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इस्लाम में नेलपॉलिश लगाने और टीवी देखने को हराम क्यों बताया गया?

(ये आर्टिकल ताबिश सिद्दीकी ने लिखा है)


क्रिकेटर इरफ़ान पठान ने अपनी पत्नी के साथ फेसबुक वॉल पर एक फोटो डाली. इसमें उनकी पत्नी ने अपने हाथ से अपना मुंह छिपा रखा था, वैसे वो हिजाब में थीं मगर जिस हाथ से चेहरा छिपाया था उसमें नेलपॉलिश लगी थी. इस बात पर इस्लामी मज़हबी ठेकेदारों ने उन्हें खूब ट्रोल किया और इरफ़ान और उनकी पत्नी को ये समझाने की कोशिश की गई कि इस्लाम में नेलपॉलिश लगाना हराम है.

ये कोई अचम्भे वाली बात नहीं है हम जैसों के लिए, मगर जिन लोगों का आज के इस्लाम और उसमें व्याप्त हराम हलाल की नीतियों से कम वास्ता है वो बहुत चौंक गए हैं इस दलील को सुनकर, वो पूछ रहे हैं कि आखिर क्यों ऐसी छोटी-छोटी चीजें इस्लाम में हराम करार दी गईं हैं.

‘मुहम्मद’ ही उनके लिए सब कुछ थे

इस्लाम जिन लोगों के बीच आया उनमें आध्यात्मिक समझ बहुत कम थी, या यूं कहें नाम मात्र थी. अरब के बद्दू लोग जो क़बीलों में बंजारों की तरह जीवन यापन करते थे उनके लिए बहुत गहरी आध्यात्मिक समझ किसी दूसरे ग्रह की बातें होती थीं. जब उन बद्दू अरबियों ने मुहम्मद साहब को अपना पैगम्बर स्वीकारा तो उनके हर एक क्रिया कलापों का वो अनुसरण करना चाहते थे क्योंकि उनके हिसाब से ‘मुहम्मद’ ही उनके लिए सब कुछ थे.

उदाहरण के लिए जब मुहम्मद साहब अपने ‘नित्य कर्म’ के लिए भी जाते थे तो वहां भी ये उनका पीछा करते थे और देखते थे कि वो किस तरह से नित्यक्रिया को अंजाम देते हैं. कई किताबों में इस बात का ज़िक्र है कि इन बातों को लेकर पैगम्बर कई बार झुंझला भी जाते थे मगर बद्दू लोग होते ही ऐसी समझ के थे.

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बद्दू कबीला

इन अरबी लोगों ने मुहम्मद साहब द्वारा कृत्य हर उस चीज़ को ‘सुन्नत’ माना और स्वयं भी वैसा ही करने की कोशिश की. एक छोटे से उदाहरण से आप इस बात को और आसानी से समझ सकते हैं, आम मुसलमानों में ये राय है कि हर मुसलमान को ‘पेशाब’ बैठकर करना चाहिए क्योंकि मुहम्मद साहब ऐसा करते थे. अगर आप मुसलमान हैं और किसी दूसरे मुसलमान के साथ कहीं खुले में जाएं और खड़े होकर पेशाब करेंगे, तो वो आपको एक बार टोकेगा ज़रूर. यहां तक कि लोग आपस में लड़ पड़ते हैं इस बात को लेकर. और मां-बाप अपने ‘लड़कों’ से बहुत सख्ती से पेश आते हैं अगर उन्हें पता चल जाए कि उनका बेटा खड़े होकर पेशाब करता है. अब ‘मुहम्मद साहब’ के पेशाब करने के बारे में कई ‘हदीसें’ हैं. जिनमें से कई हदीसें बताती हैं कि उन्होंने बैठ कर पेशाब किया और कईं बताती हैं कि उन्होंने खड़े होकर पेशाब किया. (देखिए: हदीस सहीह बुखारी किताब 4 हदीस नंबर 224, 225/सहीह मुस्लिम किताब 2 हदीस नंबर 523)

सख़्त क्यों हैं मौलाना

सवाल ये है कि जब हदीसें स्वयं बताती हैं कि मुहम्मद साहब ने कभी खड़े होकर पेशाब किया और कभी बैठकर तो फिर आम ‘इस्लामिक आलिम और मौलाना’ इस बात को लेकर इतने सख्त क्यों होते हैं कि आम मुसलमान मर्दों को सिर्फ बैठकर ही पेशाब करना चाहिए? इसका जवाब आपको तब ठीक से मिलेगा, जब आप ‘इस्लामिक धर्मशास्त्र’ का इतिहास पढ़ेंगे. आपको पता चलेगा कि दरअसल आम मुसलमान उन बातों को ही फॉलो करता है, जिसे मुहम्मद साहब के सैकड़ों साल के बाद हुए इमामों और खलीफाओं ने प्रचलित किया.

आज का इस्लाम और उनमें व्याप्त धारणाएं हर दौर के आलिमों और मौलानाओं की देन हैं. इनमें से जिसने खड़े होकर पेशाब करने को ग़लत समझ लिया उसे आने वाली नस्लों ने ग़लत मान लिया. बिना ये जाने और समझे कि इस्लाम में खड़े होकर पेशाब करने के मामले में ऐसी कोई सख्ती नहीं है. इस्लामिक आलिम अपना ध्यान हराम और हलाल के मसले हल करने में बहुत लगाते हैं जो कि उसी समस्या से उपजा हुआ मसला है जिसे मुहम्मद साहब के ज़माने के बद्दू अरबी जूझते थे. वो मुहम्मद साहब से हर उस मसले पर सवाल करते थे जिस पर आज हम लोग हंसेंगे मगर चूंकि उनकी समझ ही ऐसी थी इसलिए पैगम्बर उन्हें बहुत शालीनता से कोई न कोई रास्ता बता देते थे जिससे उनकी जिज्ञासा समाप्त हो जाए.

इरफ़ान की पत्नी ने लगाई थी नेलपॉलिश

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इरफ़ान और उनकी पत्नी की इसी फ़ोटो के बाद शुरू हुई थी बहस.

ये इरफ़ान पठान की पत्नी द्वारा नेलपॉलिश लगाना और उसे आम मुसलमानों द्वारा हराम बता देना उसी “अरबी बद्दू” समझ का हिस्सा है. आम धार्मिक मुसलमान उन्ही बद्दुओं जैसी सोच ओढ़ चुका है और वो हर मसले पर अपने इलाके के आलिम और मुफ़्ती से ‘फतवा’ मांगता है. किसी मुसलमान को जब लगा कि मेरी पत्नी जो नेलपॉलिश लगाती है क्या ये इस्लाम के हिसाब से सही है तो उसने अपने आलिम से उसके लिए फतवा मांगा.

आलिम साहब अपनी समझ के हिसाब से किताबें लेकर बैठ गए. खूब सर धुना अपना जवाब पाने के लिए और अंत में वो इस नतीजे पर पहुंचे कि चूंकि नमाज़ से पहले वुज़ू करते समय हाथ का हर एक हिस्सा पानी से भीगना चाहिए और जहां नेलपॉलिश लगी है वो हिस्सा नहीं भीगेगा. इसलिए उन्होंने अपनी समझ से नेलपॉलिश को हराम बता दिया और इस पर फतवा दे दिया.

अब एक मौलाना ने फतवा दिया अपनी समझ से और सारे मुसलमानों ने उसे अपने लिए एक “इस्लामिक” नियम जैसा स्वीकार कर लिया. इस बात का न तो मुहम्मद साहब से कोई ताल्लुक़ है और न कुरान से. ये पूरी तरह से “मौलानाओं” द्वारा बताया गया ‘हराम और हलाल’ वाला इस्लाम है. जो किसी मौलाना की अपनी निजी समझ का हिस्सा है. ऐसे ही हम लोगों के बचपन में फतवा आया था कि टीवी देखना हराम है क्योंकि एक मौलाना ने जब इस पर अपना सर धुनकर ये समझा कि चूंकि इस्लाम में तस्वीरें रखना सही नहीं है और टीवी में चलती फिरती तस्वीरें होती हैं इसलिए उसने इसे हराम होने का फतवा दे दिया.

मगर बाद में जब मौलाना साहब को ख़ुद टीवी पर आने की ज़रूरत महसूस हुई तो फिर धीरे-धीरे चुपके-चुपके उस फतवे को किनारे कर दिया गया और अब मौलाना साहब ख़ुद टीवी पर आते हैं. मगर अब भी बहुत से ग्रामीण इलाक़े ऐसे हैं जहां बुज़ुर्ग लोग उस फतवे को दिल से लगाए बैठे हैं और टीवी देखना हराम समझते हैं. हम लोगों ने भी बचपन में अपने घर में बहुत मार खाई है टीवी देखने को लेकर. अब वही टीवी हर घर में चल रही है और अब वो हलाल हो चुकी है.

कब तक फंसे रहोगे मियां

तो मुसलमान जब तक इस “बद्दू अरबी” वाली समझ से बाहर नहीं निकलेगा वो तब तक ऐसे ही हराम और लाल के चक्कर में फंसा रहेगा. जब तक वो दैनिक जीवन की एक एक चीज़ में धर्म ढूंढता रहेगा तब तक मौलाना अपने दिमाग और अपनी समझ से ऐसे-ऐसे फतवे देकर उनके जीवन को कण्ट्रोल करने की कोशिश करते रहेंगे. ये किस तरह की समझ है कि नेलपॉलिश लगाना हराम है या हलाल. इस तरह की छोटी-छोटी बातों के लिए हमें मौलानाओं से राय की ज़रूरत क्यों पड़ती है. अगर आप किसी मौलाना से पूछेंगे तो वो तो उसमें अपना दिमाग चलाकर आपको ऐसे ही “रिजल्ट वाले” फतवे देगा और आपकी आने वाली नस्लें पूरी उम्र इसी बात को लेकर आपस में लडती रहेंगी कि फ़लाने की बेटी या बहू नेलपॉलिश या लिपस्टिक लगा रही है तो क्या वो इस्लाम के हिसाब से सही कर रही है या नहीं.

अगर इनमें से कोई पागलपन की हद तक कट्टर निकल गया और उसे आपका ये ‘ग़ैर इस्लामिक’ कृत्य सही नहीं लगा तो वो आपके साथ कुछ भी कर बैठेगा. यही हो रहा है आज हर इस्लामिक देश में. हर दूसरे मुसलमान का “इस्लाम” एक दूसरे से अलग मिलेगा आपको. उसी वजह से ये आपस में ही एक दूसरे को मारते मिलेंगे और उसकी वजह यही उलूल जुलूल फतवे और स्थानीय आलिम और मौलानाओं की समझ होती है.


20196805_10213145238562576_712062070_nताबिश एक लिबरल मुसलमान हैं. अपनी लॉजिकल सोच की वजह से फेसबुक पर फेमस हैं. इसी वजह से आसपास के कट्टर धार्मिक विचारधारा वाले लोगों के निशाने पर रहते हैं. ताबिश का मानना है कि सबसे पहले खुद के घर से शुरुआत करनी चाहिए. इसीलिए अपने ही मज़हब की कुरीतियों पर खुलकर लिखते हैं. फेसबुक पर फॉलोअर्स और विरोधक समान मात्रा में हैं इनके. अक्सर दोनों तरफ के कट्टरपंथियों के निशाने पर रहते हैं.


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