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पायलट और गहलोत के बीच वो गिले-शिकवे, जिससे नौबत यहां तक आ गई

राजस्थान में पिछले एक हफ्ते से सियासी उठा-पटक जारी है. जन्म से कांग्रेसी रहे सचिन पायलट ने अपने समर्थक विधायकों के साथ बगावत कर दी. इसके बाद राजस्थान की सरकार पर खतरा मंडरा रहा है. सचिन पायलट और सीएम अशोक गहलोत के बीच कोर्ट से लेकर मीडिया में लड़ाई लड़ी जा रही है. दोनों नेताओं के बीच हालिया विवाद की जड़ पुलिस के स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (SOG) की ओर से भेजे गए नोटिस को बताया गया.

SOG ने विधायकों की खरीद-फरोख्त मामले में सीएम-डिप्टी सीएम के साथ ही 20 से ज्यादा मंत्रियों और विधायकों को भी नोटिस भेजा. SOG के नोटिस को पायलट खेमे ने निशाना बनाए जाने के रूप में देखा. पायलट ने इस नोटिस के बाद ही कांग्रेस से दूरी बना ली. वहीं ये भी खबरें आईं कि गहलोत कैम्प सचिन पायलट को राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष के पद से हटाने के लिए माहौल तैयार कर रहा है. विवाद बढ़ा, तो सचिन पायलट को डिप्टी सीएम और राजस्थान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया गया.

कहां से शुरू हुआ विवाद?

2013 का विधानसभा चुनाव. कांग्रेस सत्ता में थी. सीएम थे अशोक गहलोत. लेकिन नतीजे आने के बाद कांग्रेस बुरी तरह हारी. 200 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस को मात्र 21 सीटें मिलीं. बड़ी मुश्किल से कांग्रेस विपक्षी पार्टी बन पाई. आधिकारिक तौर पर 10 प्रतिशत सीटें जीतने वाली पार्टी को विपक्षी पार्टी का दर्जा मिलता है. कांग्रेस की ये अब तक की सबसे बड़ी हार थी.

इसके बाद ये माना जाने लगा कि अशोक गहलोत का जादू कम होने लगा है. गहलोत राज्य की राजनीति छोड़कर केंद्र में आ गए. लेकिन 2017 में वो फिर से अपना जादू दिखाने में सफल रहे. गुजरात चुनाव. अशोक गहलोत को गुजरात का प्रभारी बनाया गया था. 20-25 साल में पहली बार ऐसा लगा कि कांग्रेस ने चुनाव लड़ा. थोड़ी-सी मार्जिन से चूक गए. लेकिन कांग्रेस के चुनाव लड़ने की तारीफ हुई. गहलोत की भी तारीफ हुई. वो राहुल गांधी के और करीब आ गए. अब तक उन्हें सोनिया गांधी का करीबी माना जाता था. उन्हें अब एआईसीसी का महासचिव प्रभारी बनाया गया.

2018 में फिर से राज्य की राजनीति में आए गहलोत

फरवरी 2018. राजस्थान में दो लोकसभा सीटों पर और एक विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुए. सत्ता में होने के बावजूद बीजेपी हार गई. अलवर और अजमेर लोकसभा सीट बीजेपी हार गई. दोनों संसदीय क्षेत्र में बीजेपी एक भी विधानसभा सीट पर लीड नहीं ले पाई थी. विधानसभा सीटों के लिहाज से बीजेपी 18 सीटों पर सीधे-सीधे हारी. यहां से सचिन पायलट लीडर के रूप में उभरे.

राजनीति के जानकार कहते हैं कि यहां से सचिन पायलट और अशोक गहलोत में नेतृत्व की लड़ाई शुरू हुई.

अशोक गहलोत और सचिन पायलट. राजस्थान में विधानसभा चुनाव में जीत के बाद ही टशन शुरू हो गया था.
अशोक गहलोत और सचिन पायलट. राजस्थान में विधानसभा चुनाव में जीत के बाद ही टकराव शुरू हो गया था.

टिकट बंटवारे से शुरू हुआ विवाद

कांग्रेस में ये परंपरा रही है कि जो एआईसीसी यानी अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का सदस्य है, अगर उसके राज्य में चुनाव है, तो वह एआईसीसी की टिकट बांटने वाली कमेटी में शामिल नहीं हो सकता. लेकिन अशोक गहलोत ने परंपरा तोड़ दी और टिकट बंटवारे में शामिल हो गए. कहते हैं कि यहीं से दोनों के बीच तनाव शुरू हुआ. जानकार बताते हैं कि 200 में से 80 टिकट अशोक गहलोत के खाते में गए. सचिन पायलट के खाते में 50 के आसपास टिकट आए. बाकी के क्षेत्रीय छत्रपों को टिकट दिया गया. इस तरह से समीकरण साधने की कोशिश की गई.

कहते हैं कि गहलोत ने अपने खेमे के लोगों को निर्दलीय खड़ा कर दिया. दो-तीन को छोड़कर बाकी जीत भी गए. जिस तरह वसुंधरा राजे सरकार के खिलाफ लोगों में नाराजगी थी, उसे देखते हुए कांग्रेस को लगा था कि कम से कम 120 सीटें जीत जाएगी. कहा जा रहा था कि ऐसा होता है, तो गहलोत की जगह सचिन का सीएम बनना तय था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

कांग्रेस 200 सदस्यों वाली विधानसभा में 100 सीटों पर अटक गई. पायलट के कई करीबी चुनाव हार गए. ऐसे में बाजी पलट गई. कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए एक विधायक की जरूरत थी. अशोक गहलोत ने 13 निर्दलीय और राष्ट्रीय लोकदल के विधायक के साथ कांग्रेस आलाकमान को अपनी ताकत दिखाई.

टिकट बंटवारे का गहलोत ने लोड नहीं किया और पुराने कांग्रेसियों को निर्दलीय मैदान में उतार दिया. इनमें से ज्यादातर जीत गए.
टिकट बंटवारे का गहलोत ने लोड नहीं लिया और पुराने कांग्रेसियों को निर्दलीय मैदान में उतार दिया. इनमें से ज्यादातर जीत गए.

सीएम नहीं बन पाए

गहलोत के सीएम बनने पर मुहर लग गई. लेकिन सचिन नहीं मान रहे थे. उनका तर्क था कि उन्होंने पांच साल तक कड़ी मेहनत की है. घर-परिवार दांव पर लगा दिया. अंदरूनी सूत्र कहते हैं कि सीएम नहीं बनाए जाने पर पायलट ने पार्टी छोड़ने की धमकी दी. कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें कहा कि छोड़ दीजिए. फिर पायलट ने अपने पैर पीछे खींच लिए.

सचिन पायलट ने खूब कोशिश की कि उन्हें सीएम बना दिया जाए. लेकिन राजनीति के घाघ अशोक गहलोत से हार गए.
सचिन पायलट ने खूब कोशिश की कि उन्हें सीएम बना दिया जाए. लेकिन राजनीति के घाघ अशोक गहलोत से हार गए.

सचिन पायलट ने खूब कोशिश की कि उन्हें सीएम बना दिया जाए. लेकिन राजनीति के घाघ अशोक गहलोत से हार गए.

सत्ता मिलते ही टकराव शुरू

‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार शरत कुमार बताते हैं कि राजस्थान के शपथ ग्रहण समारोह में भी दोनों के बीच मनमुटाव देखने को मिला था. शपथ ग्रहण के दैरान सचिन पायलट ने अपनी कुर्सी राज्यपाल के बगल में लगाने को कहा. कहा जाता है कि अशोक गहलोत ने इसका विरोध किया. कहा कि उपमुख्यमंत्री का पद कोई संवैधानिक पद नहीं है. इसलिए राज्यपाल और मुख्यमंत्री की कुर्सी के बगल में उपमुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं लग सकती. मगर पायलट ने अपनी कुर्सी लगवाई.

सरकार बनी. मंत्रालयों का बंटवारा हुआ. सचिन पायलट को ‘मलाईदार’ कहा जाने वाला पीडब्ल्यूडी मंत्रालय दिया गया. लेकिन अशोक गहलोत ने उनके पर करत दिए. उन्होंने ये तय कर दिया कि कोई भी बड़ा प्रोजेक्ट बिना सीएमओ के पास नहीं होगा. मंत्री होते हुए भी पायलट बड़े फैसले नहीं ले पा रहे. बाद में तो गहलोत ने पायलट की ऐसी स्थिति और खराब कर दी. पायलट ने कांग्रेस आलाकमान से शिकायत कर दी कि उनके विधानसभा क्षेत्र में भी उनकी नहीं सुनी जाती है.

अशोक गहलोत-सचिन पायलट की बदौलत कांग्रेस को राजस्थान में भाजपा पर बढ़त हासिल हुई थी. (फोटोः FB)
अशोक गहलोत-सचिन पायलट की बदौलत कांग्रेस को राजस्थान में भाजपा पर बढ़त हासिल हुई थी. (फोटोः FB)

शरत कुमार बताते हैं कि राजस्थान विधानसभा में मुख्य द्वार से केवल राज्यपाल, विधानसभा अध्यक्ष और मुख्यमंत्री आते हैं. पहली बार जब विधानसभा शुरू हुई, तो उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट उसी रास्ते से आए. एक दिन तो वह आ गए, मगर दूसरे दिन जैसे ही आए, विधानसभा के मास्टर ने उन्हें रोक लिया. कहा कि आप विधायकों और मंत्रियों के रास्ते से आइए. सचिन पायलट जिद पर अड़ गए, तो अशोक गहलोत ने उन्हें आगंतुकों के रास्ते से आने का प्रावधान कर दिया. यानी बीच का रास्ता निकाला गया कि न तो मुख्यमंत्री के रास्ते से आएंगे, न मंत्रियों के रास्ते से आएंगे, वह दूसरे रास्ते से ही आएंगे.

एकजुटता का संदेश देने के लिए कभी बाइक, कभी बस और कभी एक गाड़ी में बैठ रहे हैं गहलोत-पायलट.
एकजुटता का संदेश देने के लिए कभी बाइक, कभी बस और कभी एक गाड़ी में बैठ रहे हैं गहलोत-पायलट.

धीरे-धीरे सरकार के फैसलों में सचिन पायलट की हिस्सेदारी कम होती चली गई. सचिन पायलट अक्सर बताया करते थे कि एक साल से ज्यादा हो गए, राहुल गांधी उनसे बातचीत नहीं करते हैं. यानी कांग्रेस में अब उनके पास न दिल्ली में जगह बची थी, न ही राजस्थान में.

टकराव की कई वजहें रहीं

आरोप-प्रत्यारोप दोनों तरह से चला. शरद कुमार बताते हैं कि सरकार बनते ही पहला मौका आया, जब अलवर में गैंगरेप हुआ. सचिन पायलट न केवल उपमुख्यमंत्री थे, बल्कि पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी थे. इसके बावजूद कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर अपनी ही सरकार पर सवाल उठाए. गृहमंत्री होने के नाते अशोक गहलोत पर जवाबदेही तय करने की कोशिश की. जब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत राजस्थान क्रिकेट असोसिएशन का चुनाव लड़ रहे थे, तो रामेश्वर डूडी की तरफ से साथ देते हुए सचिन पायलट ने अशोक गहलोत की मंशा पर और पुलिस पर सवाल उठाया था.

एक महीने तक चुप रहने के बाद इस मामले में अशोक गहलोत ने बयान दिया है.
एक महीने तक चुप रहने के बाद अस्पताल में बच्चों की मौत पर अशोक गहलोत ने चुप्पी तोड़ी थी.

कोटा के जे.के. लोन अस्पताल में बच्चों की मौत हुई, तो अशोक गहलोत ने कह दिया कि बीजेपी सरकार के दौरान भी इससे ज्यादा बच्चे मरे थे. इस बात को पकड़कर पायलट ने कहा कि हम सरकार में आ चुके हैं और पिछली सरकार की गलतियों को गिनाकर बच नहीं सकते हैं. पायलट यहीं नहीं रुके. सीधे कोटा अस्पताल पहुंच गए और वहां पर जाकर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सरकार पर सवाल उठाए. नागौर में दलितों की पिटाई का वीडियो वायरल हुआ. पायलट ने प्रदेश कांग्रेस की कमेटी बनाकर जांच के लिए भेज दी. कहा दलित अत्याचार की घटनाएं सरकार में नहीं होनी चाहिए और कानून व्यवस्था के जिम्मेदार लोग इस पर ध्यान दें, यह जानते हुए कि गृह मंत्री खुद अशोक गहलोत हैं.

इन तमाम मौकों पर अशोक गहलोत चुप्पी साधे रहे. जवाब नहीं दिया. बस यही कहते रहे कि अभी उनमें परिपक्वता की कमी है. धीरे-धीरे सब कुछ समझने लगेंगे. कभी-कभी तो यह कह देते थे कि प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष हैं और उनका हक बनता है कि कहीं कोई कमी हो रही है तो उस पर सवाल उठाएं.

हालांकि गहलोत को पता है कि विरोधियों को ठिकाने कैसे लगाना है. जब उन्होंने देखा कि पानी सिर के ऊपर से बहने लगा है, तो उन्होंने सचिन पायलट से पीछा छुड़ा लेना ही मुनासिब समझा. उन्होंने ऐसा स्थिति पैदा कर दी कि सचिन के पास खुली बगावत के सिवा कोई और विकल्प नहीं था. अब नतीजा सबके सामने है.


सचिन पायलट ने अब जो कहा, वो सुन कर बीजेपी को अच्छा नहीं लगेगा!

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