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क्या है इज़रायल का रक्षाकवच आयरन डोम जो उसे हर हमले से बचा लेता है!

इज़रायल और हमास के बीच जंग चल रही है. फिलिस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास 10 मई की शाम से ही इज़रायल पर रॉकेट हमले कर रहा है. जवाब में इज़रायल भी फिलिस्तीनी इलाकों पर हवाई बमबारी कर रहा है.

इज़रायल और हमास के बीच शुरू हुई इस ताज़ा हिंसा से जुड़े कई विडियोज़ इंटरनेट पर सर्कुलेट हो रहे हैं. इनमें एक विडियो इज़रायल डिफेंस फोर्सेज़ का भी है. इसे IDF ने अपने ट्विटर हैंडल से शेयर किया. इसमें 11 मई की रात का एक घटनाक्रम है. विडियो में हमें इज़रायल का आसमान दिखता है. यहां दनादन दर्ज़नों रॉकेट आते दिखते हैं. मगर ये रॉकेट अपने टारगेट तक नहीं पहुंचते. बीच हवा में ही नष्ट हो जाते हैं.

आपको एक मोबाइल गेम याद है? जिसमें चीजें ऊपर से नीचे गिरती रहती थीं. और उनके नीचे गिरने से पहले उन्हें मारकर खत्म करना होता था. समझिए कि कुछ-कुछ इसी शैली की एक चीज है इज़रायल के पास. जो हमास के रॉकेट्स को बीच हवा में रोककर उन्हें खा जाती है. इस चीज़ का नाम है- आयरन डोम. एक क़िस्म का लौह कवच. जिसपर इज़रायली आसमान की सुरक्षा का जिम्मा है. क्या है आयरन डोम? कैसे काम करता है ये? आज विस्तार से बताएंगे.

इज़रायल के दक्षिणी हिस्से में स्डेरोत नाम का एक शहर है. मानचित्र पर देखिए, तो बिल्कुल गाजा से जुड़ी सरहद के नज़दीक बसा है स्डेरोत. ये तकरीबन 27 हज़ार की आबादी वाला एक छोटा सा शहर है.

साल 2001 के 16 अप्रैल की तारीख़ थी. इस छोटे से शहर ने वो देखा, जो पहले कभी नहीं देखा था. उस रोज़ इस शहर पर एक रॉकेट आकर दगा. इस रॉकेट का नाम था- क़स्साम. ये एक होममेड रॉकेट था. बुनियादी और कम दूरी तक जाने वाला रॉकेट. प्लंबिंग में काम आने वाला पाइप होता है ना. उसी पाइप के भीतर थोड़ा विस्फ़ोटक और छर्रा भरकर रॉकेट छोड़ दिया जाता है. ताकि विस्फ़ोट के बाद इससे निकले छर्रे चारों तरफ फैल जाएं. और ज़द में आने वालों को नुकसान पहुंचाएं.

क़स्साम को छोड़ा गया था, सरहद पार गाज़ा से. गाज़ा पर फिलिस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास का कंट्रोल है. उसी ने ये रॉकेट दागा था. ये पहली बार था, जब हमास ने इज़रायल पर रॉकेट हमला किया था. इससे पहले तक हमला करने की उसकी मुख्य मोडस ऑपरेंडी थी- सुसाइड अटैक्स. मगर अब हमास ने दूर बैठकर इज़रायली ठिकानों को टारगेट करने का नया हथियार खोज लिया था.

Hamas
हमास के लड़ाके. (तस्वीर: एपी)

इसके बाद हमास द्वारा रॉकेट अटैक किया जाना आम हो गया. शुरुआत के पांच साल, मतलब 2001 से 2005 तक, हमास केवल इज़रायल के सीमांत इलाकों को टारगेट कर पाता था. मगर 2006 आते-आते वो ज़्यादा सॉफ़िस्टिकेटेड रॉकेट्स दागने लगा. अब सरहद से सटे स्डेरोत जैसे शहरों के अलावा ऐस्केलॉन जैसे दूरी वाले तटीय शहर भी टारगेट किए जाने लगे.

पहले रॉकेट अटैक के 11 बरस बाद, यानी 2012 में हमास के छोड़े रॉकेट्स राजधानी टेल अविव और जेरुसलेम तक पहुंच गए. हम बार-बार कह रहे हैं रॉकेट हमला? किसी को लग सकता है कि कभी-कभार, इक्का-दुक्का रॉकेट छोड़े जाते होंगे. जी नहीं. जब इज़रायल और हमास में टेंशन बढ़ती है, तो रोज़ाना रॉकेट्स दगते हैं. वो भी दर्ज़नों की तादाद में. मिसाल के लिए स्डेरोत शहर को लीजिए. जहां से रॉकेट हमले शुरू हुए. 2001 से 2007 के बीच अकेले स्डेरोत शहर पर दो हज़ार से ज़्यादा रॉकेट दागे गए.

इस क्रोनोलॉजी से आप समझ गए होंगे कि हमास ने किस तरह लगातार अपनी ताकत बढ़ाई. इसमें हमास को मदद मिली ईरान जैसे देशों से. तो क्या जब हमास हमले की अपनी रीच बढ़ा रहा था, तब इज़रायल हाथ-पर-हाथ धरे बैठा था? नहीं. 2006 के बाद से ही इज़रायल देख रहा था कि हमास के रॉकेट्स उसकी सीमा में और भीतर, तक बढ़ते आ रहे हैं. ऐसा नहीं कि इज़रायल को बस हमास के रॉकेट्स से ख़तरा हो. 2006 में लेबनन वॉर के समय हेज़बोल्लाह ने करीब 4,000 रॉकेट्स छोड़े थे इज़रायल पर. इसमें 44 इज़रायली मारे गए.

इन घटनाओं के चलते रॉकेट अटैक्स इज़रायली सुरक्षा के लिए बड़ा ख़तरा थे. उसे इनसे निपटने की ठोस रणनीति चाहिए थी. इसके अलावा सरकार और सेना पर जनता का भी दबाव था. इन्हीं सब के चलते साल 2007 में इज़रायली रक्षा मंत्रालय ने डिफ़ेंस के लिए एक ख़ास कवच विकसित करना शुरू किया. यहां कवच का मतलब है, मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम. जैसा कि नाम से स्पष्ट है, ये डिफेंसिव हथियार है. इसका काम है दुश्मन के मिसाइल अटैक को विफल करना. उन्हें लक्ष्य तक पहुंचने से पहले नष्ट कर देना.

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हेज़बोल्लाह ने लगातार हमास की मदद की है. (तस्वीर: एपी)

ये बात सुनने में आसान लग सकती है. मगर मिसाइलों को आकाश में ही शूट कर देना, बहुत मुश्किल काम है. इसकी एक मिसाल है- अमेरिका का पैट्रिअट मिसाइल डिफेंस सिस्टम. 1991 में हुए पहले गल्फ़ वॉर की बात है. तब अमेरिका ने अपने पैट्रिअट डिफ़ेंस सिस्टम को इज़रायली सीमा पर तैनात किया. ताकि इराक़ी मिसाइल हमलों से इज़रायल को बचाया जा सके. उस दौर में इराक के पास दो मुख्य मिसाइलें थीं. एक थी, स्कड. ये मिसाइल सोवियत ने दी थी इराक को. स्कड एक बलिस्टिक मिसाइल थी, जिसे सोवियत ने कोल्ड वॉर के दौर में विकसित किया था. इराकी जख़ीरे में दूसरी प्रमुख मिसाइल थी, अल-हुसैन. ये स्कड मिसाइल का ही अपग्रेडेड वर्ज़न था.

क्या पैट्रिअट अपना काम बख़ूबी कर पाया?

उस समय अमेरिका ने प्रचारित किया कि पैट्रिअट बेहद प्रभावी है. अमेरिका द्वारा जारी किए गए आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, पैट्रिअट ने इराक द्वारा दागी गईं करीब 94 पर्सेंट मिसाइलों को गिरा दिया. इसको आसान भाषा में समझिए, तो नुकसान को 94 पर्सेंट तक कम कर दिया. सुनने में लगेगा कि वाह, ये तो बहुत टॉप क्लास परफ़ॉर्मेंस है. लेकिन असलियत ये है कि अमेरिका ने झूठ बोला था. पैट्रिअट असल में बेहद कमज़ोर साबित हुआ था. वो इराकी मिसाइलों को रोक ही नहीं पाया. अमेरिका हथियारों का टॉप निर्यातक है. इतने बड़े युद्ध में उसका प्रचारित डिफ़ेंस सिस्टम फेल रहा था. शायद इसी झेंप से बचने के लिए झूठे दावे परोसे गए थे.

ऐसे में जब इज़रायल ने मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम विकसित करने की योजना बनाई, तो काफी शुबहा था. इस डिफेंस सिस्टम को विकसित करने, डिप्लॉय करने और ऑपरेट करने में बहुत बड़ी रकम ख़र्च होने वाली थी. कितनी रकम? समझिए कि दुश्मन के एक मिसाइल को रोकने की इसकी लागत 37 से 65 लाख रुपये के बीच आती. इतना पैसा ख़र्च करके भी अगर काम न सधे, तो क्या होगा? इन सब वजहों से कई सवाल खड़े हुए. अमेरिका ने भी इज़रायल को समझाया कि वो कोई सस्ता विकल्प खोजे.

मगर तमाम शंकाओं के बावजूद इज़रायल ने काम जारी रखा. इसका जिम्मा मिला इज़रायल की एक कंपनी- रफाएल अडवांस्ड डिफेंस सिस्टम्स को. इस प्रॉजेक्ट के लिए इज़रायल को करीब सात हज़ार करोड़ रुपए की ज़रूरत थी. इतनी बड़ी रकम अकेले मैनेज करना मुश्किल था. ऐसे में आगे आया अमेरिका. तब अमेरिका के राष्ट्रपति थे बराक ओबामा. वो चाहते थे कि इज़रायल एक सिक्योर्ड स्थिति में आए. उसका डिफेंस अप-डू-डेट हो. ताकि हमास और हेजबोल्लाह जैसे ईरान समर्थित संगठन हावी न हों. ओबामा को उम्मीद थी कि ऐसा हुआ, तो शायद सभी पक्ष शांति वार्ता की तरफ बढ़ें.

शायद इसीलिए ओबामा प्रशासन ने 2010 में तमाम आपत्तियों के बावजूद अमेरिकी कांग्रेस से करीब 1,500 करोड़ रुपए का एक फंड पास करवाया. ये फंड इज़रायली डिफेंस सिस्टम विकसित करने के लिए दी गई एक क़िस्म की सब्सिडी थी. आने वाले सालों में अमेरिका ने इस मद में और भी फंडिंग दी इज़रायल को. ये वित्तीय मदद न मिलती, तो शायद इज़रायल का डिफ़ेंस सिस्टम प्रॉजेक्ट लटक जाता.

Barack Obama
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा. (तस्वीर: एपी)

इन कोशिशों का रिज़ल्ट आया 2011 में. अप्रैल 2011 की बात है. यानी रॉकेट हमले शुरू होने के ठीक एक दशक बाद. एक रोज़ हमास ने गाज़ा वाली साइड से एक रॉकेट छोड़ा. इज़रायल ने उस रॉकेट को बीच हवा में नष्ट कर दिया. ये पहली बार था, जब इज़रायल ने एक शॉर्ट-रेंज रॉकेट अटैक पर इस तरह का काउंटर स्ट्राइक किया हो. और ये जिसकी वजह से मुमकिन हो पाया, उसका नाम था- आयरन डोम. इज़रायल का विख़्यात मिसाइल डिफेंस सिस्टम.

कितना कारगर था आयरन डोम?

इसकी मिसाल के लिए 2012 की एक घटना सुनिए. 14 नवंबर, 2012 को इज़रायल ने एक एयरस्ट्राइक किया. इसमें हमास का मिलिटरी चीफ़ अहमद जबारी मारा गया. स्पष्ट था कि हमास भी जवाबी कार्रवाई करेगा. इज़रायल को पता था कि इस बार संघर्ष और तेज़ होगा. इसकी वजह ये थी कि ईरान की मदद से इस वक़्त तक हमास के पास लॉन्ग-रेंज के रॉकेट्स आ चुके थे. वो अब टेल अविव और जेरुसलेम को निशाना बना सकता था.

इज़रायल का अनुमान सच निकला. इस संघर्ष के दौरान नवंबर 2012 में पहली बार हमास के रॉकेट्स राजधानी टेल अविव पहुंचे. जब टेल अविव में पहली बार रॉकेट अटैक का वॉर्निंग सायरन बजा, तो भी लोगों में पैनिक नहीं फैला. क्योंकि इस वक़्त तक आयरन डोम ख़ुद को साबित कर चुका था. उसकी एक्युरेसी रेट 80 से 90 पर्सेंट के बीच थी. इसका मतलब था, इज़रायल को जान-माल का कम-से-कम नुकसान.

इसका मतलब ये भी था कि हमास के संसाधन बर्बाद हो रहे थे. उसके पास आयरन डोम का कोई तोड़ नहीं था. इसी वजह से जबारी की हत्या के एक हफ़्ते बाद, यानी 21 नवंबर 2012 को, इज़रायल और हमास के बीच सीज़ फायर हो गया. अगर पहले का वक़्त होता, तो संघर्ष तेज़ होने पर इज़रायल को गाज़ा में अपने सैनिक तैनात करने पड़ते. हफ़्तों तक हिंसा चलती रहती.

मगर इस दफ़ा ऐसा नहीं हुआ. इज़रायल ने इस सफलता का श्रेय दिया आयरन डोम को. जानकारों ने भी कहा कि अब फिलिस्तीनी चरमपंथी और इज़रायल, दोनों की फ़्यूचर सैन्य रणनीति का सेंटरपीस होगा आयरन डोम. ऐसा ही हुआ भी. पिछले एक दशक से आयरन डोम इज़रायल की डिफेंस स्ट्रैटजी का पोस्टरबॉय बना हुआ है.

आयरन डोम काम कैसे करता है?

इतनी बातें हो गईं आयरन डोम की. अब ये भी जान लेते हैं कि ये काम कैसे करता है? ये डिफेंस सिस्टम कई बैटरी की बदौलत चल रहा है. यहां बैटरी का मतलब चार्ज होने वाली बैटरी बिलकुल नहीं है. रॉकेट रोकने वाले एक यूनिट को बैटरी कहते हैं. आयरन डोम के काम करने का तरीका समझने के लिए इस बैटरी के अलग-अलग हिस्सों को जानना होगा.

एक बैटरी के तीन अहम हिस्से होते हैं- रेडार, कंट्रोल सेंटर और लॉन्चर. पहला हिस्सा है रेडार. जैसे ही गाज़ा की तरफ से कोई रॉकेट फायर होता है, रेडार को तुरंत भनक लग जाती है. रेडार को उस रॉकेट की स्पीड और ट्रैजेक्ट्री की भी जानकारी मिल जाती है. ट्रैजेक्ट्री यानी वो रास्ता, जो रॉकेट तय करने वाला है. ये जानकारी रेडार आयरन डोम के दूसरे हिस्से को भेज देता है.

इस दूसरे हिस्से का नाम है- कंट्रोल सेंटर. इस सेंटर में हाई स्पीड कंप्यूटर रखे होते हैं. इनकी मदद से ये अंदाज़ा लगाया जाता है कि रॉकेट कहां गिरने वाला है. अगर रॉकेट किसी आबादी वाले इलाके में या किसी महत्वपूर्ण इमारत पर गिरने वाला हो, उसे तभी रोका जाता है. अगर किसी खाली जगह या वीराने में गिरने वाला हो, तो उसे गिरने दिया जाता है. किसी रॉकेट को रोकना है या नहीं, ये फैसला कंट्रोल सेंटर में रखे कंप्यूटर लेते हैं.

अगर कंप्यूटर को लगता है कि किसी मिसाइल को रोका जाना है, तो कंट्रोल सेंटर आयरन डोम के तीसरे हिस्से को सिग्नल भेजता है. इस तीसरे हिस्से का नाम है लॉन्चर. लॉन्चर में कई इंटरसेप्टर तैनात होते हैं. इंटरसेप्टर यानी वो मिसाइल जो हमला करने वाले रॉकेट को हवा में ख़त्म कर देगी. कंट्रोल सेंटर से सिग्नल मिलते ही तुरंत एक इंटरसेप्टर लॉन्च हो जाता है. इस इंटरसेप्टर को कंट्रोल सेंटर से लगातार गाइडेंस मिलता है.

इस इंटरसेप्टर के अंदर भी एक छोटा सा रेडार लगा होता है. इस इंटरनल रेडार और कंट्रोल सेंटर की मदद से इंटरसेप्टर दुश्मन के रॉकेट के पास पहुंच पाता है. रॉकेट के पर्याप्त नज़दीक पहुंचकर इंटरसेप्टर ब्लास्ट हो जाता है, और उस दुश्मन रॉकेट को हवा में ही ख़त्म कर देता है.

रेडार, कंट्रोल सेंटर और लॉन्चर. बैटरी के ये तीन हिस्से एक जगह पर मौजूद नहीं होते. ये अलग-अलग जगहों पर तैनात किए जाते हैं. इनके बीच बहुत तेज़ी से वायरलेस डेटा ट्रांसफ़र होता है. इन हिस्सों की कोई जगह तय नहीं होते. ये मोबाइल, यानी चलायमान होते हैं. यानी इन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है.

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पिछले एक दशक से आयरन डोम इज़रायल की डिफेंस स्ट्रैटजी का पोस्टरबॉय बना हुआ है. (तस्वीर: एएफपी)

आयरन डोम का परफ़ॉर्मेंस कैसा है?

ये तो हुआ आयरन डोम का मकैनिज़म. लेकिन क्या इसकी परफ़ॉर्मेंस पर कभी कोई सवाल नहीं उठा? बिल्कुल उठा. कई जानकारों का कहना है कि आयरन डोम उतना प्रभावी नहीं, जितना इज़रायल दावा करता है. उनका कहना है कि शुरुआती दिनों के मुकाबले आयरन डोम की क्षमता घटी है. ये पहले से कम रॉकेट्स को नष्ट करता है.

कुछ एक्सपर्ट कहते हैं कि इसकी वजह शायद ये है कि आयरन डोम का सिस्टम बेहतर हुआ है. वो ज़्यादा सटीक तरीके से अनुमान लगा पा रहा है कि किस रॉकेट से ख़तरा है, किससे नहीं. चूंकि हमास के रॉकेट्स बहुत प्रिसासइली गाइडेड नहीं होते, सो आयरन डोम को कम ही रॉकेट्स में ख़तरा दिखता है. यही वजह है कि वो कम रॉकेट्स को गिराता है.

आयरन डोम से जुड़ा एक सवाल लागत का भी है. इज़रायल कहता है कि आयरन डोम द्वारा एक रॉकेट गिराए जाने की लागत 37 से 65 लाख रुपये के बीच आती है. मगर कुछ एक्सपर्ट्स कहते हैं कि ये आंकड़ा ग़लत है. असल लागत डेढ़ करोड़ रुपये से ज़्यादा हो सकती है. उनका कहना है कि इज़रायली सरकार सुरक्षा के लिए ख़र्च होने वाले भारी-भरकम पैसों को जानबूझकर कम बताती है. ताकि उसपर फिलिस्तीन के साथ आक्रामकता कम करने का दबाव न बने.

इस दलील को थोड़ा और बारीकी से समझते हैं. आयरन डोम की सफलता का मतलब है, संघर्ष के दौरान इज़रायल का कम-से-कम नुकसान. अगर इज़रायल को जान-माल के ज़्यादा नुकसान की आशंका हो, तो उसकी लीडरशिप फिलिस्तीन के साथ तनाव घटाने की कोशिश करेगी.

इज़रायल के मौजूदा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की पॉलिसी आक्रामक है. वो उकसावा और कट्टर राष्ट्रवाद की राजनीति करते हैं. फिलिस्तीनी अधिकारों को जगह देकर विवाद झुलसाने की कोशिश नहीं करते. वो लंबे समय से फिलिस्तीन के साथ शांति वार्ता टालते आए हैं. इसकी बड़ी वजह ये है कि इज़रायल कम्फर्टेबल स्थिति में है. वो हमास जैसे संगठनों के साथ होने वाले संघर्ष से काफी हद तक ख़ुद को बचा लेता है. लेकिन जब वो गाज़ा पर बमबारी करता है, तो फिलिस्तीनियों के पास कोई डिफेंस नहीं होता है. वो मरते हैं.

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इज़रायल के मौजूदा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू. (तस्वीर: एपी)

आख़िर में एकबार फिर मौजूदा प्रकरण पर लौटते हैं. एकबार फिर हमास और इज़रायल में जंग छिड़ी हुई है. 10 मई की शाम से ही हमास रॉकेट दाग रहा है. जानकारों के मुताबिक, इसबार की स्थिति पहले से कहीं अधिक गंभीर है. हमास ने रॉकेट्स की बौछार कर दी है इज़रायल पर. पिछले सात सालों में दोनों पक्षों के बीच इतनी ज़्यादा हिंसा नहीं हुई थी.

11 और 12 मई की दरमियानी रात ही रॉकेट हमलों में तीन इज़रायली मारे गए. सोमवार से अब तक पांच इज़रायलियों की मौत हुई है. 100 से ज़्यादा इज़रायली जख़्मी हुए हैं. कई इमारतों को भी नुकसान पहुंचा है. इज़रायली एयरफोर्स ने भी गाज़ा स्ट्रिप पर बमबारी बढ़ा दी है. रपटों के मुताबिक, इज़रायली एयरस्ट्राइक्स में 43 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं. इनमें 13 बच्चे भी शामिल हैं. हमास के भी कुछ लोगों के मारे जाने की ख़बर है. 300 से ज़्यादा फिलिस्तीनी जख़्मी हुए हैं. इज़रायल और हमास, दोनों एक-दूसरे की आम आबादी को निशाना बना रहे हैं.

Israel Vs Palestine
इज़रायली एयरस्ट्राइक्स में 43 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं. (तस्वीर: एपी)

इन सबके बीच आयरन डोम भी सुर्ख़ियों में है. उसके द्वारा दुश्मन के रॉकेट्स ख़त्म किए जाने के विडियोज़ को इंटरनेट पर लाखों लोग देख चुके हैं. इनके बीच 11 मई को आयरन डोम में तकनीकी गड़बड़ी की भी ख़बर आई. पता चला कि ऐस्केलॉन शहर में तैनात आयरन डोम की बैटरी में कुछ फॉल्ट हुआ. इसके चलते वो दुश्मन के रॉकेट्स को नहीं रोक पाया.

Soumya Santosh
सौम्या संतोष इज़रायल में नर्स का काम करती थीं. (तस्वीर: ट्विटर)

इसके कारण ऐस्केलॉन शहर में दो लोग मारे गए. इनमें से एक हमारी हमवतन सौम्या संतोष भी थीं. केरल की रहने वाली सौम्या इज़रायल में नर्स का काम करती थीं. वो एक बुजुर्ग इज़रायली महिला की नर्स थीं. 11 मई को सौम्या फ़ोन पर अपने पति से बात कर रही थीं. इसी समय हमास का दागा रॉकेट अपार्टमेंट में घुसा. सौम्या और उन इज़रायली महिला, दोनों की मौत हो गई. हमास के रॉकेट्स ने कुछ स्कूलों को भी टारगेट किया. अच्छा ये हुआ कि स्कूल पहले ही खाली करवा लिए गए थे.

इज़रायली मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये गड़बड़ी ठीक कर ली गई है. हमास इसे लेकर अलग दावा कर रहा है. उसका कहना है कि उसने सिजील नाम का नया मिसाइल इस्तेमाल किया था. इस मिसाइल में आयरन डोम के डिफेंस सिस्टम को बायपास करने की क्षमता है.

Mohammad Shtayyeh
फिलिस्तीन के प्रधानमंत्री मुहम्मद शतायेह. (तस्वीर: एपी)

एक और इतनी बर्बादी हो रही है. दूसरी तरफ़ दोनों पक्षों की लीडरशिप आक्रामकता बढ़ाने में लगे हैं. इज़रायली PM नेतन्याहू ने कहा कि उनका देश एक बड़े ऑपरेशन के बीच में है. हमास को भारी क़ीमत चुकानी होगी. नेतन्याहू ने ये भी कहा कि मौजूदा ऑपरेशन फिलहाल समय लेगा. मतलब, ये संघर्ष अभी जारी रहेगा.

उधर फिलिस्तीन के प्रधानमंत्री मुहम्मद शतायेह ने UN सिक्यॉरिटी काउंसिल से अपील की है. कहा है कि वो इज़रायल को रोके. इज़रायल के खिलाफ़ हमले में हमास के अलावा इस्लामिक जिहाद मूवमेंट नाम का संगठन भी शामिल है. इसके सेक्रेटरी जनरल ज़ियाद अल-नखालाह ने कहा कि वो जंग जारी रखेगा, चाहे कुछ भी हो जाए, पीछे नहीं हटेगा. दोनों पक्ष एक-दूसरे को ज़्यादा-से-ज़्यादा चोट देने में लगे हैं. और ये चोट सबसे ज़्यादा लग किसे रही है? आम आबादी को.


विडियो- इज़रायल और फ़िलिस्तीन इस जगह के लिए मार-काट क्यों कर रहे हैं?

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