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इशांत शर्मा, जिसने एक घंटे पोंटिंग को नचाकर रखा

रिकी पोंटिंग. क्रिकेट के इतिहास में दुनिया के सबसे अच्छे बल्लेबाजों की लिस्ट बने, तो उसमें पहले पांच नामों में जिसका नाम शामिल होगा. पोंटिंग बैटिंग कर रहे थे. अपने घर ऑस्ट्रेलिया में. इंडिया वर्सेज़ ऑस्ट्रेलिया. साल 2008 शुरू हुए बस आधा महीना ही शुरू हुआ था. वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया की उछाल भरी पिच. सीरीज़ का तीसरा टेस्ट. ऑस्ट्रेलिया पिछले दो जीत चुका था.

ऑस्ट्रेलिया की दूसरी इनिंग्स चल रही थी. रिकी पोंटिंग क्रीज़ पर थे. लेकिन उतने आराम में नहीं दिख रहे थे जितने में वो ज़्यादातर बैटिंग कर रहे होते हैं. ये पर्थ की उछाल का असर नहीं था. वजह था इंडिया का एक बॉलर. पोंटिंग कभी भी इस हद तक असहज नहीं दिखे थे. वो भी ऑस्ट्रेलिया में. टेस्ट क्रिकेट में उस वक़्त का सबसे अच्छा बल्लेबाज एक 19 साल के लड़के को खेलने में दिक्कतों का सामना कर रहा था. ऐसा होना एक आश्चर्य था.

इशांत ने एक गेंद पोंटिंग के पैरों पर दे मारी. अपील में सभी खड़े हो गए. लेकिन पोंटिंग बच निकले. अम्पायर को बॉल की हाइट पर शक था. साथ खेल रहे माइकल हसी का एक एज भी स्लिप के आगे ही गिर पड़ा था.

खैर, नया दिन आ चुका था. सोचा जा रहा था कि पोंटिंग उबर जायेंगे. लेकिन नहीं. परफ़ेक्ट लेंथ पर गिरी एक गेंद, अन्दर की ओर आती रही. पड़ने के बाद सीधी हो गयी. पोंटिंग डिफेंड करने के मकसद से बल्ले का मुंह खोल खड़े हो गए. लेकिन गेंद बल्ले का किनारा एक बाल की मोटाई जितने अंतर से छोड़कर सीधे धोनी के दस्तानों में धप्प से जाकर बैठ गयी. पोंटिंग की आंखें खुल गयीं.

सालों से चली आ रही बादशाहत का ख़ुमार हिरन हो गया.

इनिंग्स का चौंतीसवां ओवर. लगने लगा था कि पोंटिंग बुरे वक़्त को झेल चुके हैं. क्यूंकि बॉलर कितना भी अच्छा फेंक रहा हो, हमेशा के लिए नहीं फेंकता रह सकता है. कप्तान कुम्बले ने ओवर फेंकने के लिए आरपी सिंह को बुलाया. स्लिप में जाने को तैयार खड़े वीरेंद्र सहवाग दौड़ कर उनके पास पहुंचे और बॉलर से एक ओवर और फिंकवाने को कहा. सहवाग उसका खेल समझते थे. सहवाग दिल्ली रणजी टीम में उसके कप्तान रह चुके थे. कुम्बले बमुश्किल राज़ी हुए. एक ओवर और मिला. पहली गेंद. लम्बे कद का बॉलर, लम्बी टांगों को हवा में फेंकता हुआ दौड़ पड़ा. पॉपिंग क्रीज़ पर हाई आर्म ऐक्शन के साथ ऑफ़ स्टम्प की लाइन में फेंकी गेंद. पोंटिंग तक पहुंचते-पहुंचते उठने लगी थी. लेकिन साथ ही पोंटिंग को छोड़ती हुई भी जा रही थी. पोंटिंग कमिट हो चुके थे. गेंद उनके बल्ले के किनारे लगी और स्लिप की ओर चल पड़ी. द्रविड़ के हाथ खुले और पोंटिंग का खाता बंद हुआ. जश्न शुरू हो चुका था.

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किस्मत की वजह से आया था टीम में

इशांत शर्मा. जिसकी गेंदों की बदौलत उस एक घंटे के खेल ने पोंटिंग को तबाह कर दिया था. 19 साल का लड़का टीम में इसीलिए पहुंचा था क्यूंकि श्रीसंत और मुनाफ़ पटेल को चोट लगी हुई थी. उसे सिडनी टेस्ट में इसीलिए खिलाया गया था क्यूंकि ज़हीर को वापस जाना पड़ा था. इशांत ने इस वक़्त तक मुट्ठी भर मैच खेले हुए थे. लेकिन जितने भी खेले, सभी में वो बेहतर होते जा रहे थे. सिडनी में भले ही उन्हें कोई भी विकेट नहीं मिला था, लेकिन उनकी गेंदबाजी में धार दिख रही थी. इस एक घंटे ने पोंटिंग के ग्राफ़ को गिराया. इंडिया के ख़िलाफ़ हमेशा बड़ा स्कोर करने वाले पोंटिंग के बारे में अब विश्वास होने लगा था कि उनका किला भी भेदा जा सकता था. स्टीव वॉ कुछ ही दिन बाद ये कहते मिले कि इशांत शर्मा इंडिया के लिए होने वाली बेहतरीन चीज़ों में से एक हैं.

इशांत ने वो चीज खो दी, जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी

6 फ़ुट 4 इंची चेसिस लिए इशांत लगातार लय में 140 के एटे-पेटे गेंद फेंकते रहते थे. गेंद दोनों तरफ़ घूमती थीं. अन्दर भी बाहर भी. ऑस्ट्रेलिया में 2008 की टेस्ट सीरीज़ के बाद वन डे सीरीज़ में अच्छी बॉलिंग की. एक बार 150 किलोमीटर प्रति घंटा की स्पीड भी छुई. 2008 में ऑस्ट्रेलिया टूर के बाद श्री लंका में अच्छा परफॉर्म कर के अपनी जगह पक्की कर ली. इशांत अब ज़हीर खान के साथी बन चुके थे. और ठीक उसी समय में आईपीएल में वो गच्चा खाते दिखे. फ़्लैट पिचों पर वो मुंह की खा रहे थे. कुछ लोग कहते थे कि उनसे इतनी ज़्यादा बॉलिंग करवाई जा रही है कि वो चुक गए हैं. जबकि कुछ का कहना था कि शुरुआती चमक निकलने के बाद असल अब यही है. और इसी चक्कर में इशांत ने वो खोया, जिसके लिये वो जाने जाते थे. जिसकी इंडिया को ज़रूरत भी थी. उनकी स्पीड. उनकी पेस ही वो चीज थी जो लेंथ के साथ मिलकर पोंटिंग को परेशान कर पायी थी. ऐसे में इशांत का खुद का कॉन्फिडेंस भी गिरता दिखा. सब कुछ उनके गेम में रिफ्लेक्ट हो रहा था.

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उनका स्ट्रगल चल रहा था लेकिन चूंकि इंडिया को पेस बॉलर्स की कमी हमेशा सालती रही है, सेलेक्टर्स उनके पास पहुंचते रहे. वो टीम में मौजूद रहे. महीनों एड़ी की सर्जरी की वजह से बाहर रहने के बावजूद. इतनी कामयाबी के बाद अब वो समय आ गया था कि 50 टेस्ट खेलने वाले टेस्ट बॉलर्स की लिस्ट में उनका बेहद खराब ऐवरेज था.

इशांत की वापसी

अच्छी बात ये कि फिर उन्होंने खुद को संभाला. अपने आप को वापस लाये. दो बार पांच-विकेट लेकर न्यू ज़ीलैंड में अच्छी गेंदें फेंकी. टूर में कुल 15 विकेट लिए. और अगले ही टूर पे इंग्लैंड के खिलाफ़ लॉर्ड्स में इंडिया की जीत के सबसे बड़े हीरो बने. 74 रन पर 7 विकेट. बोर्ड पर लिखा हुआ था. इंडिया 1-0 से लीड ले चुकी थी. टेस्ट क्रिकेट में उनकी सबसे बेहतरीन परफॉरमेंस में से एक.

इशांत का बिखरना

इस सब के बीच इशांत इमोशनली बिखरने लगे. मैचों में उनकी बहसबाजी बढ़ने लगी. साथ ही उनके टेम्पर पर भी सवाल उठे. संजय मांजरेकर ने कहा कि एक विकेट मिलने पर ऐसा लगता है जैसे सारी दुनिया का भार उनके ऊपर आ गया और उसी वक्त वो इमोशनली बेहद कमज़ोर हो जाते हैं. उस वक़्त वो चीखते हैं, चिल्लाते हैं. संजय मांजरेकर ने कहा था कि ये एक आश्चर्य है कि श्री लंका के टूर पर उन्हें किसी प्लेयर ने पीट नहीं दिया. वहां उनकी 65% मैच फ़ीस काट ली गयी थी.

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विकेट से बाहर बॉलिंग क्यों

हालिया दिनों में इशांत अब बाहर फेंकने लगे हैं. ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्यूंकि टेस्ट में उनके साथ मोहम्मद शमी बॉलिंग कर रहे होते थे. शमी बैट्समैन को खिलाने में विश्वास रखते हैं. इस लिहाज़ से उनका विकेटों के बाहर बनता भी था. वर्ल्ड कप 2015 के कुछ वक़्त पहले वो इंजर्ड हुए. उनकी जगह मोहित शर्मा को लाया गया. उनका लैंडिंग फुट एक प्रॉब्लम था.

आज इशांत कहते हैं कि अगर कंडीशंस ख़राब हैं तो आपको दुगनी मेहनत करनी पड़ेगी. और शायद इंडियन क्रिकेट के लिए इससे अच्छी और सुकून देने वाली बात नहीं हो सकती कि ये बात इशांत को समझ आ गयी है. साथ ही वो ये भी कहते हैं कि आप खुद को बैक कीजिये और हर गेंद में अपना सब कुछ निचोड़ कर डाल दीजिये.

इशांत अच्छे थे. अब हैं या नही हैं? आगे खेलेंगे, नहीं खेलेंगे? ये सभी बातें चलती आई हैं, चलती रहेंगी. लेकिन पर्थ की ज़मीन पर एक घंटे के उस स्पेल में फेंकी गयी गेंदें इशांत शर्मा की पहचान बन चुकी हैं, हमेशा बनी रहेंगी. लम्बी टांगों के साथ दौड़ती वो लम्बे बालों से लदी सूखी काया मज़ा ज़रूर देती थी.


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