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लंगड़ा त्यागी बन हमें पक्का गालीबाज़ बना देने वाले को हैप्पी बड्डे टू यू

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साल 1998 में आई एक फिल्म का सीन है. सुबह का समय है. मोहनीश बहल और सलमान ख़ान संस्कारी सी वॉक पर निकले हुए हैं. पीछे से उनका छोटा भाई भागता हुआ आता है. शिक़ायत करता है कि वो बहुत तेज़ चल रहे हैं. वो उसके बचपने पर हंसते हैं. वो चल कर और छोटा भाई भागकर अपनी फ़ैक्ट्री के पास पहुंच जाते हैं. इस बार वो शिकायत करता है कि ठंड बहुत है. थोड़ी और देर मोहनीश बहल उसे टरकाता है. पर जब वो भूख का बहाना बनाता है, मोहनीश बहल उसे पुचकारते हुए झिड़क देता है. ‘जा दौड़ लगा आ’. ठीक वैसे ही जैसे बचपन में पापा लोग बेल्ट मारने से पहले आखिरी धमकी देते थे.

अगर अभी भी याद नहीं आया तो बता देता हूं. ये तीसरा भाई सैफ़ अली ख़ान है. फिल्म है ‘हम साथ साथ हैं’ और उसके कैरेक्टर का नाम विनोद है. साफ़ शब्दों में विनोद एक बेचैन, ज़िद्दी, कूढ़-दिमाग़ लड़का है जिसकी दिमाग़ी उम्र बहुत कम है. ‘हम तुम’, ‘मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी’, ‘कल हो न हो’ और ‘सलाम नमस्ते’ सभी पिच्चरों में एकदम लापरवाह और मस्तीखोर कैरेक्टर हैं सैफ़ के. देखिए ऐसा ही एक कैरेक्टर.

90 के दशक में मेनस्ट्रीम हिंदी फिल्मों में ये अलग ही तरह का हीरो होता था. बेवकूफ़ हरकतें करता हुआ. गोरा, चिट्टा. हिंदी की कठोरताओं पर एक मक्खन सा मलता हुआ. हमेशा बेवकूफों की तरह दांत फाड़ते हुए. जैसे आप सामने से गुद्दी पर थप्पड़ मार देंगे और उसे पता भी नहीं चलेगा. चल भी गया तो वो ‘गूफ़ी’ सी हंसी हंस के नज़रअंदाज़ कर जाएगा. लड़कियों सा खिलखिला के हंसेगा और अक्षय कुमार के मर्दाने नखरे उठाएगा. कुछ वर्षों बाद इस कैरेक्टर में एक metamorphosis यानी कायापलट सा हो गया. साल 2000 लाया ऋतिक रोशन और अभिषेक बच्चन को. ‘लल्लू हीरो’ को अब कोई भाव नहीं देता था. बिलकुल डार्विन ही के सिद्धांत पर सैफ के कैरेक्टर को थोड़ा बदलना था.

फिल्मों का शहरी छोकरा

साल 2001 में आई ‘दिल चाहता है’ नाम की एकदम नयी-नकोर फिल्म. पब्लिसिटी और प्री-रिलीज़ एक्टिविटी से ज़ाहिर था कि फिल्म ऐसे मुद्दों पर है जो अब तक हिंदी फिल्मों ने छुए तो क्या, जाने भी नहीं थे. कॉमेडी होकर भी ये फिल्म गंभीर थी. सफ़र पर थी, सैर-सपाटे पर नहीं. प्रेम पर थी, रोमांस पर नहीं. फिल्म 3 दोस्तों पर थी. दो किरदारों के लिए अभिनेता तय हो चुके थे. लेकिन तीसरे किरदार को निभाने से अभिषेक बच्चन और सिकंदर खेर तक मना कर चुके थे. कोई दिक्कत नहीं. सैफ अली ख़ान इस रोल को करेगा. वो नवाब पटौदी का बेटा था. फिल्मों में अब तक कोई ख़ास छाप नहीं छोड़ पाया था. 31 साल ही में बच्चन साहब को भी पहली सफ़लता मिली थी मगर सैफ़ू को इंडस्ट्री में आए 8 साल हो चुके थे.

फिल्म रिलीज़ होकर हिट हो गई. एक कल्ट सा बन गई. इसे अगले दसियों सालों तक दोस्तों के झुंडों में डिस्कस किया जाना था. सोशल मीडिया पर उद्धरित किया जाना था. 1964 में आई सत्येन बोस की ‘दोस्ती’ के बाद ‘दिल चाहता है’ ही बनने वाली थी दोस्ती की मिसाल फिल्म. आमिर खान के अकडू ‘कैड’ कैरेक्टर को सराहा गया. बंदा परफेक्शनिस्ट रहा है. अक्षय खन्ना के नखरे से हंसने पर लड़के-लड़कियां दोनों ख़ूब फ़िदा हुए. इस बीच सैफ अली ख़ान का पुनर्जन्म हो गया. वो हंसी का पात्र बनते-बनते आज हंसी को अपना पात्र बनाने लगा था. फ़ूल से शेक्सपीअरियन फ़ूल बन गया था. यानी वो फ़ूल जिसकी बुद्धू बातों में ज्ञान छुपा था. फिल्म में एक टाइम पर आमिर और अक्षय खन्ना के पात्रों का झगड़ा होता है. अक्षय आमिर को थप्पड़ मार देता है. दोस्तों वाला ब्रेकअप हो जाता है. इतना इंटेंस कि फिल्म का ‘तन्हाई’ गाना इस स्थिति पर ज़्यादा फिट बैठता है. इस सबके बीच सैफ कहानी का सूत्रधार है. प्यार में ‘धोख़े’ खाकर वो सयाना हो जाता है. जी नहीं, वो गुमसुम गुरु दत्त नहीं बनता. अब भी बेवकूफियां करता है. जिस हीरोइन के आगे मैचोपंती और पत्थरदिल होने का सबसे अच्छा ढोंग होना चाहिए, उसके आगे वो अब भी laughing stock है. जिस लड़की को पसंद करता है, उससे पहले दोस्ती करना सीखता है. प्यार के चोंचलों पर हंसता है.

SAIF-ALI-KHAN-AMRITA-SINGH
सैफ़ अली ख़ान और अमृता सिंह

सैफ़ का फ़िल्मी करियर कुछ ऐसा ही रहा है. ऐसे घर में जन्म हुआ जिसके मालिकों और उनके पेशों पर देश पगलाया जाता था. ये थे मंसूर अली ख़ान पटौदी और शर्मीला टैगोर. पहली फिल्म ‘बेख़ुदी’ में लिया गया और थोड़ी सी शूटिंग के बाद निकाल दिया गया. 21 साल की उम्र में 11 साल बड़ी अमृता सिंह से प्यार में पड़े. चट डेट हुई पट ब्याह. ‘मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी’ हिट तो हुई मगर फिल्म के अनाड़ी सैफ थे. ‘बम्बई का बाबू’. ‘दिल तेरा दीवाना’. फिल्में आईं और गईं. और सैफ unnoticed ही रहे. ‘हम साथ-साथ हैं’ में सचमुच सब साथ ही थे. बड़जात्या टेम्पलेट वाली इस फिल्म में सलमान समेत इतने सितारे थे कि सैफ़ की मौजूदगी से कोई घाटा नहीं होता. 1996 में आई ‘तू चोर मैं सिपाही’ बचपन के चोर-पुलिस के खेल से ज़्यादा कुछ नहीं थी.

कई मायनों में ‘दिल चाहता है’ सैफ़ के करियर की पहली प्रमुख फिल्म थी. मानो उससे पहले कोई फिल्म की ही न हो. फिल्म में तीनों एक्टर्स के बाल छोटे थे. ऐसा लगा जैसे उनकी 90s की unrealistic लालसाएं सफ़ा कर दी गईं. सैफ़ को तो जैसे फिल्म में उसकी टीनएज से लाकर पटक दिया. जैसे जावेद साब एक दिन खुद ही आकर बोले हों, “फ़ैफ़ू, बहुत हुआ. एक्टिंग करनी बंद करो और अपनी अफ़लियत दिखाओ.”

2003 में आई करण जौहर की ‘कल हो न हो’. इस फिल्म का असली हीरो शाहरुख़ खान था. लेकिन ये फिल्म सैफ़ के लिए अलग ही सरप्राइज़ लेकर आई. ‘न तुम जानो न हम’ और ‘रहना है तेरे दिल में’ में ऋतिक रोशन और आर. माधवन से लड़की के मामले में सैफ़ हार गया था. मगर इस बार मनचाही लड़की मिल गई. वो बात और है कि इसमें शाहरुख़ खान लाइलाज बीमारी से पीड़ित था और शादीशुदा होने का ढोंग करता था. कुछ ऐसा लगा जैसे तक़दीर सैफ़ को उसका हक़ आख़िरकार देने लगी थी. इस फिल्म में और कुणाल कोहली की ‘हम तुम’ में सैफ़ का कैरेक्टर पहले ही की तरह प्यारे लगने वाले बेवक़ूफ़ का है. मगर इस बार उसके कैरेक्टर में ज़बरदस्ती की संस्कारी भारतीयता कम और उसका ट्रेडमार्क कॉस्मोपॉलिटन ‘वाओ!’ ज़्यादा था. ठीक वैसे ही जैसे सनी देओल का ‘ओये’ और नाना पाटेकर का ‘इह-इह’ आज तक मिमिक्री आर्टिस्ट्स के एक्ट बचा लेता है.

सैफ़ ने ‘परिणीता’ में अपना बिदेसीपना छोड़ा ज़रूर मगर रॉयल्टी नहीं. गीले, पीछे को सटाए बाल. ऐसा चमचमाता गोरा चेहरा जिस पर शेव के बाद की हरियाली भी नहीं, बस साइड से एक लट गिरती. म्यूज़िशियन और वो भी पियानो वाला. रॉयल्टी उसके पल्ले किस्मत ने ही बांध दी थी. बात-बात पर मीडिया उसे ‘छोटे नवाब, छोटे नवाब’ कहना शुरू कर देती. पर फ़िर शायद विशाल भारद्वाज का एक्सपेरिमेंट का fetish जाग गया. शेक्सपियर के ऑथेलो को ‘ओमकारा’ नाम से बनाया. डेस्डिमोना बन गई डॉली. कैश्यो बन गया केशू. इयागो हो गया त्यागी और यही त्यागी सैफ़ था. लंगड़ा त्यागी. ब्राह्मण का basta** बेटा. इस फ़िल्म ने सैफ़ के करियर को सीढ़ी से उठाकर एलीवेटर में फ़ेंक दिया. सिर पर बालों का एक कार्पेट सा. कानों में बालियां. शायद ये ऑरिजिनल इयागो का ही आकर्षण है, मगर फ़िल्म में लंगड़ा त्यागी से आपको खतरा महसूस होता है. आने वाली ट्रैजेडी का ज़िम्मेदार वही है. उसके षड्यंत्रों से डर लगता है. किसी रोल को अपना बना लेना एक बात है, ये इंडस्ट्री के दूसरे स्टार करते हैं. किसी रोल का अपना बन जाना अलग बात है, ये सैफ़ ने ‘ओमकारा’ में किया.

‘धागे के इंघे बेवक़ूफ़ होवे है और उंघे चू**’

फिल्म में छोटे नवाब खड़ी बोली की सबसे ‘चीप’ गालियां दे रहे थे. मैं नौवीं में था. मेरी क्लास में एक बंदा था. गालियों के मामले में पूरा प्रोटोकॉल मानता था. जब तक सामने वाला मां पर नहीं जाएगा, बंदा पूरी रीत निभाएगा. गाली नहीं देगा. ‘चू**’ को तो वो ब्रह्मास्त्र की तरह इस्तेमाल करता था. ‘ओमकारा’ देख आया. पक्का गालीबाज़ हो गया. अगले ही दिन से हमें भी कुछ भान हुआ कि धागे के इंगे सचमुच बेवक़ूफ़ होता है और उंगे चू**. हमें मात्र बेवकूफ़ और संपूर्ण चू** का फ़र्क़ पता लग गया. भोंडी भाषा मज़ेदार लगने लगी. अगर सॉफ़्ट सा दिखने वाला सैफ़ इतने स्वैग के साथ इस शब्द को नया आयाम दे सकता था तो फिर हमारा तो अभी कुछ बिगड़ा ही नहीं था.

ओमकारा से भी पहले 2004 में आई ‘एक हसीना थी’ में भी सैफ़ ने अपनी इमेज से हटकर नेगेटिव रोल किया. ‘बींग साइरस’ उनकी पहली अंग्रेजी फिल्म थी. साइरस का कैरेक्टर उनके लिए ही बना मालूम हुआ. करियर के पहले हाफ में दाढ़ी मूंछ उगती नहीं थी. अब कटती नहीं है. सही मायनों सैफ़ ने रॉयल्टी को अपने अलग ही अंदाज़ और एक्टिंग की शैली से पीछे छोड़ दिया है.


ये स्टोरी हमारे साथ इंटर्नशिप कर रहे प्रणय ने लिखी थी


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