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ईरान में लगातार हो रहे हमले के पीछे कौन है?

आज की कहानी है कुछ अलग से जासूसों की. ऐसे जासूस, जो अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे दुनिया की सबसे बड़ी गुप्त जानकारियां चुरा लाते हैं. दुश्मन क्या सोच रहा है? उसके पास कितने हथियार हैं? ये सब पता लगाने के अलावा वो दुश्मन के घर में घुसकर उसके हथियार भी तबाह कर आते हैं.

आज की कहानी में एक और मिस्ट्री है. ये मिस्ट्री है एक देश में आए दिन हो रही आगजनियों की. कभी किसी न्यूक्लियर साइट में आग लग जाती है. कभी मिसाइल बनाने की फैक्ट्री जल जाती है. कभी सेना की छावनी, कभी जहाज़ बनाने का कारखाना. कोई है, जो इस देश के सबसे टॉप, सबसे सीक्रेट ठिकानों को जलाने में लगा है.

कौन है ये देश? क्या कहानी है इन रहस्यमय आगजनियों की?

इन सबका कुर्सी पर बैठे-बैठे कमाल कर जाने वाले दुश्मन देश के जासूसों से क्या रिश्ता है? आज यही सब बताएंगे आपको. मगर इन सबकी शुरुआत करते हैं फ्लैशबैक से.

Natanz Iran
ईरान का नतांज़ शहर (गूगल मैप्स)

ईरान में नतांज़ नाम का एक शहर है. यहां शहर से करीब 25-30 किलोमीटर दूर है एक बड़ा सा कंपाउंड. इस कंपाउंड के भीतर तीन अंडरग्राउंड इमारतें हैं. ये लोकेशन कहलाती है- नतांज़ फ्यूल ऐनरिचमेंट प्लांट. ये कंपाउंड ईरान न्यूक्लियर प्रोग्राम के सबसे अहम ठिकानों में से एक है. समझिए कि न्यूक्लियर बम बनाने का सबसे ज़रूरी मसाला इन्हीं इमारतों में बनता है.

इन इमारतों में क्या काम होता है, ये समझने के लिए हमको साइंस में घुसना होगा. साधारण यूरेनियम से न्यूक्लियर बम नहीं बनता. इसके लिए चाहिए होता है हाइली एनरिच्ड यूरेनियम. इसको शॉर्ट में कहते हैं, HEU.ये HEU यूरेनियम में पाए जाने वाले U235 अणुओं का ताकतवर रूप हैं. U235 को एनरिच बनाने का काम करते हैं, सेंट्रफ्यूज़ेस. सेंट्रफ्यूज़ेस को समझिए बहुत तेज़ रफ़्तार में घूमने वाली मशीनें. ये मशीनें यूरेनियम हेक्साफ्लूओराइड गैस के सहारे यूरेनियम को एनरिच करती हैं.

ऑपरेशन ओलिंपिक गेम्स

ईरान के नतांज़ प्लांट में यही सेंट्रफ्यूज़ेस मशीनें लगी हैं. 2006 में ईरान ने यहां यूरेनियम एनरिचमेंट का काम शुरू कर दिया. उसे रोकने के लिए बातचीत और आर्थिक प्रतिबंध कुछ काम नहीं आ रहे थे. ऐसे में खोजा गया एक तीसरा तरीका. इसी तीसरे रास्ते को अंजाम देने के लिए प्लानिंग हुई एक सीक्रेट ऑपरेशन की. इसका नाम था- ऑपरेशन ओलिंपिक गेम्स. और इसी सीक्रेट ऑपरेशन में काम आए कुर्सी पर बैठे वो जासूस, जिनका ज़िक्र हमने एपिसोड की शुरुआत में किया था.

Operation Olympic Games
ऑपरेशन ओलिंपिक गेम्स (फोटो: न्यूयॉर्क टाइम्स)

कौन थे ये जासूस? ये थे यूनिट 8200 का हिस्सा. ये यूनिट 8200 क्या है? इज़रायली डिफेंस फोर्सेज़ के सबसे वरिष्ठ हिस्सों में से एक है- मिलिटरी इंटेलिजेंस डायरेक्टोरेट. शॉर्ट में, MID. इसका काम है, सरकार और सेना को खुफ़िया जानकारियां देना. उन्हें किसी आने वाले ख़तरे के प्रति पहले से आगाह करना. MID बनी है तीन मुख्य यूनिट्स से. एक, यूनिट 8200. दूसरी, यूनिट 9900. तीसरी, यूनिट 504. इन तीनों में से सबसे बड़ी है यूनिट 8200.

क्या काम है इस यूनिट का? इसका काम है, कंप्यूटर के रास्ते देश की हिफ़ाजत करना. ये यूनिट दुश्मन के कंप्यूटर सिस्टम में सेंध लगाकर वहां से जानकारियां उड़ा लेती है. लेकिन ऑपरेशन ओलिंपिक गेम्स बस जानकारियां उड़ाने तक सीमित नहीं था. इस ऑपरेशन का मकसद था ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम का भट्ठा बैठाना. इसके लिए यूनिट 8200 ने अमेरिका की नैशनल सिक्यॉरिटी एजेंसी (NSA) के साथ मिलकर बनाया एक टॉप सीक्रेट साइबर वॉर प्रोग्राम.

Mid
इज़रायली डिफेंस फोर्सेज़ की मिलिटरी इंटेलिजेंस डायरेक्टोरेट.

ऐक्सिडेंट या साइबर अटैक?

इस प्रोग्राम की शुरुआत हुई 2006 में. सबसे पहले नतांज़ प्लांट के कंप्यूटरों की टोह ली गई. उनका कन्फ़िगरेशन पता किया गया. प्लांट में क्या कैसे होता है, इसका पूरा मैप बनाया गया. फिर इस डेटा के सहारे तैयार किया गया एक बेहद जटिल वर्म प्रोग्राम. इस वर्म को नतांज़ प्लांट के कंप्यूटर कंट्रोलर्स में छोड़ दिया गया. ये वही कंप्यूटर कंट्रोलर्स थे, जो इस प्लांट में लगी हज़ारों सेंट्रफ्यूज़ेस मशीनों को चलाते थे.

इस वर्म प्रोग्राम ने सेंट्रफ्यूज़ेस मशीनों के साथ क्या किया? उनके घूमने की रफ़्तार बदल दी. कुछ मशीनें बहुत ही तेज़ रफ़्तार से घूमने लगीं और कुछ हो गईं बेहद धीमी. वो अनियंत्रित हो गईं. उनकी मशीनरी ख़राब हो गई. कई मशीनें तो फट भी गईं. नतांज प्लांट के इंजिनियरों को कुछ समझ ही नहीं आ रहा था. शुरुआत में उन्हें लगा, कोई ऐक्सिडेंट हुआ है. बाद में उन्हें पता चला कि ये सब साइबर अटैक का नतीजा है. ईरान ने प्लांट की सुरक्षा के लिए नया साइबर सिक्यॉरिटी प्रोग्राम बनाया.

Natanz Plant
नतांज़ प्लांट (फोटो: एएफपी)

खेल यहां खत्म नहीं हुआ!

तो क्या ईरान के नए साइबर प्रोग्राम ने यूनिट 8200 को रोक लिया? जवाब है, नहीं. इस वक़्त तक यूनिट 8200 और NSA मिलकर नए साइबर हथियार बना चुके थे. इनके नए वर्म्स ने अटैक किया साल 2010 में. इसने ईरान की करीब एक हज़ार सेंट्रफ्यूज़ेस को तबाह कर दिया. ये ईरानी न्यूक्लियर प्रोग्राम के लिए बहुत बड़ा झटका था. 2006 से 2010 के बीच चले इस साइबर अटैक के कारण ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम कई साल पीछे चला गया.

अब आप सवाल करेंगे. ये 2010 का पोथा हम आज क्यों सुना रहे हैं आपको? याद है, हमने शुरुआत में रहस्यमय आगज़नी की कहानी सुनाई थी. वो कहानी भी ईरान से जुड़ी है.

पिछले तीन हफ़्ते से वहां एक के बाद एक कई रहस्यमय दुर्घटनाएं हो रही हैं. इन हादसों में लेटेस्ट है ईरान के एक शिपयार्ड में लगी आग. शिपयार्ड माने वो जगह जहां जहाज़ बनते हैं, उनकी मरम्मत होती है. 15 जुलाई को दोपहर बाद ख़बर आई कि ईरान के बुशेहर शहर स्थित शिपयार्ड में आग लग गई है. इसमें सात से ज़्यादा जहाज़ जल गए. आग इतनी तेज़ थी कि इसको बुझाने में 10 घंटे से ज़्यादा लग गए. आग क्यों लगी, इसकी वजह अभी किसी को नहीं मालूम. ये दुर्घटना थी या किसी तरह के अटैक का नतीजा, अभी कोई नहीं जानता. लेकिन जिस तरह ईरान में लगातार हादसे हो रहे हैं, उससे ये शक़ बन रहा है कि शायद इनके पीछे इज़रायल का हाथ है.

Iran Shipyard Fire
15 जुलाई को ईरान के बुशेहर शहर स्थित शिपयार्ड में लगी आग. (फोटो: एपी)

इस शक़ की वजह क्या है? क्या बस तुक्के में इज़रायल का नाम लिया जा रहा है? इन सवालों का जवाब पक्के तौर पर किसी को नहीं पता. लेकिन बीते दिनों ईरान में जो हादसे हुए, उनका ब्योरा सुनकर शायद कुछ संकेत मिले आपको. तो सुनिए पिछले दिनों हुए दो बड़े हाई-प्रोफाइल हादसों का ब्योरा.

पहला हादसा

राजधानी तेहरान से करीब 30 किलोमीटर दक्षिण में एक जगह है- परचिन. यहां ईरान का एक हाई सिक्यॉरिटी सैन्य बेस है. 26 जून को इसी बेस में एक ज़ोरदार धमाका हुआ. ये ब्लास्ट इतना तगड़ा था कि इसकी लपटों की रोशनी 30 किलोमीटर दूर तेहरान तक दिखाई दी.

हादसा जान लिया आपने. अब जानिए परचिन साइट की वैल्यू. इस जगह पर बनती हैं ईरान की बलिस्टिक मिसाइलें. आरोप है कि 2004 में इसी जगह पर ईरान ने हाई एक्सप्लोज़िव टेस्ट किया था. ये टेस्ट न्यूक्लियर प्रोग्राम से जुड़ा था. 2018 में इज़रायली एजेंट्स ने तेहरान की कई टॉप सीक्रेट फाइलें उड़ाईं. इसमें कई दस्तावेज़ और तस्वीरें थीं. इनसे परचिन साइट पर हो रही न्यूक्लियर ऐक्टिविटी का ब्योरा सामने आया.

Parchin Blast
परचिन में ब्लास्ट के बाद का सैटेलाइट फोटो.

दूसरा हादसा

2 जुलाई की बात है. रात के करीब दो बजे थे, जब ईरान के नतांज़ न्यूक्लियर प्लांट की एक बिल्डिंग में आग लग गई. ईरानी अधिकारियों ने शुरुआत में इसे छुपाने की कोशिश की. कहा, एक शेड में आग लगी है. मगर ईरान झूठ बोल रहा था. ये धमाका नतांज प्लांट की उस इमारत में हुआ, जहां अडवांस सेंट्रफ्यूज़ेस मशीनों का कारखाना था. ये ब्लास्ट इतना तगड़ा था कि दो मंजिला बिल्डिंग की छत उड़ गई. बिल्डिंग का मुख्य हिस्सा अंडरग्राउंड है. वहां कितना नुकसान हुआ, ये नहीं पता. हां, ये ज़रूर पता है कि ब्लास्ट के फौरन बाद ईरान के न्यूक्लियर चीफ़ अली अकबर सलेही भागे-भागे नतांज़ प्लांट पहुंचे थे.

Ali Akbar Salehi
ईरान के न्यूक्लियर चीफ़ अली अकबर सलेही (फोटो: एपी)

बाद में जब सैटेलाइट तस्वीरों के सहारे नतांज़ प्लांट को हुए नुकसान के सबूत आने लगे, तब ईरान ने यू-टर्न लिया. उसने कबूला कि इस धमाके के कारण न्यूक्लियर एनरिचमेंट के उसके प्रोग्राम को बड़ा झटका लगा है. ईरान की सरकारी न्यूज़ एजेंसी IRNA का भी बयान आया इसपर. इसमें ब्लास्ट के पीछे इज़रायल और अमेरिका का हाथ होने की आशंका जताई गई थी. जानते हैं, 2 जुलाई वाला ये ब्लास्ट उस बिल्डिंग में हुआ, जिसके ठीक बगल वाली इमारत में 10 साल पहले ऑपरेशन ओलिंपिक गेम्स को अंजाम दिया गया था.

Natanz Plant After Explosion
हमले के बाद ईरान का नतांज़ प्लांट (फोटो: एपी)

कहीं प्लांट में आग तो कहीं गैस लीक

क्या इतने ही हादसे हुए ईरान में? नहीं. और भी कई हादसे हुए हैं. मसलन, 3 जुलाई को शिराज़ पावर प्लांट में लगी आग. 4 जुलाई को अहवाज़ पावर प्लांट में लगी आग. 4 जुलाई को ही करोऊं पेट्रोकेमिकल प्लांट में हुआ गैस लीक. 7 जुलाई को तेहरान के एक कारखाने में लगी आग.

इन हादसों से पहले 9 मई को ईरान के शाहिद रजाई बंदरगाह पर एक बड़ा साइबर अटैक भी हो चुका है. उस हमले में क्या हुआ? जहाज़ों, ट्रकों और बंदरगाह पर आने वाले सामान की आवाजाही को मैनेज करने वाले कंप्यूटर्स एकसाथ ठप पड़ गए. कई दिनों तक पूरे बंदरगाह का कामकाज रुका रहा. 19 मई को वॉशिंगटन पोस्ट में छपी एक ख़बर के मुताबिक, इस साइबर अटैक के पीछे इज़रायल का हाथ होने की आशंका है. ख़बरों के मुताबिक, पहले ईरान ने इज़रायल पर साइबर अटैक किया. ईरानी हैकर्स ने इज़रायली जल वितरण सिस्टम में सेंध लगाने की कोशिश की थी. इसी के जवाब में इज़रायल ने ईरानी पोर्ट को अटैक किया.

इज़रायल क्या कहता है?

जानकारों के मुताबिक, बीते दिनों ईरान में जितने हादसे हुए उनमें से कुछ सच में दुर्घटनाएं हो सकती हैं. मगर नतांज़ प्लांट ब्लास्ट जैसे मामलों के पीछे इज़रायल का हाथ होने की मज़बूत आशंका है. 2 जुलाई वाली घटना को लेकर पत्रकारों ने इज़रायल के विदेश मंत्री गाबी अशकेनाज़ी से सवाल भी पूछा. उनका जवाब था-

हम ऐसे काम करते हैं, जिन्हें लेकर कोई टिप्पणी न ही की जाए तो बेहतर है.

Gabi Ashkenazi
इज़रायल के विदेश मंत्री गाबी अशकेनाज़ी (फोटो: एएफपी)

पता नहीं, 2 जुलाई वाली घटना का इस बात से कोई रिश्ता है कि नहीं. लेकिन इस घटना के तीन दिन बाद 5 जुलाई को मोसाद के मुखिया योसी कोहेन का कार्यकाल बढ़ा दिया गया. एक और इनाम बंटा इज़रायल में. पता नहीं, उस इनाम का ईरान के शाहिद रजाई बंदरगाह पर हुए साइबर अटैक से कोई लिंक है या नहीं. लेकिन 25 जून को इज़रायल ने यूनिट 8200 के जवानों को स्पेशल मेडल ज़रूर दिए थे. इस मौके पर IDF की तरफ से जारी बयान में लिखा था-

मिलिटरी इंटेलिजेंस के इन जवानों को हाल ही में अंजाम दिए गए सीक्रेट ऑपरेशन की कामयाबी पर सम्मानित किया जा रहा है.

Yossi Cohen
मोसाद के मुखिया योसी कोहेन (फोटो: एएफपी)

इज़रायल क्या चाहता है?

अब सवाल है कि अगर इन हादसों के पीछे इज़रायल का ही हाथ है, तो इसकी वजह क्या है? एकाएक ईरान पर हमले क्यों तेज़ हो गए हैं?

वजह हैं बेंजामिन नेतन्याहू. ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम की तरफ बढ़ना इज़रायली अस्तित्व पर ख़तरा है. नेतन्याहू की नज़र है है नवंबर 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव पर. अगर चुनाव में जो बाइडन जीत गए, तो ईरान के साथ न्यूक्लियर डील फिर ज़िंदा हो सकती है. नेतन्याहू ये नहीं होने देना चाहते. यानी अब ईरान को पीछे धकेलने के लिए उनके पास बहुत कम दिन बचे हैं. और शायद यही वजह है ईरान में हो रहे रहस्यमय हादसों की.

नेतन्याहू जानते हैं कि ईरान अभी कमज़ोर है. वो जवाबी हमला करने की स्थिति में नहीं है. ईरान के मौजूदा राष्ट्रपति हसन रूहानी भी खुलकर हमला नहीं करना चाहते. इसीलिए सुलेमानी की हत्या के बाद जब ईरान ने इराक स्थित अमेरिकी ठिकानों पर हमला किया, तो इस बारे में पहले ही बगदाद को ख़बर भेज दी. रूहानी का कार्यकाल अगले बरस पूरा हो रहा है. ईरान के नज़रिये से देखें, तो रूहानी लिबरल हैं. बातचीत से चीजें सुलझाने की बात करते हैं. मगर उनकी इस नीति से ईरान को फ़ायदा नहीं हुआ. बहुत मुमकिन है, अगले साल उनकी जगह हार्डलाइनर्स सत्ता में आएं. वहां अभी से ही हार्डलाइनर्स का ज़ोर दिखने लगा है. मसलन, हार्डलाइनर्स ग्रुप के मुहम्मद बाग़ेर ग़ालिबाफ़. जो कि ईरानी संसद के नए स्पीकर हैं. वो ईरानी रेवॉल्यूशनरी गार्ड्स के पूर्व कमांडर रहे हैं. अमेरिका से बातचीत करके हालात सामान्य करना उनकी टेक्स्टबुक से बाहर है.

ये सारी स्थिति इज़रायल भी कैलकुलेट कर रहा है. शायद इसीलिए उसने ईरान के खिलाफ़ कोवर्ट ऑपरेशन्स तेज़ कर दिए हैं. ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को पटरी से उतारने का उसका ये पुराना फॉर्म्युला है. इसी फॉर्म्युले की एक मिसाल देता हूं आपको. कुछ बरस पहले ईरान में आएदिन वैज्ञानिकों पर हमले होने लगे. इन वैज्ञानिकों का रिश्ता ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम से था. 2007 से 2012 के बीच ईरान के पांच टॉप न्यूक्लियर वैज्ञानिकों की हत्या हो गई. किसी की कार पर बम चिपकाकर उसे उड़ा दिया गया. किसी को गोली मार दी गई. किसी को ज़हरीली गैस सुंघाकर मार दिया गया.

Mohammad Bagher Ghalibaf
ईरानी संसद के नए स्पीकर मुहम्मद बाग़ेर ग़ालिबाफ़ (फोटो: एएफपी)

ये तो वो वैज्ञानिक थे, जो मारे गए. इनके अलावा दर्जनों ऐसे न्यूक्लियर साइंटिस्ट भी थे, जो हमले में बाल-बाल बच गए. ईरान समेत पूरी दुनिया को इज़रायल पर शक़ था. ऑस्ट्रेलिया की ABC न्यूज़ एजेंसी ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा-

अमेरिका आरोप ख़ारिज करता है. इज़राइली भी इससे इनकार करते हैं, मगर मुस्कुराते हुए. ईरान के न्यूक्लियर साइंटिस्ट्स को कौन मार रहा है? इज़रायल? अमेरिका? या फिर ख़ुद ईरान? ये कौन वाली बात भले एक सवाल हो. मगर इस बात में कोई शक़ नहीं कि ईरान के कथित न्यूक्लियर हथियार प्रोग्राम से जुड़े साइंटिस्ट्स, रिसर्चर और अधिकारी लगातार मरते जा रहे हैं.


विडियो- ईरान ने चाबहार रेल प्रोजेक्ट से भारत को क्यों डिरेल कर दिया?

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