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चौटाला परिवार में चल रही जंग के पीछे की कहानी क्या है?

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भारत के पूर्व उप प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल एक इंटरव्यू दे रहे थे. उस वक़्त वो राजनीति से लगभग रिटायर हो चुके थे. लगभग इसलिए क्योंकि भारत में राजनीति से कोई पूरा रिटायर कभी नहीं होता. पत्रकार राजीव शुक्ला ने उनसे पूछा

आपके दोनों बेटे, रणजीत और ओमप्रकाश के बीच लड़ाई क्यों रहती है?

देवीलाल का अपना अंदाज़ था. सीधा कह देते थे. फिर जिसे चाहे जैसा लगे. भरभराती आवाज़ में बोले

अब आप मुझसे ये भी पूछोगे कि वीपी सिंह और अर्जुन सिंह की लड़ाई क्यों रहती है. ये लड़ाई तो रहती है राज के काम के लिए. दोनों पॉलिटिक्स में हैं. दोनों मुख्यमंत्री बनना चाह रहे हैं. इसका इलाज ना आपके पास है ना मेरे पास. इसका इलाज यही है कि एक की मानो दूसरे को छोड़ो.

देवीलाल ने ओमप्रकाश चौटाला की मानी. आज देवीलाल के गुज़र जाने के डेढ़ दशक बाद उनके पुत्र ओमप्रकाश चौटाला के सामने भी यही सवाल है. दोनों बेटे, अजय और अभय में से किसे बनाएं वारिस. और अजय के बागी हो चले सांसद बेटे दुष्यंत और संगठन देख रहे दिग्विजय का क्या करें.

इनेलो का अपना एक फैन बेस है जो उनके साथ हमेशा रहता है. जाट बेल्ट के ज्यादतर वोटर अब भी खुद को देवीलाल का सच्चा सिपाही कहते हैं. यही कारण है कि 2014 की मोदी लहर में भी चौटाला की रैलियों में खूब भीड़ आती थी.
इनेलो का अपना एक फैन बेस है जो उनके साथ हमेशा रहता है. जाट बेल्ट के ज्यादातर वोटर अब भी खुद को देवीलाल का सच्चा सिपाही कहते हैं. यही कारण है कि 2014 की मोदी लहर में भी चौटाला की रैलियों में खूब भीड़ आती थी.

रैली में क्यूं बिगड़ी बात?

7 अक्टूबर 2018 को सोनीपत के गोहाना में चौटाला परिवार की पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) ने रैली की. देवीलाल के सम्मान में. नाम रखा सद्भावना सम्मान रैली. मगर यहीं परिवार की सदभावना बिगड़ गई. हिसार के सांसद और चौधरी देवीलाल के प्रपौत्र दुष्यंत चौटाला ट्रैक्टर रैली का नेतृत्व करते हुए रैली स्थल और फिर मंच पर पहुंचे. इसी बीच दुष्यंत समर्थकों ने नारे लगाने शुरू कर दिए.

हमारा सीएम कैसा हो

दुष्यंत चौटाला जैसा हो

फिर बारी आई दुष्यंत के चाचा और हरियाणा के नेता प्रतिपक्ष अभय की. मगर दुष्यंत समर्थक हल्ला और नारेबाजी करते रहे. दुष्यंत के भाषण के दौरान सब चुप रहे. दुष्यंत भाषण देकर जैसे ही अपनी जगह पर बैठे, दादा ओमप्रकाश ने हाथ का इशारा कर बुलाया. और फिर मंच पर डांट लगा दी. फिर बोलने की बारी आई ओपी चौटाला की. उन्होंने कहा.

केवल नारे से काम नहीं चलता. अगर नारे से काम चलता तो मैं एकला ए चला लेता. ये जो फर्जी ताली-पटका करते हैं, नारे लगाते हैं. ये तो माहौल को बिगाड़ने का काम करते हैं. या तो वो सुधर जाएं अन्यथा ये मान के चलो कि चुनाव से पहले इस प्रकार के लोगों को हम पार्टी से निकालकर बाहर कर देंगे.

दुष्यंत चौटाला अपने समर्थकों के साथ ट्रैक्टर पर गोहाना पहुंचे. उनके इसी व्यव्हार के कारण समर्थकों को नारेबाज़ी करने का साहस मिला, जिससे ओमप्रकाश नाराज़ हो गए.
दुष्यंत चौटाला अपने समर्थकों के साथ ट्रैक्टर पर गोहाना पहुंचे. उनके इसी व्यवहार के कारण समर्थकों को नारेबाज़ी करने का साहस मिला, जिससे ओमप्रकाश नाराज़ हो गए.

इतना कहने के बाद उन्होंने दुष्यंत के छोटे भाई और रैली में युवाओं की भीड़ जुटाने वाले दिग्विजय के पर कतर दिए. दिग्विजय इनेलो के स्टूडेंट और यूथ फ्रंट के मुखिया थे. ओपी चौटाला ने आनन-फानन में इसकी सब जिला इकाई भंग कर दीं. हिसार और दादरी की जिला इकाई के प्रधान भी बदल दिए. इन्हें दुष्यंत का करीबी माना जाता था. और भी कई बदलाव हुए. अब पलड़ा अभय चौटाला ग्रुप का भारी हो गया. दुष्यंत, पापा अजय चौटाला के जेल से आने का इंतजार कर रहे हैं.

झगड़े की पृष्ठभूमि क्या है?

इस झगड़े की शुरुआत दरअसल बहुत पहले हो चुकी है. एक घटना को इस मनमुटाव का दोषी नहीं ठहराया जा सकता. इस विवाद का सबसे पहला कारण है 3 अक्टूबर 2018 को गुडगांव में हुई कार्यकर्ताओं की बैठक. इसमें ओमप्रकाश चौटाला ने अभय चौटाला की तारीफ तो की लेकिन युवा नेता दुष्यंत चौटाला का नाम तक नहीं लिया. सारे कार्यकर्ताओं ने इसे दिल पे नहीं लिया लेकिन दुष्यंत के कट्टर समर्थकों ने इसे उनका अपमान समझा. और यहीं से आगे के विरोध के लिए ज़मीन तैयार हो गई. इसके बाद 6 अक्टूबर को अभय चौटाला गोहाना में होने वाली रैली की तैयारियों का जायज़ा लेने पहुंचे. गुड़गांव की घटना से नाराज दुष्यंत चौटाला समर्थकों ने हंगामा किया. इन घटनाओं के बाद जो कसर रह गई थी वो रैली में पूरी कर ली गई. मगर अजय और अभय के बीज ये जंग छिड़ी क्यों. इसे समझने के लिए आपको ओमप्रकाश चौटाला का फैमिली स्ट्रक्चर समझना होगा.

कुछ ऐसा है चौटाला परिवार का फैमिली ट्री:

देवीलाल के चार बेटे हैं. ओमप्रकाश चौटाला, रणजीत चौटाला, प्रताप और जगदीश. इनमें से पहले दो सक्रिय राजनीति का हिस्सा हैं. देवीलाल के उप प्रधानमंत्री बन दिल्ली चले जाने के बाद उत्तराधिकार की जंग शुरू हो गई. जिसमें अंततः ओपी को जीत हासिल हुई. नाराज़ रणजीत के कांग्रेस जॉइन कर लेने के बाद पार्टी का सारा कामकाज ओमप्रकाश के बाद हाथों में आ गया. ओमप्रकाश चौटाला के दोनों बेटे अजय और अभय चौटाला भी राजनीति में हैं. JBT घोटाले के चलते जेल जाने से पहले ओपी चौटाला जींद के उचाना कलां से चुनाव लड़ते थे, और अजय सिरसा के डबवाली से. अभय सिरसा की ही एलनाबाद सीट से विधायक हैं. अजय चौटाला के दोनों बेटे भी राजनीति में हैं. बड़े बेटे दुष्यंत हिसार लोकसभा सीट से सांसद हैं और छोटे बेटे दिग्विजय इनेलो के यूथ विंग के सर्वेसर्वा हैं. अभय चौटाला के बेटे करन-अर्जुन भी राजनीति में सक्रिय हैं, हालांकि वो अभी पार्टी रैलियों में मंच पर नहीं देखे जाते.

देवीलाल के बेटे. ओमप्रकाश चौटाला, प्रताप सिंह, रणजीत सिंह क्रमशः.
देवीलाल के बेटे. ओमप्रकाश चौटाला, प्रताप सिंह, रणजीत सिंह क्रमशः.

देवीलाल के दूसरे बेटे रणजीत सिंह बहुत पहले कांग्रेस जॉइन कर चुके हैं. उनके एक और बेटे प्रताप भी राजनीति में सक्रिय हैं. रणजीत 1987 में हरियाणा की सातवीं विधानसभा में सिरसा की रोड़ी सीट से विधायक रहे हैं. देवीलाल के तीसरे बेटे जिन्हें लोग नहीं जानते वो हैं जगदीश. उन्हें शराब की लत थी और एक बार महिला से बदतमीजी को लेकर सुर्ख़ियों में रहे थे. जगदीश के बेटे आदित्य और अनिरुद्ध चौटाला ने बीजेपी जॉइन कर रखी है. चौथे बेटे प्रताप सिंह चौटाला 1967 में केवल बार कांग्रेस के टिकट पर एलनाबाद से विधायक रहे थे. 2014 में उनका देहांत हो गया.

अजय चौटाला के बेटे. दुष्यंत और दिग्विजय चौटाला (दाएं).
अजय चौटाला के बेटे. दुष्यंत और दिग्विजय चौटाला (दाएं).

ओमप्रकाश चौटाला 5 बार हरियाणा के सीएम रहे हैं. 2008 में सामने आए JBT घोटाले में अजय और ओपी के अलावा 52 लोगों पर पैसे लेकर टीचर भर्ती करने के आरोप लगे. 1999 में ओमप्रकाश चौटाला के मुख्यमंत्री रहते हुई 3,206 जूनियर बेसिक टीचर्स की भर्ती को लेकर ओमप्रकाश और उनके बेटे अजय चौटाला पर आरोप लगे. जनवरी 2013 में कोर्ट ने 10 साल की सजा का आदेश दिया. इसी घोटाले की सजा काट रहे ओपी अब स्वास्थ्य कारणों के चलते पैरोल पर बाहर आते रहते हैं.

ओमप्रकाश चौटाला के बेटे. अजय और अभय चौटाला (बाएं).
ओमप्रकाश चौटाला के बेटे. अजय और अभय चौटाला (बाएं).

क्या है JBT घोटाला?

हरियाणा में 1999-2000 के दौरान 3,206 JBT टीचर्स की भर्ती की गई. इसी भर्ती में गड़बड़ी के कारण चौटाला अपने बेटे अजय और सरकार के तीन बड़े अफसरों के साथ 10 साल की जेल काट रहे हैं. उनपर आरोप थे कि इस भर्ती में 3 से 4 लाख रुपये प्रति टीचर लिए गए और अपने मनपसंद लोगों को भर्ती किया. हरियाणा सरकार के शिक्षा विभाग में अफसर रहे संजीव कुमार ने इस घोटाले का भंडाफोड़ किया. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एक PIL दाखिल कर ये आरोप लगाए कि चौटाला ने उनपर पहले से सिलेक्टेड कैंडिडेट्स की लिस्ट बदलने का दबाव बनाया. संजीव कुमार के साथ-साथ अफसर विद्या धर और मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार शेर सिंह को भी जेल हुई.

JBT घोटाले में ओमप्रकाश चौटाला और उनके बेटे अजय चौटाला को कोर्ट ने 10 साल जेल की सजा सुनाई थी.
JBT घोटाले में ओमप्रकाश चौटाला और उनके बेटे अजय चौटाला को कोर्ट ने 10 साल जेल की सजा सुनाई थी.

कैसा रहा है इनेलो का सफ़र?

इनेलो की मुख्य ताकत जाट किसान वोटर हैं.पार्टी रोहतक, झज्जर, भिवानी, हिसार बेल्ट में राज्य के अन्य हिस्सों की अपेक्षा ज्यादा मजबूत है. पार्टी का लोकसभा में प्रदर्शन ज्यादा अच्छा नहीं रहा है. 2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव में पार्टी 10 में से एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत पाई. 2009 में तो इनेलो भाजपा के साथ गठबंधन में भी थी. पार्टी का सबसे अच्छा प्रदर्शन 1999 के लोकसभा चुनाव में था जब भाजपा के साथ गठबंधन में पार्टी ने 5 सीटें जीती थी. हरियाणा की बाकी 5 लोकसभा सीटों पर भाजपा के कैंडिडेट चुनाव लड़ रहे थे और वो सब भी लोकसभा के लिए चुन लिए गए थे. इसके बाद से पार्टी का ग्राफ लगातार गिरता रहा है. 2004 के लोकसभा चुनाव में पार्टी हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश की 22 सीटों पर चुनाव लड़ी लेकिन 14 उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त हो गई. 2014 में पार्टी के युवा नेता दुष्यंत चौटाला हिसार और चरणजीत सिंह रोड़ी सिरसा सीट से चुनाव जीते.
विधानसभा चुनाव की बात करें तो पार्टी 2000 के चुनावों में 90 में से 47 सीट जीतकर पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने में सफल रही थी लेकिन 2005 के चुनावों में केवल 9 सीटें ही जीत सकी. कांग्रेस ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में 67 सीटें जीती और सरकार बनाई. 2009 के चुनावों में पार्टी एक बार फिर उभरी लेकिन सरकार नहीं बना पाई. कुल 31 सीटें मिलीं लेकिन सरकार बनाने के लिए के लिए ज़रूरी आंकड़े से बहुत दूर थी. 2014 के विधानसभा सभा चुनाव में पार्टी को 19 सीटें मिलीं और दुष्यंत के चाचा अभय चौटाला विपक्ष के नेता चुने गए.

कौन हैं देवीलाल जिन्हें हाईजैक करने की कोशिश की जा रही है?

देवीलाल हरियाणा के धुरंधर नेता रहे हैं. पिता बड़े ज़मींदार थे. अपनी पढाई पूरी करने के बाद देवीलाल गांधीजी से प्रभावित होकर कांग्रेस जॉइन कर ली और 1930 के दशक में आज़ादी आंदोलन में कूद पड़े. अंग्रेजी राज में अपनी गतिविधियों के चलते कई बार जेल भी गए. 1944 में एक बार तत्कालीन पंजाब के वित्त मंत्री और बड़े जाट नेता सर छोटूराम देवीलाल के गांव आए थे और कांग्रेस छोड़कर यूनियनिस्ट पार्टी में शामिल होने को कहा. देवीलाल नहीं माने. कांग्रेस में रहे और किसानों के लिए काम करते रहे. 1951 में हुए विधानसभा चुनावों में वो असेंबली के लिए चुन लिए गए. अपने राजनीतिक कद को बढ़ाने के लिए जिस एक काम का बीड़ा उन्होंने उठाया वो था पंजाबी बोलने वाले सूबे को हरियाणवी बोलने वाले क्षेत्र से अलग करना. 1962 में असेंबली के लिए दोबारा चुने गए थे और अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही 1966 में हरियाणा बनवाने में सफल भी हो गए.

देवीलाल के लिए खुद भी पार्टी का वारिस चुनना आसान नहीं रहा था. उन्होंने अपने छोटे बेटे रणजीत सिंह की बजाय ओपी चौटाला को चुना. रणजीत सिंह ने बाद में कांग्रेस जॉइन कर ली. यहां भी कुछ दुष्यंत से ऐसा ही करने की उम्मीद कर रहे हैं, जो फ़िलहाल तो असंभव नज़र आ रहा है.
देवीलाल के लिए खुद भी पार्टी का वारिस चुनना आसान नहीं रहा था. उन्होंने अपने छोटे बेटे रणजीत सिंह की बजाय ओपी चौटाला को चुना. रणजीत सिंह ने बाद में कांग्रेस जॉइन कर ली. यहां भी कुछ दुष्यंत से ऐसा ही करने की उम्मीद कर रहे हैं, जो फ़िलहाल तो असंभव नज़र आ रहा है.

70 के दशक की शुरुआत में जब कांग्रेस पर इंदिरा हावी हो चुकी थी, तब देवीलाल का यहां से मोहभंग होने लगा. वो इंदिरा विरोधी हो गए और इमरजेंसी के दौरान जेल में डाल दिए गए. बाहर आए तो जनता पार्टी के साथ हो लिए, जो उस वक़्त विरोध का दूसरा नाम थी. जीते और 1977 में पहली बार हरियाणा के मुख्यमंत्री बना दिए गए. 2 साल बाद कुछ राजनीतिक कारणों से इस्तीफ़ा देना पड़ा. इसके बाद 1980 में हुए लोकसभा चुनाव में वो चुन लिए गए. कार्यकाल सीमित रहा लेकिन कुछ साल बाद 1987 में फिर से विधायक बने और में मुख्यमंत्री भी. 1989 का लोकसभा चुनाव आते-आते देवी जनता दल के साथ आ चुके थे,जो जनता पार्टी और कुछ अन्य दलों के नेताओं से मिलकर बनी थी. 1989 में देवी उप प्रधानमंत्री बने लेकिन वीपी सिंह ने अगले ही साल उनका इस्तीफा मांग लिया.

देवीलाल में अंतिम दिनों में ओमप्रकाश चौटाला संगठन के सर्वेसर्वा हो चुके थे. अजय और अभय की जिम्मेदारियां विभाजित थी, इसीलिए उनके मतभेद कभी सामने नहीं आए, और ना ही ओमप्रकाश को कहीं से चुनौती मिली. अब भी पार्टी में कुछ लोग उनसे नाराज़ भले हों लेकिन उनकी सत्ता को चुनौती नहीं दे रहे. सभी एक स्वर में ओपी को ही अपना नेता मान रहे हैं.
देवीलाल में अंतिम दिनों में ओमप्रकाश चौटाला संगठन के सर्वेसर्वा हो चुके थे. अजय और अभय की जिम्मेदारियां विभाजित थी, इसीलिए उनके मतभेद कभी सामने नहीं आए, और ना ही ओमप्रकाश को कहीं से चुनौती मिली. अब भी पार्टी में कुछ लोग उनसे नाराज़ भले हों लेकिन उनकी सत्ता को चुनौती नहीं दे रहे. सभी एक स्वर में ओपी को ही अपना नेता मान रहे हैं.

अब बारी देवीलाल की थी. चंद्रशेखर के साथ मिलकर जनता पार्टी में विद्रोह करा दिया. वीपी सिंह की कुर्सी गई और हाथ आई चंद्रशेखर के. देवीलाल फिर से उपप्रधानमंत्री बना दिए गए. लेकिन ज्यादा दिन नहीं टिक सके. मार्च 1991 में चंद्रशेखर सरकार गिर गई. इसके बाद देवीलाल कभी लोक सभा नहीं पहुंच पाए और लगातार तीन बार हारे. अपने जीवन के आखिरी दिनों में वो राज्यसभा सांसद थे. हरियाणा में 2 साल से ज्यादा चली चेतना यात्रा के बाद हरियाणा लोक दल पार्टी बनाई जिसे बाद में इंडियन नेशनल लोक दल कहा जाने लगा. राज्यसभा चले जाने और ढ़लती उम्र के कारण संगठन का सारा काम ओमप्रकाश चौटाला को देकर अपने अंतिम दिनों में दिल्ली रहे. अब इसी पार्टी की कमान को लेकर हंगामा मचा हुआ है.

राजनीतिक असुरक्षा का परिणाम है मतभेद:

झगड़े की एक वजह अजय और अभय की राजनीतिक असुरक्षा भी है. अजय के दोनों बेटे राजनीति में हैं, जबकि अभय के बेटे अभी उस स्तर पर नहीं पहुंचे हैं. एक दौर में देवीलाल के सहयोगी रहे रणसिंह मान ने बताया

इनकी लड़ाई दरअसल पार्टी को हाईजैक करने की है. अभय को ये लग रहा है कि जबतक उसके बच्चे राजनीति में आएंगे तब तक दुष्यंत और दिग्विजय पार्टी में अपनी जगह बना चुके होंगे. उस वक़्त इनके लिए वापसी करना आसान नहीं होगा. आप इनसे देवीलाल के काम पूछिए. एक नहीं बता पाएंगे. इन्हें बस उनकी विरासत चाहिए. वोट मिलते रहें ये किसी के नाम की माला जपने को तैयार हैं.

क्या ये पॉलिटिकल ड्रामा है?

कुछ राजनीतिक चिंतकों का मानना है कि ये सब ड्रामा है. पॉलिटिकल इमेज बनाने के लिए किया जा रहा है. रोहतक स्थित महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट के प्रोफेसर राजेंद्र शर्मा ने बताया-

युवाओं के बीच दुष्यंत काफी पॉपुलर हैं. वो चाहते हैं कि अगर इनेलो चुनाव जीते तो दुष्यंत को ही मुख्यमंत्री बनाया जाए. लेकिन ये सब इतना स्पष्ट भी नहीं है, जितना दिख रहा है. इसमें उत्तर प्रदेश में हुए ड्रामे जैसा कुछ लग रहा है जिसमें अखिलेश को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करने के लिए मुलायम के खिलाफ दिखाया गया और बाद में सब एक हो गया.जब आपकी कोई छवि नहीं होती तो उसका निर्माण ऐसे ही किया जाता है. फिर आपको उस छवि के लिए भी वोट मिल सकता है जो आपकी है ही नहीं. दुष्यंत चाहकर भी ओमप्रकाश चौटाला के खिलाफ नहीं बोलेंगे क्योंकि उन्होंने ही संगठन को संभालकर रखा है. लेकिन राजनीति में कई बार वो सब भी करना पड़ता है जो आप नहीं करना कहते. दुष्यंत को इन सबसे दूर रहना चाहिए. आज नहीं तो कल लोग उनके लिए वोट करेंगे ही.

अब ये ड्रामा है या हकीकत कह नहीं सकते लेकिन जो सामने आ रहा है उसके हिसाब से चौटाला की पार्टी में सब ठीक नहीं चल रहा, जो आगे चलकर नुकसान ही करेगा. अब नुकसान संगठन को होगा या किसी नेता को, कहा नहीं जा सकता.

अभी ताज़ा पोजीशन ये है कि दुष्यंत बगावती हो चुके हैं. कह रहे है कि पार्टी द्वारा की जाने वाली किसी भी कार्रवाई के लिए तैयार हैं. अलग पार्टी बनाने की बातें भी चल रही हैं. कहीं भाषण देते हैं तो लोग दुष्यंत जिंदाबाद और अभय जिंदाबाद के नारे लगाकर दो धड़ों में बंटे दिखाई देते हैं. जो भी हो, आने वाले लोकसभा चुनाव और उसके बाद हरियाणा विधानसभा चुनाव में ये पार्टी के लिए अच्छी ख़बर नहीं है.


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