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क्या अब देश की आबादी बढ़ने के बजाय घटने लगी है?

हम सबने बचपन में जनसंख्या पर निबंध लिखे. कि कैसे बढ़ती जनसंख्या ने देश के संसाधनों पर दबाव बना दिया है. किसी को उसका हक नहीं मिल पाता, क्योंकि भीड़ ही इतनी है. इसी तर्क पर ऐसे कानूनों के लिए आधार तैयार किया गया कि दो से ज़्यादा बच्चे हुए, तो चुनाव नहीं लड़ पाएंगे, सरकारी योजनाओं में पहले की तरह लाभ नहीं मिलेगा.

फिर एक डर ये दिखाया जाता है कि इस देश में मुसलमानों की आबादी इस तेज़ी से बढ़ रही है कि जनसंख्या का अनुपात ही गड़बड़ा जाएगा. इन सारी बातों पर सवालिया निशान लगाता नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 24 नवंबर को हमारे सामने आया. इसकी शुरुआती रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में आबादी बढ़ने की रफ्तार थम गई है.

तो क्या अब हमें परिवार नियोजन की ज़रूरत नहीं रह गई है? या फिर उस आक्रामकता पर दोबारा विचार करने की बारी आ गई है, जो नियोजन के नाम पर दिखाई जाती है, जनसंख्या विस्फोट और कथित डेमोग्रैफिक चेंज का भय दिखाकर.

जनसंख्या वृद्धि भारत के लिए एक बड़ी समस्या है. शायद ही किसी को इस बात पर कभी भी शक रहा हो. दशकों से हमारे देश में सरकारें परिवार नियोजन के कार्यक्रम चला रही हैं. मोटा-मोटी ये छोटे परिवार के फायदे वाली जागरुकता के अभियान थे. लेकिन बीच बीच में सरकारें कड़ाई से भी पेश आईं. इमरजेंसी के दौर में जबरन नसंबदी की थी.

लेकिन अब जाकर जनसंख्या वृद्धि वाली डिबेट नए दौर में पहुंच गई. किसी ने कहा कि कि देखिए एक समुदाय के लोग 40 – 40 बच्चे पैदा करते हैं. किसी ने कहा कि ऐसे ही आबादी बढ़ती रही तो मुसलमान ज्यादा हो जाएंगे.

तो इस तरह की बयानबाज़ी में एक समुदाय को अपराधी की तरह पेश किया जाता है. साबित कर दिया जाता है कि आबादी बस उनकी वजह से ही बढ़ रही है. फिर वो सुझाव आते हैं कि दो बच्चों से ज्यादा पैदा करने वालों को मतदान वाला अधिकार वापस ले लो. कोई कहता है कि उनको सरकारी योजना का लाभ ना दो, नौकरी मत दो.

यूपी और असम की सरकारें भी जनसंख्या नियंत्रण की ज़रूरत पर खूब हल्ला मचा रही हैं. हम जानते हैं जनसंख्या वाली इन चिंताओं में राजनैतिक निहितार्थ छिपे होते हैं. लेकिन इस राजनीति के फेर में आप ना फंसें, इसलिए सच जानिए. आज जब ये पूरा शो आप देखेंगे तो कई भ्रम टूटेंगे. जैसे कि क्या देश में अब भी जनसंख्या वृद्धि की दिक्कत है. क्या जनसंख्या वृद्धि के लिए मुसलमान जिम्मेदार हैं, वो ज्यादा बच्चे पैदा कर रहे हैं. क्या मुसलमानों की आबादी इतनी बढ़ रही है कि एक दिन हिंदू अल्पसंख्य हो जाएंगे?

लेकिन क्या देश में आबादी का बढ़ना या उसमें समुदायों का अनुपात बदलना अब भी समस्या है? और क्या ये समस्या इतनी गंभीर है कि देश के किसी भी राज्य में नीति निर्धारकों को इस पर सख्त कानून लाने की जरूरत पड़े.

हम आज सरकार के दिए आंकड़ों पर ही बात करेंगे. लेकिन उससे राजनीतिक बयानों से इतर आबादी को लेकर कुछ वाजिब चिंताएं और आंकड़े.

अनुमान है कि 2027 तक हम नंबर वन हो जाएंगे. आबादी के मामले में. चीन को पछाड़ देंगे. आज़ादी के बाद हमने आबादी में 1 अरब का इजाफा किया है. तब 36 करोड़ थी. अब 136 करोड़ के करीब. 136 करोड़ वाला अनुमान ही है, 2021 की जनगणना अभी हुई नहीं है. और जो पिछली जनगनणना हुई थी,

2011 वाली, उसके हिसाब से भारत में हर साल 2 करोड़ 40 लाख लोग पैदा होते हैं, जबकि 88 लाख कम हो जाते हैं. इस गणित से हर साल आबादी में डेढ़ करोड़ का इजाफा होता है. तो एक तो संसाधनों के हिसाब से हमारी आबादी पहले ही ज्यादा है और इसमें इजाफा भी हो रहा है. दुनिया की कुल जमीन का 2.4 फीसदी हिस्सा ही हमारे पास है,

और उस पर दुनिया की 18 फीसदी आबादी रहती है. तो इस डेटा के आसपास जनसंख्या नियंत्रण का पूरा तर्क गढ़ा जाता है. लेकिन क्या देश में अब भी उतने बच्चे पैदा हो रहे हैं, कि हम किसी के सरकारी राशन या वोट देने के अधिकार को छीनने का कोई कानून लाएं. इन सारी बातों पर भ्रम दूर होते हैं केंद्र सरकार के नए सर्वे से.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय हर पांच साल से एक सर्वे कराता है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे. हिंदी में कहते हैं राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण. इसमें आबादी, स्वास्थ्य और पोषण पर देशभर में सर्वे किया जाता है. और फिर अलग अलग कैटेगरी में सर्वे के आंकड़े जारी किए जाते हैं. पूरे देश के ओवरऑल आंकड़े इसमें हैं.

इसमें हर राज्य और केंद्रशासित प्रदेश का अलग अलग डेटा है. और कुछ जरूरी इंडिकेटर्स के मामले में जिला-स्तर का भी डेटा है. ये सर्वे 1992 में शुरू हुआ था और अब हर पांच साल में होता है. इसके पांचवें संस्करण की रिपोर्ट कल जारी हुई है. ये सर्वे 2019 से 2021 के बीच दो चरणों में हुआ.

इसमें देश के 707 ज़िलों में से 6 लाख 50 हज़ार परिवारों से जानकारी इकट्ठा की गई है. मुंबई का इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट फॉर पॉपुलेशन भारत सरकार के लिए ये सर्वे करवाता है. माने नोडल एजेंसी की भूमिका निभाता है है. आगे बात हो, इससे पहले आप ये बात समझें कि ये एक सर्वे है. माने एक अनुमान है.

सर्वे के नतीजे सौ फीसदी सही हों ये जरूरी नहीं होता है. लेकिन चूंकि सर्वे सरकार का है, इसीलिए इसके आधार पर सरकार की नीतियों को समझा जा सकता है और उसपर सवाल भी उठाए जा सकते हैं.

अब खोलते हैं सर्वे को. सर्वे का डेटा कहता है देश में प्रजनन दर घटी है. 2 से नीचे चली गई है. और अगर ऐसा ही रहा तो आबादी बढ़ने की बजाय घट जाएगी. माने जितनी आबादी अभी है, उससे कम हो जाएगी.

जनसंख्या वृद्धि का पैमाना टोटल फर्टिलिटी रेट या TFR भी होता है. हिंदी में इसे प्रजनन दर कहते हैं. क्या होता है ये- वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की परिभाषा के मुताबिक औसतन एक महिला अपने प्रजननकाल में कितने बच्चों को जन्म देगी, इसका एक अनुमान निकाला जाता है. और ये निकाला कैसे जाता है?

15 साल से 49 साल की उम्र को 5-5 साल के 7 आयुवर्गों में बांटा जाता है. जैसे 15-19 साल वाली महिलाओं का आयुवर्ग. फिर 20 से 24 साल वाला ग्रुप. तो ऐसे ग्रुप्स में बांटकर महिलाओं और उनके बच्चों की संख्या काउंट की जाती है. और फिर औसत निकालकर प्रजनन दर या फर्टिलिटी रेट तय होती है. प्रजनन दर मालूम चलता है आबादी किस रफ्तार से बढ़ रही है.

तो फर्टिलिटी रेट के बारे में क्या कहता है नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे? कि ये घटकर अब 2 रह गई है. यानी हर महिला औसतन दो बच्चों को जन्म दे रही है. शहरी इलाकों में प्रजनन दर 2 से भी कम है – 1.6. ग्रामीण इलाकों में 2.1 है.

तो अब 2 प्रजनन दर होने का मतलब क्या है. ये वास्तविक रूप में ‘हम दो हमारे दो’ है. मां-बाप से औसतन दो बच्चे. जिसका नारा हमारे देश में इतने सालों से दिया जा रहा है. इतने सालों तक बस नारा ही था. अब असल में हमने ये लक्ष्य हासिल कर लिया है. अगर एक दंपत्ति से औसतन 2 बच्चे पैदा होते हैं तो हमारी जनसंख्या वृद्धि दर ज़ीरो हो जाएगी.

मतलब जनसंख्या बढ़ना बंद हो जाएगी. संयुक्त राष्ट्र के पॉपुलेशन डिविजन 2.1 से प्रजनन दर को बिलो रिप्लेसमेंट लेवल मानता है. क्या मतलब है इसका. कि उस देश में जितने लोग मर रहे हैं, उतने बच्चे पैदा नहीं हो रहे हैं. भारत – बिलो रिप्लेसमेंट लेवल पर पहुंच गया है. माने अब भारत की आबादी बढ़ने के बजाय कम होगी. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि अगले बरस से ही कम होना शुरू हो जाएगी. जानकार कह रहे हैं कि इसमें 30-40 साल लग सकते हैं.

तो क्या इसका मतलब हम दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाले देश के तमगे से हम बच जाएंगे, चीन ही हमारे आगे रहेगा? नहीं. चीन की प्रजनन दर है 1.6. वहां तो अब सरकार खुद कर रही है कि भाई बच्चे पैदा करो. पहले अनुमान था कि 2027 के आसपास हम चीन को पछाड़ देंगे. अब लग रहा है कि इसमें थोड़ा और वक्त लग सकता है. तो इन नए डेटा के बाद वो संगठन क्या कह रहे हैं जो जनसंख्या वृद्धि पर कानून की मांग कर रहे थे.

मनु गौर ने हमें बताया

ये जो नया सर्वे है ये एक सेम्पल सर्वे है. असल फ़िगर जो आपके सामने आते हैं वो हमेशा सेन्सेज़ के द्वारा आते हैं. आख़री सेन्सेज़ हमारा 2011 में हुआ था उसके अनुसार हमारे देश में लगभग 34 करोड़ विवाहित महिलाएं उनमें से 18 करोड़ ऐसी महिलाएं थीं जिनके 2 या उनसे कम बच्चे थे. और क़रीब 15 करोड़ 75 लाख ऐसी महिलाएं थीं जिनके 3 या उनसे ज़्यादा बच्चे थे. अब जो असल फर्टिलिटी रेट हमारे सामने आएगी वह 2021 के सेन्सेज़ हिसाब से होगी. वो रिपोर्ट 2020 में आयगी. हमारे देश की ऐसी आबादी जो आने वाले समय में रिप्रॉडक्टिव ऐज में आयगी वो लगभग 90 करोड़ है. इसका मतलब 45 करोड़ जोड़े ऐसे हैं जो आने वाले समय में नए बच्चों को जन्म देंगे. अगर ये लोग केवल 2 बच्चे भी पैदा करते हैं तो अगले 35 वर्ष में लगभग 90 करोड़ बच्चे ज़रूर होंगे. वहीं देश में हर साल लगभग 90 लाख लोगों की मौत होती है. इस हिसाब से आने वाले सालों में 35 करोड़ लोगों की मृत्यु होगी. इस हिसाब से आप आने वाले समय में जनसंख्या का आँकड़ा खुद लगा सकते हैं.

अब आते हैं, इस सवाल पर हमने आबादी की दर कितनी घटाई है. 2016 वाले सर्वे के मुताबिक देश में प्रजनन दर 2.2 थी. थोड़ा और पीछे जाएं तो साल 2000 में प्रजनन दर 3.2 थी. मतलब चीज़ें कंट्रोल में आ रही हैं. और जनसंख्या अब वैसी समस्या नहीं है कि पॉपुलेशन कंट्रोल को लेकर कोई नीतिगत फैसला लिया जाए, या किसी तरह की सख्ती लागू की जाए.

पर सख्ती वाली बातें तो हो रही हैं. उत्तर प्रदेश में जनसंख्या नियंत्रण पर बिल का ड्राफ्ट भी बन गया है. तो चलो उत्तर प्रदेश की बात कर लेते हैं कि वहां समस्या कितनी बड़ी है. 2015-16 में यूपी में प्रजनन दर थी 2.7. और इस बार के सर्वे में यूपी में फर्टिलिटी रेट है 2.4. यानी अब भी राष्ट्रीय औसत से उत्तर प्रदेश में फर्टिलिटी रेट ज्यादा है. और इसमें कोई दो राय नहीं है.

लेकिन लगातर घट रही है. बढ़ोतरी का ग्राफ नीचे जा रहा है. इसीलिए सवाल उठता है कि जब आबादी घट ही रही है कि तो किसी कानून या संख्तियों से जनता को आतंकित करने की क्या जरूरत है. अपने जनसंख्या नीति में योगी सरकार ने अगले 10 सालों में प्रजनन दर घटाकर 1.9 करने का लक्ष्य रखा है. और जिस तरह से पिछले 5 सालों में यूपी में प्रजनन दर घटी है, ये बताता है कि योगी आदित्यनाथ जनसंख्या को लेकर कुछ ना करें, तो भी प्रजनन दर घटकर 1.9 फीसदी तक आ सकती है.

अब आते हैं इस सवाल पर कि क्या मुसलमान ज्यादा बच्चे पैदा कर रहे हैं? इस परसेप्शन पर भी आंकड़ों से ही बात करते हैं. इस बार हमारे अभी नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़ें धार्मिक आधार पर नहीं आए. लेकिन पुराने आंकड़ें हैं. और क्या बताते हैं ये देख लीजिए. जब साल 1992 में पहली बार नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे ने आंकड़े जुटाए थे, तब मुस्लिमों में 4.4 प्रजनन दर थी.

लेकिन 2015 वाले सर्वे में ये 2.6 रह गई. मतलब तब हर 10 मुस्लिम महिलाएं 44 बच्चे पैदा करती थी, तो 2015 तक आते आते हर 10 महिलाओं के औसत बच्चे हो गए 26.
जबकि हिंदुओं में अगर 1992 में 10 महिलाओं के 33 बच्चे होते थे तो 2015 में 21 बच्चे औसतन हो गए. और अब 10 महिलाओं से औसतन 20 बच्चे हैं.

मतलब ये कि मुस्लिमों की प्रजनन दर अब भी हिंदुओं से ज्यादा है, लेकिन तेज़ी से घट रही है. और ये चीज़ हमने पिछले 3 दशक में देखी है.
इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ पॉपुलेशन स्टडीज़ के निदेशक केएस जेम्स लिखते हैं कि 1992-93 से 2015-16 के बीच भारत में सबसे प्रजनन दर में गिरावट आई है, वो मुसलमान हैं. हिंदू, सिख, ईसाई इन सबसे ज्यादा गिरावट आई है. मतलब उन पर आबादी बढ़ाने के इल्ज़ाम सही नहीं हैं. वहां भी आबादी घटाने पर ज़ोर है. और ये आंकड़ों में दिख भी रहा है.

तो हमने अलग अलग डेटा आपको समझाया. अब विद्वानों की राय. क्यों प्रजनन दर घट रही है, वजह क्या हैं, इसके मायने क्या हैं.
सुभानिल चौधरी कहते हैं कि

इस डेटा से साफ़ है कि हमारे देश में कोई सख़्त क़ानून की ज़रूरत नहीं है. आबादी के साथ धर्म या भारतीयता का कोई सम्बंध नहीं है. ये सिर्फ़ आर्थिक मामलों पर डिपेंड करता है. देश तरक़्क़ी कर रहा है देश के लोगों की सोच बदल रही है जिससे चीजें ठीक हो रही हैं.

तो आबादी और प्रजनन दर की बात हुई. अब चलते हैं लिंग अनुपात पर. ये भी तो हमारी चिंता रही है. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे अभियान हमारी सरकारें चलाती रही हैं. अब लिंगानुपात वाले मोर्चे से भी अच्छी खबर है. देश में हज़ार पुरुषों पर 1020 महिलाएं हैं. पिछले सर्वे में 991 थीं.

और 1992 के बाद से ये पहली बार हुआ कि लिंगानुपात में महिलाओं की संख्या बढ़ी है. हालांकि अभी भी एक चिंता की बात है. पिछले 5 सालों में पैदा हुए बच्चों में अब भी लड़कियां कम हैं. 1000 लड़कों के मुकाबले 929 लड़कियां. वैसे 2015 के मुकाबले इसमें भी सुधार है. तब 1000 लड़कों पर 919 लड़कियां थीं.

वैसे इसमें एक और दिलचस्प बात है. हमें लगता है कि ना बेटी की चाह ग्रामीण इलाकों में ज्यादा होती है. शहरी वालों के लिए बेटा बेटी सब बराबर होता है. लेकिन लिंगानुपात के आंकड़े गांवों में बेहतर हैं. सर्वे कहता है पिछले 5 साल में जन्में 1000 लड़कों में शहरी इलाके में लड़कियों की संख्या 924 हैं. जबकि ग्रामीण इलाकों में ये 931 है. मतलब गांवों में ज्यादा लड़कियां हैं.

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे में और भी कई जरूरी बातें हैं. जैसे देश में 6 साल या उससे ज्यादा उम्र की सिर्फ 71.8 फीसदी लड़कियां ही स्कूल जाती हैं. 15-49 साल की उम्र की लगभग आधी महिलाओं में एनिमिया की दिक्कत होती है. कई और जानकारियां भी सर्वे में हैं, लेकिन सब कुछ एक बार में बताना मुमकिन नहीं है.

कुल मिलाकर सर्वे से ये समझ आता है कि सरकारों को जनसंख्या वृद्धि पर हल्ला करने के बजायबाकी जरूरी मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए. जिनमें लड़कियों का स्वास्थ्य है, उनकी शिक्षा की बात है. उम्मीद है केंद्र सरकार के सर्वे से राज्य सरकारें भी सबक लेंगी.


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