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हसरत मोहानी, जिनका दिया 'इंक़लाब जिंदाबाद' का नारा अंग्रेजी हुकूमत के लिए खौफ़ बन गया

8 अप्रैल 1929.

दिल्ली की लेजिस्लेटिव असेम्बली.

इस दिन यहां एक घोषणा होनी थी. दो बिलों के प्रभावी होने की. ये दो बिल थे पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट बिल. इन दोनों बिलों का विरोध असेम्बली के अधिकतर सदस्यों ने किया था. लेकिन उनकी मर्जी के खिलाफ इन्हें एनैक्ट किया जाने वाला था. इनके प्रभावी होते ही सभी हड़तालें गैरकानूनी घोषित हो जातीं. किसी को भी बिना किसी ट्रायल के जेल में डालने की छूट मिल जाती. इससे पहले कि इन पर कुछ निर्णय हो पाता, असेम्बली में जोरदार धमाके की आवाज़ आई. वहां स्मोक बम फूटे थे. इसी के साथ कुछ पैम्फलेट भी वहां गिरे. साथ ही आवाजें सुनाई दीं. एक ही नारा लग रहा था:

इंक़लाब जिंदाबाद.

यानी, क्रांति अमर रहे.

6 जून, 1929.

असेम्बली बम धमाका केस की सुनवाई.

आरोपी: भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त.

उनके वकील: मिस्टर आसिफ अली.

जज के सामने भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की स्टेटमेंट पढ़ी गई. पढ़ने वाले मिस्टर अली थे. उस स्टेटमेंट में बम फेंकने की वजह बताई गई. बताया गया कि किस तरह सरकार का अत्याचार एक ऐसे संघर्ष को जन्म देगा, जिसमें सारे ‘रोड़े’ हटा दिए जाएंगे.

क्रांति मनुष्य का अधिकार है, जिसे छीना नहीं जा सकता. आज़ादी सभी का जन्मजात हक़ है. इन मूल्यों के लिए और इस विश्वास के लिए, हम हर यातना से गुजरने को तैयार हैं. इस क्रांति की पूजास्थल पर हमारी जवानी का धूप चढ़ाने आए हैं. हम संतुष्ट हैं इससे, हम क्रांति का इंतज़ार कर रहे हैं.

इंक़लाब जिंदाबाद.

ये पहली बार नहीं था. जब इंक़लाब जिंदाबाद का नारा गूंजा था. लेकिन इस एक घटना ने इसे अमर ज़रूर कर दिया.

तब से लेकर अब तक, कई विरोध प्रदर्शनों में ये नारा उठाया गया है. कई लोगों का ये मानना है कि ये नारा भगत सिंह ने ही सबसे पहली बार दिया था.

Bhagat Singh 700
भगत सिंह ने असेम्बली में बम धमाका करना इसलिए चुना ताकि अरेस्ट होकर ट्रायल कोर्ट में अपनी विचारधारा लोगों तक पहुंचा सकें. (तस्वीर: ट्विटर)

लेकिन ऐसा नहीं है

1910 में मेक्सिको नाम के देश में क्रांति शुरू हुई. ये अमेरिका के दक्षिण में पड़ता है. पिछले 31 साल से वहां का राष्ट्रपति पोर्फिरियो डिएज था. लोग उससे तंग आ चुके थे. अंत में उसका तख्ता पलट दिया गया. इसी क्रांति के दौरान नारा दिया गया था- Viva La Revolution. स्पैनिश नारा है. इसका मतलब भी यही होता है, क्रांति अमर है.

इसी से प्रेरित होकर उर्दू शायर मौलाना हसरत मोहानी ने 1921 में इंक़लाब ज़िंदाबाद का नारा लिखा. उन्नाव जिले में पैदा हुए थे, जो आज उत्तर प्रदेश में पड़ता है. उनके शहर का नाम मोहान था, इसलिए अपना तखल्लुस मोहानी रख लिया. ये कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के संस्थापकों में से एक रहे. पूर्ण स्वराज्य की मांग सबसे पहले इन्होंने और स्वामी कुमारानंद ने ही की थी. 1921 में.

Hasrat Mohani
मौलाना हसरत मोहानी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़े थे. तब उसका नाम मोहम्मडन एंग्लो ओरिएण्टल कॉलेज हुआ करता था. इनकी लिखी हुई ग़ज़ल ‘चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है’ मशहूर गायकों जैसे गुलाम अली और जगजीत सिंह ने गाई.

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने यही नारा क्यों लगाया?

जब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ये नारा लगाया, तब कलकत्ता से निकलने वाली मॉडर्न रिव्यू नाम की मासिक पत्रिका के सम्पादकीय ने इस की आलोचना की. तब संपादक थे रामानंद चटर्जी. उन्होंने इस नारे को निरर्थक बताया था. इसके जवाब में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने इसका जवाब उन्हें भेजा. ये जवाब 24 दिसंबर 1929 को ट्रिब्यून में छपा था. इसमें इस नारे के बारे में लिखा था,

क्रांति (इंक़लाब) का अर्थ अनिवार्य रूप से सशस्त्र आन्दोलन नहीं होता. बम और पिस्तौल कभी-कभी क्रांति को सफल बनाने के साधन मात्र हो सकते हैं. इसमें भी सन्देह नहीं है कि कुछ आन्दोलनों में बम और पिस्तौल एक महत्वपूर्ण साधन सिद्ध होते हैं, परन्तु केवल इसी कारण से बम और पिस्तौल क्रांति के पर्यायवाची नहीं हो जाते. विद्रोह को क्रांति नहीं कहा जा सकता, हालांकि हो सकता है कि विद्रोह का अन्तिम परिणाम क्रांति हो.

एक वाक्य में क्रान्ति शब्द का अर्थ ‘प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना और आकांक्षा’ है. लोग आम तौर पर जीवन की परम्परागत दशाओं के साथ चिपक जाते हैं और परिवर्तन के विचार से ही कांपने लगते हैं. यही एक अकर्मण्यता की भावना है, जिसकी जगह पर क्रान्तिकारी भावना जगाने की जरूरत है. दूसरे शब्दों में, कहा जा सकता है कि अकर्मण्यता का वातावरण बन जाता है और रूढ़िवादी शक्तियां मानव समाज को कुमार्ग पर ले जाती हैं. यही परिस्थितियां मानव समाज की उन्नति में गतिरोध का कारण बन जाती हैं.

क्रान्ति की इस भावना से मनुष्य जाति की आत्मा स्थायी तौर पर ओत-प्रोत रहनी चाहिए, जिससे कि रूढ़िवादी ताकतें मानव समाज की प्रगति की दौड़ में बाधा डालने के लिए संगठित न हो सकें. यह जरूरी है कि पुरानी व्यवस्था सदा न रहे और वह नयी व्यवस्था के लिए स्थान खाली करती रहे, जिससे कि एक आदर्श व्यवस्था संसार को बिगड़ने से रोक सके. यह है हमारा अभिप्राय, जिसको हृदय में रखकर हम ‘इंक़लाब ज़िन्दाबाद’ का नारा ऊंचा करते हैं.

(स्रोत: marxist.org/shahidbhagatsingh.org)

ये है उस इंक़लाब जिंदाबाद नारे की कहानी, जो आज हर किसी की ज़बान पर है. क्रांति का सबसे ताकतवर नारा माना जाता है.


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