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IRCTC के शेयर्स के साथ उन्नीस-बीस का जो खेल हुआ उसका तीन-पांच क्या था?

शेयर मार्केट का खेल, कभी पास कभी...

अंग्रेजी की एक कहावत है, ‘ऑल गुड थिंग्स कम्स टू एन एण्ड’. मतलब हर अच्छी चीज़ का कभी न कभी अंत होता है. जो फ़िट बैठती है इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉर्पोरेशन (IRCTC) के शेयर्स पर.

भाग एक: क्यूरियस केस ऑफ़ IRCTC

IRCTC का शेयर अपनी लिस्टिंग के दिनों से ही इंवेस्टर्स को मालामाल किए जा रहा था. हालांकि बीच में ये तेज़ी कुछ दिनों के लिए थम सी गई, मानो कोई धावक थोड़ी देर के लिए सुस्ता रहा हो. लेकिन फिर इसने और तेज़ दौड़ लगानी शुरू कर दी. ये सब आपको नम्बर्स में बताएं तो IRCTC का IPO 320 रुपये का था.

शेयर मार्केट में लिस्ट होते ही इसने इंवेस्टर्स को मालामाल करना शुरू कर दिया. 320 रुपये का ये शेयर 644 रुपये, यानी लगभग दुगुने रेट में लिस्ट हुआ. ये बात अक्टूबर 2019 की थी. इसके बाद इसके शेयर ने कभी मुड़कर नहीं देखा. 2021 आते-आते ये क़रीब 1,400-1,450 रुपये में ट्रेड करने लगा. लेकिन असली तेज़ी तो 2021 में आनी थी. और आई. ऐसी कि 19 अक्टूबर को इसका भाव ऑल टाइम हाई यानी 6,396.30 पर पहुंच गया. अब ये तेज़ी कितनी बड़ी थी इसका अंदाज़ा नीचे के कुछ पॉइंट्स से लगाइए:

IRCTC में असली तेज़ी इस साल आई.

# जिस किसी को भी IRCTC का IPO अलॉट हुआ होगा, और अगर उसने ठीक ऑल टाइम हाई पर अपने पैसे निकाले होंगे तो उसका इन्वेस्टमेंट क़रीब 20 गुना हो गया होगा.

# 19 अक्टूबर को IRCTC का मार्केट कैप एक लाख करोड़ रुपये हो गया था. मार्केट कैप बोले तो अगर IRCTC कंपनी के सारे शेयर्स बेच दिए जाएं तो जितने रुपये मिलेंगे. किसी कंपनी का मार्केट कैप एक लाख करोड़ रुपये हो जाना कितनी बड़ी बात है, इसे ऐसे समझें कि IRCTC के अलावा सिर्फ़ 8 और पब्लिक सेक्टर यूनिट (सरकारी कंपनियां) हैं जिनका मार्केट कैप एक लाख करोड़ या उससे ज़्यादा है.

# बीते एक साल में इस स्टॉक ने करीब 300 प्रतिशत का रिटर्न दिया है. मतलब इन्वेस्टर्स के रुपये तिगुने कर चुका है. अच्छे-अच्छे स्टॉक्स या कोई बेहतरीन लीगल इन्वेस्टमेंट स्कीम भी अपने इन्वेस्टर्स को इतने पैसे बना के नहीं देती.

ख़ैर, आपके ये तो समझ में आ गया कि IRCTC का ड्रीम रन चल रहा था. लेकिन अब आप जानिए कि हमने शुरू में क्यों कहा था कि: हर अच्छी चीज़ का कभी न कभी अंत होता है.

वो इसलिए क्योंकि जिस ’20 अक्टूबर’ को हम IRCTC के शेयर्स का सबसे अच्छा दिन कह रहे हैं, विडंबना ये कि वही दिन IRCTC के शेयर्स का, तब तक का सबसे बुरा दिन साबित हुआ.

19 अक्टूबर, 2021 को ढाई बजे तक सब सही था. लेकिन उसके बाद IRCTC ने दो बार लोवर सर्किट लगाया. लोवर सर्किट क्या होता है? इसकी बात तो हम आगे करेंगे ही. पर अभी के लिए ये समझ लीजिए कि एक ही दिन में इसका शेयर अपने ऑल टाइम हाई से क़रीब 20 प्रतिशत गिर गया. मतलब सिर्फ़ एक घंटे में अपने इन्वेस्टर्स के 100 में से 20 रुपये खा गया और हाथ में रह गए सिर्फ़ 80 रुपये. हालांकि ये अपने ऑल टाइम हाई से तो बेशक 20 प्रतिशत गिरकर बंद हुआ, लेकिन अपने पिछले दिन की क्लोजिंग से 16 फीसदी के क़रीब ही गिरा था.

रुकिए, स्टोरी अभी बाकी है. जैसा हमने पिछले पैरा में कहा कि 19 अक्टूबर का दिन ‘तब तक का सबसे बुरा दिन’ साबित हुआ. क्योंकि अगले दिन और बड़ी गिरावट आनी थी. यूं जहां 19 अक्टूबर को ये अपने पिछले दिन की क्लोजिंग से 16 प्रतिशत नीचे गिरा, वहीं 20 अक्टूबर को फिर इसमें दो बार लोवर सर्किट लगे और ये अपने पिछले दिन की क्लोजिंग से 19 प्रतिशत के क़रीब नीचे गिरकर बंद हुआ. यानी एक ट्रेडिंग सेशन और एक घंटे में अपने उच्चतम स्तर से 30 फीसदी से ज़्यादा का डाउनफ़ॉल.

कुल मिलाकर दो दिन से बजी पड़ी है बैंड IRCTC की, अब इस बैंड पर नाचे कौन?

भाग 2: आसान भाषा में

बीते दो दिनों से स्टॉक में आई गिरावट को शेयर मार्केट के जानकार प्रॉफ़िट बुकिंग बता रहे हैं. प्रॉफ़िट बुकिंग मतलब अपने प्रॉफ़िट को कैश करवाना. आख़िर शेयर अपने इन्वेस्टर्स को कम ही समय में मालामाल कर चुका था तो ऐसे में प्रॉफिट बुकिंग और सेलिंग प्रेशर का आना कई लोग ऑलरेडी प्रेडिक्ट कर चुके थे.

19 अक्टूबर, 2021 को IRCTC अपने ऑल टाइम हाई पर था.

वैसे भी शेयर महंगा भी काफ़ी हो चुका था. महंगे होने का एक क्राइटीरिया तो हमने आपको ऊपर बताया ही, कि कैसे इसने कम समय में सरपट रेस लगाई थी. दूसरा क्राइटीरिया है प्राइस टू अर्निंग रेश्यो (P/E रेश्यो).

# प्राइस टू अर्निंग रेश्यो-

PE रेश्यो मतलब प्राइस टू अर्निंग रेश्यो. इसे ऐसे समझिए, अगर किसी कंपनी की क़ीमत 500 रुपये है और उसने इस साल 50 रुपये की कमाई की है, तो उसका PE रेश्यो हुआ 500/50 = 10. मतलब उस कंपनी से एक रुपया कमाने के लिए आपको 10 रुपये इन्वेस्ट करने पड़ेंगे. अब बाई दी वे, अगले साल उसी कंपनी की क़ीमत तो वही 500 रुपये रहती है लेकिन अबकी वो 100 रुपये की कमाई करके देती है, तो इस साल उसका PE रेश्यो हो गया 500/100 = 5. मतलब अबकी इस कंपनी में आपको 1 रुपया कमाने के लिए सिर्फ़ 5 रुपया इन्वेस्ट करना पड़ा. अब तीसरे साल कंपनी की क़ीमत हो जाती है 1000 रुपया लेकिन वो कमा के वही पहले साल की तरह सिर्फ़ 50 रुपये देती है तो इस साल उसका PE रेश्यो हो गया 1000/50 = 20. यानी अब इस कंपनी में आपको हर एक रुपया कमाने के लिए 20 रुपये देने पड़ेंगे.

यानी PE रेश्यो कम से कम रहे, इसके लिए या तो कंपनी की क़ीमत कम होती चली जाए या फिर कंपनी अपनी अर्निंग बढ़ाती चली जाए. इसका उल्टा होगा तो PE रेश्यो बढ़ता चला जाएगा.

अब PE रेश्यो कैल्क्यूलेट करने के लिए कंपनी की कमाई तो कंपनी की बैलेन्स शीट से पता लग जाएगी. लेकिन कंपनी की क़ीमत का पता कैसे लगेगा?

किसी कंपनी के लिए ‘लोग कितने रुपये देने को तैयार हैं’, ये कैल्क्यूलेट नहीं किया जा सकता. ये तो पता चलेगा तब, जब कंपनी लोगों के पास जाएगी पूछने. अपनी कंपनी की क़ीमत पता लगाने. और कंपनी जाएगी कहां? शेयर मार्केट. वहीं पर तो उसे पता चलेगा कि लोग मेरे एक शेयर के लिए कितने पैसे देने को तैयार हैं? और जितने पैसे लोग एक शेयर के लिए देने को तैयार हैं उसे अगर कुल शेयर्स से गुणा कर दो तो वो हो गई कंपनी की मार्केट द्वारा लगाई गई वैल्यू. या मार्केट कैपिटलाइज़ेशन (शॉर्ट में मार्केट कैप). और यही तो वो अमाउंट होता है जो हमारे PE रेश्यो वाले समीकरण को पूरा करता है.

किसी कंपनी का PE रेश्यो = कंपनी का मार्केट कैप/कंपनी की कुल कमाई.

अब PE एक रेश्यो है. तो ये पूरी कंपनी के लिए जितना होगा, उतना ही एक शेयर के लिए भी होगा. इसलिए,

किसी कंपनी के एक शेयर का PE रेश्यो = उस शेयर का मूल्य/उस शेयर से होने वाली कमाई = कंपनी का मार्केट कैप/कंपनी की कुल कमाई.

यूं आपके समझ में आ गया होगा कि अगर कंपनी की कमाई कॉन्स्टंट रहे, मतलब बिलकुल भी न बदले, तो जैसे-जैसे किसी कंपनी के शेयर का मूल्य बढ़ता चले जाएगा, उसका PE रेश्यो भी बढ़ता चला जाएगा. मतलब एक रुपया कमाने के लिए पहले से और ज़्यादा, और ज़्यादा पैसे लगाने होंगे.

इसलिए ही इस PE रेश्यो का शेयर मार्केट में इतना महत्व है. सोचिए, अगर किसी कंपनी का PE रेश्यो बढ़ता चला जा रहा है तो इसका मतलब उसकी कमाई तो बढ़ नहीं रही लेकिन उसके शेयर्स का मूल्य बढ़ता चला जा रहा है. या फिर जिस तेज़ी से कमाई बढ़ रही है, उससे कहीं तेज़ी से शेयर का मूल्य.

और जब किसी कंपनी के लिए ये PE रेश्यो बहुत अधिक हो जाता है तो समझ लेना चाहिए कि अब थमने का समय है. यानी अब या तो कंपनी को प्रॉफ़िट कमाकर देना होगा या फिर शेयर्स के दाम में लगी आग बुझेगी, तभी PE रेश्यो अपनी सामान्य और कम डराने वाली स्थिति में आएगा.

इतने गुणा भाग के बाद अगर आसान भाषा में सब कुछ समझाएं तो-

किसी कंपनी का PE रेश्यो ज़्यादा होने का मतलब, कंपनी के शेयर्स अपनी औक़ात से कुछ ज़्यादा ही महंगे हो गए हैं.

तो यूं अगर IRCTC कमाई कर रहा होता तो शेयर के दाम बढ़ने के बावज़ूद P/E रेश्यो में कोई ख़ास बढ़त नहीं होती. मगर लॉकडाउन वग़ैरह के चलते IRCTC की इनकम तो घट रही थी और शेयर के मूल्य थे कि बढ़ते जा रहे थे. यानी P/E में P बढ़ता ज़ा रहा था और E घटता. और इसलिए हो गई प्रॉफ़िट बुकिंग. क्योंकि अंग्रेज़ी में एक और कहावत है कि वन इन अ हैंड इज़ बैटर देन टू इन अ बुश. यानी सिर्फ़ शेयर के बढ़ते रहने की उम्मीद से पैसे को उसमें लगाए रखने से अच्छा है कि जो प्रॉफ़िट हुआ, उसे इनकैश करवा लिया जाए.

बहरहाल आगे बढ़ते हैं और जिस एक टर्म ‘लोवर सर्किट’ की बात हमने ऊपर की थी उसे समझने का प्रयास करते हैं.

# सर्किट-

हमने ऊपर प्रॉमिस किया था कि आगे हम ‘लोवर सर्किट’ समझेंगे. तो चलिए समझते हैं. दरअसल लोवर सर्किट और अपर सर्किट कुछ हथकंडे हैं SEBI के. जिससे वो शेयर मार्केट को रेगुलेट करती है. SEBI कौन? सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ़ इंडिया. हिंदी में बोलें तो भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड. SEBI, शेयर मार्केट वाली क्लास की मॉनिटर है.

जैसे बैंकिंग वाली क्लास का RBI और इंश्योरेंस वाली क्लास का IRDA है. तो SEBI इन्वेस्टर्स के हितों की रक्षा करने के लिए और आइंदा शेयर मार्केट कोई हर्षद मेहता न पैदा करे, इसके लिए मार्केट को नज़दीक से ऑब्ज़र्व करता है. समय-समय पर कुछ ऐसे नियम लेकर आता है, जिससे बेइमानी या फ़्रॉड करना तो मुश्किल होता ही है, साथ ही वोलेटेलिटी (अस्थिरता) में भी कमी आती है. वोलेटेलिटी बोले तो, बहुत तेज़ी से उतार-चढ़ाव. यूं वोलेटेलिटी में कमी आने से इन्वेस्टर्स को नुक़सान होने की संभावना कम होती है और शेयर मार्केट ‘लो रिस्क इन्वेस्टिंग’ का प्लेटफ़ॉर्म बनता है और जैसा लोग पहले से कहते आते थे कि ‘ये तो जुआ है’, ये इमेज भी बदलती है.

लोवर सर्किट (और अपर सर्किट भी) यही सारे कार्यों को साधने का काम करता है.

आपके मोबाइल में शायद कभी मैसेज आया होगा कि इसकी बैटरी बहुत गर्म हो गई है इसलिए ये बंद हो रहा है. बंद होने के बाद जब मोबाइल कुछ ठंडा हो जाता है तो फिर ठीक से काम करना शुरू कर देता है. तो अपर सर्किट या लोवर सर्किट भी ऐसा ही कुछ मैकेनिज़्म है.

कोई भी शेयर या इंडेस्क अगर दिनभर की ट्रेडिंग में एक निश्चित प्राइस से ऊपर या नीचे जाता है, तो उसमें कुछ समय के लिए या दिनभर के लिए ट्रेडिंग रोक दी जाती है.

अब ऊपर के पैरा में कई चीज़ें समझने वाली हैं:

# 1) निश्चित प्राइस से ऊपर या नीचे जाने का क्या मतलब?

मान लीजिए कोई शेयर कल 100 रुपये पर बंद हुआ, और इसका सर्किट 5 प्रतिशत पर है. तो इसका मतलब ये हुआ कि शेयर का भाव आज के दिन में अगर 105 या 95 होता है तो उस शेयर की ट्रेडिंग रोक दी जाएगी. अगर शेयर का भाव 105 रुपये हुआ तो इसका मतलब इसपर अपर सर्किट लग गया और अगर भाव 95 हुआ तो इसका मतलब इसमें लोवर सर्किट लग गया.

अपर या लोअर सर्किट की रेंज को हम प्राइस बैंड के नाम से जानते है (पिक्चर क्रेडिट – बिज़नेस टुडे)

# 2) वो कौनसे शेयर्स हैं, जिनके लिए सर्किट लगने पर दिनभर के लिए ट्रेडिंग रोक दी जाती है, और वो कौन से शेयर्स हैं जिनके लिए सिर्फ़ कुछ समय के लिए ट्रेडिंग रोकी जाती है?

जो शेयर्स डेरिवेटिव्स में भी ट्रेड करते हैं उनके लिए सर्किट सिर्फ़ कुछ समय के लिए लगता है और जो शेयर्स डेरिवेटिव्स में ट्रेड नहीं करते हैं उनके लिए सर्किट लगने पर दिनभर की ट्रेडिंग रोक दी जाती है.

अब आप पूछेंगे कि, ‘डेरिवेटिव्स में भी ट्रेड करते हैं’ का क्या मतलब हुआ. इसके लिए एक और आसान भाषा में हो जाएगा, ये इतना विशाल कॉन्सेप्ट है. अभी के लिए इतना समझ लीजिए कि कुछ बाढ़िया शेयर्स ऐसे होते हैं जिनमें सिर्फ़ कुछ समय के लिए ट्रेडिंग रुकती है बाकी कुछ कम मार्केट कैप वाले या स्मॉल-मिड कैप शेयर ऐसे होते हैं जिनमें अगर सर्किट लगा तो फिर अगले दिन ही उनमें ट्रेडिंग पॉसिबल है. हम यहां पर अपर सर्किट और लोवर सर्किट दोनों की बात कर रहे हैं.

# 3) कितने प्रतिशत में लगता है सर्किट?

हर शेयर के लिए इसके नियम अलग-अलग हैं, जिसे SEBI बदलता रहता है. जैसे, हो सकता है किसी शेयर में सिर्फ़ 5% का सर्किट लगने पर उसकी ट्रेडिंग दिनभर के लिए बंद हो जाए. फिर कुछ शेयर ऐसे भी होंगे जिनमें 10, 15 या 20 प्रतिशत का सर्किट लगे तभी उसमें दिनभर के लिए ट्रेडिंग बंद हो. फिर कुछ शेयर्स ऐसे भी होंगे जिनमें 10 प्रतिशत का सर्किट लगने पर पहले 15 मिनट के लिए ट्रेडिंग बंद हो, फिर 5 प्रतिशत का एक और सर्किट लगने पर फिर से 15 मिनट के लिए ट्रेडिंग बंद हो जाए.

# 4) क्यों लगते हैं सर्किट?

साफ़ है कि सर्किट के माध्यम से स्टॉक के गिरने या चढ़ने की दर को कंट्रोल किया जा सकता है. अपर और लोवर सर्किट के चलते कोई शेयर एक निश्चित अवधि में, एक निश्चित मात्रा में ही घट बढ़ सकता है. न कम न ज़्यादा. जैसे हमारे उदाहारण में कल 100 रुपये पर बंद हुआ शेयर, आज ज़्यादा से ज़्यादा 105 और कम से कम 95 रुपये पर ही बंद हो सकता है. यूं इन्वेस्टर्स को होने वाले नुक़सान, और बढ़ने की दशा में किसी फ़्रॉड की संभावना घट जाती है. जितने समय में सर्किट लगता है, उतने समय में मार्केट या शेयर भी कुछ कूल ऑफ़ होता है और भेड़ चाल से बचता है. भेड़ चाल बोले तो, अगर कोई शेयर लगातार गिर रहा है, तो हर कोई उसे बेचना चाहेगा. ऐसे में सप्लाई ज़्यादा होने के चलते शेयर और गिरता चला जाएगा, और गिरेगा तो कुछ और लोग उसे बेचेंगे. यूं शेयर के गिरने का एक कुचक्र शुरू हो जाएगा. ऐसा ही शेयर के अंधाधुन बढ़ने में भी होगा. इसलिए सर्किट, जैसा पहले बताया एक तरह का कूलिंग का मैकेनिज़्म है, पैनिक कम करता है.

अच्छा ये तो आपको समझ में आ ही गया होगा कि सर्किट लिमिट शेयर के पिछले दिन के क्लोजिंग प्राइस के आधार पर लगती है, और सिर्फ़ एक दिन या एक ट्रेडिंग सेशन के लिए मान्य होती है. यानी हर दिन ये सर्किट बदल जाता है. एक दूसरी बात भी बता दें, कि अपर या लोवर सर्किट की रेंज को हम प्राइस बैंड के नाम से जानते है. जैसे हमारे 100 रुपये वाले शेयर का आज का प्राइस बैंड 95-105 होगा.

# 5) इंडेक्स क्या होता है और इसमें कैसे लगता है सर्किट?

आप सुनते हैं न कि आज निफ़्टी-फ़िफ़्टी, 200 पॉइंट ऊपर चला गया, सेंसेक्स 500 पॉइंट नीचे चला गया. तो दरअसल निफ़्टी और सेंसेक्स इंडेक्स हैं. इंडेक्स बोले तो, ये कोई शेयर नहीं बल्कि शेयर्स का गुच्छा होते हैं. जैसे निफ़्टी, 50 बड़े और अच्छे शेयर्स का और सेंसेक्स, 30 बड़े और अच्छे शेयर्स का. यानी निफ़्टी बताता है कि भारत के 50 बड़े शेयर्स की औसत चाल क्या रही. अगर इसमें लिस्टेड ज़्यादातर शेयर्स बढ़े हैं तो निफ़्टी भी उस दिन बढ़ेगा, और अगर इसमें लिस्टेड ज़्यादातर शेयर्स घटे हैं या फिर कुछ ही शेयर्स इतने ज़्यादा घटे हैं, कि बढ़ने वाले शेयर्स की बढ़त को भी ज़ीरो आउट कर गए हैं तो निफ़्टी उस दिन घटेगा.

वो आपने बचपन में गणित के सवाल हल किए हैं न, ‘क्लास की औसत हाइट क्या है?’ वाले, ठीक वैसे ही निफ़्टी टॉप 50 शेयर्स की औसत चाल और सेंसेक्स टॉप 30 शेयर्स की औसत चाल दिखाता है. और जिस तरह शेयर्स में सर्किट लगता है वैसे ही इंडेक्सेज में भी सर्किट लग जाता है. इंडेक्सेज में सर्किट लगने का मतलब ये हुआ कि अब एक निश्चित समय के लिए किसी भी शेयर में ट्रेडिंग नहीं होगी. यानी एक निश्चित समय के लिए पूरा शेयर मार्केट बंद. अब हर इंडीविजुअल शेयर के लिए तो अलग-अलग प्राइस बैंड या सर्किट हैं, लेकिन इंडेक्स के सर्किट बहुत स्पेसिफ़िक हैं और इन्हें समझना भी आसान है.

# अगर इंडेक्स यानी सेंसेक्स या निफ़्टी दोपहर 1 बजे से पहले अपने प्रीवियस क्लोज प्राइस से 10% ऊपर या नीचे जाता है, यानी इंडेक्स में 10% की बढ़त या गिरावट देखने को मिलती है तो ट्रेडिंग 45 मिनट के लिए रोक दी जाती है.

# इसी तरह दोपहर 1 से 2:30 बजे के दौरान 10% बढ़ने या घटने पर ट्रेडिंग सिर्फ़ 15 मिनट के लिए रोकी जाती है. लेकिन अगर यही 10% की बढ़त या गिरावट दोपहर 2:30 बजे के बाद हो तो ट्रेडिंग नहीं रोकी जाती.

# ठीक इसी तरह अगर दोपहर 1 बजे से पहले 15% की बढ़त या गिरावट हो तो ट्रेडिंग 1 घंटे 45 मिनट के लिए रोक दी जाती है.

# दोपहर 1 से 2:30 के बीच 15% की बढ़त या गिरावट होने पर ट्रेडिंग 45 मिनट के लिए रोकी जाती है. और अगर यही मूवमेंट दोपहर 2:30 के बाद हो तो ट्रेडिंग उस दिन के बचे हुए ट्रेडिंग सेशन के लिए रोक दी जाती है और फिर बाज़ार अगले दिन ही खुलता है.

# लेकिन अगर किसी दिन इंडेक्स 20% घट या बढ़ जाते हैं. फिर चाहे वो दिन के किसी भी समय घटें-बढ़ें, तो ट्रेडिंग पूरे दिन या ट्रेडिंग सेशन के लिए रोक दी जाती है, फिर मार्केट अगले ट्रेडिंग सेशन में ही खुलता है.

19 अक्टूबर के ढाई बजे से लेकर 20 अक्टूबर को मार्केट क्लोज़ होने तक IRCTC का शेयर 29.99% नीचे गिर चुका था.

# स्टॉक स्प्लिट

अब आप कहेंगे ये क्या बला है और हम इसकी बात क्यों कर रहे है. दरअसल IRCTC की बोर्ड मीटिंग में स्टॉक को स्प्लिट करने की बात हुई है जिसकी रिकॉर्ड डेट 29 अक्टूबर रखी गई है. यानी उस दिन IRCTC का स्टॉक स्प्लिट हो जाएगा.

अब आसान भाषा में समझिए कि स्टॉक स्प्लिट क्या होता है.

स्प्लिट का शब्दशः मतलब हुआ किसी चीज़ को दो या दो से अधिक भागों में बांटना. जैसे, मान लीजिये आपके पास 2,000 का नोट है और आपको इसके छुट्टे करवाने हैं. आप किसी दुकानदार के या ऑटो वाले के पास जाएंगे और दुकान वाला आपको 200 रुपये के 10 नोट या फिर 100 रुपये के 20 नोट दे देगा और आपके 2,000 रुपयों को अच्छे से जांच परख के अपने गल्ले में रख देगा. यूं न दुकानदार को कोई फ़ायदा-नुक़सान हुआ न आपको. बस आपका काम बन गया. यूं अगर दुकानदार ने आपको 200 के 10 नोट दिए तो आपका नोट 1:10 के रेश्यो में और अगर दुकानदार ने आपको 100 के 20 नोट दिए तो आपका नोट 1:20 के रेश्यो में स्प्लिट हो गया. ऐसा ही शेयर के मामले में है.

IRCTC का 1:5 के रेश्यो में स्टॉक स्प्लिट का प्लान है. यानी शेयरधारकों को हर पुराने एक शेयर के बदले नए 5 शेयर मिलेंगे. लेकिन इससे IRCTC के शेयर धारकों को ‘तत्काल’ (पन इटेंडेड) या बाकी चीज़ों के नियत रहने पर भविष्य में कभी भी कोई फ़ायदा या नुक़सान नहीं होगा. क्यों? वही 2,000 रुपये वाले उदाहरण को रिकॉल कीजिए. इसी तरह अगर 29 अक्टूबर, 2021 को IRCTC के शेयर का रेट 5,000 रुपये हुआ तो शेयर धारकों को हर शेयर के बदले हज़ार-हज़ार रुपये के 5 शेयर्स मिल जाएंगे.

20 अक्टूबर को IRCTC 4,415 पॉइंट के करीब पर बंद हुआ.

तो फिर शेयर स्प्लिट किया क्यों? जब ऊपर की गणित से साफ़ है कि शेयर स्प्लिट से न इंवेस्टर्स, न कंपनी को कोई आर्थिक फ़ायदा होता है, फिर भी कोई कंपनी ऐसा क्यों करती है? उत्तर 2,000 रुपये के स्प्लिट में छुपा है. आपने जब उसके छुट्टे करवाए, तब आपको भी तो कोई फ़ायदा न हुआ, फिर क्यों करवाए? क्योंकि बेशक आपको आर्थिक रूप से कोई फ़ायदा न हुआ हो, लेकिन आपका काम आसान हो गया. अगर 10 रुपये की कोई चीज़ ख़रीदनी है तो फिर भी 100 रुपये का नोट चल जाएगा, 2,000 का थोड़े न चलेगा.

ऐसा ही शेयर्स के मामले में भी है. स्टॉक स्प्लिट होते ही मार्केट में शेयर की संख्या बढ़ जाती है. और शेयर का प्राइस कम होने पर छोटे निवेशक भी उस शेयर को खरीद सकते है. जैसे MRF के शेयर का प्राइस करीब 82,000 है. और कोई इन्वेस्टर आधा पौना शेयर ख़रीद नहीं सकता. यूं अगर आपको MRF में इन्वेस्ट करना है तो कम से कम 82,000 रुपये आपकी जेब में होने चाहिए. और इसी गुणांक में यानी 82,000… 1,64,000… 2,46,000… एंड सो ऑन. मतलब आपके पास डेढ़ लाख रुपये हों तो भी आप सिर्फ़ एक ही शेयर ख़रीद पाएंगे. अब अगर MRF इस स्टॉक को 1:10 के रेश्यो में स्प्लिट कर दें तो कंपनी की मार्केट कैप और शेयर धारकों के इन्वेस्टमेंट में तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, लेकिन अब हर शेयर का दाम 8,200 रुपये हो जाएगा. यानी कम पूंजी वाले निवेशक भी इसे खरीद सकेंगे.

इसी के चलते स्प्लिट होते ही शेयर के वॉल्यूम में बढ़ोतरी देखने को मिलती है, ज्यादा लोग शेयर को खरीदते है जिससे धीरे धीरे शेयर का प्राइस मार्केट में बढ़ जाता है. हालांकि ऐसा हमेशा हो ये ज़रूरी नहीं. इसलिए ही तो MRF जैसे शेयर्स स्प्लिट नहीं होते, क्योंकि कहा जाता है कि महंगे शेयर्स में ‘सीरियस’ और ‘लॉन्ग टाइम इन्वेस्टर्स’ ही इन्वेस्ट करते हैं.

बहरहाल अंत में ये भी जान लीजिए कि अगर आपको महंगे शेयर्स में इन्वेस्ट करना है तो आप कम पूंजी के साथ भी ऐसा कर सकते हैं. कैसे? उत्तर है: म्यूचुअल फंड. जिसके बारे में आप हमारी इस स्टोरी में पढ़ सकते हैं. अभी के लिए विदा. हैप्पी इन्वेस्टिंग.

ये स्टोरी हमारे साथ इंटर्नशिप कर रहीं सुरभि के साथ मिलकर लिखी गई है.

पिछले वीडियो देखें – पैंडोरा पेपर्स: आप पेट्रोल-माचिस पर टैक्स देते रहे, धुरंधरों ने टैक्स चोरी के नए तरीके निकाल लिए

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