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जावेद मियांदाद के वो दो किस्से, जो हर भारतीय क्रिकेट फैन को चिढ़ाएंगे

# जब मोरे के साथ उलझे मियांदाद

4 मार्च 1992. बेंसन एंड हेजेज़ वर्ल्ड कप. ये वो वक़्त था, जब सचिन तेंदुलकर पांचवें नम्बर पर बैटिंग करने आते थे. श्रीकांत ओपनिंग करते थे, सिद्धू के साथ. चूंकि इस टूर्नामेंट में सिद्धू नहीं थे, इसलिए उनकी जगह लोग बदल रहे थे. इस मैच में जडेजा ने ओपनिंग की. श्रीकांत जल्दी चलते बने. अज़हर ने ठीक खेलना शुरू किया, लेकिन जब तक तो बढ़िया खेलते, तब तक निपट लिए. सचिन ने पचासा मारके मामला संभाला और नीचे कपिल देव ने बम फोड़ कर बाजा फाड़ दिया. सचिन ने 62 गेंद में 54 रन बनाये और कपिल ने 26 गेंद में 35 रन. इंडिया ने बोर्ड पर 7 विकेट के नुकसान पर 216 रन का एक एवरेज स्कोर बनाया.

पाकिस्तान की बैटिंग आई. उधर भी वही हाल. एक ओपनर खूंटा गाड़कर जम गया. आमिर सोहेल. 95 गेंद में 62 रन. इंज़माम-उल-हक़ और जाहिद फ़ज़ल 2-2 रन बनाकर निकल पड़े. जावेद मियांदाद और आमिर सोहेल के बीच बढ़िया पार्टनरशिप चल पड़ी. इस चालू पार्टनरशिप में इंडिया को खतरे की तस्वीर दिखाई दे रही थी. मियांदाद खतरनाक दिखाई दे रहे थे. विकेट के पीछे किरन मोरे काफी एक्टिव हो रहे थे. तेंदुलकर का ओवर. उनकी काईयांपन से भरी मीडियम पेस गेंदें थोड़ा परेशान कर रही थीं. तेंदुलकर की लेग स्टम्प की ओर फेंकी गेंद को मियांदाद ने बल्ला लगाकर किनारे करना चाहा, लेकिन गेंद मिस हुई और मोरे के हाथों में पहुंच गई. मोरे के पास जितनी ताकत थी, सब झोंक कर वो चिल्ला पड़े. अम्पायर ने सर न में हिला दिया, लेकिन मियांदाद का मुंह बन गया.

तेंदुलकर की अगली गेंद. अपने छोटे रन-अप के बीच में ही उन्हें रोक दिया गया. वजह थे खुद मियांदाद. उन्हें किरन मोरे की आवाज़ अभी भी आ रही थी. मियांदाद ने मोरे से पूछा, “दिक्कत क्या है?” उन दोनों की इसके बाद लगभग 15 सेकंड बात हुई. मियांदाद अम्पायर डेविड शेफ़र्ड की ओर पलटे और उनसे शिकायत की. किरन मोरे ने अम्पायर की ओर ऐसा इशारा किया, जैसे उन्हें कुछ मालूम ही नहीं था.

Miandad More
जावेद मियांदाद-किरन मोरे. फोटो: Twitter

तेंदुलकर फिर से दौड़े. मिड ऑफ़ की ओर गेंद मारी. मियांदाद ने रन लेने की सोची. दौड़े, मगर तुरंत ही वापस आ गए. मोरे ने गेंद पकड़ी और गिल्लियां उड़ा दीं. मियांदाद ने फिर मुंह बनाया. इसके बाद उन्होंने बल्ला दोनों हाथों में पकड़ा और उछाल मारने लगे. उनकी उछाल स्टंप्स की हाइट तक पहुंच रही थी. ओवर खत्म हो चुका था और मोरे उनके ठीक बगल से निकल कर दूसरे एंड पर जा रहे थे. हालांकि मियांदाद ये जो भी कर रहे थे, मोरे की नकल उतारने की एक कोशिश थी, लेकिन क्रिकेट की पिच के बीचों-बीच ऐसा सीन थोड़ा खराब टेस्ट में मालूम दे रहा था. इसके साथ ही मियांदाद की बहुत जल्दी फ्रस्ट्रेट हो जाने की आदत भी एक बार फिर खुलकर सामने आ गई थी.

# शारजाह की वो हार कभी नहीं भूलती

शारजाह रणभूमि बन चुकी थी. ये वो ज़मीन थी, जिसने भारत-पाकिस्तान के कम्पिटीशन की कितनी ही गवाहियां दी हैं. ये वो समय था, जब विश्व कप भारत के पास था. अप्रैल का महीना और साल 1986. सचिन तेंदुलकर अभी मुंबई में रमाकांत आचरेकर के स्कूटर पर बैठ एक मैदान से दूसरे का चक्कर काट रहे थे. क्रिकेट को टीवी के कीड़े ने बस अभी-अभी ही काटा था. हालांकि वो क्रांति नहीं आई थी, जिसने कितनी ही कम्पनियों के दरवाज़े क्रिकेट के मैदान के लिए खोल दिए थे.

ऑस्ट्रेलेशिया कप का फाइनल. पहला ऐसा टूर्नामेंट. न्यूज़ीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, श्रीलंका और इंडिया के बीच ये टूर्नामेंट खेला जा रहा था. इसमें श्रीलंका को सीधे सेमीफाइनल में एंट्री मिली, क्योंकि उसने एशिया कप जीता हुआ था. सेमीफाइनल से पहले इंडिया ने न्यूज़ीलैंड को हराया और पाकिस्तान ने ऑस्ट्रेलिया को. न्यूज़ीलैंड सेमीफाइनल में पहुंचने वाली चौथी टीम थी. इंडिया ने श्रीलंका को हराया और पाकिस्तान ने न्यूज़ीलैंड को. फाइनल इंडिया और पाकिस्तान के बीच होना तय हुआ.

20,000 की जनता के सामने इंडिया ने पहले बैटिंग करते हुए 245 रन बनाए. विकेट गिरे कुल 7. सुनील मोहन गावस्कर ने 92 रन बनाए. ये उनका अंतिम दौर चल रहा था. पाकिस्तान पूरी ताकत झोंक रहा था, लेकिन उस रोज़ श्रीकांत और गावस्कर की ओपनिंग पार्टनरशिप ने कमाल का खेल दिखाया. पहला विकेट 117 रन पर गिरा. इसके बाद वेंगसरकर और गावस्कर की पार्टनरशिप बनी, जिसने स्कोर को 200 पार पहुंचा दिया. ये अच्छे खेल की निशानी थी, क्योंकि सामने इमरान खान, नया-नया वसीम अकरम, अब्दुल क़ादिर जैसे लोग गेंद फेंक रहे थे. हालांकि इन 3 बल्लेबाजों के सिवा और कोई चमक भी नहीं. कपिल देव से उम्मीदें थीं कि अगर वो दम भर खेल गए, तो स्कोर 300 के पास पहुंच जाएगा. मगर ये हो न सका. (मैं जब भी ‘मगर ये हो न सका’ लिखता हूं बस मन कर जाता है कि आगे लिखने लग जाऊं ‘ और अब ये आलम है कि तू नहीं, तेरा गम तेरी जुस्तजू भी नहीं…’ खैर…)

पाकिस्तान बैटिंग करने उतरा, तो जावेद ही जावेद दिखाई पड़ रहा था. 200 रन बनाते-बनाते पाकिस्तान ने 6 विकेट खो दिए. सलीम मलिक और जावेद मियांदाद ने साथ मिलते हुए 50 रनों की पार्टनरशिप ज़रूर बनाने की कोशिश की, मगर सब कुछ 49 रनों पर ही रुक गया और सलीम मलिक को रन आउट कर दिया गया. यहां से पाकिस्तान की आख़िरी आशा की किरण बनी मियांदाद और अब्दुल क़ादिर की जोड़ी जिसने साथ मिलकर 71 रन बनाए.

होते-करते बात अंतिम 10 ओवर तक पहुंची, जहां पाकिस्तान को 90 रन बनाने थे. जावेद मियांदाद अकेले डटे हुए थे. जावेद अपने शतक के एकदम करीब थे. शारजाह में हर शख्स कुर्सी के कोने पर बैठा हुआ था. ये वो वक़्त था, जब ये ज़मीन सट्टेबाजों का गढ़ बन चुकी थी. यकीनन उस शाम कितने ही रुपयों का दांव खेला जा रहा था. 49वें ओवर में शतक पूरा हुआ. लेकिन जावेद को बखूबी मालूम था कि उनका काम अभी पूरा नहीं हुआ है. आख़िरी ओवर में पाकिस्तान को जीतने के लिए 11 रन चाहिए थे. चेतन शर्मा के हाथ में गेंद दिखाई दी. पहली गेंद पर एक रन आया, लेकिन वसीम अकरम जावेद को स्ट्राइक पर रखने के चक्कर में रन आउट हो गए.

दूसरी गेंद. जावेद तीनों स्टंप दिखाते हुए खड़े थे. उनका पिछला पैर लेग स्टंप के ठीक बाहर था और कंधे खुले थे. मतलब साफ़ था, वो हाथ खोलकर मारने के लिए तैयार थे. यही चारा ही था. चेतन शर्मा ने उन्हें फॉलो करते हुए गेंद फेंकी. बस लेंथ ऐसी कि बल्ला घुमाने पर सीधी बल्ले पर आई. लॉन्ग ऑन बाउंड्री पर चार रन. पाकिस्तान को जीतने के लिए 4 गेंदों में 6 रन चाहिए थे. शारजाह में लम्बी होती परछाइयां शोर मचा रही थीं.

तीसरी गेंद. इस बार जावेद ने चालाकी दिखाई. उन्हें मालूम था कि चेतन शर्मा भी कम अनुभवी नहीं हैं, लिहाज़ा वो गलती नहीं दुहराएंगे. इस बार चेतन के हाथ से गेंद छूटते ही जावेद विकेट्स पर चलकर ऑफ स्टंप पर आ गए और गेंद को लेकर पीछे घूम गए. गेंद को बैकवर्ड शॉर्ट लेग पर खड़े फील्डर ने शानदार तरीके से रोकी. ये वो मौका था जो पाकिस्तान के हाथ से गेम छीन सकता था. कम से कम इंडियन टीम को तो ऐसा ही लग रहा था.

चौथी गेंद. अब क्रीज़ पर थी पाकिस्तान की कमज़ोर कड़ी. विकेटकीपर ज़ुल्की. शर्मा की सीधी और तेज़ गेंद जिस पर ज़ुल्की ने पूरी ताकत से बल्ला चलाया. नॉन-स्ट्राइकिंग एंड से मियांदाद दौड़ पड़े. लेकिन कोई फल नहीं. ज़ुल्की गेंद मिस कर चुके थे. पाकिस्तान का 9वां विकेट गिर गया था. अब चीखने की बारी आधे शारजाह की थी, जिसमें इंडियन सपोर्टर थे. जावेद काफ़ी नाखुश थे. वो अब भी नॉन-स्ट्राइकिंग एंड पर थे.

पांचवीं गेंद. तौसीफ़ अहमद ने अपनी आंखें फाड़कर गेंद को देखा और वहीं टैप कर दिया. सिंगल लेने के लिए मियांदाद ऐसे दौड़े जैसे उनका जीवन दांव पर लगा हो. बॉलिंग एंड पर रन-आउट का चांस छूटा. पाकिस्तान को अब 4 रन चाहिए थे.

आख़िरी गेंद. 110 रनों के पर्सनल स्कोर पर खेल रहे जावेद मियांदाद के सामने चेतन चौहान खड़े थे. लगभग 3 मिनट की टीम मीटिंग के बाद भारतीय फ़ील्डिंग सजी हुई थी. चेतन शर्मा दौड़े और मियांदाद के बल्ले के बीचों-बीच एक फ़ुलटॉस गेंद रख दी. गेंद अगले ही सेकंड बाउंड्री के पार गिरी. पाकिस्तान पहला ऑस्ट्रेलेशिया कप जीत चुका था. जावेद मियांदाद शॉट मारने के तुरंत बाद दौड़ पड़े. उन्हें मालूम था कि गेंद कहां जाकर गिरने वाली थी.

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