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मंटो के नाम से न जाने क्यों ग़म और ग़ुस्से का पहाड़ टूट पड़ता है

रामलाल के नाम

मेरे मरने के बाद मुझे समन्दर में फेंक दिया जाये ताकि मछलियों के पेट में कांटा बन जाऊं और किसी बहुत ज़्यादा भाषण देने वाले के गले में फंस कर किसी अच्छे काम का कारण बन सकूं.

इस्मत चुग़ताई

मण्टो के नाम से न जाने क्यों ग़म और ग़ुस्से का पहाड़ टूट पड़ता है और फिर उसकी रूह को मेरे वजूद में दाख़िल करके यह भी बता दिया है कि वह मर चुका है. एक मण्टो है जिसकी सारी किताबें उसकी बीवी सफ़िया ने मुझे दी थीं.

तुमने उसे याद दिलाया और उसकी रूह तो उसका अपना कलेजा चीरकर समाप्त हो गयी. भला वह मेरे वजूद में समाने का अपमान कैसे सहन करेगी? एक तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ा. अरे भई तुमने कन्हैया जी को औरतबाज़ कह कर बड़ा जी जलाया. एक वही तो ढंग के भगवान हैं. सबसे ज़्यादा प्रोग्रेसिव और लेखक तो थे ही. यानी अपनी ही ज़ात-बिरादरी के हुए. गीता की रचना की.

सबसे बड़ा चमत्कार उनमें यह था कि उन्होंने औरत को भी इनसानों में शामिल किया. दुनिया के किसी साहित्य में इतनी बहादुरी के साथ औरत को मर्द से प्रेम की अभिव्यक्ति करने की मिसाल नहीं मिलती. किसी तहज़ीब ने औरत को आशिक़ और मर्द को माशूक़ बनाने की कोशिश नहीं की. फ्रांसीसी और अंग्रेज़ी साहित्य में भी औरत ही महबूबा है और ज़्यादातर रंडियों ने ही आज़ाद इश्क़ किया है जिसे नीचा और व्यापार का रंग दे दिया गया है, मगर कृष्ण जी ने शारीरिक प्रेम को भक्ति का रुत्बा दिया है. राधा शादीशुदा है मगर कृष्ण के प्रेम में ऐसी दीवानी हुई कि पूजी जाने लगी. इतनी बाग़ी और बेलगाम आशिक़ की मिसाल कहीं और नहीं मिलेगी. औरत तो दुनिया में प्रेमिका बनाकर भेजी गयी है. उस पर आशिक़ हुआ जा सकता है. लेकिन शरीफ़ औरत छुपे-चोरी कर भी डाले इश्क़ तो या तो डूब मरती है या ज़हर खाकर मर जाती है. और ब्याही औरत का पति उसका भगवान होता है. ब्याही राधा अपने पति की नहीं, कृष्ण की है. राधा के पति देव का क्या नाम था? मुझे तो नहीं मालूम, हां उसके प्रेमी का नाम दुनिया जपती है.

यही नहीं, अगर कोई ग़ैर मर्द किसी की मां-बहन की तरफ़ आंख उठाकर देख ले तो उसकी आंखें निकाल ले मगर जब अर्जुन आशिक़ हो जाते हैं और बाप शादी के लिए तैयार नहीं होता तो कृष्ण कहते हैं, ‘‘मैं बहन को किसी बहाने से ले आऊंगा और तुम उसे भगा ले जाना.’’ है किसी माई के लाल का इतना बड़ा कलेजा कि बहन को उसके प्रेमी के साथ भगाने में मदद करे.

Ismat-Apa
शीघ्र प्रकाश्य

सेक्स को कृष्ण ने पवित्रता का स्थान दिया है. उस समय भी आज की तरह औरत-मर्द के मिलाप पर पहरा था. सौदेबाज़ी के बाद ही उनका मिलाप सही समझा जाता था. यानी औरत-मर्द का रिश्ता एक-दूसरे की लगावट पर नहीं, दौलत के लेन-देन पर निर्भर था. मर्द तो औरत के रेवड़ ख़रीद सकता था. औरत उसकी जायदाद बन जाती थी और उसके साथ चिता पर फूंक दी जाती थी. बेवा जीते जी भी मर जाती थी. कृष्ण जी ने राधा को न सोने से ख़रीदा न उस पर कोई छाप लगायी. बंसी बजाई और वह खिंची चली आयी. दुनिया की कोई ताक़त न रोक सकी. ऐसी आज़ादी की मिसाल किसी मुल्क और किसी मज़हब में नहीं मिलती. मर्द की तो मिलती है मगर औरत की नहीं.

इतिहास उठा कर देखो. बादशाह, राजा, नवाब, औरत के गोल के गोल पालते हैं. क्या उन्होंने अपने प्यार की बदौलत पायी थीं? लोगों ने उनके सर मढ़ी थीं और बदले में जागीरें और ओहदे लिए थे. पत्तेबाज़ी की तरह और मां, बहन, बीवी, बेटी को तुरुप बनाकर मारा था. कृष्ण ने सेक्स की आज़ादी को धर्म का एक स्तम्भ क्यों समझा? किसी ने उस वक़्त की समाजी पाबन्दियों पर रिसर्च की है? क्या ऐसा तो नहीं था, जैसा आज भी ज़्यादातर है कि औरत सस्ती थी, बेबस थी, अधमरी थी. माल की तरह ख़रीदी और बेची जाती थी. पुराने कूड़े-करकट की तरह चिता पर फेंक दी जाती थी.

औरत और मर्द का रिश्ता जब इन गतों को पहुंच जाता है तो इस समाज की बौद्धिक स्थिति क्या होती है. औरत को पैर की जूती बनाकर क्या मर्द वाक़ई यौन सन्तुष्टि प्राप्त कर सकता है. ज़रूरत से ज़्यादा चिकनाई वाले खाने खाकर बदहज़मी और अक़सर हैज़ा हो जाता है. पैर की जूती कोई चबाकर निगल ले तो क्या पेट भर सकेगा? रोटी की भूख से भी मौत हो सकती है. मगर जो रोटी की मार देते हैं, ग़रीबों का हक़ दबाकर अपने लिए ऐश ख़रीदते हैं, उनमें यौन-ऐश सबसे महंगे पड़ते हैं, क्योंकि औरतों को कुनबे पालने पड़ते हैं. उन कुनबों के मर्द भी तो ऐश पालते हैं, उन्हें भी तो औरतों के समूह चाहिए.
देश की पूंजी का ज़्यादातर हिस्सा हाकिम और उसके चाटुकारों के हिस्से में आता है. जहां-जहां इम्पीरियलिज़म पला है और अब भी सरमायादारों की सूरत में पल रहा है, वहां-वहां अवाम भूखे मर रहे हैं. बस चोर और डाकू ऐश कर सकते हैं.

इसी कलयुग में कृष्ण पैदा हुए और हज़रत मूसा की तरह शाही ताक़त से बच निकले और अवतार बन गये. उन्होंने बड़े-बड़े कालिया मारे.
मगर हार गये कन्हैया जी भी. उन्हें तो पूज डाला गया. झूम-झूमकर राधा-कृष्ण के गीतों पर सर धुनते हैं लेकिन अगर पता चल जाये कि उनकी अपनी बीवी किसी कन्हैया के साथ रास रचा रही है तो उसकी नाक-चोटी की ख़ैर नहीं और कन्हैया जी की भी छुट्टी. कृष्ण को पत्थर का बनाकर माथा टेकते हैं, मगर उनकी बानी भूल गये कि औरत और मर्द में अगर एक आज़ाद और दूसरा नज़रबन्द होगा तो मिलन फ्रॉड होगा.
यौन इच्छाएं अगर अपवित्र होतीं तो इससे बड़े-बड़े पैग़म्बर और रसूल कैसे पैदा हो सकते थे? जब से यौन सम्बन्ध मन की मौज के बजाय बाज़ार की चीज़ बन गये इनसानी दिमाग़ बिगड़ गया.

मैंने सारी ज़िन्दगी औरत-मर्द दोनों को बराबर की अहमियत दी है. दोनों की जिहालत, ज़ुल्म और ज़्यादती के ख़िलाफ़ क़लम उठाया है. अगर मर्द ज़ालिम, नाइन्साफ़, चोर-उचक्का है तो सबसे पहले वे औरतें मुजरिम हैं जिन्होंने उसे अपने ऐश-आराम की ख़ातिर चोर-उचक्का, उठाईगीर, और मुर्दा ज़मीर का कचूमर बनाया है. मर्द दुनिया के जरायम सिर्फ़ मां, बहन, बेटी, बीवी, सास, साली के ऐश और आराम की ख़ातिर करता है और तबाह-बरबाद होता है.
लोगों का ख़याल है कि मैं औरत की हिमायत करती हूं. कितना अहमक़ है यह जानवर. उससे मज़दूरी का काम लिया जाता है और वह ख़ुद को बड़ा समझता है. हालांकि उसे बराबरी का भी हक़ नहीं, सिवाय कम्युनिस्ट मुल्कों के, जहां औरत-मर्द को बराबर की मेहनत का बराबर फल मिलता है और मज़े की बात यह कि ये जोरू के गुलाम मर्द ही इस नाइंसाफ़ी पर भड़कते हैं.

मैंने बहुत बचपन से लड़कों के साथ बराबर का हक़ हासिल करने की कोशिश की. मैंने उन्हीं जैसे सादा कपड़े पहनने की ज़िद की और ज़ेवर-कपड़े की सजावट को ठुकरा दिया. कुनबा बड़ा था, ख़ानदान के बहुत सारे बच्चों का वालिद पर बोझ था. अपने और लड़कों के कपड़े वह बहुत सादा, अक़सर गांव के लाये हुए गाढ़े और खद्दर के बनवाते थे. मगर लड़कियों के जहेज़ के लिए विदेशी रेशम और सोने-चांदी के बर्तन और ज़ेवर बनवाये जाते थे.

कांग्रेस की जीत इसीलिए हुई कि औरत-मर्द दोनों ने विदेशी माल का बायकाट किया. गांधी जी ने मेरी ऑटोग्राफ़ (बुक) पर दस्तख़त करने से इनकार किया क्योंकि मैं और मेरी कालेज की लड़कियां विदेशी कपड़े पहने थीं. हमने उसी वक़्त खादी भंडार से खादी की धोतियां ख़रीदीं और गांधी जी की बाछें खिल गयीं, आटोग्राफ़ (बुक) पर दस्तख़त कर दिए. आज फिर अमरीका और यूरोप का फ़ैशन, इंपोर्टेड कपड़ा, सजावट, सिंगार, रहन-सहन विलायती बन गया है. मुल्क के एक अदद बादशाह हैं जिन्हें प्रेसीडेंट कहा जाता है. हर सूबे का गवर्नर शाही ठाठ-बाट से डटा हुआ है. हर सूबे की अपनी सरकार है. लीडर बहुत मोटे और चिकने हो रहे हैं और बस हार्ट फ़ेल से मरते हैं. तब बड़ी धूम-धाम से उनका अन्तिम संस्कार होता है. टी.वी. और रेडियो पर मातमी धुनें बजती हैं. प्रतिमाएं लगायी जाती हैं. मलिका विक्टोरिया की जगह कोई देसी राजा मनों लोहे में ढालकर खड़ा कर दिया जाता है, जिस पर कौए और चीलें बीट की सूरत में उनका आदर करती हैं, जबकि करोड़ों गांव के बच्चे नित नयी बीमारियों से मरते हैं. कुछ चन्दा बटोरने के लिए सड़कों पर घुमाये जाते हैं और बड़ी चर्चा होती है. लेखक की ऐसी की तैसी हो गयी है. अकादमियां जूतम-पैज़ार में जुटी हुई हैं. आलोचक बड़े-बूढ़ों की तरह लगामें खींचे नये लेखक को दिशा हीनता की ओर हांक रहे हैं.

मैं आज बड़ी ढिठाई से ऐलान करती हूं कि मैं लेखक-वेखक नहीं हूं. अपनी मर्ज़ी से जीती हूं. मर कर अगर भूत न बन गयी तो मरने के बाद मुझे समन्दर में फेंक दिया जाये ताकि मछलियों के पेट में कांटा बन जाऊं और किसी बहुत ज़्यादा भाषण देने वाले के गले में फंसकर किसी अच्छे काम का कारण बन सकूं.

मेरे पास नये लिखने वालों के बहुत से संग्रह आये हैं. बड़े जोड़-तोड़ करके पन्द्रह हज़ार के ख़र्च से ख़ुद किताब छपवाई है. मेरी राय मांगते हैं. काश! एक अदद चपत बैरंग भेजने का कोई तरीक़ा होता. मैंने कभी किसी की राय न मांगी, न परवाह की और अपनी राय बांटती फिरूं, यानी मैं आलोचक बनने की हिमाक़त करूं. जो भी, जो कुछ लिखता है अपने भरम पर लिखता है. हाल ही में जितनी किताबें और कहानियां पढ़ी हैं. हर लिखने वाला औरत से असन्तुष्ट है. वह जिससे शादी हो जाती है वह बीवी यानी गर्दन पर जुआ और महबूबा अमीर तबक़े की होने के कारण वेम्प मगर दिल पर वही लकड़ी के जूते की तरह खटा-खट बरस रही है, तो मैं क्या करूं?
अदीब बनने का जुनून उर्दू वालों में ही है या सभी भाषाओं के लेखक इस बीमारी का शिकार हैं. फ़िल्मों में भी हीरोइन बेहद जूते खाने की बातें करती हैं; रेप होकर आत्महत्या करती है या रंडी बनकर हमदर्दी वसूल करती है. रंडी के बड़े ऐश हैं. उमराव जान अदा आज भी नौजवानों के दिल की कली खिला रही है. शादी के बजाय किसी सेठ की रखैल बनने में ज़्यादा फ़ायदे हैं.
रामलाल उर्दू के मशहूर अफ़साना निगार हैं.


 

डायरी

13 अप्रैल, 1978, मास्को
फ़ैज़ पीये जा रहे हैं…
राइटर्स क्लब में लंच हुआ. बेहद वोदका और शैम्पेन पी गयी. अजीब-अजीब स्नैक्स पहले मिले फिर मजेश् का स्टिक आया. लंच पांच बजे तक चलता रहा, रात को शायदा और रंजीत के घर गये. उनकी बेटी लैला मुझसे डेढ़ इंच लम्बी है. बाप से ऊंची है और मां तो बहुत छोटे क़द की है. वहां से ग्यारह बजे लौटे जल्द ही सो गये. यानी एक बजे फ़ैज़भी आ गये. सुल्ताना, सरदार जाफ़री ग्यारहवीं पे हैं मैं और फैश्जश् आठवीं पर. फ़ैज़ पीये जा रहे हैं किसी तरह क़ाबू में नहीं आते.

14 अप्रैल, दोशम्बह
टी.वी. है मगर चलाना नहीं आता…
दोशम्बह बहुत ख़ूबसूरत और माडर्न शहर है. पुराने गांव को ख़तम करके बिल्कुल नया माडर्न शहर बना दिया गया. रोशनी से चिरागां का शुबहा होता है. लोग फ़ारसी, अंग्रेज़ी, उर्दू, रूसी ज़बान में कचर-कचर बोले जा रहे हैं. हमारे मेज़बानों ने हमें समेट लिया है. मेरे कमरे का नं. 4 है. एक साहब मुझे ढूंढ़ते बौखलाये फिर रहे हैं. मैं मिल जाती हूं मुझे कमरे में पहुंचा देते हैं. बहुत ख़ूबसूरत कमरा है. तोतजाकी कालीन बिछे हैं. एक मेज़ रखने के बीच कमरे में इर्द-गिर्द चार कुर्सियां, एक अलमारी और एक टी.वी. है. मगरा चलाना नहीं आता.

यहां लोग फ़ैज़ और राजकपूर के बड़े दीवाने हैं…

दो डेलिगेट्स बहुत पीये हुए आ गये और कोनियाक की बोतल खोल कर सबके जाम भर दिये. सुल्ताना और सरदार तो एक जाम पी कर भाग लिए. फ़ैज़ को वो दाब कर बैठ गये. फ़ैज़ ने मुझे भी उठने ना दिया. और वे दीवाने जाम पर जाम भरते गये. मैंने चुपके से चाय की प्याली में उड़ेलने शुरू कर दिये. फ़ैज़ और वो दोनों पीते रहे. उनमें एक कजाकिस्तान का है. जिसे नेहरू अवॉर्ड मिल चुका है. आठ बार हिन्दुस्तान हो आया है. मगर न अंग्रेज़ी जानता है न तजाकी न उर्दू और न रूसी. बहुत मुश्किल से इशारों से दो-चार अंग्रेज़ी लफ़्ज़ बोल कर काम चला लेता है. बिल्कुल गोरखा लगता है. दूसरा आर्मेनियन है. उसका नाम मोमिन है. और वह भी तीन-चार अंग्रेज़ी के लफ़्ज़ बोल लेता है आठ पेग पी चुका है और फ़ैज़ को प्यार किये जा रहा है. यहां लोग फ़ैज़ और राजकपूर के बड़े दीवाने हैं. मैं तो बूढ़ी होकर भी बड़े ठाठ कर रही हूं.

…इस क़दर धूमधाम थी कि मैंने चार पेग वोदका के और तीन शैम्पेन के पी डाले…सिर्फ़ सीख कबाब सनसिल तक खाये और फिर शैम्पेन चली. कोस्ट चली, खूब स्पीचें हुईं. हां भूल गयी, लंच के बाद तीन बजे मीटिंग हुई और बहुत से भाषण झाड़े गये. डायस पर बैठना पड़ा जहां टी.वी. की रोशनियां भूने डाल रही थीं…

गुज़राल ने कहा कि यहां का जश्न हफ़्ते भर में ख़तम हो जायेगा. उसके बाद मैं सुल्ताना और सरदार, गुज़राल के यहां जाकर ऐश करेंगी. गुज़राल कितनी अच्छी तरह मिलता है. बार-बार आकर पूछता है. ऐसे प्यारे एम्बेसडर कहां होते हैं. मैं यों, बूढ़ी होकर भी बड़े ठाठ कर रही हूं. सब लोग मेरी ख़ातिर करते हैं. यहां पानी कोई नहीं पीता है. सोडा या शराब पीते हैं. बाथरूम के नलके का पानी पीना सख़्त मना है.


मर्द को क्यों नहीं कहते ‘ये फलां का रंडुवा है, इसकी ऐनक और घड़ी तोड़ डालो’

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