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वो पांच मौके जब मोदी के साथ झूला झूलते शी जिनपिंग की फोटो पर हमें गुस्सा आया

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क़रीब 5 साल पहले साल 17 सितंबर, 2014 को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ पीएम मोदी ने साबरमती नदी के किनारे झूला झूला था. 2014 की मीटिंग के बाद सरकार ने इसे एक सफल दौरा बताया था. कुछ ट्रेड एग्रीमेंट भी साइन किए थे. आज पांच साल बाद शी जिनपिंग फिर भारत यात्रा पर हैं. इस बार शी जिनपिंग और मोदी की मुलाक़ात महाबलीपुरम में हो रही है. ये भारत और चीन के बीच दूसरा अनौपचारिक शिखर सम्मेलन है. पहला अनौपचारिक शिखर सम्मेलन हुआ था चीन के वुहान शहर में. 27-28 अप्रैल, 2018 को. अनौपचारिक शिखर सम्मेलन किसी भी मुल्क के सबसे बड़े नेता को अपने समकक्ष के साथ बिना किसी फिक्स एजेंडे के बात करने की सुविधा देता है.

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में औपचारिक शिखर सम्मेलनों के निष्कर्ष पहले से पता होते हैं. मुद्दे फिक्स होते हैं. बात बनी तो ठीक, वर्ना मान लिया जाता है कि बातचीत बिना नतीजे के रही या असफल हो गई. अनौपचारिक सम्मेलन फिक्स मुद्दों के इर्द-गिर्द ही बंधकर बात करने की बजाए खुलकर आपसी मुद्दों पर बात करने की गुंजाइश देता है. जब मोदी 2018 में चीन गए थे तो विपक्ष ने इल्ज़ाम लगाया था कि मोदी बिना एजेंडा फिक्स किए सैर-सपाटा करने निकल गए हैं. सरकार और भाजपा का दावा था कि ऐसा नहीं है. मोदी-जिनपिंग की मुलाकात का भारत को फायदा मिलेगा. विदेश मंत्रालय ने 28 अप्रैल को वेबसाइट पर एक नोट पब्लिश किया था. जिसमें लिखा गया कि दोनों नेताओं ने सीमा, सामरिक हित और निवेश सरीखे कई मुद्दों पर खुलकर बात की. ऐसे में दूसरे शिखर सम्मेलन से उम्मीदे हैं. खासतौर पर तब, जब चीनी राष्ट्रपति भारत में हैं.

पीएम मोदी के साथ शी जिनपिंग.
पीएम मोदी के साथ शी जिनपिंग.

जिनपिंग के भारत आने से पहले एक घटना ऐसी हुई है जो चीनी इरादों पर शक पैदा करती है. दरअसल, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान 2 दिन के चीन दौरे पर थे. चीन ने कहा कि वो पाकिस्तान की संप्रभुता, स्वतंत्रता और सुरक्षा में साथ खड़ा है. एक तरीके से पाकिस्तान की बोली बोलते हुए चीन ने कश्मीर मामले में किसी भी तरह की एकतरफ़ा कार्रवाई का विरोध किया और कहा कि इससे हालात और जटिल होंगे.

ऐसा पहली बार नहीं है जब चीन ने पाकिस्तान का साथ दिया हो या भारत की मुख़ालफ़त की हो. 2014 में साबरमती नदी पर झूला झूलने के बाद से ही कम से कम 5 मौके ऐसे रहे जब चीन ने भारत के ख़िलाफ स्टैंड लिया हो या फिर भारत की परेशानियां का सबब बना हो. यहां आप 2014 के बाद के उन 5 मौकों के बारे में पढ़ेंगे जिनमें चीन भारत के विरुद्ध खड़ा हुआ है.

डोकलाम में खींचतान

भौगोलिक रूप से डोकलाम भारत, चीन और भूटान बार्डर के तिराहे पर मौजूद है. ये भूटान का इलाका है जिस पर चीन अपना हक़ जताता है. भारत भूटान का विदेश नीति और रक्षा मामलों में मार्गदर्शन करता है. साथ ही ये इलाका भारत के सिलीगुड़ी कॉरोडोर के पास है. यहां किसी दूसरे मुल्क की गहरी पैठ भारत के हित में नहीं है. लेकिन जून, 2017 में चीन की ओर से इस इलाके में घुसपैठ बढ़ी. चीन यहां सड़क बना रहा था. भारत और भूटान के विरोध के बाद भी चीन ने कार्रवाई जारी रखी. सीमा पर बढ़ते तनाव के बीच हर कोई सोच रहा था कि 62 की जंग के बाद शांत भारत-चीन की सीमा पर कोई गोली न चले. बाद में भारत और चीन ने आपसी बातचीत से मामला सुलझा लिया. इस विवाद के तक़रीबन एक साल बाद पीएम मोदी वुहान गए थे. तब विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा था कि पीएम ने चीनी राष्ट्रपति के साथ सीमा विवाद पर बात की है. चीन की सीमा पर घुसपैठ सिर्फ डोकलाम में ही नहीं हुई है, हिमाचल, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में भी चीन घुसपैठ करता रहा है.

डोकलाम की लोकेशन.
डोकलाम की लोकेशन.

अज़हर जैसे आतंकियों का बचाव

चीन ने जैश-ए-मोहम्मद सरगना मसूद अजहर को ग्लोबल आतंकी घोषित करने का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में पारित नहीं होने दिया. अजहर के खिलाफ फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका ने 27 फरवरी, 2019 को UNSC में प्रस्ताव दिया था. इस पर आपत्ति लगाने की समय सीमा 14 मार्च को रात 12:30 बजे तक थी. पर वक्त बीतने से ठीक एक घंटे पहले चीन ने इस पर अड़ंगा लगा दिया था. चीन ने इस प्रस्ताव में तकनीकी खामी बताकर मसूद को बचा लिया. चीन सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य है. ऐसे में उसकी आपत्ति पर कमिटी ने फैसले को ‘टेक्निकल होल्ड’ पर रखा है. ये चौथा मौका था, जब चीन ने मसूद अजहर को बैन होने से बचा लिया. बाद में भारत ने राजनयिक तरीके से मामले को संभाला और 1 मई, 2019 को मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकी घोषित कर दिया. भारत ने 2009 में पहली बार मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकी घोषित करने के लिए प्रस्ताव पेश किया था. 10 साल बाद भारत अपने मकसद में कामयाब हो पाया. इन दस सालों में सुरक्षा परिषद में वीटो पावर रखने वाले चीन ने ही भारत के रास्ते में अड़ंगा लगाया था.

आतंक का चेहरा बन चुका मसूद अज़हर किसी समय देवबंदी मदरसे में पढाया करता था. फाइल फोटो.
चीन ने मसूद अजहर का बचाव किया था.

CPEC का रास्ता PoK से बनाना

CPEC का मतलब है चाइना-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर. ये चीन को ज़मीन के रास्ते पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से जोड़ेगा. ग्वादर ईरान की सीमा के पास है. चीन का सामान रेल और सड़क के रास्ते ग्वादर पहुंचेगा और वहां से आगे समंदर के रास्ते अफ्रीका और यूरोप तक जाएगा, बिना भारत का चक्कर लगाए. भारत को इस प्रोजेक्ट के उस हिस्से से दिक्कत है जो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) से होकर गुज़रता है. भारत समय-समय पर CPEC के खिलाफ अपनी आपत्ति दर्ज कराता रहा है. लेकिन चीन और पाकिस्तान ने इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया. CPEC वन रोड, वन बेल्ट परियोजना का हिस्सा है. चीन का PoK को भारत का हिस्सा न मानते हुए वहां CPEC कॉरिडोर बनाना भारतीय हितों के खिलाफ रहा है. लेकिन सब जानने के बाद भी, पीएम मोदी से मुलाक़ात के बाद भी चीन ने CPEC का काम जारी रखा है.

 CPEC प्रोजेक्ट पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर, खैबर पख्तूनख्वाह और बलूचिस्तान जैसे कई संवेदनशील इलाकों से गुजरता है. तस्वीर रॉयटर्स.
CPEC प्रोजेक्ट पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर, खैबर पख्तूनख्वाह और बलूचिस्तान जैसे कई संवेदनशील इलाकों से गुजरता है. तस्वीर रॉयटर्स.

न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप में एंट्री ब्लॉक की

मई, 2016 में न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (NSG) की सदस्यता के लिए भारत के अर्जी दी थी. NSG में 48 सदस्य देश हैं. यह वैश्विक परमाणु कारोबार को रेगुलेट करता है. तभी से चीन इस बात पर जोर देता रहा है कि परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर करने वाले देशों को ही NSG में प्रवेश की इजाजत दी जानी चाहिए. NPT पर साइन नहीं करने वालों में भारत, पाकिस्तान और इज़रायल सरीखे देश शामिल हैं. भारत ने साइन न करने का कारण भी बताया है. भारत काफी समय से कहता रहा है कि वह अंतरराष्ट्रीय परमाणु अप्रसार संधि पर साइन नहीं करेगा, क्योंकि यह भेदभावपूर्ण है. भारत समेत इस संधि पर साइन नहीं करने वाले देशों का तर्क है कि विकसित देशों ने पहले ही परमाणु हथियारों का भंडार बना लिया है और बाकी देशों पर अप्रसार संधि थोप रहे है. लेकिन 2016 से अबतक NSG की हर मीटिंग में चीन ने भारत की राह रोकी है. भारत के दावे पर वो कहता है कि अगर भारत को NSG का सदस्य बनाया जाता है तो पाकिस्तान को भी बनाना चाहिए. जबकि ये सब जानते हैं कि पाकिस्तानी न्यूक्लियर प्रोग्राम के जनक डॉ. अब्दुल क़ादिर खान के खुलासा किया था कि पाकिस्तान ने उत्तर कोरिया और ईरान को न्यूक्लियर तकनीक बेची है. आज इन्हीं दोनों देशों के न्यूक्लियर प्रोग्राम को लेकर पूरी दुनिया में चिंतन हो रहा है. चीन भारत की राह रोकने के लिए पाकिस्तान के नाम का इस्तेमाल करता रहा है.

UNSC में स्थाई सीट

भारत की आज़ादी के वक्त संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत को स्थाई सीट मिल सकती थी. उस वक्त की बड़ी शक्तियां- अमेरिका और सोवियत रूस भी भारत के समर्थन में थे. लेकिन तत्कालीन सरकार ने प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया था. क्योंकि वो सीट चीन (कोमिनतांग सरकार) की थी. 1949 में वहां माओ त्से तुंग की कम्युनिस्ट सरकार बनी. तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री नेहरू ने चीन की सीट लेने से इनकार कर दिया था. लेकिन बाद में उसी चीन ने भारत पर हमला कर दिया. 1962 में हिंदुस्तान को जंग लड़नी पड़ी. बाद की सरकारों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता के लिए कोशिश की. लेकिन चीन ने बार-बार अड़ंगा डाला. इस वक्त सुरक्षा परिषद में 15 देश हैं. पांच स्थाई और 10 अस्थाई. अस्थाई देशों को 2 साल के लिए चुना जाता है. भारत 7 बार इस श्रेणी में रहते हुए सुरक्षा परिषद का हिस्सा बन चुका है. हालांकि अस्थाई सदस्य देशों के पास वीटो का हक़ नहीं होता.

2015 में काफी कोशिशों के बाद सुरक्षा परिषद के विस्तार और सुधारों के ड्राफ्ट पर चर्चा के लिए सभी देश राज़ी हो गए थे. लेकिन आज 4 साल बाद भी चीन भारत को स्थाई सदस्यता देने के पूर्ण ख़िलाफ है और कोशिश में रहता है कि कैसे सहयोगी देशों को भी अलग किया जाए.

इसके अलावा चीन ने व्यापार से जुड़े कई ऐसी रुकावटें पैदा की हैं जो भारत के आर्थिक हितों के ख़िलाफ जाती हैं. भारत जब भी चीन से मिले, तो उसे ये बातें ज़रूर ख़्याल में रखनी चाहिए.


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