ने इससे इनकार कर दिया. उसने ट्विटर पर चुनौती देते हुए लिखा-

पिछले 11 साल में मुझपर 37 मुकदमे हुए. मैंने इनमें से एक का भी जवाब नहीं दिया.

आगे के सालों में जॉन पर क्रिप्टोकरंसी में फ्रॉड करने और टैक्स चोरी के भी मामले चले. जॉन का कहना था कि उसे टैक्स भरना पसंद नहीं है. कार्रवाई से बचने के लिए वो फिर से देश छोड़कर भाग गया. ख़बरों के मुताबिक, कई महीनों तक तो वो समंदर में एक जहाज़ पर रहा.

लंबी आंख-मिचौली के बाद 3 अक्टूबर, 2020 को बार्सिलोना एयरपोर्ट पर वो अथॉरिटीज़ के हाथ लग गया. उस रोज़ जॉन बार्सिलोना से फ़्लाइट पकड़कर इस्तांबुल जा रहा था. स्पैनिश पुलिस ने उसे गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया. तब से ही अमेरिका जॉन को अपने सुपुर्द किए जाने की मांग कर रहा था. जॉन की अपील थी कि उसे अमेरिका न भेजा जाए. उसने अदालत से कहा था-

मैं 75 साल का हूं. अगर मुझे अमेरिका भेजा जाता है और वहां मुझे सज़ा हो जाती है, तो मुझे बाकी की उम्र जेल में गुज़ारनी होगी. मैं उम्मीद करता हूं स्पैनिश अदालत ये अन्याय नहीं होने देगी.

23 जून को स्पेन की हाई कोर्ट ने इस केस में फ़ैसला सुनाया. उसने जॉन के प्रत्यर्पण पर मुहर लगा दी. इसी फ़ैसले के कुछ घंटों बाद जॉन के मरने की ख़बर आई. अथॉरिटीज़ के मुताबिक, वो अपनी कोठरी में फंदे से लटका मिला. रशियन रूलेट खेलकर रोमांचित होने वाले जॉन मैकफ़ी ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली.


विडियो- ब्रिटनी स्पीयर्स को उनके पिता से क्यों आजाद कराना चाहते हैं फैन्स?

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

'मनी हाइस्ट' की खतरनाक इंस्पेक्टर अलिशिया, जिन्होंने असल में भी मीडिया के सामने उत्पात किया था

'मनी हाइस्ट' की खतरनाक इंस्पेक्टर अलिशिया, जिन्होंने असल में भी मीडिया के सामने उत्पात किया था

सब सही होता तो, टोक्यो या मोनिका में से एक रोल करती नजवा उर्फ़ अलिशिया.

कहानी 'मनी हाइस्ट' वाली नैरोबी की, जिन्होंने कभी इंडियन लड़की का किरदार करके धूम मचा दी थी

कहानी 'मनी हाइस्ट' वाली नैरोबी की, जिन्होंने कभी इंडियन लड़की का किरदार करके धूम मचा दी थी

जानिए क्या है नैरोबी उर्फ़ अल्बा फ्लोरेस का इंडियन कनेक्शन और कौन है उनका फेवरेट को-स्टार?

10 साल पहले भी शाहरुख़ का समीर वानखेड़े से सामना हुआ था, समीर ने ठोका था तगड़ा जुर्माना

10 साल पहले भी शाहरुख़ का समीर वानखेड़े से सामना हुआ था, समीर ने ठोका था तगड़ा जुर्माना

जगह थी मुंबई एयरपोर्ट. अब दस साल बाद फिर से दोनों का नाम एक साथ सुर्ख़ियों में है.

'स्क्विड गेम' के प्लेयर नंबर 199 'अली' की कहानी, जिनके इंडियन होने ने सीरीज़ में एक्स्ट्रा मज़ा दिया

'स्क्विड गेम' के प्लेयर नंबर 199 'अली' की कहानी, जिनके इंडियन होने ने सीरीज़ में एक्स्ट्रा मज़ा दिया

अली का रोल करने वाले इंडियन एक्टर अनुपम त्रिपाठी का सलमान-शाहरुख़ कनेक्शन क्या है?

IPL का कित्ता ज्ञान है, ये क़्विज़ खेलकर चेक कल्लो!

IPL का कित्ता ज्ञान है, ये क़्विज़ खेलकर चेक कल्लो!

ईमानदारी से स्कोर भी बताते जाना. हम इंतज़ार करेंगे.

'मनी हाइस्ट' वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी, जिनकी पत्नी ने कहा था, 'कभी फेमस नहीं हो पाओगे'

'मनी हाइस्ट' वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी, जिनकी पत्नी ने कहा था, 'कभी फेमस नहीं हो पाओगे'

अलवारो मोर्टे ने वेटर तक का काम किया हुआ है. और एक वक्त तो ऐसा था कि बकौल उनके कैंसर से जान जाने वाली थी.

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

हीरो बनने आए शरत सक्सेना कैसे गुंडे का चमचा बनने पर मजबूर हुए?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

एक वक़्त इंडस्ट्री में टॉप पर थे कुणाल और उनके गाने पार्टियों की जान हुआ करते थे.

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

IPL स्कैंडल, मॉडल्स के आरोप, अंडरवर्ल्ड कनेक्शंस के आरोप, एक्स वाइफ के इल्ज़ाम सब हैं इस कहानी में.

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रेन्सन की कहानी, जहां भी गए तहलका मचा दिया.