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संजय मिश्रा का Interview: 'इस सूरज ने तुम्हें पैदा होते देखा है और मरते भी देखेगा'

'सत्या', 'न्यूटन', 'मसान', 'आंखों देखी', 'कड़वी हवा' जैसी फिल्मों के अदाकार संजय मिश्रा से बातचीत.

केतन मेहता की 1995 में आई फिल्म ‘ओ डार्लिंग ये है इंडिया’ से एक्टिंग में डेब्यू करने वाले संजय मिश्रा बाद में ‘दिल से’, ‘सत्या’ जैसी फिल्मों में ग्रे शेड वाले रोल्स में दिखे. रोल छोटे से थे लेकिन आज भी ताज़ा हैं. करियर में दूसरा पड़ाव कॉमेडी रोल्स का था. उन्होंने ‘गोलमाल’, ‘धमाल’, ‘ऑल द बेस्ट’, ‘वन टू थ्री’, ‘ऑफिस ऑफिस’, ‘अतिथि तुम कब जाओगे’, ‘सतरंगी पैराशूट’ जैसी कई फिल्मों में खूब हंसाया.

फिर तीसरा पड़ाव था मुख्य भूमिकाओं में उनकी मौजूदगी. उन्होंने ‘आंखों देखी’, ‘मसान’, ‘फंस गए रे ओबामा’, ‘सारे जहां से महंगा’, ‘दम लगाके हईशा’ जैसी फिल्मों में अहम रोल किए और इन फिल्मों के विषय भी बहुत सराहे गए. आज जब वे 55 साल के हो रहे हैं, उनके पास हर तरह के ऑफर हैं. बड़ी फिल्मों में छोटे रोल भी और उनके कंधों पर टिकी पूरी फिल्में भी. ऐसा बड़ा दर्शक वर्ग तैयार हो चुका है जो कोई फिल्म सिर्फ इसलिए देखता है कि उसमें संजय मिश्रा होते हैं.

जन्मदिन के मौके पर ‘द लल्लनटॉप’ ने उनसे बात की. पढ़ें इंटरव्यू:

बर्थडे मनाने पर आपकी सोच क्या है?
एक particular date होता है जो अहसास कराता है कि आप थोड़े बड़े हुए हैं. उम्र में. आप आज के दिन पैदा हुए थे. बस. यही फिलॉसफी है. जैसे आप किसी को पूछें बर्थडे कब था तो जिस दिन कढ़ी बनी थी यार.

मृत्यु को कैसे परिभाषित किया है अपने विचारों में?
जिस दिन आप पैदा होते हैं उसी दिन आप मौत की तरफ बढ़ना शुरू करते हैं. ये इंसानों में ही नहीं पत्तों में भी है. जो एक नन्हा, कोमल, छोटा पत्ता निकलता है तो पीला होने के लिए. पीला होकर उसे झड़ ही जाना है. आपके पैदा होते ही डेथ आपके बग़ल में सो जाता है.

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‘प्रणाम वालेकुम’ आपने डायरेक्ट की है. रिलीज कब होगी?
ये फिल्म बात करती है कि चलो गंगा नहाते हैं, मदीना सर झुकाते हैं, एक पौधा लगाते हैं और इंसान बन जाते हैं. ये इंसानियत की बात करती है. थोड़ा सा मसला है प्रोड्यूसर-फाइनेंसर का, वो ठीक हो जाएगा तो रिलीज होगी. बनकर तैयार है.

क्या कह सकते हैं ‘मसान’, ‘आंखों देखी’ ने आपको सबसे ज्यादा संतुष्ट किया है?
हां, मतलब एक एक्टर के तौर पर मुझे बहुत कमर्शियल रोल मिले हैं. लेकिन इन फिल्मों में मैंने अपने आप को अलग पाया है. मेरे चाहने वालों, दर्शकों को भी अलग कुछ दिया. ‘फंस गए रे ओबामा’ से शुरुआत हुई थी. फिर ‘आंखों देखी’, ‘मसान’, ‘दम लगाके हईशा’ ये सारी फिल्में बहुत अलग-अलग इसी प्रकार की थीं.

‘‌वॉर छोड़ न यार’ भी थी.
हां, ‘वॉर छोड़ न यार’. मैं खुशनसीब हूं कि मुझे ऐसे रेंज ऑफ रोल्स मिलते हैं. ऐसा भी मिलता है और वैसा भी मिल जाता है.

‘आंखों देखी’ में आपके पात्र बाबूजी के बदलाव भरे विचारों को कहां ट्रेस कर सकते हैं?
ये ऐसा विचार है कि अभी में जियो. इस क्षण जियो. मैं उस चीज़ को बिलीव ही क्यों करूं जिसको मैंने देखा नहीं है. कभी कभी आप कहते है कि यार फलना गजिंदर बड़ा कमीना आदमी है, बड़ा गंदा आदमी है यार.. और फिर आप उसके प्रति एक इमेज बना लेते हो. कि यार वो गंदा ही होगा. वो गलत होगा. लेकिन जब उसको मिलते हो तो लगता है कि यार, अरे! ये तो कुछ और ही था. हो सकता है आप दूसरों के लिए गलत हो, लेकिन मेरे लिए ठीक हो. संभावनाओं का खेल है. जिंदगी को हम ज्यादातर कैसे देखते हैं? कि जैसे मेरे बाबा जिए वैसे मैं भी जी लूं. आम मानसिकता यही होती है न कि भई 30 का हो गया है शादी कराओ इसकी, क्योंकि आपके फादर की भी इतने में ही हुई है जी. शादी हो गई है अब बेटी बच्चों के लिए कुछ करो, जाओ, कमाओ. बस आप कमाने लग गए. आप जीवन के पैशन को नहीं जोड़ते हैं क्योंकि आप सुनी-सुनाई, रटी-रटाई बातों पर चलते हैं. ये जीवन को समझने का रहस्य है कि एक ही जिंदगी मिली है हम वैसा क्यों मान लें कि बॉस, वही होता है जो हमेशा होता आया है, हम क्यों न, दूसरा पहलू देखने की कोशिश करें.

आंखों देखी में संजय.
आंखों देखी में संजय.

फिल्म का क्लाइमैक्स होता है कि वो अंत में उड़ता है या आत्महत्या करता है.
आत्महत्या नहीं करता है, वो उड़ता है. और पिक्चर का एंड कहीं ऐसा नहीं दिखाया गया है कि उसकी डेड बॉडी पड़ी हुई है. वो उड़ता है. फिल्म की शुरुआत देखेंगे तो आवाज आती है कि मैं उड़ रहा हूं.

जब वो छलांग लगाने के लिए जाता है तो उससे पहले पत्नी को रेस्टोरेंट ले जाता है, फिर सोती हुई को विश करके जैसे रवाना होता है उससे तो यही लगता है कि चीजों को जानने की अपनी यात्रा में कहीं वो उड़ने को यूं आजमाना चाहता है. जैसे कि वो शेर को शेर नहीं मानता जब तक दहाड़ नहीं सुन लेता और फिर डर जाता है. या जैसे बिजली को छुए बगैर मानने को तैयार नहीं कि झटका लगता है. वैसे ही उड़कर देखना चाहता है लेकिन उसका भी तो नतीजा होगा, जो उड़ना नहीं हो सकता.
पूरी पिक्चर फ्लैशबैक में है. अगर तुम बहुत ध्यान से पिक्चर सुनोगे ना, तो शुरुआत में ही वो वॉयस आती है बाबूजी की, “मैं उड़ रहा हूं. उड़ रहा हूं गगन को चीरता मक्खन की तरह”. फिर उसकी बेटी की कहानी आती है. और फिर अंत वहीं होता है, मैं उड़ रहा हूं. वो मरा नहीं है. कहीं गया नहीं है. वो उड़ रहा है.

वो ऐसा विचार है कि उससे आगे दर्शकों को सोचने की जरूरत नहीं है?
उसके आगे जरूरत ही नहीं है. कोई बोलेगा बेवकूफ है बॉडी दिखा दिए होते, लेकिन वो (डायरेक्टर) बेवकूफ नहीं है. उसने नहीं दिखाई क्योंकि वो देखना ही नहीं है.

क्या अच्छी या बुरी एक्टिंग जैसी कोई चीज़ होती है?
कलाकार अच्छा या बुरा, ऐसा नहीं होता है. कलाकार क्या होता है कि एक्टिंग में soul है कि नहीं. संगीत में आत्मा है कि नहीं. क्यों मुंशी प्रेमचंद को हम पूजते हैं. उसकी कहानियों में भारतीयपन है. वो हर भारतीय के बारे में सोच रहा है. आप करोड़ों लगा दीजिए फिर भी कुछ नहीं होगा, अगर सोल है तो सबकुछ है. एक्टिंग अच्छी या बुरी नहीं होती है, सोल होती है. अगर ‘आंखों देखी’ में आत्मा नहीं होती तो मेरा कैरेक्टर कुछ होता ही नहीं. कैरेक्टर में सोल आई तो देखने वाले तक वो आत्मा वो दिल सब पहुंचा. गब्बर सिंह में सोल थी. जो लगा लोगों को कि अरे गुरु, गब्बर सिंह!! मैं अच्छे से बांसुरी बजाऊंगा, तो सामने वाले तक पहुंचेगी. आप अगर दिल से रोते हो तो सामने वाला भी रो लेगा. आप रोने की एक्टिंग करते हो और सोच रहे हो कि सामने वाला रो देगा, तो नहीं!

संजय अपनी माताजी के साथ.
संजय अपनी माताजी के साथ.

क्या एक एक्टर हर फिल्म में अलग-अलग एक्टिंग करता है, या वो अपनी उसी आवाज, उसी चेहरे से वैसा ही मटीरियल हर बार निकाल रहा होता है?
देखिए, बंदा तो वही होता है. अब आप रोज़ ऑफिस जाते हैं. अगर आप अपने आपको जिंदा रखना चाहते हैं तो एक गुलाब का फूल ले लिया. टेबल पर लगा लिया. टेबल-वेबल साफ कर लिया. राइट साइड में कंप्यूटर रखते हैं, आज लेफ्ट कर देते हैं. चलो यार भिंडी बना लेते हैं आज. एक्टर एक वही होता है लेकिन दूसरी जब फिल्म में जाता है तो temperament थोड़ा चेंज करना पड़ता है. बहुत एक्टर हर फिल्म में एक ही अंदाज में रहते हैं. देखो क्या होता है, कलाकार बहाना बनाने लगता है, कि गुरु अब यही चीज लोगों को पसंद आ रही है, लो चलाओ. ना बेटा, चेंज न करना. इमली से टमाटर पे मत आना, इमली चल रहा है चलाओ. है कि नहीं? लेकिन हो सकता है एक एक्टर जो बहाना न बनाता हो वो बोले कि इमली का अच्छा है लेकिन सर मैंने आज हींग लगाकर तैयार किया है देखिए सर, कैसा लग रहा है हींग वाला? तो, हां यार हींग वाला भी अच्छा है! तो मतलब उसके पास अब इमली और हींग दोनों आ गए.

जैसे ‘आंखों देखी’ में जो बाबूजी है. उसके एक बेटी है, एक बेटा है, एक भाई है, एक बीवी है, ऐसे घर में रहता है, तो ऐसे घर में ये रहता है संजय मिश्रा, हो तो संजय ही मिश्रा ना? उसका तो नकली नाम है बाबूजी. तो वो इस घर में क्या करेगा? इसकी बीवी एक बार कुछ हो जाता है तो कांव कांव कांव कांव बोलने लगती है, तो ये कैसे रिएक्ट करेगा? दूसरी तरफ, ‘मसान’ में बीवी भी नहीं है. दोनों फिल्मों के बाबूजी में फर्क क्या है. पहले वाले दुनिया से दूर निकल चुके हैं, और ये दुनियादारी में फंसा हुआ है. लेकिन है तो दोनों एक ही एक्टर ना. दोनों का अप्रोच अलग है.

आप सांचा नहीं बदल सकते लेकिन दिल्ली वाले बाबूजी और बनारस वाले में फर्क है. दिल्ली वाला उलझन में ज्यादा है, बनारस वाला पीड़ा में ज्यादा है.
क्लास दोनों का एक ही है. दिल्ली का वो क्लास और बनारस का वो क्लास एक ही है. कि ल्यो, बना लो आलू की सब्जी और चावल. हिंदुस्तान की हर बीवी अपने हस्बैंड से पूछती होगी कि क्या बनाऊं सब्जी? तुम कहते होगे, यार जो भी चाहो बना लो. तो वो जो क्लास है वो पूरे इंडिया में एक ही है. तुम्हारी बीवी भी पूछती थी, मेरे पापा की बीवी भी पूछती थी. तुम्हारे बच्चे की बीवी भी पूछेगी कि सुनो, सुबह नाश्ता क्या करोगे? तो क्लास एक ही होता है. वो हम बेवकूफी में बना जाते हैं कि वो मेट्रो का क्लास है. आज तो हर जगह एक ही चीज है यार. छोटे-छोटे शहरों में बड़े बड़े मॉल खुल गए हैं. सबकुछ तो वैसे ही है. टेलीविजन सब घर में है. चाहे वो दतिया में कोई घर हो मध्य प्रदेश में या फिर बंबई का घर हो. लेकिन बंबई में घर से फोन पर खाना मंगवा सकते हैं लेकिन दतिया में नहीं. लेकिन चीजें तो कमोबेश एक ही हैं. क्लास एक ही रहता है. मिडिल क्लास परिवार में बाप बोलेगा कि यार मेरी बेटी जवान हो रही है कहां जाएगी? कैसे होगा? कैसे लोग मिलेंगे? बाप अगर बनारस में है तो उसको भी वही चिंता सताएगी.

आपको बहुत से पात्रों में देख लोग खिलखिलाते हैं. आप क्या देखकर खुश होते हैं?
जो दिल को बात लग जाए. आय हाय, हा हा क्या बात कर रहा है यार!! ऐसे. कला बड़ी दिल की चीज है. जैसे छोटे शहरों में आज भी सड़क किनारे देखते हैं कि छोटी सी बच्ची 7 साल की, रस्सी पर चल रही है. लेकिन किसी को देखकर रुकने का मन करता है, किसी को देखकर नहीं. कोई दिल से कर रहा होता है तो हंसी आ जाती है. म्यूजिक में भी खुशी मिलती है. भाषा पर मैं बहुत ध्यान हीं देता पर इंग्लिश म्यूजिक बहुत सुनता हूं. उसके लिरिक्स से नहीं मतलब होता. लिरिक्स तो एक चीज है लेकिन जिस तरह से वो गा रहा है ना, वो इमोशन मुझे छू जाता है.

किसे सुनते हैं वेस्टर्न म्यूजिक में?
जेथ्रो टल (Jethro Tull) को सुन रहा हूं. पुराना म्यूजिक है. आजकल जिम मॉरिसन सुन रहा हूं. जेथ्रो टल का फ्लूट मुझे बहुत बढ़िया लगता है.

नेटफ्लिक्स देखते हैं?
नहीं, अभी तक तो नहीं.

टीवी या वेब सीरीज? उनका कंटेंट कुछ वैसा हो रहा है जैसा आप अपने सिनेमा में होते देखना चाहते थे.
अभी तक तो मैं अपनी ही एक्टिंग में लगा हुआ हूं. नहीं देख पाया हूं. लेकिन आप कह रहे हैं जैसा हो रहा है तो अच्छा है.

वेब सीरीज में काम की आज़ादी है और बजट का मसला भी बहुत नहीं है.
जी, फिल्म की तरह 50 करोड़ की नहीं बनती वो. वहां सब्जेक्ट और कंटेंट पर फोकस कर रहे हैं. नेटफ्लिक्स में आप कभी नहीं देखेंगे कि लड़का, लड़की के पीछे जा रहा है, गाना गा रहा है. 70 के दशक में कुछ ऐसी फिल्में बनी थीं. अब नया कंटेंट आ रहा है. अब दो घंटे की फिल्म क्यों? आप अपनी बात 10 मिनट की फिल्म में कह दीजिए. एक एक्टर और डायरेक्टर के तौर पर दस मिनट में बात कीजिए. कि देखो भई मैंने ये कुछ बनाया है. कि लैपटॉप पर घर में ही देख लिया. ये नया दौर है.

ऑनलाइन में किसी किस्म की सेंसरशिप भी नहीं है.
आर्टिस्ट जो बनाना चाह रहा है उसे बना पा रहा है.

जैसे आपकी शॉर्ट फिल्म ‘लाफ’ ऑनलाइन रिलीज हुई है. उसका कंटेंट फिल्म में होता तो सेंसर कर दिया जाता.
हां, काट दिया जाता. लेकिन वो बुरा नहीं लग रहा है. वो बस आपस में बात कर रहे हैं. किसी को, किसी दूसरे को बताने का हक नहीं कि अच्छा क्या है और बुरा क्या है? इंसान हैं आप, आप खुद ही जानते हैं कि अच्छा क्या है और बुरा क्या है. क्योंकि आपका अच्छा कुछ और होगा, मेरा अच्छा कुछ और होगा.

कैसे रोल करने हैं अब भी? एक्टर के तौर पर क्या महत्वाकांक्षा बाकी है?
नाटक. इसमें शुरू करना चाहता हूं. अभी हम लोग सोच रहे हैं एक प्ले. शेक्सपीयर करना चाहता हूं. जिस स्कूल को मैं belong नहीं करता हूं. मेरी एक्टिंग शेक्सपीयर स्कूल ऑफ एक्टिंग से वास्ता नहीं रखती है.

एनएसडी के दिनों में लेकिन ऐसे नाटक किए तो थे?
किया था. लेकिन अब एक एक्टर के तौर पर अनुभव अलग हो गया है. शेक्सपीयर थोड़ा सा लाउड है. किंग लीयर जो थोड़ा सा लाउड है. उसकी चाल अलग है. उसकी चाल संजय मिश्रा जैसी नहीं है. संजय मिश्रा तो ऐसे ही चल देते हैं. लेकिन वो किंग लीयर है. तो वो वाली एक्टिंग. मैं प्रयास कर रहा हूं. हम कुछ लोग बैठे हुए हैं लीयर को उठाने के लिए. मेरे कुछ दोस्तों ने कहा मिश्रा तुम पागल हो गए हो, वो तुम्हारा स्कूल ऑफ एक्टिंग ही नहीं है. मैंने कहा, वही तो देखना चाहता हूं. कि कितने स्कूल हैं. पढ़ रहा हूं लीयर को. बहुत डिफरेंट है. बाप रे बाप! शेक्सपीयर की सारी कथाएं ऐसी हैं. लीयर भी ऐसा है. बहुत थका देने वाला पात्र है. एक नाटक आपको शारीरिक रूप से कम थकाएगा लेकिन mentally निचोड़कर रख देगा.

एक आर्टिस्ट चाहे वो पेंटर हो, एक्टर हो, सिंगर हो, उसे political comment करने चाहिए या सिर्फ अपने आर्ट पर ध्यान देना चाहिए? और आलोचकों को उनसे राजनीतिक टिप्पणी की उम्मीद करनी चाहिए या उन्हें अकेला छोड़ देना चाहिए?
एक बैंक कर्मचारी कुछ बात बोले, या कोई डाकिया कोई बात बोले, तो इतनी बात नहीं होती. मगर एक अभिनेता जो हमेशा आपके घर के टीवी पर दिखता है जिसको आप सिनेमाघर में देखने जाते हैं, वो कुछ बोलता है तो लोगों को लगता है कि उसने कुछ बोला ऐसा. बैंक वाला बोलेगा तो कोई मतलब है? लोग भी चाहते हैं कि यही (अभिनेता) लोग बोलें. आप एक चैनल में जाएं और बोलें कि मैं एक बैंक कर्मचारी हूं और ऐसा बोलना चाहता हूं तो उसको बोलेंगे यार कहां तुम आ गए हो? अरे? काम तो वो भी करता है. बाल-बच्चे तो वो भी पाल रहा है. लेकिन नहीं. आज मेरा जन्मदिन है इसलिए मुझसे बात कर रहे हैं न? कहीं मैं कोल इंडिया में कुछ काम कर रहा होता तो तो शायद नहीं मुझसे बात करते. कि सर, कोयला कैसे निकालते हैं? तो ऐसा है. लोग अपना जिसको जैसा समझ में आता है बोलते हैं. उसके बोलने के बाद क्या बाल की खाल निकाली जाती है. लेकिन कोई भी भारतीय है, उसका इरादा खराब नहीं होता है. या किसी भी देश के लोगों का अपने देश के प्रति इरादा खराब नहीं होता. लेकिन किस भाव में बोला, किस समय बोला? भई आपको एक बच्चा तंग कर रहा है, आप उसको बोलेंगे न, “ऐ.. हट” (बेज्जत करते हुए), या फिर बोलेंगे कि “बेटा, हटो.. चलो बाद में आना”. तो आप कैसे बोल रहे हैं उसकी बात है.

जीवन में hope कहां से लेते हैं?
मैं उम्मीद लेता हूं कि आप भी एक प्राणी हैं, चींटी भी एक प्राणी ही है, सांप भी एक प्राणी है, हर कोई एक प्राणी है इस प्रकृति में. सब अलग अलग हैं. कोई क्रोकोडाइल बना हुआ है प्राणी के नाम पर. आप आप बने हुए हैं. ये बड़ा अच्छा लगता है कि दुनिया में हर तरह के प्राणी हैं, जीव हैं. कबूतर सुबह दिखता है, रात में कोई कबूतर रास्ते पर नहीं दिखेगा कि दाना चुग रहा है. नहीं. चिड़िया सुबह उठी, दाना चुगी, थोड़ा सा अपने बच्चे को भी दिया. सब जिंदगी चला रहे हैं. उधर कबूतर के बच्चे कोंके कोंके कोंके .. लड़ रहे हैं पंखों से. जिंदगी जी रहे हैं. यही है. आने वाला कल सुकून का हो. आप एक पेड़ भी लगा देते हैं तो 20 साल बाद वो बड़ा हो जाएगा और आपका काफी कुछ करेगा.

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मुझे बड़ा दुख होगा अगर मैं कभी बोलूं कि वहां गंगाजी बहती ‘थीं’, अब बंद हो गईं. बस ये हो कि आप छोड़कर जाएं इस दुनिया को तो लोग कहें कि हां यार गंदा करके नहीं गया. हमें कुछ दे के ही गया है. भारतीय संस्कृति, हमारी चीजें मैं अपने बच्चों को दे के जाऊं. जो आम का अचार है मैं अपने बच्चों को देकर जाऊं. जो लिट्‌टी चोखा है मैं अपने बच्चों को देकर जाऊं. बर्गर और पिज्जा तो है ही है लेकिन बेटा, एक अदरक का ऐसा चटनी बनता है जो मेरे ही फैमिली में बनता है. तभी तो जब शादियां होती थीं तो बहू को बताया जाता था कि ये ऐसे ऐसे होता है ताकि वो उस परंपरा को आगे ले जाए. है ना? धनिया की चटनी, या वो चीज या वो अचार. वो छूटे नहीं हमसे. हम भूलें नहीं सबकुछ. ऐ बेटा, सारी दुनिया खा रही है वो हम भी खा रहे हैं, लेकिन हमारे यहां का जो है न, आलू का भर्ता आय हाय!

हमारा सितार न छूट जाए. म्यूजिक न छूट जाए. वही इच्छा है कि वो परंपरा मैं आगे भी देखूं. कोई बच्चा अगर मुझे पसंद करता है और मेरा सितार के साथ एक फोटो छप जाए तो वो बोलेगा, ओहो मैं भी ये बजाना चाहूंगा मम्मी. बजाना नहीं भी चाहे तो सुनना तो चाहेगा कि क्या है? तो मैं उस परंपरा को थोड़ा सा आगे बढ़ाने की उम्मीद पर जीता हूं. कि मैं एक अच्छे समाज से विदा लूं. I am going, I am going, I am going. ये नहीं कि कांव कांव के के कों कों कों कों. नहीं नहीं नहीं. आप प्रोग्रेस कर रहे हैं तो शांति लाइए ना. प्रोग्रेस कर रहे हैं फिर भी चिल्लाना है तो वो प्रोग्रेस ही गलत दिशा में है.

तो उस शांति, उस सुबह को महसूस करना कि देखो सूरज निकल रहा है. दुनिया पर जुल्म हो रहे हैं, दुनिया नष्ट हो रही है. लेकिन सूरज को उगेगा ही. इसने तुम्हे पैदा होते हुए भी देखा और वो तुम्हे मरते हुए भी देखेगा. सोचता होगा ना, कि बेटा जब जा रहे हो तो कुछ अच्छा करके जाओ.

55 के हो रहे हैं. अंदर से लगता है.
मैं उम्र गिनता नहीं. अभी कल ही तो मैंने कपड़े बदले हैं. अगर आप साल गिनने लग जाओगे तो 30 में ही ठंडे पड़ जाओगे, हाय, 70 की उम्र है और 40 बचे हैं. उम्र और पैसा दो अलग चीजें होती हैं. कि बताओ बस 3 ही रुपये बच गए, लेकिन उम्र में ऐसा नहीं है भले ही तीन पल बचे हों थैंक्यू उसका जिसने मुझे बनाकर भेजा है. आखिरी क्षण तक मैं मजा लेना चाहता हूं. मैं आखिरी क्षण तक मजा लेना चाहता हूं.

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(Updated since October 6, 2016.)
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