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99.5 प्रतिशत अंक पाने वाली टॉपर के पेस्ट्री शेफ बनने में बुरा क्या है?

समीक्षा एस कुमार. ISC Examination में 12वीं में टॉप करने वाली छात्रा हैं. हैरतअंगेज 99.5 फीसदी अंकों के साथ. समीक्षा दिल्ली पब्लिक स्कूल न्यू टाउन की स्टूडेंट हैं. परीक्षा में टॉप करने के बाद उनसे सवाल किए जाने लगे कि वे आगे क्या बनना चाहती हैं. इस पर समीक्षा ने कहा कि वे पेस्ट्री शेफ बनना चाहती हैं. उन्होंने हॉस्पिटैलिटी कोर्स चुना है. समीक्षा का कहना है कि अंक नहीं, बल्कि योग्यता और जुनून के अनुसार करियर का फैसला करना चाहिए. एक वेबिनार में हॉस्पिटैलिटी पर उन्होंने कहा,

जब मेरा रिजल्ट आया तो बहुत लोगों ने हॉस्पिटैलिटी चुनने के फैसले पर संदेह किया. लेकिन मेरे करियर के चुनाव का मेरे अंकों से कोई लेना-देना नहीं है. क्योंकि मैं लंबे समय से यही करना चाहती थी. अंकों का प्रतिशत आपके जुनून को निर्धारित नहीं करेगा. यदि आप दूसरों के लिए कुछ करना चाहते हैं तो तो हॉस्पिटैलिटी निश्चित रूप से आपके लिए है. मुझे लगता है कि मैंने सही फैसला लिया है. पेस्ट्री मेरा पैशन है. मैं सातवीं क्लास से थोड़ा-थोड़ा इसकी प्रैक्टिस कर रही हूं. ये लर्निंग एक्सपीरियंस है. जब मैं केक बनाती हूं तो मुझे खुशी होती है.

लेकिन टॉपर होने के बावजूद समीक्षा एस कुमार का ये फैसला कुछ लोगों को रास नहीं आया. वे सवाल उठा रहे हैं, तरह-तरह की बातें कर रहे हैं. समीक्षा के मामले के बहाने हम ये समझने की कोशिश करते हैं कि करियर को लेकर बच्चों पर किस तरह के मानसिक दबाव बनाए जाते हैं. और इसका असर क्या होता है. किसी टॉपर का या किसी भी छात्र का अपनी मर्जी से पसंद का करियर चुनने में क्या बुराई है.

‘कई साल पढ़ना बच्चों को रास नहीं आ रहा’

हमने बात की दिल्ली के सर्वोदय कन्या स्कूल, दल्लूपुरा की प्रिंसिपल डॉ. राजेश्वरी कापड़ी से, जिन्होंने दिल्ली को पहला मॉडल स्कूल दिया है. उनके स्कूल में 3900 स्टूडेंट्स पढ़ते हैं. राजेश्वरी कापड़ी का कहना है कि 99.5 प्रतिशत वाले टॉपर बच्चे के पेस्ट्री शेफ बनने के इरादे ने सारी पुरानी भ्रांतियों को तोड़ दिया है. हमारे सामने प्रश्न खड़े कर दिए हैं कि टॉपर बच्चा पेस्ट्री शेफ क्यों बनना चाहता है? उन्होंने कहा,

मेरा मानना है कि आजकल बच्चों के जो रोल मॉडल होते हैं वो सेलिब्रिटी होते हैं. आज के बच्चे पढ़ाई के साथ कमाई करना चाहते हैं. उन्हें शॉर्टकट में सक्सेस चाहिए. उनको 10 साल पढ़के मेडिकल में जाना, 8 साल पढ़के इंजीनियर बनना, कई साल पढ़के टीचिंग में जाना रास नहीं आ रहा. बच्चों को आइडेंटिटी क्राइसेस भी हो गई है. उनको लगता है कि हम जल्दी से काम करें. जल्दी से कमाई करें. जल्दी से नाम भी करें.

लॉकडाउन की वजह से अप्रैल-मई में होने वाली NEET-JEE की परीक्षा को आगे बढ़ा दिया गया था. (प्रतीकात्मक तस्वीर- PTI)
प्रतीकात्मक तस्वीर- PTI)

डॉ. राजेश्वरी कापड़ी  का कहना है कि बच्चे पहचान बनाना चाहते हैं. पेस्ट्री शेफ बनने या अन्य इस तरह के कोर्स करने के लिए जाना चाहते हैं. उनके हिसाब से ये बहुत गैरपारंपरिक है. पहले बच्चे डॉक्टर और इंजीनियर बना करते थे. राजेश्वरी का ये भी लगता है कि इसमें बच्चों पर कोई दबाव नहीं है. उनकी स्वतंत्र सोच विकसित हुई है. कोरोना के टाइम में बच्चों का माइंडसेट बन गया है जिसमें बच्चे अपना व्यवसाय करना चाहते हैं. लोगों को रोजगार देना चाहते हैं. उन्होंने हमसे कहा,

पुराने बच्चों की तरह अब के बच्चों पर पैरेंट्स का प्रेशर नहीं रहा. मेरे स्कूल में एक बच्ची है जो 9वीं में है, लेकिन अपना चैनल चला रही है. ऐसे कई सारे बच्चे हैं जो अपना काम कर रहे हैं. ये नई बात नहीं रही कि टॉपर बच्चे ने पेस्ट्री शेफ बनना सोचा है. एक प्रिंसिपल और टीचर होने के नाते मैं इसका स्वागत करती हूं. बच्चों की नई सोच के लिए हमें उनका सहयोग करना चाहिए, ताकि उनकी जो उड़ान है वो सक्सेसफुल हो सके. पैरेंट्स का भी कोई प्रेशर नहीं होना चाहिए. उल्टे हमें सपोर्ट सिस्टम बनकर बच्चों की मदद करनी चाहिए.

‘सिंगल गोल पर खुद का मूल्यांकन करते हैं बच्चे’

करियर चुनते समय बच्चों पर किस तरह का मानसिक दबाव रहता है. ये समझने के लिए हमने बात की साइकायट्रिस्ट डॉक्टर प्रवीण त्रिपाठी से. उनका कहना है,

स्कूल के बच्चे हों या कॉलेज के. इस एज में सबसे बड़ा इश्यू ये हो जाता है कि आपको जब जज किया जाता है, या अपने आप के बारे में जो खुद की सेल्फ इमेज बनती है वो बहुत-छोटी-छोटी चीजों पर डिपेंट होती है. मान लीजिए कि एक अडल्ट है, जो चार-पांच चीजों को लेकर अपने को नापता है या खुद को वैल्युएट करता है. लेकिन बच्चे सिंगल गोल पर खुद को वैल्युएट करने लगते हैं. जज करने लगते हैं. अगर वे उस चीज में उतना सक्सेस नहीं हो पाते हैं या जो खुद को लेकर सोचते लगते हैं कि वो सफल नहीं हैं, तो उनके लिए दिक्कत हो जाती है. एक सिंगल पैरामीटर के पर खुद को वैल्युएट करने से चांसेस बढ़ जाते हैं कि एक छोटे से सेटबैक को भी बड़ा देखा जाए. कई बार देखते हैं कि सुसाइड हो जाते हैं, वो इसी का डायरेक्ट असर होता है.

फाइल फोटो.
फाइल फोटो.

‘अपना सपना बच्चों पर ना थोपें’

कोटा के मनस हॉस्पिटल के डॉक्टर अखिल अग्रवाल जो कि मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल हैं, उनका का कहना है कि क्या बना जाए से ज्यादा जरूरी है कैसा बना जाए. बहुत बार जब बच्चा पढ़ाई में अच्छा होता है या टॉपर होता है तो बच्चे के पैरंट्स उनके जरिए अपने सपने पूरा करने की कोशिश करते हैं. डॉ. अग्रवाल ने बताया,

ऐसा ही एक केस हमारे सामने आया था. 6 साल की लड़की ने नहाना-धोना छोड़ दिया था. नए कपड़े पहनने छोड़ दिए. क्योंकि उसकी मां चाहती थी कि वो मॉडल बने. और इसलिए वो बच्ची को टोकती रहती थी. हमें बेवजह बच्चों के ऊपर प्रेशर नहीं डालना चाहिए. बच्चे मिट्टी की तरह होते हैं. उनकी क्वालिटी की तरह उन्हें शेप देना चाहिए. हम बच्चों को गाइड कर सकते हैं, उन्हें समझा सकते हैं लेकिन प्रेशर ना दें. बच्चों को सपने देखने दें. अपना सपना उन पर ना थोपें.

डॉ. अखिल अग्रवाल जोर देते हुए कहते हैं कि बच्चों को वो करने दें जो वो करना चाहते हैं. ऐसा नहीं होने पर वो डिप्रेशन, एंग्जाइटी, पर्सनैलिटी डिसऑर्डर का शिकार हो सकते हैं. किसी एडिक्शन का शिकार हो सकते हैं. एंटी सोशल पर्सनैलिटी बन सकते हैं. गलत राह पर जा सकते हैं. उनका भविष्य बर्बाद हो सकता है.


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