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इज़रायल-फिलिस्तीन लड़ाई रुकने में कौन अटका रहा रोड़े?

इज़रायल और फिलिस्तीन के बीच पिछले 11 दिनों से जंग चल रही है. इसमें अब तक कम-से-कम 230 फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं. इन मृतकों में 64 बच्चे और 38 महिलाएं शामिल हैं. रॉकेट फ़ायरिंग में इज़रायल के 12 लोग मारे गए. इतनी मौतों के बाद जाकर अब इस जंग में संघर्षविराम की उम्मीद बन रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, किसी भी वक़्त सीज़फायर का ऐलान हो सकता है. संघर्षविराम कराने की इस मुहिम में किन देशों की भूमिका है? विस्तार से बताते हैं.

10 मई को इज़रायली फोर्सेज़ ने अल-अक्सा मस्ज़िद परिसर में घुसकर कार्रवाई की. इसके बाद हमास ने इज़रायल के लिए अल्टीमेटम ज़ारी किया. शाम होते-होते हमास ने इज़रायली शहरों पर रॉकेट दागने शुरू किए. जवाब में इज़रायल ने गाज़ा पर हवाई बमबारी शुरू कर दी. इसके बाद से स्थितियां बदतर होती गईं.

लड़ाई शुरू होने से पहले कौन सुलह करवा रहा था?

मगर ये सब शुरू होता, उससे पहले ही एक देश दोनों पक्षों को शांत करवाने में जुट गया था. ये देश था- इज़िप्ट. वो हमास और इज़रायल में समझौता करवाने की लगातार कोशिश कर रहा है. सवाल है कि इज़िप्ट मध्यस्थता करने की स्थिति में कैसे आया?

इज़िप्ट के साथ एक बड़ी अनोखी बात है. उसका हमास और इज़रायल, दोनों से रिश्ता है. इज़रायल से इसलिए कि 1979 में इज़िप्ट ने पूरे अरब ब्लॉक के खिलाफ़ जाकर इज़रायल से शांति समझौता किया था. उसका हमास से भी संबंध है. इसकी वजह है भूगोल. हमास का गढ़ है गाज़ा. गाज़ा पर तीन ओर से इज़रायल की बैरिकेडिंग है. इसकी चौथी दिशा में पड़ता है इज़िप्ट. यानी, ये गाज़ा और हमास के लिए बाहरी दुनिया तक पहुंचने का इकलौता रूट है. इसीलिए हमास को इज़िप्ट की ज़रूरत पड़ती है. वो इज़िप्ट से बनाकर रखता है.

अब फिर लौटते हैं इज़रायल-फिलिस्तीन की मौजूदा हिंसा पर

इस बारे में इज़िप्ट की ओर से पहला बड़ा बयान आया 11 मई को. यानी, हिंसा शुरू होने के कुछ ही घंटे बाद. क्या बताया इज़िप्ट ने? इज़िप्ट का बयान आया था एक अहम बैठक के संदर्भ में. 11 मई को इस मुद्दे पर अरब लीग ने एक इमरजेंसी बैठक बुलाई थी.

इसमें इज़िप्ट की ओर से शामिल हुए उसके विदेश मंत्री सामेह शोक्रे. उन्होंने सदस्य देशों को बताया कि इज़िप्ट ने इस मसले पर इज़रायल से संपर्क किया. उसने इज़रायल और हमास, दोनों से मामला शांत करने की अपील की. मगर इज़रायल ने इस अपील का जवाब नहीं दिया. इज़िप्ट ने ये भी बताया कि उसने इस मसले पर अंतरराष्ट्रीय पक्षों से भी बात की. कहा कि वो बातचीत के ज़रिये संघर्ष भड़कने से रोकें. मगर इस अपील का भी कोई नतीजा नहीं हुआ.

इसके बाद ख़बर आई कि इज़िप्ट का एक प्रतिनिधिमंडल गाज़ा पट्टी पहुंचा है. यहां उसकी हमास लीडरशिप के साथ बात हुई. मुद्दा था, हमास को संघर्षविराम के लिए राज़ी करना. इससे बात करने के बाद डेलिगेशन पहुंचा इज़रायल. ख़बरों के मुताबिक, हमास कुछ शर्तों के साथ सीज़फायर के लिए तैयार था. मगर इज़रायल राज़ी नहीं हुआ. नतीजतन ये संघर्ष चलता रहा.

क्या ये पहली बार था जब इज़िप्ट ने दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता करने की कोशिश की हो?

नहीं. इज़िप्ट दशकों से ये भूमिका निभा रहा है. इज़िप्ट की इस भूमिका से जुड़ा एक चर्चित प्रसंग बताते हैं. ये बात है 25 जून, 2006 की. इतवार की सुबह थी. गाज़ा पट्टी के दक्षिणी छोर पर इज़रायल वाले भूभाग में सैनिक ड्यूटी पर तैनात थे. सुबह के धुंधलके में एकाएक आठ फिलिस्तीनी लड़ाके इज़रायली पोस्ट के पास प्रकट हुए.

ये लड़ाके एक सीक्रेट सुरंग के सहारे इज़रायली पोस्ट में दाखिल हुए थे. इन्होंने वहां तैनात एक टैंक पर अटैक किया. टैंक में ड्यूटी कर रहे दो इज़रायली सैनिक जख़्मी हो गए. इन दो में से एक घायल सैनिक किसी तरह बच निकला. मगर दूसरे जख़्मी सैनिक को फिलिस्तीनी लड़ाके किडनैप करके अपने साथ ले गए.

जिस सैनिक को किडनैप किया गया था, उसका नाम था- गिलाद शालित. उम्र, 19 साल. शालित को किडनैप किया था हमास ने. उसी बरस, यानी 2006 में हमास ने फिलिस्तीनी चुनाव जीता था. उसके प्रधानमंत्री थे, हमास लीडर इस्माइल हानिया. इस्माइल ने इज़िप्ट के मार्फ़त इज़रायली लीडरशिप को ख़बर पहुंचवाई. कहा, अगर इज़रायल अपने सैनिक को रिहा करवाना चाहता है, तो उसे कुछ शर्तें माननी होंगी.

Gilad Shalit
गिलाद शालित को हमास के लोगों ने किडनैप कर लिया था. (तस्वीर: एएफपी)

हमास ने कैसी शर्त रखी थी?

शर्त ये कि इज़रायल ने जितने भी फिलिस्तीनियों को गिरफ़्तार किया हुआ है, उनमें से औरतों और नाबालिगों को रिहा कर दे. इज़रायल ने शर्त मानने से इनकार कर दिया. कहा, हम कोई वार्ता, कोई बारगेनिंग नहीं करेंगे. इसके बाद गिलाद का केस इज़रायल का नैशनल ट्रॉमा बन गया. जनता चाहती थी कि इज़रायली सरकार किसी भी क़ीमत पर शालित को रिहा करवाए.

इज़रायल ने हमास पर प्रेशर बनाने के लिए सैन्य कार्रवाई की. इज़रायल को ये मालूम ही नहीं चल पा रहा था कि हमास ने गिलाद को कहां छुपाकर रखा है. नतीजतन मिलिटरी ऑपरेशन के सहारे गिलाद को छुड़वाने की कोशिशें नाकाम रहीं. ऐसे में पब्लिक प्रेशर के चलते इज़रायल को हमास से वार्ता करनी पड़ी. ये बातचीत करीब पांच साल तक चली. लंबी ना-नुकुर के बाद अक्टूबर 2011 में जाकर समझौता हुआ. इसके तहत इज़रायल ने गिलाद की रिहाई के लिए 1,000 से ज़्यादा फिलिस्तीनी क़ैदियों को रिहा किया. ये चर्चित प्रिज़नर स्वैप इज़िप्ट ने ही करवाया था. उसी की मध्यस्थता के चलते क़ैदियों की ये अदला-बदली मुमकिन हो पाई थी.

इस प्रकरण से आपको पता चल गया होगा कि इज़रायल और हमास के विवाद सुलझाने में इज़िप्ट कितनी बड़ी भूमिका निभाता आया है. बल्कि ये समझिए कि इज़रायल-फिलिस्तीन विवाद में सबसे प्रभावी भूमिका इज़िप्ट ही निभाता रहा है.

Ismail Haniyeh
2006 में फ़िलिस्तीन के प्रधानमंत्री थे, हमास लीडर इस्माइल हानिया. (तस्वीर: एएफपी)

अमेरिका क्या कर रहा?

अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति हैं जो बाइडन. अमेरिका के किसी भी राष्ट्रपति की विदेश नीति में मिडिल-ईस्ट बड़ा प्रमुख होता है. इसमें इज़रायल-फिलिस्तीन का मुद्दा भी शामिल है. बाइ़डन से पहले राष्ट्रपति थे डॉनल्ड ट्रंप. वो नेतन्याहू की आक्रामक पॉलिसी के सपोर्टर थे. मगर ट्रंप से पहले राष्ट्रपति रहे बराक ओबामा का इस मुद्दे पर नेतन्याहू से मतभेद था. इसकी एक बड़ी वजह फिलिस्तीनी भूभाग में बसाए गए अवैध इज़रायली सेटलमेंट्स भी थे. नेतन्याहू इन इज़रायली सेटलमेंट्स की संख्या बढ़ाते जा रहे थे. ये अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन था. नेतन्याहू की पॉलिसी फिलिस्तीन विवाद के निपटारे में भी बाधा थी. ऐसे में ओबामा काफी नाराज़ थे नेतन्याहू से. उनके दौर में इज़रायल और अमेरिका के बीच काफी तल्ख़ियां आ गई थीं.

Jo Biden
मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन. (तस्वीर: एपी)

उस वक़्त अमेरिका के उपराष्ट्रपति थे बाइडन. ओबामा ने नेतन्याहू को समझाने का जिम्मा बाइडन को सौंपा. क्यों? क्योंकि बाइडन और नेतन्याहू के बीच काफी दोस्ताना रिश्ता रहा है. बाइडन पब्लिक मंच पर भी नेतन्याहू को ‘बीबी’ कहकर संबोधित करते हैं. बीबी, नेतन्याहू का चर्चित निकनेम है. बाइडन और नेतन्याहू की दोस्ती करीब चार दशक पुरानी है. इस संदर्भ में 2014 में की गई बाइडन की एक टिप्पणी बड़ी चर्चित है. बाइडन ने कहा था-

30 साल से ज़्यादा वक़्त से वो मेरा दोस्त है. मैं उससे कहता हूं कि बीबी, देखो. मैं भले तुम्हारी किसी बात से सहमत न होऊं, मगर आई लव यू.

मगर इस दोस्ती, इस पुरानी पहचान के बावजूद ओबामा कार्यकाल में उपराष्ट्रपति रहे बाइडन ओबामा और नेतन्याहू की तल्ख़ियां नहीं मिटा सके. अब समय अलग है. बाइडन ख़ुद राष्ट्रपति हैं. कार्यकाल संभालने से पहले ही बाइडन ने कहा था. कि मिडिल-ईस्ट में स्थिरता लाना उनकी विदेश नीति की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक है. बाइडन ने ये संकेत भी दिया था कि वो इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की आक्रामक पॉलिसी को काउंटर करेंगे. ऐसे में जब इज़रायल और हमास के बीच हिंसा का ताज़ा राउंड शुरू हुआ, तो दुनिया की नज़रें वाइट हाउस पर टिकी थीं.

Barack Obama
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा. (तस्वीर: एपी)

क्या किया बाइडन प्रशासन ने?

उसने इज़रायल को पूरा सपोर्ट दिया. कहा कि इज़रायल को आत्मरक्षा का पूरा अधिकार है. अमेरिका उसकी कार्रवाई का समर्थन करता है. जब पत्रकारों ने ध्यान दिलाया कि संघर्ष में फिलिस्तीनी पक्ष को जान-माल का ज़्यादा नुकसान हो रहा, तब भी अमेरिका ने इज़रायल का पक्ष लिया. कहा कि हमास और इज़रायल के हमले में फ़र्क है. हमास ने शुरुआत की और इज़रायल ने जवाबी हमला किया.

यहां एक बड़ा सवाल था. अमेरिका समेत कई देश हमास को आतंकवादी संगठन मानते हैं. इसके पीछे एक बड़ी वजह है, हमास द्वारा इज़रायली सिविलियन्स को टारगेट करना. लेकिन क्या इज़रायल आम आबादी को टारगेट नहीं करता? ये सच है कि मौजूदा हिंसा हमास ने शुरू की. जवाब में इज़रायल ने बमबारी शुरू की. उसने कहा कि वो हमास के सैन्य ढांचे, उससे जुड़ी स्ट्रैटजिक लोकेशन्स और लीडरशिप को टारगेट कर रहा है. लेकिन तमाम मीडिया रिपोर्ट्स साक्ष्य हैं कि इज़रायल फिलिस्तीन की आम आबादी और निर्दोष सिविलियन्स पर भी बम गिरा रहा है. अंतरराष्ट्रीय बिरादरी और मानवाधिकार संगठन इसकी आलोचना करते हैं. मगर बाइडन प्रशासन ने इस मसले पर बहुत ठोस प्रतिक्रिया नहीं दी.

तो क्या बाइडन ने बीच-बचाव की बिल्कुल कोशिश नहीं की?

की. मगर उनकी रणनीति पर्दे के पीछे बात करने पर केंद्रित थी. वो सार्वजनिक तौर पर इज़रायल को काउंटर नहीं करना चाहते थे. वो पब्लिकली इज़रायल को सपोर्ट देते. और ऑफ-द-सीन निजी तौर पर नेतन्याहू को फ़ोन करके उनसे समझौता करने को कहते.

जानकारों के मुताबिक, बाइडन को लग रहा था कि अगर सार्वजनिक तौर पर नेतन्याहू के ऊपर प्रेशर बनाया जाए, तो शायद बात बिगड़ सकती है. शायद नेतन्याहू पब्लिक में घेरे जाने पर और आक्रामक हो जाएं. वो इज़रायली जनता को ये नहीं दिखाना चाहेंगे कि वो किसी दबाव में आकर झुके. क्योंकि नेतन्याहू की पॉलिटिक्स आक्रामकता और समझौता न करने की ज़िद पर टिकी है.

Benjamin Netanyahu
इज़रायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू. (तस्वीर: एपी)

क्या बाइडन की रणनीति असरदार रही?

जवाब है, नहीं. रपटों के मुताबिक, इस संघर्ष के दौरान बाइडन ने चार बार नेतन्याहू को फ़ोन किया. बार-बार कहा कि नेतन्याहू संघर्ष रोकने पर राज़ी हों. मगर इसके बावजूद नेतन्याहू पब्लिकली ये कहते रहे कि इज़रायल फिलहाल सीज़फायर नहीं करेगा.

ख़बरों के मुताबिक, बाइडन की ओर से नेतन्याहू को सबसे लेटेस्ट कॉल गई 19 मई की सुबह. इसमें बाइडन ने अपेक्षाकृत अधिक दृढ़ता दिखाई. नेतन्याहू से कहा कि अगर इज़रायल सैन्य अभियान जारी रखता है, तो उस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ेगा. मगर इस बातचीत में भी नेतन्याहू ने हिंसा घटाने की कोई गारंटी, कोई समयसीमा नहीं दी. बल्कि इस बातचीत के बाद नेतन्याहू ने एक बयान में कहा कि वो अभी गाज़ा पर बमबारी जारी रखेंगे.

ख़बरों के मुताबिक, इस पॉइंट पर आकर बाइडन का धैर्य चुक गया. 19 मई को वाइट हाउस ने एक अलग मिज़ाज का बयान जारी किया. इसमें बाइडन द्वारा नेतन्याहू को किए लेटेस्ट फोन कॉल की जानकारी दी गई. बताया गया कि बाइडन ने नेतन्याहू से कहा कि वो आज-के-आज हमले का स्केल घटाए जाने की उम्मीद करते हैं. ताकि जल्द-से-जल्द संघर्षविराम हो सके. ये बयान पब्लिक करना संकेत है कि बाइडन को प्राइवेट फोन कॉल्स से फिलहाल कोई राह निकलने की उम्मीद नहीं रही है. इसीलिए वो अब नेतन्याहू पर सार्वजनिक दबाव बना रहे हैं.

बाइडन पर कुछ ठोस करने का दबाव बढ़ रहा?

जानकारों के मुताबिक, बाइडन के इस थोड़े बदले रुख की वजह प्रेशर भी है. उनके ऊपर यूरोपीय देशों समेत बाकी इंटरनैशनल कम्युनिटी का दबाव बढ़ रहा है. उनकी अपनी डेमोक्रैटिक पार्टी के कई लीडर्स विरोध कर हैं. करीब 130 डेमोक्रैटिक सांसदों ने बाइडन के लिए अपील जारी की है. इसमें कहा गया है कि वो तत्काल संघर्षविराम करवाने की कोशिश करें. इसके लिए दोनों पक्षों पर दबाव डालें.

डेमोक्रैटिक पार्टी के कुछ लीडर्स इस संघर्ष की शुरुआत से ही इज़रायल की आलोचना कर रहे हैं. उसकी एक लीडर हैं, राशिदा तलैब. पिछले हफ़्ते उन्होंने ये मुद्दा सदन में उठाया था. 18 मई को राशिदा ने बाइडन से मुलाकात भी की. उन्होंने बाइडन द्वारा इज़रायल को दिए जा रहे सपोर्ट पर सवाल उठाया. उन्होंने बाइडन से कहा कि वो आम फिलिस्तीनियों के साथ अपराध कर रही नेतन्याहू सरकार का साथ देना बंद करें. डेमोक्रैटिक पार्टी की ही लीडर हैं अलेक्जैंड्रिया कोरटेज़. उन्होंने भी इज़रायल को फिलिस्तीनियों के गंभीर मानवाधिकार हनन का दोषी बताया.

Rashida Tlaib
डेमोक्रैटिक पार्टी की नेता राशिदा तलैब. (तस्वीर: एपी)

इसी बीच पिछले दिनों ख़बर आई कि बाइडन प्रशासन इज़रायल को नए हथियार देने जा रहा है. इसपर भी डेमोक्रैटिक पार्टी के लीडर्स ने सवाल उठाया. कुछ लीडर्स ने कहा कि अमेरिका रबड़ स्टैंप नहीं बन सकता. इज़रायल गाज़ा पर बम गिराए और अमेरिका उसे हथियारों की आपूर्ति करे, ये नहीं होना चाहिए. अमेरिकी संसद में फॉरेन अफ़ेयर्स की एक कमिटी है. इसके मुखिया हैं, ग्रेगरी डब्ल्यू मीक्स. वो संसद में इज़रायल के सबसे बड़े समर्थकों में गिने जाते हैं.

मगर इस दफ़ा उन्हीं ग्रेगरी मीक्स ने कहा कि वो राष्ट्रपति से हथियारों की ये सप्लाई फिलहाल टालने की अनुशंसा करेंगे. इसके अलावा डेमोक्रैटिक पार्टी के 28 सांसदों ने सीज़फायर की अपील करते हुए एक सार्वजनिक चिट्ठी भी जारी की. यानी बाइडन पर कुछ ठोस करने का बाहरी और आंतरिक दबाव बढ़ रहा है. उनके बार-बार फोन करने के बाद भी नेतन्याहू का हमला जारी रखने की बात करना, बाइडन पर सवाल खड़े कर रहा है.

Gregory Meeks
अमेरिकी संसदीय फॉरेन अफ़ेयर्स कमिटीके मुखिया ग्रेगरी डब्ल्यू मीक्स. (तस्वीर: एपी)

फिर से लौटते हैं संभावित संघर्ष विराम पर

इस से जुड़ा एक संकेत हमास की ओर से भी आया. बीते रोज़ हमास के कुछ लोगों ने मीडिया से बात की. बताया कि मौजूदा संघर्ष शायद जल्द ही रुक जाए. ख़बरों के मुताबिक, हमास ने कहा कि 24 से 48 घंटे के भीतर संघर्षविराम हो सकता है.

इज़रायली और अमेरिकी मीडिया भी यही संकेत दे रही है. चैनल 12 और दी टाइम्स ऑफ़ इज़रायल समेत कई मीडिया संगठनों ने अनुमान जताया है कि शायद 20 मई को संघर्षविराम हो जाए. वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा कि अमेरिका को उम्मीद है कि इस हफ़्ते सीज़फायर हो जाएगा. मगर कब होगा, ये नहीं पता.

क्या इज़रायल ने आधिकारिक तौर पर भी ऐसा कोई संकेत दिया?

जवाब है, नहीं. इज़रायल के इंटेलिजेंस मिनिस्टर हैं एली कोहेन. 20 मई को उन्होंने कहा कि जब तक इज़रायल अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर लेता, तब तक बमबारी नहीं रुकेगी. एली ने माना कि अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है. साथ में ये भी जोड़ा कि हमास अब सीज़फायर की भीख मांग रहा है, मगर इज़रायल फिलहाल नहीं रुकेगा.

Eli Cohen
इज़रायली इंटेलिजेंस मिनिस्टर एली कोहेन. (तस्वीर: एएफपी)

ये ख़बर लिखे जाने तक इज़रायल और फिलिस्तीन के बीच जारी हिंसा रुकी नहीं थी. हमास के रॉकेट हमले कुछ समय के लिए बंद ज़रूर हुए थे. 19 और 20 मई की दरमियानी रात करीब 1 बजे हमास की ओर से आ रहे रॉकेट्स बंद हो गए. सुबह 9 बजे तक इज़रायल के वॉर्निंग सायरन्स चुप रहे. मगर इस दौरान इज़रायल ने बमबारी जारी रखी. इसके बाद 20 मई की सुबह 9 बजे के करीब हमास ने भी दोबारा रॉकेट दागने शुरू कर दिए.

जानकारों का कहना है कि इसकी एक बड़ी वजह ये है कि बाइडन प्रशासन ने अब भी नेतन्याहू पर सही से प्रेशर नहीं बनाया है. चेहरा बचाने के लिए उन्होंने नेतन्याहू से हुई अपनी बातचीत को पब्लिक भले किया हो. मगर वो अब भी वो इज़रायल को इंटरनैशनल प्रेशर से बचाने में लगे हैं. मसलन, UNSC. यानी, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद. इसका स्थायी सदस्य है फ्रांस. उसने एक प्रस्ताव ड्राफ़्ट किया है. इसमें इज़रायल और हमास, दोनों से हिंसा बंद करके संघर्षविराम करने की अपील की गई है.

संघर्षविराम वाले ड्राफ्ट का क्या हुआ?

ड्राफ्ट को पास होने के लिए अमेरिका का साथ चाहिए. क्योंकि वो भी सिक्यॉरिटी काउंसिल का स्थायी सदस्य है. बाकी सभी सदस्य प्रस्ताव पर सहमत हैं. मगर अमेरिका राज़ी नहीं हो रहा. उसने ये प्रस्ताव पेश किए जाने का भी विरोध किया. UNSC में किसी मुद्दे पर प्रस्ताव पारित होना महज बयानबाजी नहीं होती. उसका बहुत वजन होता है. इस मसले पर अमेरिका के अलावा सारे सदस्य देश एकमत हैं. ऐसे में अगर ये प्रस्ताव पेश हुआ, तो इसे पारित होने से रोकने के लिए अमेरिका को वीटो लगाना होगा. वीटो लगाकर प्रस्ताव तो ब्लॉक कर देगा अमेरिका. मगर इससे उसकी भूमिका पर और सवाल उठेंगे. सदस्य राष्ट्रों के साथ भी उसका तनाव बढ़ेगा.

इसीलिए अमेरिका बार-बार ऐसे प्रस्तावों को ब्लॉक कर रहा है. गाज़ा के हालात को लेकर पिछले 10 दिनों में चार बैठकें हो चुकी हैं सिक्यॉरिटी काउंसिल की. उनमें बाकी सदस्यों ने साझा बयान जारी करने की कोशिश की. मगर अमेरिका ने ये होने नहीं दिया. मौजूदा संदर्भ में वो इसी तरह चार बार इज़रायल का बचाव कर चुका है. ऐसे में कई जानकार बाइडन की आलोचना कर रहे हैं. उनका कहना है कि अगर इस बचाव के बदले अमेरिका इज़रायल से संघर्षविराम की कोई डेडलाइन ले पाया होता, तब भी ग़नीमत थी. मगर यहां तो नेतन्याहू बमबारी जारी रखने की बात दोहराकर ख़ुद बाइडन को पब्लिकली चैलेंज देते दिख रहे हैं.

Emmanuel Macron
फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों. (तस्वीर: एएफपी)

इज़रायल और फिलिस्तीन के बीच का ये संघर्ष बाइडन की विदेश नीति के आगे पेश हुई पहली बड़ी चुनौती थी. इसमें वो अब तक बेअसर दिखे हैं. क्या ये ईरान के साथ तनाव घटाने की तैयारी के मद्देनज़र दिया गया कन्सेशन है? क्या संभावित ईरान न्यूक्लियर डील के विरोधी नेतन्याहू का सपोर्ट हासिल करने के लिए बाइडन ये लचीलापन दिखा रहे हैं? अगर हां, तो क्या ये फिलिस्तीन और इज़रायल की आम आबादी के साथ न्याय है?

एकबार फिर ज़िक्र करेंगे इज़िप्ट का

एक तरफ जहां बाइडन की लीडरशिप निराश करती दिख रही है. वहीं इज़िप्ट लीडरशिप निभाता दिखा. उसने हिंसा शुरू होने के बाद गाज़ा को मानवीय मदद दी. गाज़ा के घायल नागरिकों को अपने यहां के अस्पतालों में इलाज़ दिया. बिना समय गंवाए इज़रायली और हमास लीडरशिप से वार्ता शुरू की. दोनों पक्षों में समझौता करवाने की बार-बार कोशिश की.

जब वहां बात नहीं बनी, तो इज़िप्ट के राष्ट्रपति अब्देल अल सिसी इस मुद्दे पर सहमति बनाने के लिए पैरिस गए. उन्होंने फ्रेंच राष्ट्रपति मैक्रों से बात की. इसी वार्ता के बाद मैक्रों ने संघर्षविराम की अपील से जुड़ा ड्राफ़्ट तैयार किया. यानी जहां बाइडन दृढ़ता दिखाने में नाकाम रहे, वहीं इज़िप्ट ने जिम्मा लिया.

Abdel Al Sisi
इज़िप्ट के राष्ट्रपति अब्देल अल सिसी. (तस्वीर: एएफपी)

इज़िप्ट कई बार इज़रायल और हमास के बीच मध्यस्थता कर चुका है. दोनों पक्षों के बीच पिछला बड़ा संघर्ष हुआ था 2014 में. तब भी इज़िप्ट ने ही दोनों में समझौता करवाया था. 2014 से 2021 के बीच मिडिल-ईस्ट में बहुत कुछ बदल चुका है. UAE, बहरीन, मोरक्को और सूडान से इज़रायल की दोस्ती हो गई है. पर्दे के पीछे सऊदी और इज़रायल भी एक-पेट हैं.

इज़िप्ट का कद भी पहले जैसा नहीं रहा. सऊदी, तुर्की और UAE प्रभाव में उससे कहीं आगे निकल चुके हैं. बावजूद इसके इज़रायल-हमास की मौजूदा हिंसा में अरब बिरादरी के भीतर सबसे प्रमुख भूमिका इज़िप्ट ने निभाई. तुर्की और ईरान धमकी की भाषा बोलते रहे. सऊदी और UAE गुट लिप सर्विस देता रहा. बाइडन भी अब तक कुछ असर नहीं दिखा सके. मगर इज़िप्ट शुरू से ही संघर्ष करने की कोशिश करता रहा. उसने साबित किया कि मिडिल-ईस्ट के बदले इक्वेशन्स के बाद भी वो एक अहम पार्टी है. इस भूभाग से जुड़े अहम मसलों में अब भी उसकी भूमिका बेहद अहम है.

Uae Israel Deal
हाल में इज़रायल और UAE के बीच समझौता हुई है. (तस्वीर: एएफपी)

नादिने अब्देल की कहानी जान लीजिए

अब हम स्टोरी के अंत में पहुंच गए हैं. यहां हम आपको 10 बरस की एक बच्ची की कहानी सुनाना चाहेंगे. इस बच्ची का नाम है- नादिने अब्देल. वो फिलिस्तीनी है. गाज़ा में रहती है. उसका एक विडियो वायरल है. इसमें नादिने ज़मींदोज़ हो चुके एक मलबे के पास खड़ी सवाल पूछती है. वो मलबा दिखाकर कहती है-

आप ये देख रहे हैं? आप क्या उम्मीद करते हैं, क्या करूं मैं इसका? इसको ठीक कर दूं? मैं बस 10 साल की बच्ची हूं. मैं अब बर्दाश्त नहीं कर पा रही. मैं डॉक्टर बनना चाहती हूं. कुछ भी ऐसा बनना चाहती हूं कि अपने लोगों की मदद कर सकूं, मगर मैं ये नहीं कर पा रही.

विडियो में नादिने का छोटा भाई जेट्स की आवाज़ सुनकर डर जाता है. बिलख-बिलखकर रोने लगता है. तब नादिने उसे हौसला देती है. वो हंसती है, ताकि उसके भाई को संबल मिले.

नादिने और उसके भाई का जीवन कैसा है?

उसमें अगला पल, अगली सुबह देखने की कोई गारंटी नहीं. वो रोज़ धमाके सुनते हैं. लोगों को मरते देखते हैं. हर रात उनकी मां घर के हॉल में बिस्तर डालकर बच्चों को उसपर सुला देती हैं. इस उम्मीद में कि शायद यूं उनके बच्चे सुरक्षित रहें. विडियो में नादिने कहती है वो और उसके जैसे बच्चे ऐसी मौत के हक़दार नहीं. ये पंक्ति सवाल की शक्ल में नहीं आता. ये रिमाइंडर की तरह बताया जाता है. क्या इतनी बुनियादारी चीज, इतनी बुनियादी इंसानियत रिमाइंड कराने की नौबत आनी चाहिए? गाज़ा हो कि टेल अविव, क्या कहीं के भी बच्चों को इस भय में जीना चाहिए?


विडियो- इज़रायल या फिलिस्तीन, किसके साथ है मोदी सरकार?

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एक वक़्त इंडस्ट्री में टॉप पर थे कुणाल और उनके गाने पार्टियों की जान हुआ करते थे.

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

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IPL स्कैंडल, मॉडल्स के आरोप, अंडरवर्ल्ड कनेक्शंस के आरोप, एक्स वाइफ के इल्ज़ाम सब हैं इस कहानी में.

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

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रिचर्ड ब्रेन्सन की कहानी, जहां भी गए तहलका मचा दिया.

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

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पहला चुनाव हार गए थे, बीजेपी ने राज्य की जिम्मेदारी सौंपी है.

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

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उनके गाए 'पल' गाने के बगैर आज भी किसी कॉलेज का फेयरवेल पूरा नहीं होता.