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जिस एक्टर की खूंखार खलनायकी ने हमारा खून जमा दिया, उसकी प्रेम कहानी इंस्पायरिंग है

हमने कहा कि आशुतोष से बात की जाए और आप तक पहुंचाया जाए. हमने उनसे जो बतकही की, उसे दो हिस्सों में बांटा है. एक फिल्मी और एक फैमिली. ये फैमिली हिस्सा है. फिल्मी हिस्सा यहां क्लिक करके पढ़ लीजिए.

सवाल: रेणुका जी के साथ आपकी केमिस्ट्री देखकर शादीशुदा लोग सीख लेते हैं. उनसे मुलाकात कैसे हुई? कैसे ये लव स्टोरी परवान चढ़ी?

आशुतोष: ये 1998 की बात है. हम तो उनके प्रशंसक थे, वो दमदार काम किया करती थीं. ‘हम आपके हैं कौन’ आ चुकी थी. हमको भी ‘दुश्मन’ मिल चुकी थी. लेकिन हमारी कोई पहचान अभी नहीं बनी थी. हमारी एक मित्र हुआ करती थीं राजेश्वरी सचदेव. हंसल मेहता साहब ने जयते नाम की एक फिल्म बनाई थी, उसके ट्रायल के लिए मुझे बुलाया था. मैंने राज (राजेश्वरी) से कहा अकेले जाने का मन नहीं है क्या आप मेरे साथ चलेंगी. उनके साथ गया. वहां पर रेणुका जी भी आमंत्रित थीं. राज की वो बहुत अच्छी दोस्त थीं. राज ने उनसे परिचय कराया हमारा. कि ये भी एक्टर हैं. लेकिन रेणुका जी ने उस समय तक कोई काम देखा हुआ नहीं था हमारा. लेकिन चूंकि वो एक सह्रदय महिला हैं तो उन्होंने व्यक्त नहीं किया. सुना था उन्होंने कि एक फिल्म आई है, चर्चित है लेकिन देखा नहीं था. फिर परिचय हुआ. हम लोग लगातार आधे घंटे तक सिनेमा पर बात करते रहे. मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ. उनकी सादगी ने बड़ा प्रभावित किया. फिर मैंने उनसे कहा कि चलिए मैं आपको छोड़ देता हूं. वो दादर में रहती थीं. हम लोग जुहू में फिल्म देख रहे थे. मैं चेंबूर में रहता था. तो उन्होंने कहा आप कहां रहते हैं? मैंने कहा चेंबूर. तो चेंबूर और दादर कम्प्लीटली उल्टा है. उन्होंने कहा आशुतोष जी मैं मुंबई में पली बढ़ी हूं और मैंने ऐसा कोई रास्ता नहीं देखा जो चेंबूर जाता हो, वाया दादर. आप निश्चिंत रहें. मैं चली जाऊंगी, ये मेरी आदत में है. तो इसके बाद हम मिले नहीं. धीरे धीरे समय चलता रहा. दीवाली आई. तो रेणुका जी के एक रवि राय नाम के बैरिस्टर साहब थे जो रेणुका जी को बाई साहब कहते थे. बाई साहब महाराष्ट्र का बड़ा सम्मानित संबोधन है. बैरिस्टर साहब से रेणुका जी का नंबर मांगा तो उन्होंने कहा कि बाई साहब को 9 बजे के बाद फोन मत करना. वो उठाएंगी नहीं. अगर उनकी घंटी बजेगी तो आपको मैसेज छोड़ना पड़ेगा. अगर बिना मैसेज छोड़े फोन बंद करेंगे तो आप अशिष्ट व्यक्ति माने जाएंगे. ये उनके ऊपर है वो आपको कॉलबैक करें या न करें. मैंने कहा – अरे इतने कायदे कानून? उन्होंने कहा हम बचपन से उनके साथ काम कर रहे हैं. घड़ी और वो पर्याय हैं. तो हमने कहा कि दिवाली विश करना है, इसमें ऐसी कौन सी बात है. तो रवि ने उनके घर का फोन नंबर दिया. जैसा उन्होंने कहा था वही हुआ. आंसरिंग मशीन बजी, मैंने मैसेज छोड़ा कि मैं आशुतोष राणा हूं, आपको दिवाली की शुभकामनाएं. और अपना नंबर नहीं छोड़ा आंसरिंग मशीन पर. क्योंकि मेरा मानना है कि वहां नंबर छोड़कर हम जवाब देने के लिए बाध्य करते है. अगर उन्हें जवाब देना होगा तो जैसे मैंने नंबर पता लगाया वैसे ही वो भी लगा लेंगी. विश मुझे करना था तो मैं अपनी विश का प्रत्युत्तर क्यों मांगूं.

रेणुका संग आशुतोष
रेणुका संग आशुतोष

अगले दिन मैं घर पहुंचा तो मेरी सिस्टर ने बताया कि रेणुका शहाणे जी का फोन आया था. तुमने उनको फोन किया था तो उन्होंने धन्यवाद के लिए फोन किया था. मैंने कहा -वाह. मैंने फिर से उस धन्यवाद का धन्यवाद देने के लिए फोन किया. आंसरिंग मशीन बजी तो मैंने कहा कि आपने धन्यवाद दिया इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद. अगले दिन फिर जब उनका फोन आया तो मैं शूटिंग पर था. तब उन्होंने कहा मेरी सिस्टर से कि आप उन्हें मेरा मोबाइल नंबर दे दीजिए. क्योंकि जब मैं कॉल करती हूं तो वो नहीं होते. वो करते हैं तो मैं नहीं होती. मोबाइल उस जमाने में इतने प्रचलन में नहीं थे. 28 रुपए कॉल का पड़ता था. जब मुझे मोबाइल नंबर मिला उनका तो मैंने कहा ये ठीक है. नंबर मुझे कहीं और से भी मिल सकता था लेकिन ये थोड़ी अशिष्टता लगती है. अच्छा नंबर तो मिल गया लेकिन उनके नियम ऐसे थे. हमारा तो दिन ही रात 9 बजे शुरू होता था. फिर मैंने उन्हें 10 बजे फोन किया और कहा कि हम खुद को बदल नहीं पाएंगे. खामखां चार दिन के लिए बदल भी लिया तो उसका कोई मतलब नहीं है. इसलिए मैंने पहले उन्हें टेक्स्ट मैसेज भेजा कि मैं आशुतोष राणा हूं और कॉल कर रहा हूं. क्योंकि मोबाइल नंबर कम ही लोगों के पास होते थे तो उन्होंने उठा लिया. हमने इस बात की क्षमा मांगी कि आपके रूल के उलट मैंने आपको फोन किया. एक सवा घंटे तक बात करते रहे, जैसे पुराने मित्र हों. और उन्होंने भी अपनी तरफ से कोई ऑब्जेक्शन नहीं किया. तो मैंने पूछा कि 9 बजे के बाद आप बात कर रही हैं मुझसे. तो रेणुका जी ने कहा कि 9 बजे के बाद का समय मेरा अपना होता है. मैं पढ़ती हूं या अपनों से बात करती हूं. तुम मेरे दोस्त हो इसलिए बात कर रही हूं. अपने समय को मैं अपने हिसाब से इस्तेमाल करती हूं. और अब आप 10 बजे के बाद ही कॉल करना. फिर हम ढाई महीने फोन पर ही बात करते रहे. मिले नहीं. फिर ऐसा होने लगा कि कभी कभी दिन में दो बार, तीन बार या रात को एक बजे फ्री हुए तो कॉल कर लिया. उनको पता था कि ये आदमी रात में ही फोन करेगा. फोन पर बात करते करते दिसंबर जब आया. इनकी अंताक्षरी की शूटिंग चल रही थी गोवा में. मैं फिल्म जानवर की शूटिंग कर रहा था हैदराबाद में. तो मैंने इनको फोन करके एक कविता सुनाई. जबकि रेणुका जी गद्य वाली हैं, मैं पद्य वाला हूं. वो अर्बन हैं, मैं ठेठ देहाती हूं. उनका पूरा अप टू डेट कल्चर है. हमारा कल्चर ग्रामीण अंचल का है. मतलब वो उत्तरी ध्रुव हैं तो मैं दक्षिणी ध्रुव लेकिन हमारी मित्रता बड़ी गहरी हो गई थी. एक दूसरे का सम्मान और विश्वासपात्र हो गए.

आशुतोष राणा-रेणुका शहाणे, बीच में आशुतोष के पिता जी
आशुतोष राणा-रेणुका शहाणे, बीच में आशुतोष के पिता जी

हमारी पसंद नापसंद भी एकदम अलग थीं. मैं घनघोर रूप से ईश्वरवादी हूं और उनके यहां तीन पीढ़ियों से भगवान का कैलेंडर शो पीस में नहीं रखा जाता है. तो सोच विचार रहन सहन में जमीन आसमान का अंतर था. लेकिन एक चीज थी कि उन्हें भी पढ़ने और उतकृष्ट कामों को करने का शौक था और मुझे भी. हम लोगों के बीच कभी कुछ विवाद का कारण नहीं रहा. तो जब मैंने उनको कविता सुनाई तो उन्होंने कहा कि राणा जी आई थिंक, आई एम इन लव विद यू. अब मेरे मन में तो लड्डू फूटे बहुत सारे. लेकिन ऊपर से कहा कि आप 31 को आएं. फिर बात करते हैं. फिर 31 को मैं उनके घर गया और कहा कि आई एम इक्वली इन लव विद यू. फिर 1999 में दद्दा जी मुंबई आए, मैंने रेणुका जी से उनको मिलाया. क्योंकि मित्र हमारे लिए परिवार का हिस्सा होते हैं और जैसे हम अपने माता पिता से मिलाते हैं वैसे ही मैंने दद्दा जी से मिलवाया. विवाह करने का कोई विचार नहीं था और हम एकदूसरे के लिए ऐसे ही समर्पित थे. और मैं उस वक्त तक विवाह के इतना विरुद्ध था कि किसी से मिल जाता तो संबंध विच्छेद करवा देता. जैसे आप कह रहे हैं न कि हम सीखते हैं, तब न सीखते. तो ये चर्चा भी हर तरफ फैल गई कि ये दोनों साथ हैं और हमने भी कुछ छिपाने का प्रयास नहीं किया.

अपने आध्यात्मिक गुरु 'दद्दा जी' के साथ आशुतोष राणा
अपने आध्यात्मिक गुरु ‘दद्दा जी’ के साथ आशुतोष राणा

फिर 2001 आया और दद्दा जी फिर एक बार मुंबई आए. और उन्होंने आते ही कहा- बेटा तुमने सारा जीवन ही हमारे ऊपर छोड़ा है. कुछ काम थे जो करने थे हमको. लेकिन उस चक्कर में हम तुम्हारे विवाह को आगे टरकाते चले गए. अब हमने फैसला कर लिया है कि तुम्हारा विवाह हो. हम लड़की ढूंढ रहे थे जो कि हमें मिल गई है. हम नहीं चाहते कि तुम्हारे जीवन में कोई विसंगति आए. बहुत सी गुंजाइशें हैं. अभी संबंध हुआ, कल विच्छेद हो गया. हम लड़की ढूंढ रहे थे जो तुम्हारे अनुकूल हो और जिसके तुम अनुकूल हो. अब मिल गई है बेटा.

रेणुका और आशुतोष
रेणुका और आशुतोष

मैं तो विवाह के सख्त खिलाफ था. मैंने बताया न कि उस वक्त कोई दंपत्ति हमें मिलता तो खुशी से अपना संबंध विच्छेद कर लेता. लेकिन दद्दा जी का सुझाव मेरे लिए आदेश ही होता था. उस आदेशानुसार मैं रेणुका जी के घर पहुंचा और उनसे कहा कि- विवाह के बारे में आपकी क्या राय है? रेणुका जी ने कहा कि मैं तैयार हूं लेकिन आप दद्दा जी से तो पूछ लीजिए. उनकी माता जी ने भी यही कहा. मैंने कहा कि उनके ही आदेश पर तो विवाह का कार्यक्रम बन रहा है. फिर दद्दा जी ने ही हमारा विवाह जगन्नाथ महादेव मंदिर में कराया. उन्होंने कहा था कि आप दोनों लोग परिवार और विवाह के कपड़े लेकर आ जाएं बाकी सारी व्यवस्था हम करेंगे. जब हम पहुंचे तो वहां अलग ही नजारा था. डेढ़ से दो लाख लोगों का समूह वहां इकट्ठा था. पूरा दमोह शहर फूलों से सजा हुआ था. वहां विवाह सम्पन्न हुआ तो जो सिलसिला चला वो अभी तक चलता जा रहा है.

बड़े बेटे शौर्यमान के साथ आशुतोष
बड़े बेटे शौर्यमान के साथ आशुतोष

सवाल: आपके दोनों बच्चे तस्वीरों में तो बड़े शांत और मासूम लगते हैं. शरारत वगैरह भी करते हैं या नहीं? और करते हैं तो डांट वांट भी पड़ती है?

आशुतोष: वो बड़े अच्छे और सुलझे हुए बच्चे हैं. जो बड़े वाले हैं, शौर्यमान वो 16 वर्ष के होने वाले हैं. छोटे वाले सत्येंद्र 14 वर्ष के होने वाले हैं. दोनों के साथ अच्छी बात ये है कि वो अपनी आयु के साथ बढ़ रहे हैं. आजकल के ज्यादातर बच्चे 12-14 वर्ष की उम्र में चतुर हो जाते हैं. इनके साथ ऐसा नहीं है. बच्चों के अंदर जो बचपना और इनोसेंस होता है वो दिखता है.

छोटा बेटा सत्येंद्र
छोटा बेटा सत्येंद्र

सवाल: इनको फिल्म इंडस्ट्री में लाने का मूड है या वो खुद तय करेंगे?

आशुतोष: देखिए जब हमारे पिता ने अपने सपने हम पर नहीं लादे तो हम अपने बच्चों पर अपने सपनों का बोझ क्यों लादें? हम माता पिता के रूप में उन्हें सपने देखने की शिक्षा दे सकते हैं, बाकी उनका काम है. हमें बच्चों की जरूरतें पूरी करनी चाहिए, उनकी ख्वाहिशें नहीं पूरी करनी चाहिए. वो अपना सपना देखें और उसे पूरा करें.

अपने छोटे और सुखी परिवार के साथ आशुतोष
अपने छोटे और सुखी परिवार के साथ आशुतोष

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