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81 सीटों पर चुनाव हुए, तो 80 लोग ही क्यों जाएंगे झारखंड की विधानसभा में?

81 सीटों के झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए पांच चरणों में मतदान हुए. नतीजा आया 23 दिसंबर को. रिज़ल्ट आए तो 81 सीटों के, मगर विधायक केवल 80 जाएंगे असेंबली में.

क्यों?
जवाब हैं हेमंत सोरेन. झारखंड में गठबंधन के मुख्यमंत्री प्रत्याशी. दो सीटों से चुनाव लड़ा है उन्होंने- बरहैटा और दुमका. दोनों ही सीटों से जीत रहे हैं वो. ये ख़बर लिखे जाने तक फाइनल नतीजा तो नहीं आया, मगर वोटों का अंतर इतना है कि जीता हुआ बता सकते हैं. बरहैटा सीट पर वो 23,951 सीटों से आगे चल रहे हैं. दुमका सीट पर 13,188 वोटों से लीड कर रहे हैं. दोनों सीटें जीत जाने पर उन्हें एक सीट खाली करनी होगी. जो सीट वो खाली करेंगे, वहां उपचुनाव करवाए जाएंगे.

पढ़ें: CM रहते हुए चुनाव हारने वाले हेमंत सोरेन फिर मुख्यमंत्री बनेंगे?

ऐसा क्यों?
रेप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल्स ऐक्ट, 1951. इसमें जनप्रतिनिधियों के चुनाव लड़ने संबंधी नियम हैं. इसका सेक्शन 33, उम्मीदवार को एक से ज़्यादा सीटों पर एकसाथ चुनाव लड़ने की छूट देता है. मगर फिर सेक्शन 70 भी है. ये बताता है कि केंद्र या फिर राज्य, एक इंसान के पास एक ही सीट हो सकती है. पहले कई प्रत्याशी एक साथ तीन सीटों से भी चुनाव लड़ लेते थे. जैसे, अटल बिहारी वाजपेयी.

जनसंघ के जमाने की बात है. 1952 के चुनाव में तीसरे नंबर पर रहे थे वाजपेयी. फिर अगला चुनाव हुआ 1957 में. वाजपेयी ने एक साथ तीन सीटों पर इलेक्शन लड़ा- बलरामपुर, मथुरा और लखनऊ. नतीजा आया तो वाजपेयी जीते बलरामपुर से. लखनऊ में दूसरे नंबर पर रहे वो. और मथुरा में तो उनकी जमानत ही ज़ब्त हो गई.

इसे भी आगे की मिसाल देवी लाल की भी है. 1991 में लोकसभा के ही समय था हरियाणा विधानसभा चुनाव. देवी लाल लोकसभा के लिए तीन सीटों पर खड़े हुए- सीकर, रोहतक और फिरोज़पुर. इतना ही नहीं. विधानसभा भी लड़ लिए, घिराई सीट से. इतनी सीटों से चुनाव लड़कर भी देवी लाल एक भी सीट नहीं जीत पाए. लेकिन अगर जीत गए होते, तो? सारी-की-सारी जीत गए होते, तो? रखते तो एक ही. बाकी पर उपचुनाव होता.

ख़ैर, तो साल 1996 में एक संशोधन किया गया. इसमें तय किया गया कि एक उम्मीदवार अधिकतम दो सीटों पर ही चुनाव लड़ सकता है.

चुनाव आयोग नियम बदलना चाहता है
एक उम्मीदवार, एक चुनाव, एक सीट. ऐसा हो, इसके लिए कई बार कोशिश हुई. जैसे- 1990 में दिनेश गोस्वामी कमिटी की रिपोर्ट. 1999 में आई लॉ कमीशन की रिपोर्ट. इसमें भी इसकी अनुशंसा थी. इलेक्शन कमीशन ने भी कई बार कोशिश की ये दो जगहों से चुनाव लड़ पाने की छूट ख़त्म हो. इसकी सबसे बड़ी वजह है- सरकारी पैसे की बर्बादी और समय ख़राब होना.

इलेक्शन कमीशन ने 2004 में ज़रूरी संशोधन करके इससे जुड़े नियम बदलने का प्रस्ताव दिया था. ये भी कहा था कि अगर ऐसा न हो सके, तो कम से कम इतना हो कि दो सीटों पर जीतकर एक सीट खाली करने वाला उम्मीदवार उस खाली सीट पर करवाए गए उपचुनाव का ख़र्च उठाए. उस समय आयोग ने विधानसभा के लिए ये ख़र्च 5 लाख बताया था. और लोकसभा चुनाव के लिए ये रकम बताई थी 10 लाख.

2018 में एक जनहित याचिका दायर हुई सुप्रीम कोर्ट में. इसमें एक साथ दो सीटों के चुनाव लड़ पाने के नियम को चुनौती दी गई थी. इसपर कोर्ट ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा. आयोग ने एक हलफनामा जमा किया. इसमें अदालत से कहा गया था कि वो रेप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल्स ऐक्ट के सेक्शन 33 (7) में संशोधन करे. ताकि एक चुनाव में सिर्फ एक सीट से चुनाव लड़ने की पाबंदी हो. आयोग के दिए हलफनामे में लिखा था-

जब कोई प्रत्याशी दो सीटों से चुनाव लड़ता/लड़ती है और दोनों पर जीत मिलती है, तो उसके लिए एक सीट खाली करना ज़रूरी है. सरकारी पैसों के खर्च के अलावा इसमें सरकारी कर्मचारियों का श्रम और बाकी संसाधन भी खर्च होते हैं. वो लीडर जिस सीट को खाली करता है, ये वहां के मतदाताओं के साथ भी अन्याय है.


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