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पहली डोज़ ऐस्ट्राजेनेका की और दूसरी फाइजर की ज्यादा असरदार?

कोरोना वायरस वैक्सीन और उसके प्रभाव को लेकर लगातार तरह-तरह की रिपोर्ट्स आ रही हैं. इस सबके बीच एक और रिपोर्ट आई है. कोरोना वायरस वैक्सीन को लेकर स्पेन में एक स्टडी की गई है. इस स्टडी के मुताबिक़ एस्ट्राजेनेका वैक्सीन के पहले डोज़ के बाद फाइजर का दूसरा डोज़ देना काफी सुरक्षित और प्रभावी है. रिपोर्ट्स के मुताबिक़ 600 से अधिक लोगों पर किए गए परीक्षण के बाद इस नतीजे पर पहुंचा गया है कि दो अलग-अलग वैक्सीन अधिक कारगर हैं. आइये इस स्टडी के बारे में विस्तार से जानते हैं.

वैज्ञानिक जर्नल नेचर का यह ट्वीट देखिए.

600 से ज़्यादा लोगों पर किये गए ट्रायल के प्रारंभिक परिणाम, ऐसे पहले परिणाम हैं, जो दो वैक्सीन्स के संयोजन के फायदों को प्रदर्शित करते हैं

दी कार्लोस III हेल्थ इंस्टिट्यूट (ISCIII) का यह दावा है कि दो अलग-अलग वैक्सीन अधिक प्रभावी हैं. ISCIII ने अपनी इस स्टडी को Combivacs नाम दिया है. ISCIII ने अपनी स्टडी में 60 साल से कम 673 लोगों पर परीक्षण किया. इस परीक्षण के लिए उन लोगों को चुना गया जो एस्ट्राजेनेका वैक्सीन की पहली डोज़ ले चुके थे और उस डोज़ के बाद, कम से कम आठवें हफ्ते में थे. इसमें से 441 लोगों को वैक्सीन की दूसरी डोज़ फाइजर की दी गई और 232 लोगों को कोई डोज़ नहीं दी गई.

इसका असर क्या हुआ?

जिन लोगों ने दूसरी डोज़ फाइजर की ली, उनके रक्तप्रवाह में IgG एंटीबॉडी की मौजूदगी उन लोगों की तुलना में 30 से 40 फीसद अधिक थी, जिन्होंने एस्ट्राजेनेका वैक्सीन की सिर्फ एक डोज़ ली थी. न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट मुताबिक़ दूसरी डोज़ फाइजर की लेने के बाद न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडीज की उपस्थिति सात गुना बढ़ गई. इसको ऐसे समझिए. जिन लोगों ने एस्ट्राजेनेका की दोनों डोज़ ली हैं, उनमें दूसरे डोज़ के बाद न्यूट्रलाइज़िंग डोज़ की उपस्थिति दोगुनी देखी गई है. लेकिन फाइजर की दूसरी डोज़ लेने के बाद यह सात गुना बढ़ गई.

जिन लोगों ने दोनों डोज़ लिए उनमें थोड़े-बहुत साइड इफेक्ट थे. सबसे आम दिक्कतें सिरदर्द (44 फीसद), बेचैनी (41 फीसद), ठंड लगना (25 फीसद), हल्की उबकाई (11 फीसद) और हल्की खांसी (7 फीसद) देखी गई.

यह स्टडी उस वक्त आई है जब दुनिया के कई देशों में कोरोना वैक्सीन की किल्लत नज़र आ रही है. सीमित वैक्सीन की आपूर्ति हो रही है और सभी देशों के पास वैक्सीन चुनने तक का अधिकार नहीं है. ऐसे में कई देश पहली और दूसरी वैक्सीन के डोज़ वाले रास्ते पर चल सकते हैं.

एक्सपर्ट क्या कह रहे?

झोउ जिंग कनाडा के मैकमास्टर यूनिवर्सिटी में इम्यूनोलॉजिस्ट हैं. इस नई स्टडी को लेकर उन्होंने कहा है यह बहुत अच्छी ख़बर है. उन्होंने बताया कि एस्ट्राजेनेका वैक्सीन की पहली डोज लेने वालों की बॉडी में फाइजर की वैक्सीन की दूसरी डोज देने पर इम्यूनिटी काफी ज्यादा मजबूत हुई है.

डैनियल ऑल्टमैन, लंदन के इंपीरियल कॉलेज में इम्यूनोलॉजिस्ट हैं. उन्होंने कहा है कि इसका बुनियादी प्रतिरक्षा विज्ञान से पूरी तरह से अनुमान लगाया जा सकता है. उन्होंने आगे कहा कि वैक्सीन की दो अलग-अलग डोज़ देना समझा आता है. लेकिन अगर लोगों की इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए तीसरी डोज़ की ज़रूरत पड़ी तो क्या होगा? ऑक्सफ़ोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका जैसी वैक्सीन बार-बार दिए जाने से कम प्रभावी होती हैं.

इजरायल के डिकोनेस मेडिकल सेंटर में मौजूदा सेंटर फॉर वायरोलॉजी एंड वैक्सीन रिसर्च के निदेशक डैन बरोच का मानना है कि इस स्टडी से ये फायदा हुआ कि अब वैज्ञानिक दुनिया में मौजूद अलग-अलग टीकों को मिलाकर नए प्रभावी वैक्सीन बना सकते हैं.

भारत में दो अलग वैक्सीन की डोज़ ली जा सकती है?

दुनिया के कई देशों की तरह भारत में भी दो अलग-अलग वैक्सीन की डोज़ नहीं लेने की सिफारिश की जाती है. भारत में मुख्यतः दो वैक्सीन दी जा रही है. कोवैक्सीन और कोविशील्ड. कोविशील्ड, ऑक्सफोर्ड एस्ट्राजेनेका वैक्सीन का ही एक संस्करण है. रूसी स्पूतनिक V को भारत में सभी लाइसेंस मिल गए हैं. टीके लगने भी शुरू हो गए हैं लेकिन इस वैक्सीन की ख़ास खपत होती नहीं नज़र आ रही है.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने अब तक इस नए स्टडी पर अपनी कोई राय नहीं दी है.

इस तरह की कोई और स्टडी?

ब्रिटेन में इस तरह की एक स्टडी जारी है, लेकिन अब तक इस स्टडी का कोई नतीजा नहीं सामने आया है. क्या है स्टडी में? इसमें टीकों की वैकल्पिक डोज़ कितनी प्रभावी हैं, इसको लेकर स्टडी की जा रही है. यह स्टडी 8 अलग-अलग वैक्सीन के कंबिनेशन का आकलन कर रही हैं, जिसमें एस्ट्राजेनेका और फाइजर द्वारा बनाई गए वैक्सीन भी शामिल हैं. ब्रिटेन की वैक्सीन टास्कफ़ोर्स ने इस स्टडी के लिए 62 करोड़ रुपये दिए हैं.


वीडियो- कोरोना का पता लगाने के लिए सीटी स्कैन करवाने से क्यों मना किया जा रहा है?

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